कल पूरे देश ने 80वाँ स्वतंत्रता दिवस पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाया। जगह-जगह तिरंगा फहराया गया, देशभक्ति के गीत गूँजे और विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया गया और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई।
लेकिन इन सबके बीच मन में एक सवाल बार-बार उठता रहा—क्या देश के स्वतंत्र हो जाने भर से मनुष्य भी भीतर से स्वतंत्र हो गया?
एक समय था जब आज़ादी का अर्थ विदेशी शासन से मुक्ति था। देश ने लंबा संघर्ष किया, असंख्य लोगों ने बलिदान दिए और अंततः हमें राजनीतिक स्वतंत्रता मिली। लेकिन आज, स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद, शायद समय आ गया है कि हम आज़ादी के अर्थ को अपने भीतर भी तलाशें।
“हम लेकर रहेंगे आज़ादी!” का स्वर जब आज सुनाई देता है तो स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है—आख़िर आज़ादी किससे? और आज हम किसके ग़ुलाम हैं?
मध्यस्थ दर्शन यानी जीवन विद्या के प्रकाश में इस प्रश्न को देखें तो आज हमारे ऊपर किसी विदेशी सत्ता का शासन नहीं है, लेकिन हमारे निर्णय, हमारा सुख-दुःख और हमारा व्यवहार आज भी कई ऐसी चीज़ों से संचालित होता है, जिन्हें हमने ठीक से समझा ही नहीं है।
कहीं हम सुनी-सुनाई मान्यताओं के आधार पर जीवन जी रहे हैं, कहीं धन, पद, प्रतिष्ठा और सुविधाओं को सफलता का अंतिम पैमाना मान बैठे हैं। कहीं अहंकार हमें अपनी बात पर अड़े रहने के लिए मजबूर करता है, तो कहीं भविष्य का भय और कुछ खो देने की आशंका हमें लगातार असुरक्षित बनाए रखती है।
ज़रा सोचिए—यदि किसी दूसरे व्यक्ति का व्यवहार यह तय कर सकता है कि मैं खुश रहूँगा या दुखी, शांत रहूँगा या क्रोधित, तो मेरी स्वतंत्रता कहाँ है?
यहीं से स्वतंत्रता का एक नया अर्थ सामने आता है।
जीवन विद्या में स्वतंत्रता को केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति के रूप में नहीं, बल्कि ‘स्व-तंत्र’ होने के रूप में देखा जाता है। अर्थात ऐसा जीवन, जिसमें व्यक्ति अपने विवेक, सही समझ और मानवीय मूल्यों के आधार पर निर्णय ले सके।
यह आज़ादी किसी आंदोलन से नहीं मिलती और न ही इसे किसी दूसरे से छीना जा सकता है। इसकी यात्रा स्वयं के भीतर से शुरू होती है।
जब मनुष्य अपने जीवन से जुड़े मूल प्रश्नों—मैं कौन हूँ, मुझे वास्तव में चाहिए क्या, सुख क्या है, संबंधों में मेरी भूमिका क्या है और प्रकृति के साथ मेरा संबंध कैसा होना चाहिए—के उत्तर खोजने और समझने लगता है, तब धीरे-धीरे भ्रम की जगह स्पष्टता आने लगती है।
शरीर और उसकी सुविधाएँ जीवन के लिए आवश्यक हैं, लेकिन यदि पूरा जीवन केवल रूप, धन, पद, भोग और संग्रह के इर्द-गिर्द घूमने लगे, तो मनुष्य अनजाने में इन्हीं का आश्रित बन जाता है। इसके विपरीत, जब जीवन में विश्वास, सम्मान, स्नेह, जिम्मेदारी और न्याय जैसे मानवीय मूल्यों की पहचान होने लगती है, तब जीवन केवल सुविधा-केंद्रित न रहकर समझ-केंद्रित होने लगता है।
जीवन विद्या इसी अवस्था को समाधान की दिशा में बढ़ना मानती है—जहाँ जीवन के ‘क्या’, ‘क्यों’ और ‘कैसे’ को लेकर स्पष्टता बढ़ती जाती है।
शायद स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाने के साथ हमें एक और संकल्प की आवश्यकता है।
देश को मिली स्वतंत्रता हमारे पूर्वजों के संघर्ष और बलिदान की देन है। अब अगली यात्रा हमें स्वयं करनी है—अपने भीतर के भय, भ्रम, अहंकार और अज्ञान से स्वतंत्र होने की यात्रा।
वास्तविक स्वतंत्रता शायद वहीं से शुरू होती है, जहाँ हमारा सुख किसी दूसरे के व्यवहार का मोहताज नहीं रहता; जहाँ परिवार में संबंध विश्वास पर टिके हों, समाज में मनुष्य मनुष्य से भयभीत न हो और प्रकृति हमारे उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का हिस्सा दिखाई दे।
मध्यस्थ दर्शन इस स्थिति को व्यापक रूप में देखता है—व्यक्ति में समाधान, परिवार में समृद्धि, समाज में अभय और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व।
कल हमने पूरे उत्साह से देश की आज़ादी का उत्सव मनाया। आज शायद स्वयं से एक सवाल पूछने का दिन है—
देश तो आज़ाद है…क्या हम भी वास्तव में आज़ाद हैं?
