आखिर ऐसा क्या है बाबा नीब करोरी में?

‘हनुमान अंश’ देखते हुए लौटी एक पुरानी स्मृति और मन में उठा एक सवाल

✍️ मोहित धवन
7 सितंबर 2026

आज ‘हनुमान अंश’ देखकर सिनेमा हॉल से बाहर निकला तो मन प्रसन्न था, लेकिन फिल्म मुझे करीब 33–34 साल पीछे भी ले गई।

बात शायद 1992-93 के आसपास की है। हमारे एक शिक्षक हुआ करते थे—रमेश त्रिपाठी जी। उन्होंने बताया कि नीब करोरी मंदिर में हर वर्ष की तरह भंडारा होने वाला है और वहाँ चलने का कार्यक्रम बना।

नीब करोरी वही स्थान है, जिसके नाम से बाबा आगे चलकर दुनिया भर में जाने गए। मेरे लिए इसका एक व्यक्तिगत संयोग यह भी था कि यह मेरे गृह जनपद फर्रुखाबाद में ही है और हमारे यहाँ से लगभग 30 किलोमीटर दूर रहा होगा।

हम भंडारे में शामिल हुए और रात वहीं रुके। तब बाबा के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी। इंटरनेट और सोशल मीडिया का समय भी नहीं था। लेकिन मंदिर का वातावरण, श्रद्धालुओं का भाव और वहाँ बिताई वह रात स्मृति में रह गई। इसके बाद वहाँ आना-जाना शुरू हो गया।

नौकरी के सिलसिले में बाद में लखनऊ आया तो हनुमान सेतु मंदिर में नियमित दर्शन होने लगे। कंपनी के काम से नैनीताल-अल्मोड़ा की तरफ जाना होता तो कई बार रास्ते में कैंची धाम भी पहुँचा। इन स्थानों पर एक बात हमेशा महसूस हुई—कुछ देर के लिए मन की भागदौड़ कम हो जाती थी और एक अलग-सी शांति मिलती थी।

समय के साथ बाबा के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ते हुए भी देखा। कभी जिनके बारे में जानकारी मुख्यतः लोगों के अनुभवों और आपसी बातचीत से फैलती थी, आज उनका नाम भारत से बहुत दूर तक पहुँच चुका है।

इसकी एक चर्चित कड़ी Steve Jobs से भी जुड़ती है।

Apple की स्थापना से पहले 1974 में युवा Jobs भारत आए थे। बाबा के बारे में सुनकर वे कैंची धाम पहुँचे, हालांकि बाबा 1973 में शरीर छोड़ चुके थे और दोनों की मुलाकात नहीं हो सकी। एक अमेरिकी युवा की आध्यात्मिक खोज उसे उत्तराखंड के एक आश्रम तक ले आई—अपने आप में यह प्रसंग दिलचस्प है।

करीब आधी सदी बाद बाबा की कहानी एक बिल्कुल अलग माध्यम से बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँची।

करीब दो करोड़ रुपये के सीमित बजट में बनी हनुमान अंश शुरुआती दिनों में बॉक्स ऑफिस पर संघर्ष करती दिखाई दी। फिर word-of-mouth ने गति पकड़ी और फिल्म 150 करोड़ रुपये का आँकड़ा पार कर गई।

इस फिल्म से जुड़ी एक और कहानी ने लोगों का ध्यान खींचा—सुनील लोधी की।

ट्रेन में गाना गाने वाले सुनील की आवाज़ को पहचान मिली और एक गीत ने उनके लिए बॉलीवुड का रास्ता खोल दिया। इसे देखकर यह भी महसूस होता है कि हमारे आसपास कितनी प्रतिभाएँ ऐसी होंगी, जिन्हें अपनी जिंदगी बदलने के लिए शायद केवल एक सही अवसर की जरूरत है।

इन तीनों घटनाओं की अपनी-अपनी तार्किक व्याख्या संभव है।

Steve Jobs की भारत यात्रा को आध्यात्मिक जिज्ञासा के संदर्भ में देखा जा सकता है। छोटी फिल्म की बड़ी सफलता के पीछे दर्शकों का जुड़ाव और मजबूत word-of-mouth हो सकता है। सुनील की कहानी प्रतिभा, अवसर और सही समय के मिलने की कहानी हो सकती है।

इसलिए मैं इनमें किसी चमत्कार को स्थापित करने या उसका प्रचार करने की कोशिश नहीं करना चाहता।

मेरी दिलचस्पी किसी निष्कर्ष से ज्यादा उस प्रश्न में है, जो हनुमान अंश देखते हुए मन में आया।

एक संत, जिन्होंने दशकों पहले शरीर छोड़ दिया—उनके प्रति आकर्षण समय के साथ कम होने के बजाय इतना व्यापक कैसे होता चला गया?

क्या यह उनके व्यक्तित्व की सरलता है?
उनकी शिक्षाएँ हैं?
हनुमान जी के प्रति उनकी भक्ति है?
लोगों के एक-दूसरे तक पहुँचते व्यक्तिगत अनुभव हैं?
या आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच मनुष्य की शांति और किसी गहरे अर्थ की तलाश?

शायद हर व्यक्ति इसका उत्तर अपने अनुभव और दृष्टिकोण से अलग देगा।

मेरे लिए फिल्म ने बस एक पुरानी स्मृति का दरवाजा खोल दिया—1992-93 में अपने शिक्षक के साथ एक वार्षिक भंडारे में शामिल होने के लिए की गई छोटी-सी यात्रा का।

तब यह एक सामान्य यात्रा थी।

आज तीन दशक से अधिक समय बाद दुनिया भर से लोगों को बाबा से जुड़े स्थानों तक पहुँचते देखकर मन में केवल एक जिज्ञासा रह जाती है—

आखिर ऐसा क्या है बाबा नीब करोरी में?

मैं इसका उत्तर पाठक पर छोड़ना चाहूँगा।

आप इसे कैसे देखते हैं—आस्था, संयोग, मानवीय अनुभव या कुछ और?

RSS के सौ साल: क्या चाल, चरित्र और चेहरा बदल रहा है?

शाखा और चरित्र निर्माण से सत्ता के करीब तक, गांधी-अंबेडकर से आर्थिक असमानता तक—एक सदी की यात्रा कुछ नए सवाल भी खड़े करती है

✍️ मोहित धवन
5 सितंबर 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS की सौ साल की यात्रा को केवल हिंदुत्व या राजनीति की कहानी मानना शायद अधूरी तस्वीर देखना होगा। यह एक ऐसे संगठन की यात्रा भी है, जिसकी पहचान कभी मैदान में लगने वाली शाखाओं, अनुशासन, सीमित साधनों में काम करने वाले प्रचारकों और चरित्र निर्माण से होती थी और जो आज देश के सबसे प्रभावशाली सामाजिक-वैचारिक संगठनों में गिना जाता है।

लेकिन हर विस्तार अपने साथ एक सवाल भी लाता है—संगठन बड़ा हुआ, तो क्या उसके मूल संस्कार भी वैसे ही रहे?

