सैकड़ों मौतें, हजारों लोग लापता और उजड़े गांव—26 अगस्त की विनाशकारी बाढ़ के बाद नेपाल में राहत और बचाव की लड़ाई अभी जारी है
✍️ मोहित धवन
29 अगस्त 2026
काफी सोचा कि इस पर कुछ न लिखूं। आखिर अब ऐसी घटनाएं इतनी बार हमारे सामने आने लगी हैं कि एक त्रासदी की तस्वीरें आंखों से ओझल भी नहीं होतीं और दूसरी खबर सामने आ जाती है।
लेकिन फिर लगा—लिखना चाहिए।
भले ही यह आवाज़ चंद लोगों तक पहुंचे, लेकिन जो हमारे आसपास और हमारी धरती के साथ हो रहा है, उसकी सच्चाई से रूबरू होना जरूरी है। क्योंकि किसी त्रासदी को केवल देखकर आगे बढ़ जाना और उसे समझने की कोशिश करना—दोनों में फर्क है।

नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ भी ऐसी ही एक घटना है, जिसे केवल कुछ भयावह तस्वीरों और मौत के आंकड़ों के बीच छोड़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता।
नेपाल-तिब्बत सीमा के पास पहाड़ों से अचानक पानी, बर्फ, चट्टानों और मलबे का विशाल सैलाब नीचे की ओर आया। भोटे कोशी और त्रिशूली नदी से जुड़े इलाकों में पानी इतनी तेजी से बढ़ा कि कई लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का मौका भी नहीं मिला।
घर बह गए, सड़कें टूट गईं, पुल ध्वस्त हो गए और कई बस्तियों का संपर्क बाकी इलाकों से कट गया।
लेकिन इस त्रासदी का सबसे भयावह पहलू वे आंकड़े हैं, जो लगातार बदल रहे हैं।
29 अगस्त की सुबह तक सामने आई जानकारी के अनुसार मृतकों की संख्या 626 तक पहुंच चुकी थी, जबकि 2,426 लोग अब भी लापता बताए जा रहे थे।
ये केवल आंकड़े नहीं हैं।
इनके पीछे ऐसे परिवार हैं जो कई दिनों से किसी फोन कॉल का इंतजार कर रहे हैं। कोई अपने माता-पिता को खोज रहा है, कोई अपने बच्चों को और कोई उस व्यक्ति की तस्वीर लेकर अस्पतालों और राहत केंद्रों के चक्कर लगा रहा है, जो 26 अगस्त की सुबह तक उसके साथ था।
तबाही केवल इंसानी जिंदगियों तक सीमित नहीं है। मकान, सड़कें, पुल, बिजली व्यवस्था और hydropower projects को बड़े स्तर पर नुकसान पहुंचा है। हजारों लोगों के लिए यह बाढ़ केवल घर नहीं बहाकर ले गई—उनकी रोजी-रोटी, जमा पूंजी और भविष्य की सुरक्षा भी अपने साथ ले गई।
अब जिंदगी बचाने की जंग
इस भयावह तस्वीर के बीच उम्मीद की एक दूसरी तस्वीर भी दिखाई दे रही है।
नेपाल की सेना, पुलिस, disaster-management agencies, स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य सेवाएं search, rescue और evacuation में जुटी हैं। हजारों सुरक्षाकर्मी और राहतकर्मी प्रभावित इलाकों में लोगों को निकालने, लापता लोगों को खोजने और भोजन, पानी तथा दवाइयां पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
29 अगस्त सुबह तक 4,451 लोगों को बचाए जाने की जानकारी सामने आई थी।
लेकिन rescue operation आसान नहीं है।
पहाड़ी रास्ते टूट चुके हैं, कई पुल बह गए हैं और कुछ जगहों पर सड़कें मलबे में दब गई हैं। खराब मौसम helicopter operations को भी प्रभावित कर रहा है। कुछ दुर्गम इलाकों तक पहुंचना अपने आप में एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
भारत सहित नेपाल के कई मित्र देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने सहायता के लिए हाथ बढ़ाया है। इस समय प्राथमिकता साफ है—जो जिंदगियां अभी बचाई जा सकती हैं, उन्हें बचाया जाए और जिन्होंने सब कुछ खो दिया है, उन तक भोजन, दवा और सुरक्षित आश्रय पहुंचाया जाए।
लेकिन rescue operation खत्म होने के बाद नेपाल के सामने एक और लंबी लड़ाई होगी।
उजड़े घर दोबारा बनाने होंगे। सड़कें और पुल फिर खड़े करने होंगे। रोजगार और पर्यटन को वापस पटरी पर लाना होगा। और सबसे कठिन—उन परिवारों को जिंदगी में वापस लौटना होगा जिन्होंने इस बाढ़ में अपनों को खो दिया है।
शायद इसीलिए लगा कि इस त्रासदी पर लिखना जरूरी है।
क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि नेपाल में क्या हुआ।
सवाल यह भी है कि ऐसी घटनाएं अब बार-बार हमारे सामने क्यों आ रही हैं? क्या हर बार इन्हें प्राकृतिक आपदा कहकर, कुछ दिन दुख जताकर और फिर अगली खबर की तरफ बढ़ जाना पर्याप्त है?
जब नेपाल में पानी उतर जाएगा और मलबा हटने लगेगा, तब हमें एक असहज सवाल का सामना करना होगा—
आखिर इतनी बड़ी तबाही हुई क्यों?
क्या इसके लिए केवल प्रकृति जिम्मेदार है?
या हिमालय में हो रहे बदलाव, हमारी विकास की नीतियों, निर्माण, warning systems और प्रकृति के साथ हमारे व्यवहार से जुड़े कुछ ऐसे सवाल भी हैं, जिनसे अब रूबरू होना जरूरी है?
क्योंकि राहत आज की जरूरत है।
लेकिन अगली त्रासदी से पहले सच को समझना शायद उससे भी बड़ी जरूरत है।
जारी रहेगा…