RSS के सौ साल: क्या चाल, चरित्र और चेहरा बदल रहा है?

शाखा और चरित्र निर्माण से सत्ता के करीब तक, गांधी-अंबेडकर से आर्थिक असमानता तक—एक सदी की यात्रा कुछ नए सवाल भी खड़े करती है

✍️ मोहित धवन
5 सितंबर 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS की सौ साल की यात्रा को केवल हिंदुत्व या राजनीति की कहानी मानना शायद अधूरी तस्वीर देखना होगा। यह एक ऐसे संगठन की यात्रा भी है, जिसकी पहचान कभी मैदान में लगने वाली शाखाओं, अनुशासन, सीमित साधनों में काम करने वाले प्रचारकों और चरित्र निर्माण से होती थी और जो आज देश के सबसे प्रभावशाली सामाजिक-वैचारिक संगठनों में गिना जाता है।

लेकिन हर विस्तार अपने साथ एक सवाल भी लाता है—संगठन बड़ा हुआ, तो क्या उसके मूल संस्कार भी वैसे ही रहे?

हाल ही के एक podcast में वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह और विजय त्रिवेदी के बीच RSS के सौ वर्षों और उसके बदलते स्वरूप पर हुई बातचीत इसी सवाल को कई दिलचस्प संदर्भों से सामने लाती है। संघ की सौ साल की यात्रा पर विस्तार से लिख चुके त्रिवेदी का आकलन है कि इसका बड़ा हिस्सा संघर्ष में गुजरा। लंबे समय तक उसका जोर हिंदू समाज को एक व्यापक छतरी के नीचे लाने और व्यक्ति के चरित्र निर्माण पर रहा।

मैदान की शाखा से संस्थानों तक

त्रिवेदी संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से जुड़ा एक उदाहरण देते हैं। उनके मुताबिक शाखा को मैदान में लगाने के पीछे एक भाव यह भी था कि भवन और संपत्ति संगठन के काम का केंद्र न बनें।

आज संघ के अनेक कार्यालय और उससे प्रेरित संस्थान हैं। त्रिवेदी इसे पुराने संगठनात्मक मॉडल से आए बदलाव के रूप में देखते हैं।

इसका दूसरा पक्ष भी है। सौ वर्षों में जिस संगठन का आकार और गतिविधियां कई गुना बढ़ी हों, उसके लिए संस्थागत ढांचा खड़ा होना स्वाभाविक है। इसलिए सवाल भवनों के होने या न होने का नहीं, बल्कि यह है—क्या संसाधन आज भी साधन हैं, या उनके साथ संगठन की संस्कृति भी बदल रही है?

गांधी, संविधान और अंबेडकर

त्रिवेदी संघ में आए बदलाव को तीन महत्वपूर्ण संदर्भों से देखते हैं—महात्मा गांधी, भारतीय संविधान और डॉ. बी.आर. अंबेडकर।

आज संघ के सामाजिक विमर्श में गांधी, अंबेडकर, ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले जैसे नाम प्रमुखता से दिखाई देते हैं। सामाजिक समरसता, जातिगत भेदभाव मिटाने और नागरिक कर्तव्यों की बात भी उसकी सार्वजनिक भाषा का हिस्सा बनी है।

इसे कोई ऐतिहासिक विरोधाभास मान सकता है और कोई समय के साथ विकसित होती सामाजिक सोच। लेकिन असली कसौटी शायद यह नहीं कि किन महापुरुषों को स्वीकार किया गया, बल्कि यह है कि उनके विचार व्यवहार में कितने दिखाई देते हैं।

‘हिंदू’ का अर्थ कितना बदला?

RSS प्रमुख मोहन भागवत का हालिया न्यूयॉर्क बयान इस बहस को नया संदर्भ देता है। उन्होंने कहा कि यदि कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह जाता। उन्होंने अलग-अलग धार्मिक रास्तों और प्रत्येक मनुष्य की गरिमा की भी बात की।

विजय त्रिवेदी इसे संघ की उस व्यापक व्याख्या से जोड़ते हैं, जिसमें ‘हिंदू’ केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत पहचान है। इसे समझाते हुए वे उदाहरण देते हैं कि जैसे अमेरिका से जुड़ा व्यक्ति American और Germany से जुड़ा व्यक्ति German कहलाता है, उसी तरह हिंदुस्तान से जुड़ा व्यक्ति व्यापक अर्थ में हिंदू है—जिसे आज ‘भारतीय’ भी कहा जा सकता है।

लेकिन यहीं एक स्वाभाविक सवाल खड़ा होता है—अगर ‘भारतीय’ शब्द सभी नागरिकों को सहजता से समेटता है, तो ‘हिंदू’ शब्द पर आग्रह क्यों? और क्या मुसलमान, ईसाई, सिख तथा अन्य समुदाय भी इस व्यापक परिभाषा में स्वयं को उतनी ही सहजता से देख पाते हैं?

यहीं यह सवाल भी उभरता है कि हम संघ की बदलती सोच देख रहे हैं या बदलते समय के साथ उसकी सार्वजनिक भाषा में आया बदलाव।

सत्ता ने किसे बदला?