हाल ही के एक podcast में वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह और विजय त्रिवेदी के बीच RSS के सौ वर्षों और उसके बदलते स्वरूप पर हुई बातचीत इसी सवाल को कई दिलचस्प संदर्भों से सामने लाती है। संघ की सौ साल की यात्रा पर विस्तार से लिख चुके त्रिवेदी का आकलन है कि इसका बड़ा हिस्सा संघर्ष में गुजरा। लंबे समय तक उसका जोर हिंदू समाज को एक व्यापक छतरी के नीचे लाने और व्यक्ति के चरित्र निर्माण पर रहा।

मैदान की शाखा से संस्थानों तक

त्रिवेदी संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से जुड़ा एक उदाहरण देते हैं। उनके मुताबिक शाखा को मैदान में लगाने के पीछे एक भाव यह भी था कि भवन और संपत्ति संगठन के काम का केंद्र न बनें।

आज संघ के अनेक कार्यालय और उससे प्रेरित संस्थान हैं। त्रिवेदी इसे पुराने संगठनात्मक मॉडल से आए बदलाव के रूप में देखते हैं।

इसका दूसरा पक्ष भी है। सौ वर्षों में जिस संगठन का आकार और गतिविधियां कई गुना बढ़ी हों, उसके लिए संस्थागत ढांचा खड़ा होना स्वाभाविक है। इसलिए सवाल भवनों के होने या न होने का नहीं, बल्कि यह है—क्या संसाधन आज भी साधन हैं, या उनके साथ संगठन की संस्कृति भी बदल रही है?

गांधी, संविधान और अंबेडकर

त्रिवेदी संघ में आए बदलाव को तीन महत्वपूर्ण संदर्भों से देखते हैं—महात्मा गांधी, भारतीय संविधान और डॉ. बी.आर. अंबेडकर।

आज संघ के सामाजिक विमर्श में गांधी, अंबेडकर, ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले जैसे नाम प्रमुखता से दिखाई देते हैं। सामाजिक समरसता, जातिगत भेदभाव मिटाने और नागरिक कर्तव्यों की बात भी उसकी सार्वजनिक भाषा का हिस्सा बनी है।

इसे कोई ऐतिहासिक विरोधाभास मान सकता है और कोई समय के साथ विकसित होती सामाजिक सोच। लेकिन असली कसौटी शायद यह नहीं कि किन महापुरुषों को स्वीकार किया गया, बल्कि यह है कि उनके विचार व्यवहार में कितने दिखाई देते हैं।

‘हिंदू’ का अर्थ कितना बदला?

RSS प्रमुख मोहन भागवत का हालिया न्यूयॉर्क बयान इस बहस को नया संदर्भ देता है। उन्होंने कहा कि यदि कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह जाता। उन्होंने अलग-अलग धार्मिक रास्तों और प्रत्येक मनुष्य की गरिमा की भी बात की।

विजय त्रिवेदी इसे संघ की उस व्यापक व्याख्या से जोड़ते हैं, जिसमें ‘हिंदू’ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत पहचान है। इसे समझाते हुए वे उदाहरण देते हैं कि जैसे अमेरिका से जुड़ा व्यक्ति American और Germany से जुड़ा व्यक्ति German कहलाता है, उसी तरह हिंदुस्तान से जुड़ा व्यक्ति व्यापक अर्थ में हिंदू है—जिसे आज ‘भारतीय’ भी कहा जा सकता है।

लेकिन यहीं एक स्वाभाविक सवाल खड़ा होता है—अगर ‘भारतीय’ शब्द सभी नागरिकों को सहजता से समेटता है, तो ‘हिंदू’ शब्द पर आग्रह क्यों? और क्या मुसलमान, ईसाई, सिख तथा अन्य समुदाय भी इस व्यापक परिभाषा में स्वयं को उतनी ही सहजता से देख पाते हैं?

यहीं यह सवाल भी उभरता है कि हम संघ की बदलती सोच देख रहे हैं या बदलते समय के साथ उसकी सार्वजनिक भाषा में आया बदलाव।

सत्ता ने किसे बदला?

त्रिवेदी की ज्यादा गंभीर चिंता संघ की बदलती कार्य-संस्कृति को लेकर है।

इसी संदर्भ में वे अमित शाह द्वारा कार्यकर्ताओं की एक बैठक में दिए गए संबोधन का जिक्र करते हैं। त्रिवेदी के मुताबिक अमित शाह ने कार्यकर्ताओं को याद दिलाया था कि आज जिस राजनीतिक संगठन को वे इतने व्यापक रूप में देखते हैं, उसकी नींव सुंदर सिंह भंडारी जैसे लोगों की तपस्या से भी बनी है। ऐसे कार्यकर्ता संघ और जनसंघ का काम करने के लिए साइकिल से निकलते थे। रूमाल में दो रोटियां बांध लेते; रास्ते में कुछ मिल गया तो ठीक, नहीं तो पानी के साथ वही रोटियां खाकर काम जारी रखते थे।

त्रिवेदी इसी पुराने उदाहरण के सामने आज के बढ़ते संसाधनों और सुविधाओं को रखते हैं। उनका सवाल है कि सादगी, त्याग और न्यूनतम साधनों वाली उस कार्य-संस्कृति पर सत्ता के करीब आने का कितना असर पड़ा है?

सुविधा अपने आप में मूल्यों के क्षरण का प्रमाण नहीं है। समय के साथ यात्रा, संचार और संगठन चलाने के तरीके बदलना भी स्वाभाविक है। फिर भी एक सवाल महत्वपूर्ण बना रहता है—RSS ने BJP को जितना प्रभावित किया, क्या BJP की लंबी सत्ता ने भी RSS को बदल दिया है?

‘1% क्लब’ और आखिरी पंक्ति का आदमी

शीतल पी. सिंह बातचीत को अर्थव्यवस्था की ओर मोड़ते हुए सवाल उठाते हैं कि जब दुनिया भर में धन और आर्थिक शक्ति कुछ चुनिंदा हाथों में सिमटती दिखाई दे रही है, तब RSS की अपनी आर्थिक समझ क्या कहती है?

विजय त्रिवेदी भी बढ़ती आर्थिक असमानता को गंभीर चिंता मानते हैं। वे उस बहस का जिक्र करते हैं जिसमें मौजूदा अर्थव्यवस्था को एक तरह के ‘1% क्लब’ की ओर बढ़ता बताया जाता है—जहां संपत्ति और अवसरों का बड़ा हिस्सा सबसे संपन्न एक प्रतिशत के आसपास केंद्रित होता जा रहा है। दिलचस्प यह है कि व्यवस्था पर सवाल उठाने के बजाय समाज का बड़ा हिस्सा खुद उसी एक प्रतिशत में शामिल होने की दौड़ में दिखाई देता है।

2022-23 के एक प्रमुख अध्ययन में भारत के शीर्ष एक प्रतिशत के पास करीब 40 प्रतिशत संपत्ति और कुल आय में लगभग 23 प्रतिशत हिस्सेदारी होने का अनुमान लगाया गया। यानी ‘1% क्लब’ की चर्चा के पीछे आर्थिक असमानता का एक वास्तविक प्रश्न भी मौजूद है।

यहीं संघ परिवार की पुरानी ‘स्वदेशी’ आर्थिक धारा याद आती है। वाजपेयी सरकार के दौर में स्वदेशी जागरण मंच वैश्वीकरण, विनिवेश और कुछ आर्थिक नीतियों पर सरकार से अलग आवाज उठाता दिखाई देता था।

दूसरी तरफ दीनदयाल उपाध्याय का ‘अंत्योदय’—यानी समाज की आखिरी पंक्ति में खड़े सबसे कमजोर व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचाना—एक बिल्कुल अलग कसौटी सामने रखता है।

एक तरफ अर्थव्यवस्था का ‘1% क्लब’ और दूसरी तरफ आखिरी पंक्ति में खड़ा आदमी—आज RSS की आर्थिक सोच इन दोनों के बीच कहां खड़ी है?

