न्यूज़ चैनल बदल गए… या दर्शक?

टीवी के शोर से पॉडकास्ट की लंबी बातचीत तक

✍️ मोहित धवन
25 अगस्त 2026

भारतीय टेलीविजन पर रात जैसे-जैसे गहराती है, बहस भी तेज होती जाती है। स्क्रीन कई हिस्सों में बंटती है, चेहरे बढ़ते जाते हैं और आवाजें एक-दूसरे पर चढ़ने लगती हैं। एंकर सवाल पूछता है, जवाब शुरू होता है और उससे पहले कोई दूसरा बोल पड़ता है। कुछ ही देर में यह समझना मुश्किल हो जाता है कि सवाल क्या था और जवाब कौन दे रहा है।

हम इस दृश्य के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि शायद अब इसमें कुछ असामान्य भी नहीं लगता।

लेकिन भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने हाल में भारतीय टीवी न्यूज़ को एक बाहरी व्यक्ति की नजर से देखा तो उनकी टिप्पणी चर्चा का विषय बन गई। नई दिल्ली में Economic Times World Leaders Forum में उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि उन्हें भारतीय टीवी न्यूज़ देखना पसंद है। शाम छह बजे किसी शो में आठ लोग बहस करते दिखाई देते हैं और रात दस बजे तक संख्या बारह हो जाती है—जहां किसी एक व्यक्ति को ठीक से सुनना मुश्किल हो जाता है।

उनकी बात पर हंसा जा सकता है, नाराज भी हुआ जा सकता है। लेकिन इससे एक सवाल जरूर निकलता है—

न्यूज़ चैनल बदल गए हैं… या दर्शक?

एक समय था जब टेलीविजन की चर्चाओं में सीमित संख्या में विशेषज्ञ बैठते थे। सवाल पूछा जाता, जवाब के लिए समय मिलता और असहमति के बावजूद दूसरे पक्ष को सुनने की गुंजाइश रहती थी। आज कई कार्यक्रमों में बड़ी स्क्रीन, कई खिड़कियां, उत्तेजक शीर्षक और टकराव स्वयं कार्यक्रम का आकर्षण बनते दिखाई देते हैं।

लेकिन इसके लिए केवल न्यूज़ चैनलों को कठघरे में खड़ा करना भी उचित नहीं होगा।

आखिर TRP दर्शक से आती है। सोशल मीडिया पर वही वीडियो आगे बढ़ता है जिसे हम क्लिक और शेयर करते हैं। शांत और तथ्यपूर्ण बातचीत की तुलना में तीखी नोकझोंक तेजी से हमारा ध्यान खींचती है। बाजार आखिरकार वही परोसता है जिसकी मांग दिखाई देती है।

लेकिन इसी शोर के बीच एक दूसरा बदलाव भी दिलचस्प है।

राज शमानी, रणवीर अल्लाहबादिया और दूसरे डिजिटल creators के लंबे podcasts को बड़ी संख्या में लोग सुनते और देखते हैं। वहां उद्यमी, खिलाड़ी, कलाकार, वैज्ञानिक या किसी विषय के जानकार को अपनी बात विस्तार से रखने का अवसर मिलता है। दर्शक उस बातचीत के साथ कुछ देर ठहर सकता है, तर्क को समझ सकता है और अपनी राय बना सकता है।

शायद podcasts की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे एक कारण यह भी है।

दर्शक केवल निष्कर्ष नहीं, उस निष्कर्ष तक पहुंचने की पूरी बातचीत भी सुनना चाहता है।

हालांकि podcast होना अपने आप में सार्थक या तथ्यपूर्ण संवाद की गारंटी नहीं है। वहां भी सनसनी, कमजोर सवाल और गलत सूचनाओं की गुंजाइश है। लेकिन इस माध्यम ने लंबी बातचीत के लिए वह जगह जरूर बनाई है जो टीवी की तेज रफ्तार में कम होती दिखाई देती है।

सर्जियो गोर की टिप्पणी को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया का एक दूसरा पक्ष भी है। एक राजनीतिक दल से जुड़े वरिष्ठ नेता लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) शरद शरण इसे व्यापक भू-राजनीतिक नजरिए से देखते हैं। उनका कहना है, “जब विदेश नीति और जियो-स्ट्रैटेजिक फैसलों में राष्ट्रीय हितों से ऊपर राजनीतिक या चुनावी हित आने लगें, तो देश की वैश्विक स्थिति प्रभावित होती है। विदेशी ताकतों को हमारी आंतरिक राजनीति पर टिप्पणी का अवसर नहीं मिलना चाहिए। वैश्विक मंच पर सरकार और विपक्ष—दोनों के लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए।”

यह दृष्टिकोण अपनी जगह है, लेकिन किसी विदेशी राजदूत की टिप्पणी को भारतीय मीडिया पर अंतिम फैसला मान लेना भी उचित नहीं होगा। भारतीय पत्रकारिता ने सत्ता से कठिन सवाल पूछे हैं, घोटाले उजागर किए हैं और समाज के उन हिस्सों की आवाज को राष्ट्रीय मंच दिया है जो अन्यथा शायद सुनाई नहीं देते।

इसलिए सवाल टीवी न्यूज़ को खारिज करने का नहीं, उसके बदलते स्वरूप को समझने का है।

अगर लोग अपनी इच्छा से एक या दो घंटे का podcast सुन सकते हैं, तो यह धारणा भी कमजोर पड़ती है कि आज के दर्शक के पास लंबी और गंभीर बातचीत के लिए धैर्य नहीं बचा।

शायद धैर्य आज भी है।

सवाल सिर्फ इतना है—हम उसे सुनने लायक क्या दे रहे हैं?

Leave a comment