✍️ मोहित धवन
लखनऊ, 23 अगस्त 2026

जिंदगी में हम सब कोई न कोई किरदार निभाते रहते हैं—किसी के बेटे, किसी के पिता, किसी के साथी, किसी संस्थान के कर्मचारी। इन्हें निभाते-निभाते कभी अचानक मन पूछ बैठता है—इन सबके बीच मेरी अपनी कहानी कहाँ है?
आज लखनऊ आ रहे अभिनेता आशीष विद्यार्थी को देखकर कुछ ऐसा ही सवाल मन में आता है।
सिनेमा के पर्दे पर हमने उन्हें दशकों तक अलग-अलग किरदारों में देखा। कभी उनकी आंखों का गुस्सा याद रहा, कभी आवाज की कठोरता। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित इस अभिनेता ने अनेक भाषाओं की फिल्मों में अपनी पहचान बनाई।
लेकिन आशीष विद्यार्थी की कहानी शायद फिल्मों से आगे जाकर और दिलचस्प हो जाती है।
पिछले कुछ वर्षों में हमने उन्हें एक मुसाफिर की तरह भी देखा—कभी किसी छोटे शहर में, कभी सड़क किनारे किसी दुकान पर खाना खाते, तो कभी किसी अनजान व्यक्ति से आत्मीयता से बातें करते हुए। इन यात्राओं में सबसे खूबसूरत चीज जगह या खाना नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी को लेकर बची हुई जिज्ञासा दिखाई देती है।
आज यही मुसाफिर लखनऊ में ‘Kahanibaaz’ के मंच पर अपनी कहानियाँ लेकर आ रहा है।
कहानियाँ सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं। कभी किसी की यात्रा हमें अपनी छूटी हुई यात्रा याद दिला देती है, किसी का संघर्ष अपना-सा लगता है और किसी को जिंदगी का नया अध्याय शुरू करते देखकर भीतर से आवाज आती है—शायद अभी देर नहीं हुई।
लखनऊ भी तो किस्सों का शहर है। यहाँ गलियों, इमारतों, चाय की दुकानों और दस्तरख्वान तक की अपनी कहानियाँ हैं। आज इसी शहर में एक कहानीबाज़ अपनी कहानी लेकर आ रहा है।
शायद इस शाम की असली खूबसूरती तब होगी, जब लौटते हुए कोई दर्शक खुद से पूछे—
“दुनिया के दिए हुए किरदार तो खूब निभाए… लेकिन अपनी कहानी आखिरी बार कब जी थी?”
क्योंकि कुछ कहानियाँ मंच पर खत्म नहीं होतीं,
वे हमारे भीतर से शुरू होती हैं।