त्रिवेदी इसी संदर्भ में एक तीखा व्यंग्य करते हैं। दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर आज BJP का भव्य राष्ट्रीय मुख्यालय है। वे कहते हैं कि अगर स्वयं दीनदयाल आज वहां पहुंचें तो शायद उनके लिए भी प्रवेश आसान न हो।

यह टिप्पणी प्रतीकात्मक है, लेकिन इसके पीछे सवाल गंभीर है—क्या कोई आंदोलन सत्ता और संसाधनों के विस्तार के साथ उस अंतिम व्यक्ति से दूर होने का जोखिम भी उठाता है, जिसके लिए वह कभी खड़ा हुआ था?

दूसरे सौ वर्षों की असली परीक्षा

सौ साल बाद RSS पहले से कहीं अधिक व्यापक, संसाधन-संपन्न और प्रभावशाली है। इसे उसकी संगठनात्मक सफलता के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन प्रभाव जितना बड़ा होता है, उसकी कसौटी भी उतनी ही कठिन होती है।

संघ के दूसरे सौ वर्षों में सवाल केवल उसकी शाखाओं, कार्यालयों या राजनीतिक प्रभाव का नहीं होगा। सवाल यह भी होगा कि जिस सेवा भाव, सादगी और चरित्र निर्माण को उसने अपनी ताकत बनाया, वह सत्ता और संसाधनों के बीच कितना सुरक्षित रह पाया।

गांधी की सादगी, अंबेडकर की समानता, संविधान की बराबरी, फुले का सामाजिक न्याय, दीनदयाल का आखिरी व्यक्ति और हेडगेवार का चरित्र निर्माण—इनकी असली परीक्षा भाषणों या भवनों में नहीं, व्यवहार में होगी।

और शायद RSS के सौ वर्षों का सबसे महत्वपूर्ण सवाल भी यही है—

संघ ने भारत को कितना बदला, और बदलते भारत तथा सत्ता के करीब पहुंचने की यात्रा ने खुद संघ को कितना बदल दिया?

इसी जवाब में शायद यह भी छिपा है कि RSS की केवल चाल और चेहरा बदला है, या उसके चरित्र में भी कोई गहरा परिवर्तन आया है।

‘Winning Through Execution’: A Book Rooted in the Real World of Sales

✍️ Mohit Dhawan

3 September 2026,

Some books introduce us to their authors. In the case of Winning Through Execution, it is the other way around for me. I have known its author, Maneesh Kapur, since the days when we both worked with PepsiCo India.

I was based in Delhi at the time, while Maneesh was our colleague in the Punjab team. Even then, one of his interests stood out clearly—training and capability building. So, years later, while reading Winning Through Execution – A Practical Guide to Sales, Distribution and Leadership, I felt that the same passion had now evolved into a book, enriched by years of professional experience.

The central idea of the book is simple and practical: a good strategy is important, but results ultimately depend on how well it is executed. Maneesh attempts to bridge the gap between boardroom planning and ground realities. Topics such as territory planning, distributor ROI, working capital, input KPIs and pre-call planning make it more of a practical guide than merely a motivational business book. 

WINNING THROUGH EXECUTION

The book also questions some common assumptions in Sales. Does working harder always mean better performance? Do more sales calls necessarily result in more business? The author places greater emphasis on effective execution rather than mere activity. Having spent many years in Sales myself, I find this particularly relevant—being busy in the market and being productive are not always the same thing.

The book’s PERI Square Model—Planning, Execution, Review and Innovation—gives this thinking a structured framework. Particularly useful is the idea that a review should go beyond asking, “How much did we sell?” and instead explore why performance changed and what needs to be done differently going forward. 

WINNING THROUGH EXECUTION

The book also offers a practical perspective on month-end target pressure. Instead of constantly focusing on the final sales number, Maneesh suggests paying closer attention to the daily inputs that eventually produce that result. 

WINNING THROUGH EXECUTION

Importantly, the book does not restrict Sales to numbers alone. It covers retailer psychology, relationships, leadership, coaching and emotional intelligence, and goes on to discuss technology and AI. Yet, the author maintains that Sales remains fundamentally a people-driven business—technology should support relationships, not replace them. 

WINNING THROUGH EXECUTION

Experienced Sales professionals may find some of the concepts familiar, but the book’s simple and practical approach can be particularly useful for young professionals and first-time managers.

For me, the book also has a personal dimension. It is satisfying to see a colleague whose passion for training I witnessed years ago turn that passion into a book.

Perhaps that is also the essence of Winning Through Execution—Strategy shows the way, but Execution takes you to the destination.

कृष्ण और सुदामा: क्या दोस्ती अब भी बिना हैसियत देखे होती है?

पंद्रह साल बाद एक पुराने मित्र से हुई बातचीत ने याद दिलाया कि समय हमारी परिस्थितियां बदल सकता है, लेकिन कुछ रिश्तों में अपनापन शायद वहीं ठहरा रहता है।

✍️ मोहित धवन
2 सितंबर 2026

कल अचानक एक पुराने मित्र का फोन आया।

बात शुरू हुई तो एहसास हुआ कि शायद करीब 15 साल बाद हम एक-दूसरे से इस तरह जुड़ रहे थे। इतने वर्षों में बहुत कुछ बदल चुका था—काम, शहर, जिम्मेदारियां और जिंदगी को देखने का नजरिया भी।

लेकिन कुछ मिनटों की बातचीत के बाद लगा जैसे बीच के पंद्रह साल कहीं गायब हो गए हों।

पुरानी यादों से शुरू हुई बातचीत धीरे-धीरे आज की जिंदगी तक पहुंच गई। कभी हम मिलते थे तो सबसे बड़ी चिंता अपना करियर हुआ करती थी—नौकरी कैसी चल रही है, आगे क्या करना है, कहां पहुंचना है और भविष्य कैसे बेहतर बनाना है।

कल वही दो दोस्त बात कर रहे थे, लेकिन चिंताएं बदल चुकी थीं।

अब चर्चा अपने करियर से ज्यादा बच्चों की पढ़ाई, उनके करियर, उनके भविष्य और परिवार की जिम्मेदारियों की थी। वह भी लगभग उन्हीं सवालों से गुजर रहा था, जिनसे मैं।

फोन रखने के बाद एक बात मन में आई—

समय हमारी चिंताएं खत्म नहीं करता, शायद सिर्फ उनका पता बदल देता है।

कभी हम अपने भविष्य को लेकर चिंतित थे, आज बच्चों के भविष्य को लेकर हैं।

लेकिन उस बातचीत ने एक और सवाल छोड़ दिया। करीब पंद्रह वर्षों तक जिन दो दोस्तों के बीच कोई खास संपर्क नहीं रहा, वे अचानक इतनी सहजता से कैसे बात करने लगे?

