✍️ मोहित धवन
लखनऊ, 24 सितंबर 2026
पिछले दस दिनों में गणेश उत्सव को बहुत करीब से देखने का मौका मिला।
कहीं विशाल पंडाल सजे, कहीं छोटी-सी प्रतिमा के सामने पूरा परिवार बैठा दिखाई दिया। कहीं बच्चे बप्पा को चिट्ठियां लिख रहे थे, कहीं मोदक चढ़ रहे थे। शाम होते ही आरती, भजन और ढोल के बीच शहर जैसे कुछ देर के लिए अपनी रोजमर्रा की भागदौड़ भूल जाता था।
कई जगह तीन, पांच या सात दिनों में विसर्जन हो चुका है। अब बाकी जगहों पर भी बप्पा की विदाई का समय करीब है।
“गणपति बप्पा मोरया… अगले बरस तू जल्दी आ…”
इस आवाज़ में उत्साह है, लेकिन कहीं न कहीं विदाई की हल्की-सी उदासी भी।
इन्हीं दिनों यह सब देखते हुए मेरे मन में एक सवाल बार-बार आया—हम बप्पा को इतने प्रेम से बुलाते हैं और फिर उनका विसर्जन क्यों करते हैं?
खासकर उत्तर भारत में कुछ लोगों के मन में यह सवाल स्वाभाविक हो सकता है। जिन्हें हम अपना मानते हैं, घर लाते हैं, सुबह-शाम उनके सामने बैठते हैं, फिर कुछ दिनों बाद उनकी विदाई क्यों?
इसकी धार्मिक और पारंपरिक व्याख्याएं अपनी जगह हैं। मुझे लगा, शायद इसका एक अर्थ अपने जीने में भी खोजा जा सकता है।
मिट्टी से एक स्वरूप बनता है। हम उससे जुड़ते हैं, उसे सजाते हैं, उसके सामने अपनी बातें रखते हैं और कुछ दिनों बाद वही स्वरूप फिर प्रकृति में लौट जाता है।
तो क्या स्थायी प्रतिमा नहीं, उससे जुड़ा भाव और उससे मिली समझ है?
यहीं मुझे मध्यस्थ दर्शन में समझी एक बात याद आती है—“श्रेष्ठ आचरण का अनुकरण ही पूजा है।”
मेरे लिए यह छोटी-सी बात पूजा को देखने का एक नया रास्ता खोलती है।
गणेश जी को हम बुद्धि और विवेक से जोड़कर देखते हैं। इसलिए उन्हें देखते हुए मेरे मन में यह सवाल भी आया कि यह विवेक हमारे अपने जीने में कहां दिखाई देता है? उन्हें विघ्नहर्ता कहते हुए मन में एक और सवाल आया—जिन विघ्नों को हम दूर करने की प्रार्थना करते हैं, उनमें से कुछ कहीं हमारे अपने भीतर तो नहीं?
ये किसी निष्कर्ष की तरह नहीं, बस वे सवाल हैं जो इस उत्सव के बीच मेरे भीतर उठे।
मध्यस्थ दर्शन में एक और बात मुझे छूती है—सह-अस्तित्व। यानी हम अकेले नहीं हैं; हमारा होना संबंधों और प्रकृति से जुड़ा है।
इन दस दिनों में पंडालों के आसपास इसका एक छोटा-सा रूप भी दिखाई दिया। कोई प्रतिमा बना रहा था, कोई सजावट में लगा था, कोई प्रसाद बांट रहा था, तो कोई व्यवस्था संभाल रहा था। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं, युवा—अलग-अलग लोग किसी एक भाव के आसपास साथ दिखाई दिए।
शायद उत्सव की खूबसूरती भी यहीं है—कुछ समय के लिए ‘मैं’ थोड़ा पीछे होता है और ‘हम’ सामने दिखाई देने लगता है।
अब विसर्जन होगा।
पंडाल हटेंगे, रोशनियां उतरेंगी और ढोल की आवाज़ भी धीरे-धीरे थम जाएगी। शहर फिर अपनी रोजमर्रा की रफ्तार में लौट आएगा।
लेकिन शायद एक सवाल तब भी बचा रहेगा—
इन दस दिनों में जो महसूस किया, उसमें से कितना हमारे साथ जाएगा?
जरूरी नहीं कि इसका कोई बहुत बड़ा उत्तर मिले। लेकिन अगर इन दस दिनों की कोई छोटी-सी अनुभूति हमारे रिश्तों, हमारे फैसलों या प्रकृति को देखने के ढंग में कहीं ठहर जाए, तो शायद उत्सव हमारे भीतर भी थोड़ा-सा बचा रहता है।
तब विसर्जन केवल विदाई नहीं रह जाता।
मिट्टी का स्वरूप प्रकृति में लौट जाता है… लेकिन उससे जुड़ा कोई भाव, कोई सवाल या शायद कोई छोटी-सी समझ हमारे भीतर रह जाती है।
इस बार जब आवाज़ आए—
“गणपति बप्पा मोरया… अगले बरस तू जल्दी आ…”
तो शायद मन में एक बात और उठे—
“अगले बरस जब आना बप्पा, तो देखना… इस बार के उत्सव से हमारे भीतर कुछ बचा या नहीं।”
शायद मेरे लिए इस बार के गणेश उत्सव का यही सबसे सुंदर प्रसाद है।