लेखक परिचय
अमित जैन पिछले दो वर्षों से अपने परिवार के साथ MCVK, इंदौर से जुड़े हुए हैं। पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर अमित जर्मनी और अमेरिका में भी काम कर चुके हैं। ऑर्गेनिक फार्मिंग और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन में उनकी हमेशा से गहरी रुचि रही है। प्रकृति के करीब रहकर एक सहज और संतुलित जीवन जीने की इसी चाह ने उन्हें विदेश की चमक-दमक छोड़कर वापस भारत 🇮🇳 लौटने के लिए प्रेरित किया।
ओमैक्स रेजीडेंसी-2 में स्वतंत्रता दिवस समारोह, बच्चों की प्रस्तुतियां और वरिष्ठ नागरिकों का सम्मान
लेखक ✍️ – मोहित धवन
लखनऊ, 15 अगस्त 2026।
गोमती नगर विस्तार स्थित ओमैक्स रेजीडेंसी-2 में स्वतंत्रता दिवस समारोह देशभक्ति और आपसी सौहार्द के साथ मनाया गया। रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) की ओर से आयोजित कार्यक्रम में सोसाइटी के निवासियों से आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर समस्याओं के समाधान के लिए कंधे से कंधा मिलाकर काम करने का आह्वान किया गया। समारोह में बच्चों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं और वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत वंदे मातरम् से हुई। इसके बाद ध्वजारोहण किया गया और उपस्थित निवासियों ने सामूहिक रूप से राष्ट्रगान गाकर तिरंगे को नमन किया। इस अवसर पर RWA अध्यक्ष सुखराज कौर संधू, उपाध्यक्ष हजारी सिंह, सचिव आकाश अग्निहोत्री और राजेश सिंह सहित एसोसिएशन के पदाधिकारी और बड़ी संख्या में निवासी मौजूद रहे।
समारोह को संबोधित करते हुए उपाध्यक्ष हजारी सिंह ने कहा कि देश को आजादी आसानी से नहीं मिली है। इसके पीछे हजारों स्वतंत्रता सेनानियों का संघर्ष, त्याग और बलिदान रहा है। आजादी का उत्सव मनाते समय उन लोगों को याद करना भी जरूरी है, जिनके कारण आज हम स्वतंत्र वातावरण में जीवन जी रहे हैं।
उन्होंने सोसाइटी की समस्याओं की ओर निवासियों का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि किसी भी आवासीय परिसर को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी केवल RWA या कुछ पदाधिकारियों की नहीं हो सकती। इसके लिए प्रत्येक निवासी की भागीदारी जरूरी है। उन्होंने लोगों से कंधे से कंधा मिलाकर काम करने और आपसी सहयोग से समस्याओं का समाधान खोजने की अपील की।
हजारी सिंह ने कहा कि किसी सोसाइटी की पहचान केवल उसकी इमारतों और सुविधाओं से नहीं होती, बल्कि वहां रहने वाले लोगों के व्यवहार, आपसी सहयोग और सौहार्द से भी होती है। मिल-जुलकर रहने से ही एक बेहतर और सुरक्षित सामाजिक वातावरण तैयार किया जा सकता है।
कार्यक्रम में मौजूद बच्चों की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा, “ये बच्चे हमारा भविष्य हैं।” उन्होंने अभिभावकों से बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ सही मूल्य, संस्कार और अनुशासन देने पर भी ध्यान देने की अपील की। उन्होंने कहा कि जब वे बच्चों को मंदिर में भगवान शिव पर जल चढ़ाते और ‘ॐ नमः शिवाय’ कहते देखते हैं तो उन्हें खुशी होती है। उनके अनुसार बच्चों में संस्कार और अनुशासन देखकर भविष्य के प्रति विश्वास बढ़ता है।
उन्होंने धार्मिक और सामाजिक सौहार्द का उल्लेख करते हुए कहा कि ओमैक्स रेजीडेंसी-2 में अलग-अलग आस्थाओं के लोग आपसी सम्मान के साथ रहते हैं। यहां एक ओर दुर्गा पूजा का आयोजन होता है, वहीं मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर तरावीह का आयोजन करते हैं। उन्होंने इसे सोसाइटी की साझा संस्कृति और आपसी भाईचारे का उदाहरण बताया।
समारोह में बच्चों की प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र रहीं। प्रथम ओझा, मिशिका यादव, शांभवी मिश्रा, शिवांश गिरी, नेसाया, सुलेमान, एज्राक, अहमद, शर्वस दुबे, शीर्षिका श्रीवास्तव, विष्णुप्रिया श्रीवास्तव, वर्णिका सहाय, अभिनव सिंह तोमर, रुद्र सिंह, योनित सिगरोहा, अरुद्रा श्रीवास्तव, कबीर सिंह, गार्गी सिंह और दीपांशी चिलकोटी सहित बच्चों ने नृत्य, गायन, कविता और भाषण की प्रस्तुतियां दीं। ताइक्वांडो ग्रुप ने मार्शल आर्ट्स का प्रदर्शन किया।
इस अवसर पर सोसाइटी के वरिष्ठ नागरिकों को भी सम्मानित किया गया। रमेश मिश्रा, राजीव गुजराल, सतीश कुमार श्रीवास्तव, चन्द्र सेन, अशोक सिंह, मनोज कौशिक, उमेश चन्द्र श्रीवास्तव, जयपाल सिंह, हरिवंश सिंह, राजेश सिंह और प्रमोद चन्द्र श्रीवास्तव को सम्मान प्रदान किया गया।
समारोह में बच्चों से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक की भागीदारी रही। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश के लिए बलिदान देने वालों को याद करने के साथ ही निवासियों ने सोसाइटी में आपसी सहयोग, अनुशासन, सामाजिक सद्भाव और मिल-जुलकर रहने का संदेश दिया।
Flag Hoisting, Children’s Performances and Felicitation of Senior Citizens at Omaxe Residency-2
Writer ✍️ – Mohit Dhawan
Lucknow, August 15, 2026
Independence Day is not merely an occasion to hoist the Tricolour and sing the National Anthem; it is also a day to celebrate the spirit of India—a nation whose strength lies in unity amidst diversity and mutual brotherhood. With this very spirit, Independence Day was celebrated at Omaxe Residency-2, Gomti Nagar Extension, Lucknow, where the participation of children, families and senior citizens turned the occasion into a warm community celebration.
The programme, organised by the Resident Welfare Association (RWA), began with Vande Mataram, followed by the flag-hoisting ceremony. Residents then came together to sing the National Anthem and pay tribute to the Tricolour.
RWA President Sukhraj Kaur Sandhu, Vice President Hazari Singh, Secretary Akash Agnihotri, Rajesh Singh, other office-bearers and a large number of residents were present on the occasion.
Addressing the gathering, Vice President Hazari Singh extended his Independence Day greetings to all residents. He reminded everyone that the freedom we enjoy today did not come easily; it was achieved through the struggle, sacrifice and courage of thousands of freedom fighters. Independence Day, he said, should therefore remind us not only of our rights but also of our responsibilities towards society and the nation.
A key message of his address was the importance of living together with mutual respect, cooperation and harmony. He emphasised that a residential society is not defined merely by its buildings and facilities, but by the relationships, trust and sense of belonging shared by the people who live there.
Highlighting the spirit of communal harmony at Omaxe Residency-2, he pointed out that while Durga Puja is celebrated with enthusiasm in the society, Muslim residents also come together for Taraweeh during Ramadan. When people belonging to different faiths and traditions respect one another and live together in harmony, he said, the true spirit of India becomes visible.