शायद कुछ रिश्तों की यही खूबसूरती है।

और जन्माष्टमी के आसपास यही बात कृष्ण और सुदामा की मित्रता की याद दिलाती है।

कृष्ण और सुदामा की कथा भारतीय परंपरा में पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है। दोनों गुरु सांदीपनि के आश्रम में साथ रहे और शिक्षा प्राप्त की। बाद में जीवन उन्हें बिल्कुल अलग परिस्थितियों में ले गया। कृष्ण द्वारका के वैभव तक पहुंचे, जबकि सुदामा का जीवन अभावों में बीता।

लोकप्रिय कथा के अनुसार, कठिन परिस्थितियों में सुदामा अपने पुराने मित्र कृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे। देने के लिए कोई कीमती उपहार नहीं था—बस थोड़े से चावल।

लेकिन कृष्ण ने मित्र के वस्त्र, उसकी आर्थिक स्थिति या उसके उपहार की कीमत नहीं देखी। उन्होंने अपने पुराने मित्र को देखा।

शायद यही इस कथा का सबसे मानवीय पक्ष है।

आज भी स्कूल-कॉलेज के दोस्त जीवन में अलग-अलग रास्तों पर निकल जाते हैं। कोई बड़ी कंपनी में ऊंचे पद तक पहुंचता है, कोई व्यवसाय करता है, कोई विदेश चला जाता है, कोई अपने शहर में सामान्य जीवन जीता है तो कोई परिस्थितियों से संघर्ष करता रहता है।

बीस-पच्चीस साल बाद उनकी आय बराबर नहीं होती, पद बराबर नहीं होते, घर और गाड़ियां बराबर नहीं होतीं।

लेकिन क्या दोस्ती के लिए इनका बराबर होना जरूरी है?

आज इस सवाल की अहमियत शायद और बढ़ गई है।

सोशल मीडिया ने पुराने दोस्तों से जुड़े रहना आसान बनाया है, लेकिन उसने तुलना को भी हमारे जीवन का हिस्सा बना दिया है। किसने नया घर खरीदा, कौन विदेश घूम रहा है, किसे प्रमोशन मिला, किसके बच्चे कहां पढ़ रहे हैं—बहुत कुछ अब हमारी स्क्रीन पर दिखाई देता रहता है।

कई बार अनजाने में उपलब्धियां रिश्तों के बीच भी जगह बनाने लगती हैं।

ऐसे में कृष्ण-सुदामा की कहानी एक साधारण-सी बात याद दिलाती है—दो लोगों की परिस्थितियां समान होना जरूरी नहीं, लेकिन उनके बीच सम्मान समान रह सकता है।

सच्ची मित्रता बराबर हैसियत वाले दो लोगों के बीच नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए बराबर सम्मान रखने वाले दो लोगों के बीच होती है।

उम्र बढ़ने के साथ शायद हम यह भी समझने लगते हैं कि संपर्क और संबंध एक ही चीज नहीं हैं।

मोबाइल में सैकड़ों नंबर हो सकते हैं। सोशल मीडिया पर हजारों लोग जुड़े हो सकते हैं। काम और समाज के कारण परिचय का दायरा लगातार बढ़ सकता है।

लेकिन कुछ पुराने दोस्त ऐसे होते हैं जिनसे वर्षों बात न हो, फिर भी बातचीत दोबारा शुरू होने पर परिचय की जरूरत नहीं पड़ती।

कल मेरे साथ शायद यही हुआ।

पंद्रह साल बाद बातचीत वहीं से तो शुरू नहीं हुई जहां छूटी थी, लेकिन अपनापन जरूर वैसा ही लगा। फर्क बस इतना था कि कभी हम अपनी जिंदगी बनाने की चिंता साझा करते थे, आज अपने बच्चों की जिंदगी को लेकर चिंताएं साझा कर रहे थे।

शायद समय ने हमारी बातचीत के विषय बदल दिए थे, रिश्ते की सहजता नहीं।

इस जन्माष्टमी पर जब घरों और मंदिरों में कृष्ण का बाल रूप सजेगा, झांकियां लगेंगी और उत्सव मनाया जाएगा, तब कृष्ण-सुदामा की मित्रता को अपनी जिंदगी से जोड़कर देखने का भी एक अवसर है।

हो सकता है हमारे फोन में भी किसी ऐसे पुराने मित्र का नंबर हो, जिससे कभी रोज बात होती थी और आज वर्षों से कोई बातचीत नहीं हुई।

उससे संपर्क करने के लिए किसी काम या खास अवसर की जरूरत नहीं।

कभी-कभी सिर्फ इतना कहना काफी होता है—

“बहुत दिन हो गए… याद आए, तो सोचा बात कर लूं।”

क्योंकि शायद दोस्ती की सबसे खूबसूरत पहचान यही है—

समय बदल जाए, परिस्थितियां बदल जाएं, हैसियत बदल जाए… लेकिन मिलने पर अपनापन हिसाब न मांगे।

क्या हम कुछ सीखेंगे? — प्रकृति के साथ जीना कब सीखेंगे?

नेपाल की त्रासदी केवल एक आपदा की कहानी नहीं, यह हमारे विकास, बढ़ती जरूरतों और प्रकृति के साथ रिश्ते को फिर से समझने का सवाल भी है

✍️ मोहित धवन
31 अगस्त 2026

नेपाल की त्रासदी पर इस series के पहले हिस्से में हमने तबाही और जिंदगी बचाने की जंग देखी। दूसरे हिस्से में सवाल उठाया—आखिर जिम्मेदार कौन है?

अब शायद सबसे जरूरी सवाल बचता है—

क्या हम इससे कुछ सीखेंगे?

हर बड़ी आपदा के बाद लगभग एक जैसा क्रम दिखाई देता है। राहत पहुंचती है, मुआवजे की घोषणा होती है, सड़कें और पुल दोबारा बनते हैं, कुछ समय कारणों पर बहस होती है और फिर जिंदगी आगे बढ़ जाती है।

धीरे-धीरे हम भी भूल जाते हैं।

केदारनाथ हो, हिमाचल और उत्तराखंड में भूस्खलन हों या अब नेपाल की यह त्रासदी—हर घटना के बाद एक बात जरूर सुनाई देती है कि प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है।

लेकिन शायद इसे थोड़ा अलग तरह से देखने की जरूरत है।

प्रकृति अपनी व्यवस्था में चल रही है। सवाल यह है कि क्या हम उस व्यवस्था को समझकर जी रहे हैं?

आज विकास की हमारी परिभाषा काफी हद तक सुविधाओं से जुड़ गई है। बेहतर सड़क, बड़ा घर, ज्यादा बिजली, तेज यात्रा और अधिक उपभोग को हम प्रगति के संकेत मानते हैं।

इन सुविधाओं में अपने आप में कुछ गलत नहीं है। समस्या शायद वहां शुरू होती है जहां जरूरत की जगह लगातार बढ़ती चाहत लेने लगती है।

प्रश्न इतना बड़ा है कि हमारे मित्र और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं से जुड़े समाजसेवी मुदित टंडन भी इस विषय पर अपने विचार लिखने से खुद को नहीं रोक सके।

वे कहते हैं कि हर बड़ी त्रासदी के बाद हम भावुक होते हैं, उसे प्राकृतिक या दैवीय आपदा कहकर दुख व्यक्त करते हैं और कुछ समय बाद फिर अपनी सामान्य जिंदगी में लौट जाते हैं।

लेकिन क्या हमने कभी रुककर यह समझने की कोशिश की कि इसमें हमारी अपनी भूमिका कितनी है?

मुदित टंडन आज की उस सोच पर भी सवाल उठाते हैं जिसमें जरूरतों से ज्यादा दूसरों से आगे निकलने की होड़ दिखाई देती है। पहाड़ों में घर चाहिए, resorts और आधुनिक सुविधाओं वाले villas चाहिए और हर खूबसूरत जगह तक आसान पहुंच भी।

उनके मुताबिक जिस ठंडी हवा, हरियाली और प्राकृतिक वातावरण की तलाश में हम पहाड़ों पर जाते हैं, अपनी सुविधाओं के विस्तार से उसी वातावरण को धीरे-धीरे बदल भी रहे हैं।

उनका सवाल सीधा है—

हर बड़ी घटना के बाद हम प्रकृति को दोष देते हैं, लेकिन क्या कभी यह भी देखते हैं कि प्रकृति के हिस्से में हमारा हस्तक्षेप कितना बढ़ गया है?

