आखिर ऐसा क्या है बाबा नीब करोरी में?

‘हनुमान अंश’ देखते हुए लौटी एक पुरानी स्मृति और मन में उठा एक सवाल

✍️ मोहित धवन
7 सितंबर 2026

आज ‘हनुमान अंश’ देखकर सिनेमा हॉल से बाहर निकला तो मन प्रसन्न था, लेकिन फिल्म मुझे करीब 33–34 साल पीछे भी ले गई।

बात शायद 1992-93 के आसपास की है। हमारे एक शिक्षक हुआ करते थे—रमेश त्रिपाठी जी। उन्होंने बताया कि नीब करोरी मंदिर में हर वर्ष की तरह भंडारा होने वाला है और वहाँ चलने का कार्यक्रम बना।

नीब करोरी वही स्थान है, जिसके नाम से बाबा आगे चलकर दुनिया भर में जाने गए। मेरे लिए इसका एक व्यक्तिगत संयोग यह भी था कि यह मेरे गृह जनपद फर्रुखाबाद में ही है और हमारे यहाँ से लगभग 30 किलोमीटर दूर रहा होगा।

हम भंडारे में शामिल हुए और रात वहीं रुके। तब बाबा के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी। इंटरनेट और सोशल मीडिया का समय भी नहीं था। लेकिन मंदिर का वातावरण, श्रद्धालुओं का भाव और वहाँ बिताई वह रात स्मृति में रह गई। इसके बाद वहाँ आना-जाना शुरू हो गया।

नौकरी के सिलसिले में बाद में लखनऊ आया तो हनुमान सेतु मंदिर में नियमित दर्शन होने लगे। कंपनी के काम से नैनीताल-अल्मोड़ा की तरफ जाना होता तो कई बार रास्ते में कैंची धाम भी पहुँचा। इन स्थानों पर एक बात हमेशा महसूस हुई—कुछ देर के लिए मन की भागदौड़ कम हो जाती थी और एक अलग-सी शांति मिलती थी।

समय के साथ बाबा के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ते हुए भी देखा। कभी जिनके बारे में जानकारी मुख्यतः लोगों के अनुभवों और आपसी बातचीत से फैलती थी, आज उनका नाम भारत से बहुत दूर तक पहुँच चुका है।

इसकी एक चर्चित कड़ी Steve Jobs से भी जुड़ती है।

Apple की स्थापना से पहले 1974 में युवा Jobs भारत आए थे। बाबा के बारे में सुनकर वे कैंची धाम पहुँचे, हालांकि बाबा 1973 में शरीर छोड़ चुके थे और दोनों की मुलाकात नहीं हो सकी। एक अमेरिकी युवा की आध्यात्मिक खोज उसे उत्तराखंड के एक आश्रम तक ले आई—अपने आप में यह प्रसंग दिलचस्प है।

करीब आधी सदी बाद बाबा की कहानी एक बिल्कुल अलग माध्यम से बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँची।

करीब दो करोड़ रुपये के सीमित बजट में बनी हनुमान अंश शुरुआती दिनों में बॉक्स ऑफिस पर संघर्ष करती दिखाई दी। फिर word-of-mouth ने गति पकड़ी और फिल्म 150 करोड़ रुपये का आँकड़ा पार कर गई।

इस फिल्म से जुड़ी एक और कहानी ने लोगों का ध्यान खींचा—सुनील लोधी की।

ट्रेन में गाना गाने वाले सुनील की आवाज़ को पहचान मिली और एक गीत ने उनके लिए बॉलीवुड का रास्ता खोल दिया। इसे देखकर यह भी महसूस होता है कि हमारे आसपास कितनी प्रतिभाएँ ऐसी होंगी, जिन्हें अपनी जिंदगी बदलने के लिए शायद केवल एक सही अवसर की जरूरत है।

इन तीनों घटनाओं की अपनी-अपनी तार्किक व्याख्या संभव है।

Steve Jobs की भारत यात्रा को आध्यात्मिक जिज्ञासा के संदर्भ में देखा जा सकता है। छोटी फिल्म की बड़ी सफलता के पीछे दर्शकों का जुड़ाव और मजबूत word-of-mouth हो सकता है। सुनील की कहानी प्रतिभा, अवसर और सही समय के मिलने की कहानी हो सकती है।

इसलिए मैं इनमें किसी चमत्कार को स्थापित करने या उसका प्रचार करने की कोशिश नहीं करना चाहता।

मेरी दिलचस्पी किसी निष्कर्ष से ज्यादा उस प्रश्न में है, जो हनुमान अंश देखते हुए मन में आया।

एक संत, जिन्होंने दशकों पहले शरीर छोड़ दिया—उनके प्रति आकर्षण समय के साथ कम होने के बजाय इतना व्यापक कैसे होता चला गया?

क्या यह उनके व्यक्तित्व की सरलता है?
उनकी शिक्षाएँ हैं?
हनुमान जी के प्रति उनकी भक्ति है?
लोगों के एक-दूसरे तक पहुँचते व्यक्तिगत अनुभव हैं?
या आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच मनुष्य की शांति और किसी गहरे अर्थ की तलाश?

शायद हर व्यक्ति इसका उत्तर अपने अनुभव और दृष्टिकोण से अलग देगा।

मेरे लिए फिल्म ने बस एक पुरानी स्मृति का दरवाजा खोल दिया—1992-93 में अपने शिक्षक के साथ एक वार्षिक भंडारे में शामिल होने के लिए की गई छोटी-सी यात्रा का।

तब यह एक सामान्य यात्रा थी।

आज तीन दशक से अधिक समय बाद दुनिया भर से लोगों को बाबा से जुड़े स्थानों तक पहुँचते देखकर मन में केवल एक जिज्ञासा रह जाती है—

आखिर ऐसा क्या है बाबा नीब करोरी में?

मैं इसका उत्तर पाठक पर छोड़ना चाहूँगा।

आप इसे कैसे देखते हैं—आस्था, संयोग, मानवीय अनुभव या कुछ और?

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