उन आँसुओं ने ज़िन्दगी का मकसद बदल दिया

यह लेख केवल अभिषेक सिंह की सेवा-यात्रा का वर्णन नहीं, बल्कि एक संवेदनशील युवा के भीतर मानवता के जागरण की प्रेरक कहानी है। वरिष्ठ पत्रकार राज खन्ना ने सहज और भावपूर्ण शब्दों में दिखाया है कि कैसे एक छोटी-सी संवेदना आजीवन सेवा के संकल्प में बदल सकती है। यह लेख पाठकों को सोचने और समाज के प्रति अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करता है।

क्या भारत का मिडिल क्लास अब जोखिम लेने लगा है?

क्या सचमुच भारत का मिडिल क्लास बदल रहा है? आखिर क्यों आज के युवा क्रिकेट, स्टार्टअप, सोशल मीडिया और नए व्यवसायों में अपना भविष्य तलाश रहे हैं? क्या यह एक नई पीढ़ी की कहानी है, या फिर बदलते भारत की नई पहचान?

संपादकीय

सोनम वांगचुक के अनशन के बहाने यह संपादकीय भारतीय लोकतंत्र, जनआंदोलनों, सरकार की जवाबदेही और युवाओं की आकांक्षाओं पर गंभीर प्रश्न उठाता है। साथ ही यह कौशल-आधारित शिक्षा, प्रकृति के साथ संतुलित विकास और नए सामाजिक नेतृत्व की आवश्यकता पर विचार प्रस्तुत करता है।

जब एक बेटे की स्मृतियाँ बन गईं सैकड़ों बच्चों के सपनों की रोशनी

जब एक बेटे की स्मृतियाँ बन गईं सैकड़ों बच्चों के सपनों की रोशनी
तन्मय फाउंडेशन: शिक्षा के माध्यम से समाज में बदलाव की एक प्रेरक पहल

38 वर्षों से मानवता की सेवा का पर्याय बना अंकितग्राम सेवाधाम आश्रम

36 वर्षों की सेवा यात्रा का प्रेरक उत्सव—अंकितग्राम सेवाधाम में मानवीय शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समर्पण का अनूठा संगम।

बाजपेयी जी की कचौड़ी: एक दोना, दो कचौड़ियाँ और पूरा लखनऊ

लखनऊ में एक कहावत-सी सुनने को मिलती है—“हुज़ूर, शहर को समझना है तो उसकी रसोई तक जाइए।” शायद यही वजह है कि इस शहर की पहचान सिर्फ़ टुंडे के कबाब या मक्खन मलाई तक सीमित नहीं है। सुबह के लखनऊ की अपनी एक अलग थाली है, और उस थाली का सबसे आत्मीय स्वाद है—बाजपेयी जी की गरमागरम कचौड़ी।

शर्मा जी की चाय: कुल्हड़ में उबलती लखनऊ की तहज़ीब, गोल समोसों में बसती यादों की विरासत

आज भी सुबह होते ही यहां कुल्हड़ों से उठती चाय की भाप, मक्खन से लबालब बन-मक्खन और ताज़ा तले गोल समोसों की खुशबू लोगों को अपनी ओर खींच लाती है। दुकान के बाहर लगी कतारें इस बात का प्रमाण हैं कि स्वाद का रिश्ता समय से नहीं, भरोसे से बनता है।