“जब भजन सुनने नहीं, उनमें डूबने लगा Lucknow: Kumar Satyam की Bhajan Jamming”

✍️ Mohit Dhawan
लखनऊ | 18 सितंबर 2026

कल शाम करीब सात बज रहे होंगे। लखनऊ के डॉ. बी.आर. आंबेडकर ऑडिटोरियम में तालियों के बीच कुमार सत्यम की एंट्री होती है। उनके साथ करीब 10–11 कलाकारों की टीम है और सामने बैठे लोगों को शायद तब अंदाजा भी नहीं था कि अगले ढाई घंटे में यह सभागार कभी कृष्ण-भक्ति में झूमेगा, तो कभी राम-भक्ति में डूब जाएगा।

शुरुआत “अच्युतम केशवम्…” से होती है।

पहले ही भजन के बाद कुमार सत्यम सामने बैठे लोगों से कहते हैं—आज वे अकेले नहीं गाएंगे, सभी को उनके साथ स्वर मिलाना होगा। क्योंकि जैमिंग का अर्थ केवल सुनना नहीं, खुद उस संगीत का हिस्सा बन जाना है।

लखनऊ ने उनकी बात मान ली।

“श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवा…” की धुन उठी तो सभागार से भी आवाजें मिलने लगीं। कुमार सत्यम मुस्कराकर बोले—“आपने हमें यहां क्यों बुलाया? आप तो खुद बड़े सुरीले हो!”

कुमार सत्यम के लिए संगीत केवल पेशा नहीं, विरासत भी है। वे ऐसी सांगीतिक परंपरा से आते हैं जिसकी जड़ें कई पीढ़ियों तक जाती हैं। उनकी पारिवारिक संगीत विरासत करीब 13 पीढ़ियों पुरानी बताई जाती है। इसी परंपरा में स्वर्गीय पं. ललन जी महाराज और स्वर्गीय पं. रामाशीष महाराज जैसे नाम भी शामिल रहे हैं। उनके दादा और पिता भी गायकी से जुड़े रहे। भजन, ग़ज़ल, सूफी और सेमी-क्लासिकल गायकी के साथ कुमार सत्यम आज उसी विरासत को अपने अंदाज़ में आगे बढ़ा रहे हैं।

कल शाम उनके इस अंदाज़ की सबसे खूबसूरत बात थी—श्रोताओं से लगातार बनता संवाद।

कभी “तुम श्याम रूप में आना, राधा साथ लेके…” और “श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी…” के साथ माहौल कृष्ण-भक्ति में रंग जाता, तो अगले ही पल “श्री राम जानकी बैठे हैं मेरे सीने में…” राम-भक्ति का भाव जगा देता। “पतवार के बिना ही मेरी नाव चल रही है…” जैसे भजन इस यात्रा को एक अलग भाव में ले जाते रहे।

एक प्रस्तुति खत्म होती और लगभग बिना ठहराव अगली धुन शुरू हो जाती। बीच-बीच में गिटार, तबला और दूसरे वाद्ययंत्रों की जुगलबंदी शाम को और जीवंत करती रही। कई बार शब्द थम जाते और वाद्ययंत्र ही जैसे आपस में संवाद करने लगते।

लेकिन असली बदलाव सामने बैठे लोगों में दिखाई दिया।

शुरुआत में लोग अपनी कुर्सियों पर बैठकर तालियां बजा रहे थे। कुछ देर बाद वहीं बैठे-बैठे झूमने लगे। फिर धीरे-धीरे कुर्सियां छूटने लगीं और लोग मंच के सामने पहुंच गए। कोई हाथ उठाकर गा रहा था, कोई तालियां बजा रहा था और कोई कृष्ण-भक्ति के रंग में बेफिक्र होकर नाच रहा था।

अब सामने केवल श्रोता नहीं थे—वे भी प्रस्तुति का हिस्सा बन चुके थे।

शायद यही भजन-जैमिंग की खूबसूरती है। भजन जाना-पहचाना हो सकता है, शब्द पहले भी सुने हो सकते हैं, लेकिन जब सैकड़ों लोग एक साथ उन्हें गाते हैं तो मंच और दर्शक के बीच की दूरी मिटने लगती है।

ढाई घंटे से अधिक समय तक कभी कृष्ण-भक्ति में झूमता, तो कभी राम-भक्ति में डूबता लखनऊ कुमार सत्यम और उनकी टीम के साथ गाता रहा।

कार्यक्रम खत्म होने तक लगा कि लोग यहां भजन सुनने आए जरूर थे, लेकिन लौटते समय उन्हें थोड़ा-सा जीकर जा रहे थे।

कुछ शामें कार्यक्रम खत्म होने के साथ खत्म नहीं होतीं—वे अपने पीछे एक धुन छोड़ जाती हैं।

कल की यह शाम भी शायद उन्हीं में से एक थी।

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