Children added colour and energy to the celebration through a variety of cultural performances. Some danced, some sang, while others expressed their patriotic feelings through poems and speeches. Pratham Ojha, Mishika Yadav, Shambhavi Mishra, Shivansh Giri, Nesaaya, Sulaiman, Ezraque, Ahamed, Pratham Ojha-Mishu, Sharvas Dubey, Sheershika Srivastava, Vishnupuriya Srivastava, Varnika Sahay, Abhinav Singh Tomar, Rudra Singh, Ycnit Sigroha, Arudra Srivastava, Kabir Singh, Gargi Singh and Dipanshi Chilkoti were among the children who participated in various performances. A Taekwondo group also impressed the audience with a martial arts demonstration.
Another touching part of the programme was the felicitation of the society’s senior citizens. In recognition of their experience, contribution and valued presence in the community, Ramesh Mishra, Rajeev Gujral, Satish Kumar Srivastava, Chandra Sen, Ashok Singh, Manoj Kaushik, Umesh Chandra Srivastava, Jaipal Singh, Harivansh Singh, Rajesh Singh and Pramod Chandra Srivastava were honoured on the occasion.
The presence of different generations and families together under the Tricolour gave a deeper meaning to the Independence Day celebration. The programme concluded with a simple but powerful message: one of the best ways to preserve the legacy of our freedom is to build a society around us where differences of opinion do not become differences of heart, diversity does not create distance, and people live together with mutual respect, harmony and a shared sense of belonging.
बारिश के मौसम में लोगों की अपनी-अपनी पसंद होती है। किसी को पकौड़े और चाय याद आते हैं तो किसी को गरमा-गरम समोसे। मेरी पसंद पता नहीं कब से एक साधारण-से भुट्टे पर आकर टिक गई। आसमान में बादल हों, हल्की बारिश हो और कोयले पर सिंका हुआ भुट्टा मिल जाए तो मेरे लिए मौसम का आनंद कुछ और ही हो जाता है। यह शौक कब शुरू हुआ, याद नहीं, लेकिन बरसात में भुट्टा सामने आ जाए तो बिना खाए आगे बढ़ना मुश्किल जरूर लगता है।
पिछले दिनों इंदौर जाना हुआ तो हाईवे के किनारे एक दिलचस्प नजारा देखने को मिला। कई स्थानों पर भुट्टे बिक रहे थे और कहीं-कहीं तो 30-40 विक्रेता आसपास ही दिखाई दिए। देखकर दिल खुश हो गया कि इस स्वाद के चाहने वालों की कमी नहीं है। वैसे मानसून में यह दृश्य केवल इंदौर तक सीमित नहीं। देश के लगभग हर शहर, हाईवे और पर्यटन स्थल पर इस मौसम में भुट्टा आसानी से मिल जाता है। पहाड़ों पर बादलों के बीच भुट्टा बेचते छोटे ठेले तो जैसे वहां के दृश्य का हिस्सा ही बन चुके हैं।
दिलचस्प यह है कि जिस भुट्टे को आज हम इतना देसी मानते हैं, उसकी कहानी भारत में शुरू नहीं हुई थी। मक्का मूल रूप से अमेरिका महाद्वीप की फसल है। आज के मेक्सिको क्षेत्र में हजारों वर्ष पहले वहां के मूल निवासियों ने जंगली घास से इसे विकसित किया और धीरे-धीरे यह उनकी भोजन संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
15वीं शताब्दी के अंत में अमेरिका और यूरोप के बीच समुद्री संपर्क बढ़ने के बाद मक्का दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंचा। भारत में इसके आगमन के समय और रास्ते को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत हैं, लेकिन इसके व्यापक प्रसार को लगभग 16वीं शताब्दी के समुद्री व्यापार से जोड़ा जाता है। भारतीय मिट्टी और जलवायु ने इस परदेसी फसल को ऐसा अपनाया कि यह हमारे खेतों और खान-पान का हिस्सा बनती चली गई।
मक्के से जुड़ा मेरा एक दिलचस्प अनुभव अफ्रीका का भी है। अफ्रीकी देशों में मक्के की खूब खेती होती है और वहां भी भुट्टा भूनकर खाने का चलन है। नाइजीरिया में अपने प्रवास के दौरान मेरा यह शौक खूब पूरा होता रहा। सड़क किनारे आग या कोयले पर सिकते भुट्टे वहां भी आसानी से मिल जाते थे। फर्क सिर्फ इतना था कि वहां हम इसे आमतौर पर सादा ही खाते थे। भारत की तरह नींबू रगड़कर नमक-मसाला लगाने का चलन मैंने वहां नहीं देखा। एक ही भुट्टा, लेकिन दो महाद्वीपों में उसका स्वाद लेने का अंदाज अलग—यह बात मुझे हमेशा दिलचस्प लगी।
भारत ने भी मक्के को अपने-अपने क्षेत्रीय स्वाद में ढाला। कहीं मक्के की रोटी बनी, कहीं दलिया और दूसरे व्यंजन, तो कहीं दानों को उबालकर खाया गया। लेकिन कोयले पर सीधे सेंककर तैयार होने वाले भुट्टे ने सड़क किनारे मिलने वाले लोकप्रिय स्वाद के रूप में अपनी अलग जगह बना ली।
मानसून से इसके जुड़ाव के पीछे खेती का चक्र भी है। भारत में मक्का प्रमुख खरीफ फसलों में शामिल है और बारिश का मौसम ताजे भुट्टों की उपलब्धता से जुड़ा रहता है। संभवतः खेत और मौसम के इसी मेल ने इसे बरसात का इतना लोकप्रिय साथी बना दिया।
भुने भुट्टे की सबसे बड़ी खूबी शायद उसकी सादगी है। न बड़ी रसोई चाहिए, न प्लेट-चम्मच। कोयले की आंच पर भुट्टा सेंका, आधे नींबू पर नमक-मसाला लगाया और उसे गर्म दानों पर रगड़ दिया—बस तैयार। जलते कोयले की महक, नींबू की खटास और नमक-मसाले का स्वाद मिलकर एक साधारण भुट्टे को खास बना देते हैं।
लेकिन शायद भुट्टा केवल खाने की चीज नहीं है। लंबी ड्राइव के बीच अचानक गाड़ी रोककर भुट्टा खाना, पहाड़ों की ठंडी हवा में उसे हाथ में लेकर चलना या बारिश में किसी ठेले के पास उसके सिंकने का इंतजार करना—ये छोटे-छोटे पल बाद में यादों का हिस्सा बन जाते हैं।
आज दुनिया भर का खाना कुछ क्लिक में घर पहुंच जाता है, फिर भी सड़क किनारे कोयले पर सिकते भुट्टे का आकर्षण कायम है। क्योंकि कुछ स्वाद भूख से ज्यादा मौसम, जगह और हमारी यादों से जुड़े होते हैं।
सोचता हूं, इसकी यात्रा भी कितनी दिलचस्प है—हजारों वर्ष पहले मेक्सिको में विकसित हुआ मक्का समुद्र पार कर अलग-अलग महाद्वीपों तक पहुंचा। अफ्रीका में मैंने इसे सादा भूनकर खाया और भारत में वही भुट्टा नींबू-नमक के साथ मानसून का स्वाद बन गया।
शायद कुछ स्वाद जन्म से अपने नहीं होते, लेकिन समय और यादें उन्हें इतना अपना बना देती हैं कि उनके बिना पूरा मौसम ही अधूरा लगने लगता है। 🌽🌧️
आजकल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र हो या देश का कोई अन्य बड़ा शहर, इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, शहरीकरण और औद्योगीकरण के नाम पर नए आयाम स्थापित किए जा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की जमीनों का धड़ल्ले से अधिग्रहण किया जा रहा है। मीडिया इसे “प्रगति की नई सुबह” कह रहा है, तो अर्थशास्त्री टीवी चैनलों पर बैठकर जीडीपी के आंकड़ों में आने वाले संभावित उछाल पर तालियां बजा रहे हैं।
लेकिन इस कंक्रीट के चमकते हाईवे और धूल भरे चकबंदी के रास्तों के बीच एक ऐसा खौफनाक सच छिपा है, जिस पर कोई बात नहीं करना चाहता।
पता नहीं हम किस विकास पर गर्व कर रहे हैं? उस विकास पर, जिसने एक स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर उत्पादक—किसान—को एक लाचार, नशेड़ी और साधनहीन उपभोक्ता बना दिया? या उस विकास पर, जहां खेत की उपजाऊ मिट्टी की जगह कंक्रीट का जंगल उग आया और उस जंगल का राजा कोई बाहरी सेठ बन बैठा?
