✍️ मोहित धवन
लखनऊ, 21 सितंबर 2026
पिछले आठ महीनों में अमीनाबाद का यह मेरा दूसरा ही चक्कर था। जाने का मन कई बार हुआ, लेकिन वहां के ट्रैफिक और भीड़ का ख्याल आते ही हिम्मत जवाब दे जाती है।
कल तय हुआ—अमीनाबाद की चाट खानी है।
गाड़ी हनुमान सेतु मंदिर के पास छोड़ी और वहां से ई-रिक्शा पकड़ लिया। कुछ देर बाद अमीनाबाद की जानी-पहचानी हलचल के बीच हम पहुंच गए—पंडित चाट।
दुकान को देखते ही लगा जैसे समय यहां कुछ धीरे चला हो। करीब पच्चीस साल पुरानी मेरी यादों से बहुत कुछ मिलता-जुलता था। हां, जगह बदली हुई लगी। बातचीत में पता चला कि पिछले करीब 24 वर्षों में आसपास ही यह तीसरी जगह है, जहां से दुकान चल रही है।
बात आगे बढ़ी तो इस स्वाद का इतिहास भी खुलने लगा। इसकी जड़ें उस दौर तक जाती हैं, जब चाट दुकान के काउंटर से नहीं, गलियों में घूमकर परोसी जाती थी। बताते हैं कि अंगद महाराज फतेहगंज से गणेशगंज तक घूम-घूमकर चाट बेचा करते थे। वर्ष 1927 में यह कारोबार नगरपालिका में दर्ज हुआ। यानी अगले साल इसके दर्ज इतिहास को सौ वर्ष पूरे हो जाएंगे।
आलू टिक्की, पानी के बताशे, मटर चाट, पालक और मिक्स चाट यहां की पहचान हैं। लेकिन ‘सुरसुरी चाट’ यानी धनिया के आलू का अपना स्वाद है—धनिये की खुशबू के साथ ऐसा तीखापन, जो पहली ही चम्मच में अपनी मौजूदगी दर्ज करा देता है।
पर पंडित चाट की कहानी केवल प्लेट में नहीं है।
काउंटर के बाहर खड़े मिलते हैं सुभाष चंद्र शर्मा। उन्हें देखकर लगता है जैसे वे चाट बेचने से ज्यादा अपने ग्राहकों का स्वागत करने के लिए वहां खड़े हों। कोई पुराना ग्राहक हो या पहली बार आया हो, हर किसी को उसी सहजता से सुनते हैं।
और उनसे दो बातें कर लीजिए तो बातचीत स्वाद से निकलकर जिंदगी तक पहुंच जाती है।
“पच्चीस साल में बहुत कुछ बदल गया। वो जमाना और था, ये जमाना और है।”
सुभाष जी के लिए यह बदलाव सिर्फ बाजार का नहीं है। वे बताते हैं कि पहले कम आमदनी में भी गुजारा हो जाता था। आज कमाई बढ़ी है, लेकिन जरूरतें और मुश्किलें भी बढ़ी हैं। जिंदगी में वह सुकून नहीं रहा। नई पीढ़ी की अपनी सोच और अपने सपने हैं। जरूरी नहीं कि बच्चे उसी काम को चुनें, जिसे परिवार वर्षों से करता आया हो।
इन बातों को कहते हुए उनके स्वर में शिकायत नहीं सुनाई देती। बीते समय की हल्की-सी कसक जरूर है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा आज को स्वीकार करने का ठहराव।
इसी बीच वे एक ऐसी बात कहते हैं, जो शायद बदलते समाज की छोटी-सी तस्वीर भी है—
“पहले घर में सबका स्वाद एक होता था, आज सबका स्वाद अलग है।”
फिर मलिहाबाद से आने वाले अपने एक ग्राहक का किस्सा सुनाते हैं। उन्हें इतनी तीखी चाट चाहिए कि बनाते-बनाते हाथ रुकने लगे—अब और कितनी मिर्च डालें! सुभाष जी मुस्कराते हुए बताते हैं कि फिर भी कोशिश यही रहती है कि इतनी दूर से आया ग्राहक जिस स्वाद की उम्मीद लेकर आया है, उसे वही मिले।
शायद किसी पुराने प्रतिष्ठान की उम्र सिर्फ कैलेंडर के वर्षों से नहीं मापी जाती। उसकी असली उम्र उन लोगों से बनती है, जो बार-बार लौटकर आते हैं और उन हाथों से, जो बदलते वक्त के साथ भी अपनापन बचाए रखते हैं।
अमीनाबाद की गलियों ने इन वर्षों में बहुत कुछ बदलते देखा होगा। दुकान ने भी अपनी जगह बदली, बाजार ने अपना रंग और लोगों ने जीने का ढंग। फिर भी पंडित चाट के बाहर खड़े सुभाष जी को देखकर पुराने लखनऊ की एक खूबी अब भी दिखाई देती है—सामने वाले को ग्राहक से पहले इंसान समझने की।
चाट तो लखनऊ में आप बहुत जगह खा लेंगे। अच्छी चाट भी मिल जाएगी। लेकिन हर जगह से कोई कहानी साथ लेकर नहीं लौटते।
कुछ जगहें स्वाद के कारण याद रहती हैं और कुछ वहां मिले लोगों के कारण।
पंडित चाट में दोनों मिल जाते हैं।
उस शाम धनिया के आलू का तीखापन कुछ देर बाद उतर गया था,
लेकिन सुभाष जी की बातें दिल में रह गईं।