नेपाल की बाढ़—आखिर जिम्मेदार कौन?

प्रकृति, बदलता हिमालय या विकास की हमारी समझ—नेपाल की त्रासदी कई ऐसे सवाल छोड़ गई है, जिनसे अब बचना मुश्किल है

✍️ मोहित धवन
30 अगस्त 2026

नेपाल की त्रासदी पर इस series का पहला हिस्सा लिखते समय मेरे मन में एक सवाल था—क्या ऐसी घटनाओं की खबरें पढ़ते-पढ़ते हम इनके अभ्यस्त होते जा रहे हैं?

लेकिन लेख प्रकाशित होने के बाद आई कुछ प्रतिक्रियाओं से लगा कि सवाल अभी जिंदा हैं।

किसी ने पूछा—“ऐसी त्रासदियों से आखिर बचा कैसे जाए?”

किसी ने इसे प्रकृति की बार-बार मिल रही चेतावनी माना, तो किसी ने पहाड़ों और नदियों के बीच बढ़ते निर्माण और विकास के हमारे तरीके पर सवाल उठाया। केदारनाथ जैसी पुरानी त्रासदियों की याद भी फिर सामने आई।

इन प्रतिक्रियाओं में चिंता भी थी, पीड़ा भी और कहीं-कहीं गुस्सा भी।

लेकिन इनके बीच एक सवाल बार-बार उभरकर सामने आया—

क्या नेपाल में जो हुआ, वह केवल प्रकृति का प्रकोप था?

किसी त्रासदी के बाद जिम्मेदार तय करना आसान है। कभी हम प्रकृति को दोष देते हैं, कभी climate change को, कभी सरकारों को और कभी विकास के नाम पर हो रहे निर्माण को।

लेकिन सच शायद इनमें से किसी एक के भीतर नहीं, बल्कि इन सबके बीच कहीं है।

26 अगस्त की सुबह हिमालय में Langtang Lirung के पास glacier और चट्टानों का एक विशाल हिस्सा टूटकर नीचे आया। बर्फ, चट्टान, पानी और मलबा नदी तंत्र में पहुंचा और कुछ ही समय में विनाशकारी सैलाब बनता चला गया।

तो क्या कहानी बस इतनी है—पहाड़ टूटा, प्रकृति ने कहर बरपाया और इंसान बेबस था?

शायद नहीं।

पहाड़ का टूटना प्राकृतिक घटना हो सकती है, लेकिन उसका इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी में बदल जाना कई दूसरे सवाल खड़े करता है।

हिमालय हमेशा से भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ के लिहाज से संवेदनशील रहा है। अब इन्हीं पहाड़ों और संकरी नदी घाटियों में सड़कें बढ़ रही हैं, hydropower projects बन रहे हैं, tourism फैल रहा है और निर्माण भी लगातार बढ़ रहा है।

विकास अपने आप में गलत नहीं है। पहाड़ों में रहने वाले लोगों को भी सड़क, बिजली, रोजगार और बेहतर जीवन चाहिए।

सवाल विकास का नहीं, विकास की समझ का है।

क्या सड़क बनाते समय हम पहाड़ की संवेदनशीलता को पर्याप्त महत्व देते हैं? क्या नदी किनारे निर्माण करते समय यह याद रखते हैं कि आज शांत दिखाई देने वाली नदी कभी अपना रास्ता और रूप दोनों बदल सकती है?

इसी बीच climate change का सवाल भी सामने आता है।

वैज्ञानिक लंबे समय से हिमालय में बढ़ते तापमान, पीछे हटते glaciers और बदलते पर्यावरण को लेकर चिंता जता रहे हैं। बढ़ता तापमान बर्फ और पहाड़ी ढलानों की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। लेकिन नेपाल की इस एक घटना को सीधे climate change का परिणाम घोषित कर देना अभी जल्दबाजी होगी। इसके सही कारणों पर अध्ययन जारी है।

फिर सवाल है—चेतावनी का।

ऐसी आपदा में पानी और मलबा इतनी तेजी से नीचे आता है कि लोगों के पास बचने के लिए शायद कुछ मिनट ही हों। और कभी-कभी यही कुछ मिनट जिंदगी और मौत के बीच का फर्क बन जाते हैं।

इसीलिए glacier monitoring, river sensors, sirens, mobile alerts और दूर-दराज के गांवों तक मजबूत communication system अब केवल technology नहीं—जिंदगी बचाने के साधन हैं।

लेकिन जिम्मेदारी की इस चर्चा में एक पक्ष ऐसा भी है, जिसकी तरफ देखना शायद सबसे मुश्किल है—

हम स्वयं।

हमें पहाड़ों में चौड़ी सड़कें चाहिए, दूर-दराज तक hotels और resorts चाहिए, ज्यादा बिजली चाहिए और हर खूबसूरत जगह तक आसान पहुंच भी चाहिए।

सुविधा चाहना गलत नहीं है।

लेकिन क्या हमने कभी पूछा—इसकी सीमा क्या है?

शायद नेपाल की त्रासदी हमें इसी असहज सवाल के सामने खड़ा करती है।

किसी एक सरकार, climate change या प्रकृति को दोष देकर हम आगे तो बढ़ सकते हैं, लेकिन समाधान तक नहीं पहुंच सकते।

सरकारों को बेहतर planning करनी होगी। वैज्ञानिक चेतावनियों को जमीन तक पहुंचाना होगा। Technology को आखिरी गांव तक ले जाना होगा और विकास को प्रकृति की सीमाओं को समझते हुए आगे बढ़ाना होगा।

और शायद हमें भी अपनी जरूरत और लगातार बढ़ती चाहत के बीच का अंतर समझना होगा।

इसलिए असली सवाल केवल यह नहीं है—

नेपाल की बाढ़ का जिम्मेदार कौन है?

सवाल इससे कहीं बड़ा है—

क्या मनुष्य प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को सही तरह से समझ पाया है?

अगर नहीं, तो अगली त्रासदी किसी दूसरे पहाड़, किसी दूसरी नदी या किसी दूसरे शहर में हमारे सामने हो सकती है।

और यहीं से इस series का आखिरी और शायद सबसे जरूरी सवाल शुरू होता है—

क्या हम कुछ सीखेंगे?

जारी रहेगा…

Part 3: क्या हम कुछ सीखेंगे? — प्रकृति के साथ जीना कब सीखेंगे?

Leave a comment