सेठ आएगा, पैसा कमाएगा और निकल जाएगा। लेकिन जो किसान अपनी माटी छोड़कर कागजी नोटों की क्षणिक चमक में अंधे हो गए हैं, उनका क्या?
यह केवल ‘विकास’ नहीं है, यह किसी भी क्षेत्र का धीमा, मीठा और नियोजित विनाश है। यह बाहरी पूंजीपति, जिसे इन्वेस्टर की संज्ञा दी जाती है—यह कोई विकास का मसीहा नहीं, बल्कि आधुनिक समय का वह शिकारी है, जो विकास के नाम पर किसी क्षेत्र की आत्मा, उसकी पहचान और वहां के मूल निवासियों के अस्तित्व को लील रहा है।
हाईवे का कट बनता है, फोर-लेन या सिक्स-लेन चौड़ी सड़कें बनती हैं और उनके साथ ही शुरू होता है एक ऐसा खेल, जिसमें जमीन का असली मालिक यानी किसान हमेशा के लिए कंगाल हो जाता है और बाहर से आया ‘सेठ’ अरबों का साम्राज्य खड़ा कर लेता है।
विकास की योजनाएं जब फाइलों में बनती हैं, तो सबसे पहले उन पर नजर पड़ती है दलालों और कॉरपोरेट इन्वेस्टर्स की। किसी भी नए हाईवे, एक्सप्रेसवे या बायपास का नक्शा पास होने से महीनों पहले ही बाहरी पूंजीपति और रसूखदार सेठ उस इलाके में उतर आते हैं। उन्हें पता होता है कि कौन-सा हिस्सा “प्राइम लोकेशन” बनने वाला है, हाईवे का कौन-सा कट किस गांव की सीमा को छुएगा।
किसान, जो पीढ़ियों से अपनी मिट्टी को सिर्फ अन्न उगाने का माध्यम समझता आया है, उसे इस बाजारीकरण की हवा तक नहीं होती। सेठ आते हैं, पैसे की चमक दिखाते हैं और औने-पौने दामों में हाईवे के किनारे की बहुमूल्य जमीनें—लैंड पार्सल—हड़प लेते हैं।
नीति आयोग और राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में आधारभूत संरचना के विकास के बाद निर्मित 70 प्रतिशत से अधिक व्यावसायिक भूमि पर स्थानीय लोगों का कोई नियंत्रण नहीं रहता। यह पूरी तरह से बाहरी कॉरपोरेट्स और रियल एस्टेट माफिया के कब्जे में चली जाती है।
किसान को जिस जमीन का मुआवजा 20-30 लाख रुपये बीघा या एकड़ मिलता है, वही जमीन हाईवे बनते ही 2 करोड़ से 5 करोड़ रुपये बीघा हो जाती है। किसान को लगता है कि उसे बहुत बड़ा खजाना मिल गया, लेकिन वास्तव में वह अपनी आने वाली दस पीढ़ियों की संपत्ति को कौड़ियों के भाव बेच चुका होता है।
हाईवे के किनारे बड़े-बड़े लैंड पार्सल, फाइव स्टार होटल, मॉल, प्राइवेट अस्पताल और वेयरहाउस इन्हीं पूंजीपतियों के पास होते हैं। और मूल निवासी अपनी ही पैतृक जमीन की चारदीवारी के बाहर ठेला लगाने या उसी सेठ के मॉल में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करने के लिए मजबूर कर दिया जाता है।
मुआवजा आते ही बदलने लगता है बाजार
जमीन अधिग्रहण के साथ केवल भूगोल नहीं बदलता, समाज की जनसांख्यिकी और उसकी मानसिकता भी बदलती है। जैसे ही किसी क्षेत्र में अधिग्रहण का मुआवजा बंटना शुरू होता है, उस इलाके के बाजारों का परिदृश्य रातों-रात बदल जाता है।
जहां कभी खाद, बीज और खेती के औजारों की दुकानें हुआ करती थीं, वहां अचानक चमकते हुए गाड़ियों के शोरूम खुल जाते हैं। हाई-एंड शराब के ठेके, मॉडल शॉप और बार आ जाते हैं। महंगे रेस्टोरेंट और हुक्का बार गली-गली में उग आते हैं।
यह कोई इत्तेफाक नहीं है। यह एक सोची-समझी बाजारी रणनीति है।
पूंजीवादी व्यवस्था जानती है कि जिस किसान के हाथ में अचानक जीवन में पहली बार करोड़ों रुपये का कैश आया है, उसकी वित्तीय साक्षरता—फाइनेंशियल लिटरेसी—शून्य के बराबर है। उसने कभी इतने पैसे एक साथ नहीं देखे।
मार्केटिंग की यह गिद्ध संस्कृति किसान के उसी मनोविज्ञान पर हमला करती है। शराब के ठेके गांव के पास इसलिए नहीं खुलते कि वहां विकास हुआ है, बल्कि इसलिए खुलते हैं क्योंकि वहां मुआवजे का वह ‘आसान पैसा’ बह रहा है, जिसे निचोड़ना पूंजीपतियों का मुख्य लक्ष्य है।
करोड़ों का मुआवजा और चकाचौंध
