Gen-Z को वोटर नहीं, ऑडियंस की तरह क्यों देखने लगी है राजनीति?

मोदी की रील्स से राहुल के युवा संवाद तक—क्या 2029 की सियासी लड़ाई अब मोबाइल स्क्रीन पर लड़ी जाएगी?

लेखक ✍️ मोहित धवन
24 अगस्त 2026

सुबह उठते ही मोबाइल हाथ में आता है। कुछ मैसेज, कुछ खबरें, कोई मजेदार मीम और फिर एक के बाद एक रील्स। इन्हीं के बीच अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई वीडियो दिखाई देता है या राहुल गांधी किसी युवा से सवाल-जवाब करते नजर आते हैं।

हम कुछ सेकंड रुकते हैं, देखते हैं और फिर आगे स्क्रॉल कर देते हैं।

लेकिन शायद राजनीति हमारी इस छोटी-सी आदत को हमसे कहीं ज्यादा गंभीरता से देख रही है।

भारत की राजनीति में कभी बड़ी रैली और उसमें जुटी भीड़ राजनीतिक ताकत का पैमाना मानी जाती थी। फिर टेलीविजन आया, उसके बाद फेसबुक, एक्स और यूट्यूब। अब मुकाबला इंस्टाग्राम की रील और मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन तक पहुँच चुका है।

प्रधानमंत्री मोदी की हाल की सोशल मीडिया शैली इसका दिलचस्प उदाहरण है। औपचारिक भाषणों और कार्यक्रमों के बीच अब अपेक्षाकृत सहज वीडियो, सेल्फी-स्टाइल बातचीत और युवाओं को ‘दोस्त’ कहकर संबोधित करने जैसी कोशिशें दिखाई देती हैं। भाषा भी ऐसी रखने का प्रयास है जिससे नई पीढ़ी खुद को जोड़ सके।

लेकिन यह कोशिश केवल सत्ता पक्ष में नहीं दिखती।

विपक्ष के नेता राहुल गांधी के हाल के कार्यक्रमों में भी युवाओं पर जोर दिखाई देता है। प्रयागराज और पुणे में उनके हालिया संवाद युवाओं के साथ रहे। सवाल-जवाब और बातचीत के छोटे वीडियो सोशल मीडिया पर रील्स के रूप में खूब प्रसारित हुए।

मोदी और राहुल की शैली अलग हो सकती है, लेकिन दोनों जिस दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं, वह एक ही है—युवा मतदाता की मोबाइल स्क्रीन।

वजह समझना मुश्किल नहीं है।

आज का युवा अखबार के पहले पन्ने या रात के समाचार का इंतजार नहीं करता। खबर, मनोरंजन, बहस और काफी हद तक दुनिया को देखने का उसका नजरिया भी मोबाइल स्क्रीन पर बन रहा है।

वह एक ही घंटे में प्रधानमंत्री की रील देख सकता है, राहुल गांधी का वीडियो सुन सकता है, किसी इन्फ्लुएंसर की राय देख सकता है और फिर किसी राजनीतिक मीम पर हँसते हुए आगे बढ़ सकता है।

राजनीति के सामने इसलिए नई चुनौती है—स्क्रॉल करती उँगली को आखिर रोका कैसे जाए?

शायद इसी वजह से राजनीतिक संवाद भी छोटा, सहज और व्यक्तिगत होता जा रहा है।

एक घंटे के भाषण को देखने वाले लोग सीमित हो सकते हैं, लेकिन उसी कार्यक्रम से निकली 30 सेकंड की दिलचस्प क्लिप लाखों लोगों तक पहुँच सकती है। नेता अब केवल यह नहीं सोच रहे कि ‘क्या कहा जाए’, बल्कि यह भी कि ‘कैसे कहा जाए’ ताकि बात सोशल मीडिया पर आगे बढ़े।

यहीं राजनीति और ‘कंटेंट’ के बीच की दूरी कम होने लगती है।

लेकिन एक सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए—

क्या युवा तक पहुँचना और युवा को समझना एक ही बात है?

Gen-Z को केवल उसकी भाषा बोलकर, ट्रेंडिंग शब्द इस्तेमाल करके या उसके पसंदीदा प्लेटफॉर्म पर दिखाई देकर लंबे समय तक अपने साथ रखना आसान नहीं होगा।

यह ऐसी पीढ़ी है जिसके सामने विकल्प भी सबसे ज्यादा हैं। वह सत्ता पक्ष की बात सुन सकती है, विपक्ष का जवाब देख सकती है, किसी स्वतंत्र पत्रकार का विश्लेषण सुन सकती है और कुछ ही मिनटों में आम लोगों की प्रतिक्रियाएँ भी पढ़ सकती है।

और फिर उसके अपने सवाल हैं।

नौकरी कहाँ है? अच्छी शिक्षा कितनी सुलभ है? अपना घर खरीद पाना कितना संभव होगा? महंगाई उसके जीवन को कहाँ ले जाएगी? उसकी योग्यता के मुताबिक अवसर मिलेंगे या नहीं?

इन सवालों के जवाब 30 सेकंड की रील में नहीं समा सकते।

इसका मतलब यह नहीं कि राजनीति में रील्स का आना गलत है। यदि किसी छोटे वीडियो को देखकर कोई युवा पहली बार रोजगार, अर्थव्यवस्था, संविधान या किसी सरकारी नीति के बारे में जानना चाहता है, तो वही रील लोकतांत्रिक बातचीत का पहला दरवाजा भी बन सकती है।

समस्या रील में नहीं है।

सवाल यह है कि रील के बाद क्या है?

मोदी हों या राहुल गांधी, दोनों की बदलती संवाद शैली एक बात साफ करती है—भारत का युवा अब राजनीतिक संचार के केंद्र में है। 2029 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन Gen-Z से संवाद की लड़ाई शायद शुरू हो चुकी है।

इस बार मैदान केवल संसद, चुनावी सभा या विश्वविद्यालय परिसर नहीं होगा। उसका एक बड़ा हिस्सा हमारी जेब में रखा मोबाइल भी होगा।

राजनीतिक दल युवा की स्क्रीन तक तो पहुँच रहे हैं।

अब असली परीक्षा यह है कि क्या वे उसकी चिंताओं, उम्मीदों और भविष्य तक भी पहुँच पाएँगे।

क्योंकि रील कुछ सेकंड के लिए उँगली रोक सकती है, लेकिन भरोसा जीतने के लिए जवाब चाहिए।

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