उनकी बात से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन सवाल महत्वपूर्ण है—

क्या हमारी लगातार बढ़ती इच्छाओं की कीमत प्रकृति चुका रही है, या अंततः यह कीमत हमें ही चुकानी पड़ेगी?

इसका अर्थ यह नहीं कि विकास रोक दिया जाए। पहाड़ों में रहने वाले लोगों को सड़क, बिजली और रोजगार चाहिए। पर्यटन भी स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा है।

सवाल विकास का नहीं है। सवाल है—कहां, कितना और किस तरह?

यहीं एक और विचार महत्वपूर्ण लगता है।

अमरकंटक के ए. नागराज जी द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ दर्शन मनुष्य, समाज और प्रकृति को अलग-अलग देखने के बजाय एक-दूसरे से जुड़ी व्यवस्था के रूप में समझने का प्रस्ताव रखता है। इसी समझ को जीवन विद्या के माध्यम से देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग समझने और जीवन में उतारने का प्रयास कर रहे हैं।

इस दर्शन में इसे “सह-अस्तित्व” कहा गया है—सरल शब्दों में, मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही व्यवस्था के हिस्से हैं।

मिट्टी, पानी, जंगल, पहाड़, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य—सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। ऐसे में सवाल केवल यह नहीं कि प्रकृति हमें कितना दे सकती है, बल्कि यह भी है कि हमें उससे कितना लेना चाहिए?

जीवन विद्या में समृद्धि को केवल अधिक वस्तुएं जमा करने से नहीं जोड़ा जाता। बात अपनी आवश्यकताओं को पहचानने और उनकी पर्याप्त उपलब्धता की है।

अगर जरूरत की कोई सीमा है तो संसाधनों के उपयोग की भी सीमा हो सकती है। लेकिन अगर हमारी चाहत की कोई सीमा नहीं है, तो प्रकृति से लेने की भी कोई सीमा नहीं बचेगी।

इसका समाधान आधुनिक सुविधाएं छोड़कर पुराने समय में लौटना नहीं है।

बात विकास रोकने की नहीं, उसे समझ के साथ आगे बढ़ाने की है।

ऐसी सड़क जो पहाड़ की प्रकृति को समझकर बने। ऐसा शहर जो नदी को उसकी जगह दे। ऐसी ऊर्जा व्यवस्था जो आज के साथ आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी देखे।

और ऐसी जीवनशैली जिसमें हर नई सुविधा को पाने से पहले हम खुद से पूछ सकें—क्या वास्तव में इसकी जरूरत है?

नेपाल फिर खड़ा होगा। सड़कें बनेंगी, पुल दोबारा खड़े होंगे और जिंदगी आगे बढ़ेगी।

लेकिन अगर हमने केवल वही दोबारा बना दिया जो टूट गया और अपनी सोच में कुछ नहीं बदला, तो शायद हमने इस त्रासदी से बहुत कम सीखा।

प्रकृति को हराना संभव नहीं और उससे डरकर जीना भी समाधान नहीं।

शायद रास्ता है—प्रकृति को समझना और उसके साथ जीना सीखना।

और इस तीन लेखों की यात्रा के अंत में सवाल अब केवल नेपाल का नहीं रह जाता।

सवाल हम सभी से है—क्या हम अपनी जरूरत, अपने विकास और प्रकृति के बीच सही रिश्ता बनाना सीख पाएंगे?

नेपाल की बाढ़—आखिर जिम्मेदार कौन?

प्रकृति, बदलता हिमालय या विकास की हमारी समझ—नेपाल की त्रासदी कई ऐसे सवाल छोड़ गई है, जिनसे अब बचना मुश्किल है

✍️ मोहित धवन
30 अगस्त 2026

नेपाल की त्रासदी पर इस series का पहला हिस्सा लिखते समय मेरे मन में एक सवाल था—क्या ऐसी घटनाओं की खबरें पढ़ते-पढ़ते हम इनके अभ्यस्त होते जा रहे हैं?

लेकिन लेख प्रकाशित होने के बाद आई कुछ प्रतिक्रियाओं से लगा कि सवाल अभी जिंदा हैं।

किसी ने पूछा—“ऐसी त्रासदियों से आखिर बचा कैसे जाए?”

किसी ने इसे प्रकृति की बार-बार मिल रही चेतावनी माना, तो किसी ने पहाड़ों और नदियों के बीच बढ़ते निर्माण और विकास के हमारे तरीके पर सवाल उठाया। केदारनाथ जैसी पुरानी त्रासदियों की याद भी फिर सामने आई।

इन प्रतिक्रियाओं में चिंता भी थी, पीड़ा भी और कहीं-कहीं गुस्सा भी।

लेकिन इनके बीच एक सवाल बार-बार उभरकर सामने आया—

क्या नेपाल में जो हुआ, वह केवल प्रकृति का प्रकोप था?

किसी त्रासदी के बाद जिम्मेदार तय करना आसान है। कभी हम प्रकृति को दोष देते हैं, कभी climate change को, कभी सरकारों को और कभी विकास के नाम पर हो रहे निर्माण को।

लेकिन सच शायद इनमें से किसी एक के भीतर नहीं, बल्कि इन सबके बीच कहीं है।

26 अगस्त की सुबह हिमालय में Langtang Lirung के पास glacier और चट्टानों का एक विशाल हिस्सा टूटकर नीचे आया। बर्फ, चट्टान, पानी और मलबा नदी तंत्र में पहुंचा और कुछ ही समय में विनाशकारी सैलाब बनता चला गया।

तो क्या कहानी बस इतनी है—पहाड़ टूटा, प्रकृति ने कहर बरपाया और इंसान बेबस था?

शायद नहीं।

पहाड़ का टूटना प्राकृतिक घटना हो सकती है, लेकिन उसका इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी में बदल जाना कई दूसरे सवाल खड़े करता है।

हिमालय हमेशा से भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ के लिहाज से संवेदनशील रहा है। अब इन्हीं पहाड़ों और संकरी नदी घाटियों में सड़कें बढ़ रही हैं, hydropower projects बन रहे हैं, tourism फैल रहा है और निर्माण भी लगातार बढ़ रहा है।

विकास अपने आप में गलत नहीं है। पहाड़ों में रहने वाले लोगों को भी सड़क, बिजली, रोजगार और बेहतर जीवन चाहिए।

सवाल विकास का नहीं, विकास की समझ का है।

क्या सड़क बनाते समय हम पहाड़ की संवेदनशीलता को पर्याप्त महत्व देते हैं? क्या नदी किनारे निर्माण करते समय यह याद रखते हैं कि आज शांत दिखाई देने वाली नदी कभी अपना रास्ता और रूप दोनों बदल सकती है?