जब एक किसान के बैंक खाते में अचानक 1 करोड़, 2 करोड़ या 5 करोड़ रुपये आते हैं, तो एक अंधी चकाचौंध पैदा होती है। यह पैसा मेहनत से कमाया हुआ नहीं, बल्कि मिट्टी बेचने से आया पैसा है। इसलिए इसकी उम्र बहुत छोटी होती है।
एक आम किसान परिवार को जब मुआवजे का पैसा मिलता है, तो उसका पहला निवेश दिखावे की दीवारें और लोहे का हाथी होता है। सबसे पहले पुराना पक्का या कच्चा मकान तोड़ा जाता है। उसकी जगह एक विशाल, बेढंगा और अति-आधुनिक मकान खड़ा किया जाता है। उसमें लाखों के झूमर और टाइल्स लगती हैं।
इसके तुरंत बाद दरवाजे पर खड़ी होती है एक बड़ी, चमचमाती लग्जरी कार। कार चलाने का हुनर आए न आए, लेकिन आसपास में धाक जमाने के लिए बड़ी गाड़ी जरूरी है।
जिस किसान ने पूरी जिंदगी बाजरे की रोटी, छाछ और खेतों में बहाए पसीने के बीच गुजारी थी, अचानक उसके हाथ में असीमित पैसा आ जाता है। दोस्तों की मंडली जमने लगती है। शामें महंगे रेस्टोरेंटों में बीतने लगती हैं। देसी की जगह महंगी अंग्रेजी शराब ले लेती है।
जब थोड़ा होश आता है कि खेती के बिना जीवन कैसे चलेगा, तो किसान आसपास के क्षेत्रों में जमीन तलाशने निकलता है। लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है।
बाहरी निवेशकों और सट्टेबाजों ने आसपास की बची-कुची जमीनों के दाम भी चार से पांच गुना बढ़ा दिए होते हैं। किसान जिस जमीन को 10-20 लाख में बेचकर हटा था, वही जमीन अब उसे 50 लाख में भी नहीं मिलती। लाचार होकर वह एक छोटा-मोटा, अनुत्पादक प्लॉट खरीदकर संतोष कर लेता है।
क्या यह केवल एक काल्पनिक कहानी है?
यह कोई काल्पनिक कहानी या केवल एक भावना नहीं है। अगर आप भारत के किसी भी ऐसे क्षेत्र का अध्ययन करें, जहां बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हुआ है—चाहे वह ग्रेटर नोएडा का यमुना एक्सप्रेसवे हो, हरियाणा का गुड़गांव-मानेसर बेल्ट हो, गुजरात का धोलेरा हो या फिर महाराष्ट्र का समृद्धि महामार्ग—हर जगह की कहानी लगभग एक जैसी दिखाई देती है।
अधिग्रहीत भूमि के मुआवजे का अध्ययन करने वाले विभिन्न स्वतंत्र शोध बताते हैं कि 90 से 95 प्रतिशत किसान अपने मुआवजे की रकम को अगले 5 से 8 वर्षों के भीतर पूरी तरह से गैर-उत्पादक संपत्तियों जैसे गाड़ी, मकान, शादियों के दिखावे, शराब और अय्याशी में गंवा देते हैं।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के वित्तीय समावेशन आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण भारत में केवल 2 से 3 प्रतिशत लोगों को ही इक्विटी, म्यूचुअल फंड या सुरक्षित दीर्घकालिक निवेश की समझ है।
यमुना एक्सप्रेसवे और दिल्ली-एनसीआर के आसपास के क्षेत्रों पर हुए कई समाजशास्त्रीय अध्ययनों में यह बात सामने आई कि मुआवजा मिलने के पांच साल बाद उन गांवों में गृह-कलह, संपत्ति विवाद, हत्या और युवाओं में ड्रग्स/शराब की लत के मामलों में 40 से 60 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
मुश्किल से 5 प्रतिशत किसान ऐसे होते हैं, जो समझदारी दिखाते हैं। वे मुआवजे के पैसे से किसी दूर-दराज के इलाके में उतनी ही या उससे ज्यादा उपजाऊ जमीन खरीद लेते हैं या कोई बड़ा, टिकाऊ व्यवसाय शुरू कर लेते हैं। बाकी 95 प्रतिशत लोग अपनी ही आंखों के सामने अपनी भावी पीढ़ियों का भविष्य स्वाहा कर देते हैं।
आखिर किसान के पास बचता क्या है?
यह व्यवस्था इतनी शातिर है कि यह पहले किसान से उसकी जीविका का साधन—उसकी ‘जमीन’—छीनती है। फिर उसे ‘मुआवजे’ का झुनझुना थमाती है। उसके बाद अपने ही बनाए गए बाजार—शोरूम, शराब के ठेके, मॉल—के जरिए वह सारा मुआवजा किसान की जेब से निकालकर वापस पूंजीपति की तिजोरी में डाल देती है।
अंत में किसान के पास क्या बचता है?