त्रिवेदी की ज्यादा गंभीर चिंता संघ की बदलती कार्य-संस्कृति को लेकर है।

इसी संदर्भ में वे अमित शाह द्वारा कार्यकर्ताओं की एक बैठक में दिए गए संबोधन का जिक्र करते हैं। त्रिवेदी के मुताबिक अमित शाह ने कार्यकर्ताओं को याद दिलाया था कि आज जिस राजनीतिक संगठन को वे इतने व्यापक रूप में देखते हैं, उसकी नींव सुंदर सिंह भंडारी जैसे लोगों की तपस्या से भी बनी है। ऐसे कार्यकर्ता संघ और जनसंघ का काम करने के लिए साइकिल से निकलते थे। रूमाल में दो रोटियां बांध लेते; रास्ते में कुछ मिल गया तो ठीक, नहीं तो पानी के साथ वही रोटियां खाकर काम जारी रखते थे।

त्रिवेदी इसी पुराने उदाहरण के सामने आज के बढ़ते संसाधनों और सुविधाओं को रखते हैं। उनका सवाल है कि सादगी, त्याग और न्यूनतम साधनों वाली उस कार्य-संस्कृति पर सत्ता के करीब आने का कितना असर पड़ा है?

सुविधा अपने आप में मूल्यों के क्षरण का प्रमाण नहीं है। समय के साथ यात्रा, संचार और संगठन चलाने के तरीके बदलना भी स्वाभाविक है। फिर भी एक सवाल महत्वपूर्ण बना रहता है—RSS ने BJP को जितना प्रभावित किया, क्या BJP की लंबी सत्ता ने भी RSS को बदल दिया है?

‘1% क्लब’ और आखिरी पंक्ति का आदमी

शीतल पी. सिंह बातचीत को अर्थव्यवस्था की ओर मोड़ते हुए सवाल उठाते हैं कि जब दुनिया भर में धन और आर्थिक शक्ति कुछ चुनिंदा हाथों में सिमटती दिखाई दे रही है, तब RSS की अपनी आर्थिक समझ क्या कहती है?

विजय त्रिवेदी भी बढ़ती आर्थिक असमानता को गंभीर चिंता मानते हैं। वे उस बहस का जिक्र करते हैं जिसमें मौजूदा अर्थव्यवस्था को एक तरह के ‘1% क्लब’ की ओर बढ़ता बताया जाता है—जहां संपत्ति और अवसरों का बड़ा हिस्सा सबसे संपन्न एक प्रतिशत के आसपास केंद्रित होता जा रहा है। दिलचस्प यह है कि व्यवस्था पर सवाल उठाने के बजाय समाज का बड़ा हिस्सा खुद उसी एक प्रतिशत में शामिल होने की दौड़ में दिखाई देता है।

2022-23 के एक प्रमुख अध्ययन में भारत के शीर्ष एक प्रतिशत के पास करीब 40 प्रतिशत संपत्ति और कुल आय में लगभग 23 प्रतिशत हिस्सेदारी होने का अनुमान लगाया गया। यानी ‘1% क्लब’ की चर्चा के पीछे आर्थिक असमानता का एक वास्तविक प्रश्न भी मौजूद है।

यहीं संघ परिवार की पुरानी ‘स्वदेशी’ आर्थिक धारा याद आती है। वाजपेयी सरकार के दौर में स्वदेशी जागरण मंच वैश्वीकरण, विनिवेश और कुछ आर्थिक नीतियों पर सरकार से अलग आवाज उठाता दिखाई देता था।

दूसरी तरफ दीनदयाल उपाध्याय का ‘अंत्योदय’—यानी समाज की आखिरी पंक्ति में खड़े सबसे कमजोर व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचाना—एक बिल्कुल अलग कसौटी सामने रखता है।

एक तरफ अर्थव्यवस्था का ‘1% क्लब’ और दूसरी तरफ आखिरी पंक्ति में खड़ा आदमी—आज RSS की आर्थिक सोच इन दोनों के बीच कहां खड़ी है?

त्रिवेदी इसी संदर्भ में एक तीखा व्यंग्य करते हैं। दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर आज BJP का भव्य राष्ट्रीय मुख्यालय है। वे कहते हैं कि अगर स्वयं दीनदयाल आज वहां पहुंचें तो शायद उनके लिए भी प्रवेश आसान न हो।

यह टिप्पणी प्रतीकात्मक है, लेकिन इसके पीछे सवाल गंभीर है—क्या कोई आंदोलन सत्ता और संसाधनों के विस्तार के साथ उस अंतिम व्यक्ति से दूर होने का जोखिम भी उठाता है, जिसके लिए वह कभी खड़ा हुआ था?

दूसरे सौ वर्षों की असली परीक्षा

सौ साल बाद RSS पहले से कहीं अधिक व्यापक, संसाधन-संपन्न और प्रभावशाली है। इसे उसकी संगठनात्मक सफलता के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन प्रभाव जितना बड़ा होता है, उसकी कसौटी भी उतनी ही कठिन होती है।

संघ के दूसरे सौ वर्षों में सवाल केवल उसकी शाखाओं, कार्यालयों या राजनीतिक प्रभाव का नहीं होगा। सवाल यह भी होगा कि जिस सेवा भाव, सादगी और चरित्र निर्माण को उसने अपनी ताकत बनाया, वह सत्ता और संसाधनों के बीच कितना सुरक्षित रह पाया।

गांधी की सादगी, अंबेडकर की समानता, संविधान की बराबरी, फुले का सामाजिक न्याय, दीनदयाल का आखिरी व्यक्ति और हेडगेवार का चरित्र निर्माण—इनकी असली परीक्षा भाषणों या भवनों में नहीं, व्यवहार में होगी।

और शायद RSS के सौ वर्षों का सबसे महत्वपूर्ण सवाल भी यही है—

संघ ने भारत को कितना बदला, और बदलते भारत तथा सत्ता के करीब पहुंचने की यात्रा ने खुद संघ को कितना बदल दिया?

इसी जवाब में शायद यह भी छिपा है कि RSS की केवल चाल और चेहरा बदला है, या उसके चरित्र में भी कोई गहरा परिवर्तन आया है।

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