इसी बीच climate change का सवाल भी सामने आता है।

वैज्ञानिक लंबे समय से हिमालय में बढ़ते तापमान, पीछे हटते glaciers और बदलते पर्यावरण को लेकर चिंता जता रहे हैं। बढ़ता तापमान बर्फ और पहाड़ी ढलानों की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। लेकिन नेपाल की इस एक घटना को सीधे climate change का परिणाम घोषित कर देना अभी जल्दबाजी होगी। इसके सही कारणों पर अध्ययन जारी है।

फिर सवाल है—चेतावनी का।

ऐसी आपदा में पानी और मलबा इतनी तेजी से नीचे आता है कि लोगों के पास बचने के लिए शायद कुछ मिनट ही हों। और कभी-कभी यही कुछ मिनट जिंदगी और मौत के बीच का फर्क बन जाते हैं।

इसीलिए glacier monitoring, river sensors, sirens, mobile alerts और दूर-दराज के गांवों तक मजबूत communication system अब केवल technology नहीं—जिंदगी बचाने के साधन हैं।

लेकिन जिम्मेदारी की इस चर्चा में एक पक्ष ऐसा भी है, जिसकी तरफ देखना शायद सबसे मुश्किल है—

हम स्वयं।

हमें पहाड़ों में चौड़ी सड़कें चाहिए, दूर-दराज तक hotels और resorts चाहिए, ज्यादा बिजली चाहिए और हर खूबसूरत जगह तक आसान पहुंच भी चाहिए।

सुविधा चाहना गलत नहीं है।

लेकिन क्या हमने कभी पूछा—इसकी सीमा क्या है?

शायद नेपाल की त्रासदी हमें इसी असहज सवाल के सामने खड़ा करती है।

किसी एक सरकार, climate change या प्रकृति को दोष देकर हम आगे तो बढ़ सकते हैं, लेकिन समाधान तक नहीं पहुंच सकते।

सरकारों को बेहतर planning करनी होगी। वैज्ञानिक चेतावनियों को जमीन तक पहुंचाना होगा। Technology को आखिरी गांव तक ले जाना होगा और विकास को प्रकृति की सीमाओं को समझते हुए आगे बढ़ाना होगा।

और शायद हमें भी अपनी जरूरत और लगातार बढ़ती चाहत के बीच का अंतर समझना होगा।

इसलिए असली सवाल केवल यह नहीं है—

नेपाल की बाढ़ का जिम्मेदार कौन है?

सवाल इससे कहीं बड़ा है—

क्या मनुष्य प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को सही तरह से समझ पाया है?

अगर नहीं, तो अगली त्रासदी किसी दूसरे पहाड़, किसी दूसरी नदी या किसी दूसरे शहर में हमारे सामने हो सकती है।

और यहीं से इस series का आखिरी और शायद सबसे जरूरी सवाल शुरू होता है—

क्या हम कुछ सीखेंगे?

जारी रहेगा…

Part 3: क्या हम कुछ सीखेंगे? — प्रकृति के साथ जीना कब सीखेंगे?

कुछ मिनटों में सब बह गया: नेपाल में अब अपनों की तलाश और जिंदगी बचाने की जंग

सैकड़ों मौतें, हजारों लोग लापता और उजड़े गांव—26 अगस्त की विनाशकारी बाढ़ के बाद नेपाल में राहत और बचाव की लड़ाई अभी जारी है

✍️ मोहित धवन
29 अगस्त 2026

काफी सोचा कि इस पर कुछ न लिखूं। आखिर अब ऐसी घटनाएं इतनी बार हमारे सामने आने लगी हैं कि एक त्रासदी की तस्वीरें आंखों से ओझल भी नहीं होतीं और दूसरी खबर सामने आ जाती है।

लेकिन फिर लगा—लिखना चाहिए।

भले ही यह आवाज़ चंद लोगों तक पहुंचे, लेकिन जो हमारे आसपास और हमारी धरती के साथ हो रहा है, उसकी सच्चाई से रूबरू होना जरूरी है। क्योंकि किसी त्रासदी को केवल देखकर आगे बढ़ जाना और उसे समझने की कोशिश करना—दोनों में फर्क है।

नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ भी ऐसी ही एक घटना है, जिसे केवल कुछ भयावह तस्वीरों और मौत के आंकड़ों के बीच छोड़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता।

नेपाल-तिब्बत सीमा के पास पहाड़ों से अचानक पानी, बर्फ, चट्टानों और मलबे का विशाल सैलाब नीचे की ओर आया। भोटे कोशी और त्रिशूली नदी से जुड़े इलाकों में पानी इतनी तेजी से बढ़ा कि कई लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का मौका भी नहीं मिला।

घर बह गए, सड़कें टूट गईं, पुल ध्वस्त हो गए और कई बस्तियों का संपर्क बाकी इलाकों से कट गया।

लेकिन इस त्रासदी का सबसे भयावह पहलू वे आंकड़े हैं, जो लगातार बदल रहे हैं।

29 अगस्त की सुबह तक सामने आई जानकारी के अनुसार मृतकों की संख्या 626 तक पहुंच चुकी थी, जबकि 2,426 लोग अब भी लापता बताए जा रहे थे।

ये केवल आंकड़े नहीं हैं।

इनके पीछे ऐसे परिवार हैं जो कई दिनों से किसी फोन कॉल का इंतजार कर रहे हैं। कोई अपने माता-पिता को खोज रहा है, कोई अपने बच्चों को और कोई उस व्यक्ति की तस्वीर लेकर अस्पतालों और राहत केंद्रों के चक्कर लगा रहा है, जो 26 अगस्त की सुबह तक उसके साथ था।

तबाही केवल इंसानी जिंदगियों तक सीमित नहीं है। मकान, सड़कें, पुल, बिजली व्यवस्था और hydropower projects को बड़े स्तर पर नुकसान पहुंचा है। हजारों लोगों के लिए यह बाढ़ केवल घर नहीं बहाकर ले गई—उनकी रोजी-रोटी, जमा पूंजी और भविष्य की सुरक्षा भी अपने साथ ले गई।

अब जिंदगी बचाने की जंग

इस भयावह तस्वीर के बीच उम्मीद की एक दूसरी तस्वीर भी दिखाई दे रही है।

नेपाल की सेना, पुलिस, disaster-management agencies, स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य सेवाएं search, rescue और evacuation में जुटी हैं। हजारों सुरक्षाकर्मी और राहतकर्मी प्रभावित इलाकों में लोगों को निकालने, लापता लोगों को खोजने और भोजन, पानी तथा दवाइयां पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।

29 अगस्त सुबह तक 4,451 लोगों को बचाए जाने की जानकारी सामने आई थी।

लेकिन rescue operation आसान नहीं है।

पहाड़ी रास्ते टूट चुके हैं, कई पुल बह गए हैं और कुछ जगहों पर सड़कें मलबे में दब गई हैं। खराब मौसम helicopter operations को भी प्रभावित कर रहा है। कुछ दुर्गम इलाकों तक पहुंचना अपने आप में एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

भारत सहित नेपाल के कई मित्र देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने सहायता के लिए हाथ बढ़ाया है। इस समय प्राथमिकता साफ है—जो जिंदगियां अभी बचाई जा सकती हैं, उन्हें बचाया जाए और जिन्होंने सब कुछ खो दिया है, उन तक भोजन, दवा और सुरक्षित आश्रय पहुंचाया जाए।

लेकिन rescue operation खत्म होने के बाद नेपाल के सामने एक और लंबी लड़ाई होगी।

उजड़े घर दोबारा बनाने होंगे। सड़कें और पुल फिर खड़े करने होंगे। रोजगार और पर्यटन को वापस पटरी पर लाना होगा। और सबसे कठिन—उन परिवारों को जिंदगी में वापस लौटना होगा जिन्होंने इस बाढ़ में अपनों को खो दिया है।

शायद इसीलिए लगा कि इस त्रासदी पर लिखना जरूरी है।

क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि नेपाल में क्या हुआ।

सवाल यह भी है कि ऐसी घटनाएं अब बार-बार हमारे सामने क्यों आ रही हैं? क्या हर बार इन्हें प्राकृतिक आपदा कहकर, कुछ दिन दुख जताकर और फिर अगली खबर की तरफ बढ़ जाना पर्याप्त है?