एक बड़ी गाड़ी, जिसकी री-सेल वैल्यू पांच साल बाद कौड़ियों की हो जाती है। एक बड़ा मकान, जिसकी मरम्मत कराने के लिए उसके पास पैसे नहीं होते। और एक बेरोजगार, दिशाहीन नई पीढ़ी, जो न खेती के लायक बची, न पढ़ाई के और न ही किसी व्यापार के।
अगर यही मॉडल चलता रहा, तो आने वाले कुछ दशकों में ग्रामीण भारत का अस्तित्व केवल इतिहास की किताबों में रह जाएगा।
इन्वेस्टर समृद्ध होगा, उसकी बैलेंस शीट अरबों में होगी। हाईवे पर सरपट दौड़ती गाड़ियों की रफ्तार देश की तरक्की का ढोल पीटेगी। लेकिन उस हाईवे के दोनों तरफ, रोशनी से जगमगाते ढाबों और शोरूमों के ठीक पीछे, अंधेरे में डूबे वे गांव होंगे, जहां के मूल निवासी अपनी ही जमीन पर बेगाने हो चुके होंगे।
यदि सरकारें और नीति निर्माता केवल ‘भूमि अधिग्रहण’ और ‘इन्वेस्टमेंट’ के आंकड़ों पर अपनी पीठ थपथपाते रहे और मुआवजे के साथ-साथ स्थानीय लोगों के पुनर्वास, वित्तीय साक्षरता और उनकी परिसंपत्तियों की सुरक्षा का कोई ठोस ढांचा नहीं बनाया, तो यह कंक्रीट का विकास भारत के ग्रामीण ढांचे की चिता पर ही खड़ा होगा।
लेखक परिचय
बिशन नेहवाल आर्थिक-सामाजिक चिंतक एवं लेखक हैं। भारतीय कृषि, अर्थव्यवस्था, ग्रामीण समाज और किसानों के अधिकारों से जुड़े विषय उनके लेखन के केंद्र में रहे हैं। वे समसामयिक आर्थिक-सामाजिक मुद्दों पर विभिन्न हिंदी समाचार पत्रों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए वैचारिक लेख लिखते रहे हैं। वरिष्ठ राजनेता के.सी. त्यागी के साथ भी उनके कई वैचारिक लेख सह-लेखक के रूप में प्रकाशित हुए हैं।
संपादकीय टिप्पणी
विकास की चमक के पीछे छूटते किसान, भूमि के बदलते अर्थ और ग्रामीण समाज के भविष्य पर गंभीर सवाल उठाता यह विचारोत्तेजक लेख हमें अमित जैन के माध्यम से प्राप्त हुआ।
अमित जैन पिछले दो वर्षों से अपने परिवार के साथ MCVK, इंदौर से जुड़े हुए हैं। पेशे से वे सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और जर्मनी व अमेरिका में भी काम कर चुके हैं। ऑर्गेनिक फार्मिंग में उनकी हमेशा से गहरी रुचि रही है। प्रकृति के करीब रहकर और उसके साथ सामंजस्य में जीवन जीने की इसी चाह ने उन्हें विदेश की चमक-दमक छोड़कर वापस भारत 🇮🇳 लौटने के लिए प्रेरित किया।
भूमि, किसान और विकास को देखने का यह नजरिया कई असहज लेकिन जरूरी सवाल हमारे सामने रखता है। जरूरी नहीं कि पाठक लेख में व्यक्त हर निष्कर्ष से सहमत हो, लेकिन विकास की किसी भी यात्रा में उस किसान के भविष्य पर चर्चा जरूर होनी चाहिए, जिसकी जमीन पर उस विकास की नींव रखी गई है।
बिशन नेहवाल जी के प्रति साभार, यह लेख पाठकों के लिए प्रस्तुत है।
दाजी से मेरी व्यक्तिगत मुलाकात कभी नहीं हुई। न ही उनसे सीधे संवाद करने का अवसर मिला है। लेकिन कमलेश डी. पटेल, जिन्हें दुनिया भर में उनके अनुयायी प्रेम से दाजी कहते हैं, उनके प्रति लोगों के मन में जो प्रेम, श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव है, उसे मैंने करीब से जरूर महसूस किया है।
करीब छह-सात माह पूर्व दाजी की गुरु-परंपरा के पूज्य लालाजी महाराज की 153वीं जन्म जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह में मुझे उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर स्थित आश्रम में कुछ समय बिताने का अवसर मिला। देश-विदेश से आए हार्टफुलनेस के साधकों के बीच रहना और उनमें से कई से बातचीत करना मेरे लिए किसी आध्यात्मिक आयोजन को देखने भर का अनुभव नहीं था, बल्कि लोगों के जीवन में किसी विचार और साधना के प्रभाव को समझने का अवसर भी था।
अलग-अलग आयु, पेशे और देशों से आए लोगों से बातचीत में एक बात बार-बार सामने आई। कई लोगों ने बताया कि हार्टफुलनेस से जुड़ने, ध्यान को दिनचर्या का हिस्सा बनाने और इसकी शिक्षाओं को जीवन में अपनाने के बाद उन्होंने अपने भीतर बदलाव महसूस किए। किसी ने मानसिक शांति की बात की, किसी ने संबंधों में आए बदलाव की, तो किसी ने जीवन को पहले की तुलना में अधिक सहज और सुखद अनुभव करने की बात कही।
ये उनके व्यक्तिगत अनुभव थे और एक पत्रकार के रूप में मैं उन्हें उसी रूप में देखता हूँ। लेकिन अलग-अलग लोगों से एक जैसा भाव सुनने के बाद जिज्ञासा स्वाभाविक थी—
आखिर ऐसा क्या है इस विचार और साधना में, जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए लोगों को इतनी गहराई से जोड़ता है?
शायद दाजी और हार्टफुलनेस को समझने की मेरी जिज्ञासा की शुरुआत भी यहीं से होती है।
सफलता की दौड़ और भीतर का सवाल
हम जिस समय में जी रहे हैं, वहाँ सफलता की परिभाषा काफी हद तक दिखाई देने वाली उपलब्धियों से तय होने लगी है। बेहतर नौकरी, बड़ा कारोबार, अधिक आय, आलीशान घर, प्रभावशाली पद और सोशल मीडिया पर पहचान—आधुनिक जीवन लगातार हमें बाहर की ओर देखने के लिए प्रेरित करता है।
लेकिन इसी दौड़ के बीच सवाल खड़ा होता है—सब कुछ हासिल करने के बाद भी अगर मन शांत नहीं है, संबंध सहज नहीं हैं और भीतर संतुष्टि नहीं है, तो क्या उसे पूर्ण सफलता कहा जा सकता है?
यहीं दाजी एक दूसरी दिशा की ओर देखने की बात करते दिखाई देते हैं—अपने भीतर की ओर।
वर्ष 1956 में गुजरात में जन्मे कमलेश डी. पटेल ने अहमदाबाद में फार्मेसी की पढ़ाई की। छात्र जीवन में ही वे ध्यान से जुड़े। बाद में वे अमेरिका चले गए, जहाँ उन्होंने परिवार बसाया और न्यूयॉर्क में फार्मेसी का सफल व्यवसाय खड़ा किया। यानी जिस पेशेवर और भौतिक सफलता को पाने के लिए लाखों लोग प्रयास करते हैं, दाजी स्वयं उस दुनिया से होकर आए हैं।
इसके समानांतर उनकी आध्यात्मिक यात्रा चलती रही। आगे चलकर वे पार्थसारथी राजगोपालाचारी, जिन्हें चारीजी कहा जाता है, के उत्तराधिकारी बने और वर्ष 2014 के बाद श्री रामचंद्र मिशन के अध्यक्ष तथा हार्टफुलनेस परंपरा के मार्गदर्शक की जिम्मेदारी संभाली।
शायद यही पृष्ठभूमि उनके विचारों को दिलचस्प बनाती है। पेशे, कारोबार और परिवार के बीच रहते हुए उन्होंने अपनी आंतरिक यात्रा को भी आगे बढ़ाया।
बाहर की उपलब्धि, भीतर की स्थिति
दाजी के विचारों में चेतना और मनुष्य के आंतरिक विकास का प्रश्न बार-बार सामने आता है। हार्टफुलनेस में ध्यान को केवल तनाव कम करने की तकनीक नहीं, बल्कि स्वयं को समझने और चेतना के विकास की प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है।
हमने प्रगति को मापने के कई पैमाने बना लिए हैं—आय, संपत्ति, पद, कारोबार और सामाजिक प्रतिष्ठा। लेकिन मनुष्य अपने भीतर कितना सहज है, इसे मापने का हमारे पास कौन-सा पैमाना है?