जब नेपाल में पानी उतर जाएगा और मलबा हटने लगेगा, तब हमें एक असहज सवाल का सामना करना होगा—

आखिर इतनी बड़ी तबाही हुई क्यों?

क्या इसके लिए केवल प्रकृति जिम्मेदार है?

या हिमालय में हो रहे बदलाव, हमारी विकास की नीतियों, निर्माण, warning systems और प्रकृति के साथ हमारे व्यवहार से जुड़े कुछ ऐसे सवाल भी हैं, जिनसे अब रूबरू होना जरूरी है?

क्योंकि राहत आज की जरूरत है।

लेकिन अगली त्रासदी से पहले सच को समझना शायद उससे भी बड़ी जरूरत है।

जारी रहेगा…

Part 2: नेपाल की बाढ़—आखिर जिम्मेदार कौन?

पैकेट के पीछे छिपा सच, अब सामने आएगा?

खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट चेतावनी की पहल ने उपभोक्ता के जानने के अधिकार को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है

✍️ मोहित धवन
28 अगस्त 2026

बिस्किट खरीदते समय हम ब्रांड देखते हैं, चिप्स लेते समय स्वाद और कोल्ड ड्रिंक लेते समय कीमत या ऑफर। मगर कितनी बार पैकेट पलटकर देखते हैं कि उसमें चीनी, नमक या वसा (Fat) कितनी है?

यह जानकारी पैकेट पर पहले से मौजूद होती है, लेकिन अक्सर पीछे दी गई पोषण तालिका और आंकड़ों के बीच। आम उपभोक्ता के लिए यह समझना आसान नहीं कि दस या बारह ग्राम चीनी उसके लिए कितनी अधिक है। अब यही जानकारी पैकेट के सामने और अधिक स्पष्ट रूप में दिखाई दे सकती है।

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के सामने चेतावनी चिन्ह लगाने का प्रस्ताव रखा है। 28 अगस्त को सामने आई रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यदि किसी खाद्य पदार्थ में चीनी, नमक और वसा (Fat) में से दो या उससे अधिक की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक होती है, तो पैकेट के सामने लाल रंग का छह कोनों वाला चेतावनी चिन्ह लगाया जा सकता है। इसका मकसद खरीदारी के समय ही उपभोक्ता को यह साफ बताना है कि उत्पाद में चीनी, नमक या वसा अधिक है।

इस प्रस्ताव के पीछे सुप्रीम कोर्ट की दखल भी अहम है।

फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से पैकेट के सामने चेतावनी देने की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करने को कहा था। अदालत ने मामले को नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार से जोड़ते हुए इस बात पर जोर दिया कि चीनी, नमक और संतृप्त वसा की अधिक मात्रा के बारे में उपभोक्ता को ऐसी जानकारी मिलनी चाहिए, जिसे वह आसानी से समझ सके।

अगस्त में अदालत का रुख और सख्त हुआ। 13 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने इस दिशा में हो रही देरी पर नाराजगी जताई और खासकर बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर चिंता व्यक्त की। इसके बाद 27 अगस्त को अदालत ने केंद्र सरकार को इस मामले में निर्णय लेने के लिए दो सप्ताह का समय दिया। साथ ही संकेत दिया कि सरकार जरूरी कदम नहीं उठाती है तो अदालत आगे निर्देश देने पर विचार कर सकती है।

यहीं से यह मामला केवल पैकेट पर एक लाल निशान लगाने तक सीमित नहीं रह जाता। मूल सवाल उपभोक्ता के जानने के अधिकार का है।

आज बिस्किट, नमकीन, चिप्स या कोई पेय पदार्थ खरीदते समय हमारे सामने आकर्षक पैकेजिंग, स्वाद, कीमत और ऑफर प्रमुखता से दिखाई देते हैं। लेकिन पोषण संबंधी जरूरी जानकारी जानने के लिए पैकेट पलटना पड़ता है। उसके बाद आंकड़ों से खुद तय करना होता है कि उत्पाद में मौजूद चीनी, नमक या वसा हमारे लिए कितनी उचित है।

अगर पैकेट के सामने ही साफ लिखा हो—“चीनी अधिक है”, “नमक अधिक है” या “वसा (Fat) अधिक है”—तो उपभोक्ता के लिए फैसला आसान हो सकता है।

हालांकि इस प्रस्ताव पर खाद्य उद्योग और जनस्वास्थ्य से जुड़े संगठनों की राय अलग-अलग है। उद्योग का तर्क है कि किसी उत्पाद को केवल कुछ पोषक तत्वों के आधार पर चेतावनी के दायरे में रखना उसकी पूरी पोषण संरचना को नहीं दर्शाता। दूसरी ओर स्वास्थ्य विशेषज्ञों और उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि हर ग्राहक से पैकेट के पीछे लिखे आंकड़ों को समझने और उनकी गणना करने की उम्मीद व्यावहारिक नहीं है।

फिलहाल FSSAI का प्रस्ताव अंतिम नियम नहीं है। इसकी अंतिम रूपरेखा क्या होगी, कौन से उत्पाद इसके दायरे में आएंगे और इसे कब से लागू किया जाएगा—यह अभी तय होना बाकी है।

लेकिन इस बहस ने एक महत्वपूर्ण सवाल हमारे सामने जरूर रख दिया है।

जिस चीज को हम और हमारे बच्चे रोज खाते हैं, उसके बारे में जरूरी जानकारी जानने के लिए क्या हमें पैकेट के पीछे छोटे अक्षर पढ़ने पड़ने चाहिए… या वह सच सामने साफ-साफ दिखाई देना चाहिए?

Has Rakhi Changed… or Have Relationships?

✍️ Mohit Dhawan

Technology has reduced distances, but has it increased the time we give to our relationships?

Date: 27 August 2026

As Raksha Bandhan approaches, countless old memories come alive. A sister choosing her Rakhi days in advance, sweets arriving at home, a brother saving money for the traditional shagun, and that familiar teasing while tying the Rakhi—“Is that all?”

That time may not be too far behind us, but the way we live our lives and nurture relationships has certainly changed.

The story of Rakhi, however, is not limited to the bond between a brother and sister. In Indian tradition, the idea of a Raksha-Sutra, or sacred thread of protection, is considered very old. Ancient Hindu traditions include the story of Indrani tying a protective thread around Indra’s wrist. The story of Krishna and Draupadi is also deeply popular in Indian culture, although it is not considered a documented historical origin of the modern Raksha Bandhan festival.

Rakhi also has a beautiful connection with our religious traditions. In many temples and homes across India, people offer Rakhis to their deities during Raksha Bandhan. The tradition of offering a Rakhi to Lord Krishna can also be seen today. Here, the Rakhi is not merely a request for protection; it becomes an expression of love, faith and devotion between the devotee and the divine.

History and popular folklore also carry the well-known story of Rani Karnavati of Mewar and Mughal emperor Humayun. However, historians do not agree on all the details of this account.

Over different periods, therefore, this little thread has acquired different meanings—sometimes a promise of protection, sometimes a symbol of sibling affection, and sometimes an expression of devotion towards God.

But now, this little thread has entered the digital age.

Today, you don’t necessarily need to visit a market to buy a Rakhi. Choose one on your phone and it can reach a brother hundreds of kilometres away. There is no need to put shagun money in an envelope either—there is UPI. If a brother or sister is living abroad, the festival can be celebrated through a video call.

Technology has certainly reduced distances.

But it raises an important question—Has Rakhi changed, or have our relationships changed too?

There was a time when brothers and sisters grew up under the same roof. They fought, complained, argued and, after a while, sat together again as if nothing had happened.

Then came education, jobs, marriage and responsibilities. Their paths began to move in different directions. Those who once spent the entire day together may now go weeks without having a proper conversation.

Writing “How are you?” on WhatsApp is easy. Sitting down and talking for half an hour is perhaps more difficult. Gifts arrive online and money can be transferred with a single click.

Everything has become easier—except perhaps the time we give to one another.

Yet, it would be unfair to say that relationships have lost their warmth. Perhaps their roles have simply evolved.

Traditionally, Rakhi was largely associated with a brother’s promise to protect his sister. Today, a sister is equally independent and, when life gets difficult, she may herself become one of her brother’s strongest pillars.

So perhaps the meaning of Rakhi should not remain limited to “I will protect you.”

It can also be a promise between two people:

“No matter how far life takes us, when you need me, I will be there for you.”

The Rakhi thread itself is not very strong. Pull it a little and it can break. Yet, for centuries, it has remained a symbol of strong relationships.

Because strength does not lie in the thread—
it lies in the emotion with which it is tied.

This Raksha Bandhan, along with an expensive Rakhi or a special gift, give your loved ones something even more valuable—your time.

Remember the old stories. Share a laugh. Let go of an old complaint.

Because technology can deliver Rakhis, money and greetings—

but warmth in a relationship still has to be delivered by a human being.

And perhaps then we will find the answer to the question—

Has Rakhi Changed… or Have Relationships?

Wishing you all a very Happy Raksha Bandhan.

न्यूज़ चैनल बदल गए… या दर्शक?

टीवी के शोर से पॉडकास्ट की लंबी बातचीत तक

✍️ मोहित धवन
25 अगस्त 2026

भारतीय टेलीविजन पर रात जैसे-जैसे गहराती है, बहस भी तेज होती जाती है। स्क्रीन कई हिस्सों में बंटती है, चेहरे बढ़ते जाते हैं और आवाजें एक-दूसरे पर चढ़ने लगती हैं। एंकर सवाल पूछता है, जवाब शुरू होता है और उससे पहले कोई दूसरा बोल पड़ता है। कुछ ही देर में यह समझना मुश्किल हो जाता है कि सवाल क्या था और जवाब कौन दे रहा है।

हम इस दृश्य के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि शायद अब इसमें कुछ असामान्य भी नहीं लगता।

लेकिन भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने हाल में भारतीय टीवी न्यूज़ को एक बाहरी व्यक्ति की नजर से देखा तो उनकी टिप्पणी चर्चा का विषय बन गई। नई दिल्ली में Economic Times World Leaders Forum में उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि उन्हें भारतीय टीवी न्यूज़ देखना पसंद है। शाम छह बजे किसी शो में आठ लोग बहस करते दिखाई देते हैं और रात दस बजे तक संख्या बारह हो जाती है—जहां किसी एक व्यक्ति को ठीक से सुनना मुश्किल हो जाता है।

उनकी बात पर हंसा जा सकता है, नाराज भी हुआ जा सकता है। लेकिन इससे एक सवाल जरूर निकलता है—

न्यूज़ चैनल बदल गए हैं… या दर्शक?

एक समय था जब टेलीविजन की चर्चाओं में सीमित संख्या में विशेषज्ञ बैठते थे। सवाल पूछा जाता, जवाब के लिए समय मिलता और असहमति के बावजूद दूसरे पक्ष को सुनने की गुंजाइश रहती थी। आज कई कार्यक्रमों में बड़ी स्क्रीन, कई खिड़कियां, उत्तेजक शीर्षक और टकराव स्वयं कार्यक्रम का आकर्षण बनते दिखाई देते हैं।

लेकिन इसके लिए केवल न्यूज़ चैनलों को कठघरे में खड़ा करना भी उचित नहीं होगा।

आखिर TRP दर्शक से आती है। सोशल मीडिया पर वही वीडियो आगे बढ़ता है जिसे हम क्लिक और शेयर करते हैं। शांत और तथ्यपूर्ण बातचीत की तुलना में तीखी नोकझोंक तेजी से हमारा ध्यान खींचती है। बाजार आखिरकार वही परोसता है जिसकी मांग दिखाई देती है।

लेकिन इसी शोर के बीच एक दूसरा बदलाव भी दिलचस्प है।

राज शमानी, रणवीर अल्लाहबादिया और दूसरे डिजिटल creators के लंबे podcasts को बड़ी संख्या में लोग सुनते और देखते हैं। वहां उद्यमी, खिलाड़ी, कलाकार, वैज्ञानिक या किसी विषय के जानकार को अपनी बात विस्तार से रखने का अवसर मिलता है। दर्शक उस बातचीत के साथ कुछ देर ठहर सकता है, तर्क को समझ सकता है और अपनी राय बना सकता है।

शायद podcasts की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे एक कारण यह भी है।

दर्शक केवल निष्कर्ष नहीं, उस निष्कर्ष तक पहुंचने की पूरी बातचीत भी सुनना चाहता है।

हालांकि podcast होना अपने आप में सार्थक या तथ्यपूर्ण संवाद की गारंटी नहीं है। वहां भी सनसनी, कमजोर सवाल और गलत सूचनाओं की गुंजाइश है। लेकिन इस माध्यम ने लंबी बातचीत के लिए वह जगह जरूर बनाई है जो टीवी की तेज रफ्तार में कम होती दिखाई देती है।

सर्जियो गोर की टिप्पणी को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया का एक दूसरा पक्ष भी है। एक राजनीतिक दल से जुड़े वरिष्ठ नेता लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) शरद शरण इसे व्यापक भू-राजनीतिक नजरिए से देखते हैं। उनका कहना है, “जब विदेश नीति और जियो-स्ट्रैटेजिक फैसलों में राष्ट्रीय हितों से ऊपर राजनीतिक या चुनावी हित आने लगें, तो देश की वैश्विक स्थिति प्रभावित होती है। विदेशी ताकतों को हमारी आंतरिक राजनीति पर टिप्पणी का अवसर नहीं मिलना चाहिए। वैश्विक मंच पर सरकार और विपक्ष—दोनों के लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए।”

यह दृष्टिकोण अपनी जगह है, लेकिन किसी विदेशी राजदूत की टिप्पणी को भारतीय मीडिया पर अंतिम फैसला मान लेना भी उचित नहीं होगा। भारतीय पत्रकारिता ने सत्ता से कठिन सवाल पूछे हैं, घोटाले उजागर किए हैं और समाज के उन हिस्सों की आवाज को राष्ट्रीय मंच दिया है जो अन्यथा शायद सुनाई नहीं देते।

इसलिए सवाल टीवी न्यूज़ को खारिज करने का नहीं, उसके बदलते स्वरूप को समझने का है।

अगर लोग अपनी इच्छा से एक या दो घंटे का podcast सुन सकते हैं, तो यह धारणा भी कमजोर पड़ती है कि आज के दर्शक के पास लंबी और गंभीर बातचीत के लिए धैर्य नहीं बचा।

शायद धैर्य आज भी है।

सवाल सिर्फ इतना है—हम उसे सुनने लायक क्या दे रहे हैं?