उसके संबंध कैसे हैं? वह असफलता और असहमति को कैसे संभालता है? और क्या उसे यह स्पष्ट है कि जिस गति से वह दौड़ रहा है, आखिर जाना कहाँ चाहता है?
आज हमारे पास पहले से कहीं तेज संचार है, लेकिन क्या संवाद भी बेहतर हुआ है? मोबाइल में सैकड़ों संपर्क हैं, लेकिन क्या संबंध अधिक गहरे हुए हैं? जानकारी तक पहुँच लगभग असीमित है, लेकिन क्या उसी अनुपात में हमारे भीतर स्पष्टता भी बढ़ी है?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे अनेक प्रश्नों के उत्तर कुछ ही क्षणों में दे सकती है, लेकिन जीवन के कुछ सवाल अब भी हमें स्वयं से पूछने पड़ते हैं—
मैं किस दिशा में जा रहा हूँ? मुझे वास्तव में क्या चाहिए? जो कुछ मैं हासिल कर रहा हूँ, क्या वह मुझे भीतर से भी सुखी कर रहा है?
हार्टफुलनेस इसी आंतरिक यात्रा को ध्यान के माध्यम से समझने का एक रास्ता प्रस्तुत करता है। दाजी के कार्य को राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली और वर्ष 2023 में भारत सरकार ने उन्हें आध्यात्मिकता के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया।
लेकिन मेरे लिए दाजी को समझने की शुरुआत उनके पद्म भूषण या वैश्विक पहचान से नहीं हुई।
वह शाहजहाँपुर में हुई।
वहाँ अलग-अलग देशों और जीवन-पृष्ठभूमियों से आए लोगों में अपनी गुरु-परंपरा और हार्टफुलनेस के प्रति दिखाई देने वाला प्रेम और कृतज्ञता मुझे सोचने पर मजबूर करता रहा।
किसी आध्यात्मिक पद्धति के प्रभाव का आकलन शायद केवल उसके अनुयायियों की संख्या से नहीं किया जा सकता। एक कसौटी यह भी हो सकती है कि उससे जुड़ा व्यक्ति अपने जीवन, संबंधों और व्यवहार में क्या बदलाव अनुभव करता है।
आधुनिक दुनिया ने हमें आगे बढ़ना खूब सिखाया है—तेज चलना, अधिक कमाना, बड़ा सोचना और लगातार कुछ हासिल करना। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। लेकिन शायद जीवन का अगला सवाल यह होना चाहिए—
इस पूरी दौड़ में हम स्वयं कहाँ हैं?
दाजी का संदेश शायद बाहर की दुनिया को छोड़ने का नहीं, बल्कि बाहर की यात्रा के साथ भीतर की यात्रा को भी महत्व देने का है।
और शाहजहाँपुर में बिताए उस समय के बाद मेरे मन में भी एक सवाल रह गया—
क्या जीवन को थोड़ा अधिक सहज और सुखद बनाने के लिए हमें भी कभी-कभी बाहर से अपनी नजर हटाकर अपने भीतर देखने की जरूरत है?
कल इंदौर से लखनऊ लौटते हुए गाड़ी लगातार आगे बढ़ रही थी, लेकिन मन बार-बार पीछे जा रहा था। रास्ते भर MCVK में बिताए पिछले 21 दिन किसी फिल्म की तरह दिमाग में चलते रहे। कभी परिसर की सुबह याद आती, कभी Kitchen में साथ काम करते लोग, कभी किसी के साथ हुई छोटी-सी बातचीत, कभी ठहाके और कभी विदाई के वे पल, जब मन कह रहा था—कुछ दिन और रुक जाते तो अच्छा होता। ऐसा लग रहा था कि हम MCVK से निकल तो आए हैं, लेकिन MCVK अभी हमारे भीतर से नहीं निकला है। और इन तमाम यादों के बीच सबसे ज्यादा अजय भैया के सत्र घूम रहे थे—उनकी बातें, उनका समझाने का अंदाज और वे तमाम characters, जो पता नहीं कहाँ-कहाँ से उनके सत्रों में चले आते थे।
विकल्प शिविर के शुरुआती दिनों का अनुभव अपने आप में मजेदार था। अजय भैया अपनी सहज शैली में समझा रहे होते और हम लोग कई बार कुछ शब्दों का अर्थ समझने की कोशिश कर रहे होते—समाधान, समृद्धि, सह-अस्तित्व, कल्पनाशीलता, प्रमाणिकता, साक्षात्कार, बोध, अनुभव… हिंदी अपनी ही थी, लेकिन कई शब्द बड़े गूढ़ लगते थे! कभी एक शब्द का अर्थ समझने बैठो तो उसके पीछे दो नए शब्द खड़े मिल जाते। मन में आता—“अजय भैया, इसका थोड़ा आसान वाला version भी है क्या?” लेकिन धीरे-धीरे वही शब्द परिचित होने लगे और उनके मायने भी खुलने लगे। तब लगा कि मुश्किल शायद शब्दों में नहीं थी; हमारी जिंदगी में इन विषयों पर बातचीत ही कितनी होती है? Career, business, target, EMI, investment और promotion की भाषा हम तुरंत समझ लेते हैं, लेकिन सुख क्या है, संबंध क्या है, विश्वास क्या है, समृद्धि किसे कहें और आखिर मनुष्य के रूप में जीना कैसे है—इन सवालों के साथ बैठने का मौका ही कहाँ मिलता है?
और फिर अजय भैया का अपना अंदाज! विषय कितना भी गंभीर हो, उसे बोझिल न होने देना शायद उनकी खासियत है। कभी भुट्टा, कभी जामगेट, कभी कब्जा, कभी बैडमिंटन, कभी हरियाणा, कभी गुजराती और कभी अचानक—“हाय मेरा लाल रंग!” पता नहीं इन दस दिनों में कितने characters आए, पूरे हॉल को गुदगुदाया और अपना संदेश देकर चले गए। कई बार लगता था कि दर्शन का सत्र चल रहा है या किसी कहानी का नया episode! लेकिन कमाल यह था कि जिस character पर हम कुछ क्षण पहले ठहाके लगा रहे होते, वही थोड़ी देर बाद जीवन की कोई बड़ी बात समझा जाता। अजय भैया रोजमर्रा की कोई घटना उठाते, उसमें कोई character डालते, सटीक उदाहरण देते और बिना किसी लाग-लपेट के बात सामने रख देते। कई बार हँसी थमते ही भीतर से आवाज आती—“अरे! ये character तो कहीं मेरे अंदर भी बैठा है…” बातें गहरी थीं, अंदाज हल्का था; किरदार अनेक थे, हँसी सबकी थी, लेकिन सवाल हर किसी का अपना था।
और सवाल भी ऐसे कि सत्र खत्म हो जाए, लेकिन सवाल खत्म न हो। हम सभी सुखी होना चाहते हैं, लेकिन सुख आखिर है क्या? हम परिवार में रहते हैं, लेकिन क्या केवल एक छत के नीचे रहना ही परिवार है? हम कहते हैं—मेरी जिंदगी, मेरी मर्जी—लेकिन क्या मनमर्जी ही स्वतंत्रता है? हम जीवन भर पैसा और सुविधाएँ जुटाते हैं, लेकिन किस बिंदु पर कह पाएँगे कि अब मैं समृद्ध हूँ? इन सवालों का असर शायद इसलिए भी ज्यादा हुआ क्योंकि MCVK में बात केवल सत्र तक सीमित नहीं रहती। सुबह कोई बात सुनिए और दिन में कहीं न कहीं जिंदगी उसका practical आपके सामने रख देती है। संबंध में विश्वास की बात करना आसान है, लेकिन सामने वाला आपकी बात से सहमत न हो तब आपका व्यवहार क्या रहता है—यह असली practical है। सहयोग की बात करना आसान है, लेकिन काम अपनी पसंद का न मिले तब मुस्कान कितनी देर रहती है—वहाँ पता चलता है। Kitchen हो, कोई सामूहिक काम हो या परिवारों के बीच सहज बातचीत—सुबह सुनी कई बातें दिन में जीवन के बीच दिखाई देने लगती थीं।
इन 21 दिनों में MCVK के परिवारों को करीब से देखने का अवसर मिला। किसी व्यवस्था को पूरी तरह समझने के लिए 21 दिन बहुत लंबा समय नहीं है। लेकिन इतना जरूर महसूस हुआ कि यहाँ साथ जीने की कोशिश केवल विचार में नहीं, व्यवहार में भी दिखाई देती है। और शायद इसी अनुभव का सबसे सुंदर उत्तर मुझे लौटते समय श्रुति से मिला। रास्ते में मैंने उससे पूछा—“तुम MCVK से क्या लेकर वापस आ रही हो?” मुझे लगा कि वह जीवन विद्या की कोई समझ, विकल्प शिविर की कोई सीख या जीवन को देखने का कोई नया नजरिया बताएगी। लेकिन उसका जवाब सिर्फ तीन शब्दों का था—“वहाँ के लोग…” मैंने पूछा, “मतलब?” उसने सहजता से कहा—“वहाँ सब लोग बहुत अच्छे हैं।” उसका छोटा-सा जवाब मुझे कुछ देर के लिए चुप कर गया। किसी जगह से लौटते हुए अगर आपको वहाँ की इमारतें और सुविधाएँ नहीं, बल्कि वहाँ के लोग सबसे ज्यादा याद आएँ, तो शायद कहीं न कहीं संबंध बन चुका होता है।
और फिर लगा—श्रुति जो कह रही है, वही तो मैं भी महसूस कर रहा हूँ। किसी एक व्यक्ति का नाम लेना यहाँ बेमानी होगा। इन 21 दिनों में MCVK परिवार के कुछ लोग इतने निकट आ गए कि उस निकटता को दिनों में मापना मुश्किल लगता है। किसी का सहज अपनापन, किसी का बिना कहे ख्याल रखना, किसी की हँसी, किसी के साथ हुई लंबी बातचीत और कभी किसी का बस पास बैठ जाना—पता ही नहीं चला कि कब कुछ चेहरे परिचित से अपने हो गए। हम अक्सर मानते हैं कि गहरे संबंध बनने में वर्षों लगते हैं, लेकिन शायद हर संबंध कैलेंडर देखकर नहीं बनता। लौटते समय कुछ चेहरे बार-बार याद आते रहे; कभी मुस्कान आती और कभी भीतर एक कसक। एक अपनापन, स्नेह, प्रेम और फिर मिलने की ऐसी इच्छा, जिसमें अलग न होने की एक मासूम-सी तड़प भी थी।
तब लगा कि शिविर में जिन विश्वास, सम्मान, स्नेह, ममता और प्रेम जैसे मूल्यों को हम शब्दों में समझने की कोशिश कर रहे थे, उनमें से कुछ शायद अनजाने में हमारे साथ घट भी रहे थे। किताब में ‘स्नेह’ पढ़ना एक बात है और किसी का स्नेह महसूस करना बिल्कुल दूसरी। ‘संबंध’ को समझना एक बात है और किसी से विदा होते समय उसके फिर मिलने की इच्छा होना दूसरी। शायद इसीलिए MCVK से विदाई किसी परिसर से बाहर निकल जाना भर नहीं लगी। कुछ लोग वहाँ रह गए थे, लेकिन उनका अपनापन, स्नेह और प्रेम हमारे साथ लखनऊ तक चला आया।
अब घर लौट आया हूँ। शहर वही है, घर वही है और दिनचर्या भी धीरे-धीरे अपनी पुरानी रफ्तार पकड़ लेगी। क्या इन 21 दिनों में जीवन के सारे जवाब मिल गए? नहीं। शायद जवाबों से ज्यादा कुछ नए सवाल साथ आए हैं। मैं MCVK से कोई certificate लेकर नहीं लौटा कि अब जीवन समझ में आ गया है। उल्टा, जिन्हें अब तक आसानी से समझा हुआ मानता था, उन्हें शायद पहली बार थोड़ा ध्यान से देखने की शुरुआत हुई है।
21 दिन पहले मैं MCVK को देखने और समझने गया था। लौटते समय महसूस हुआ—MCVK को कितना समझ पाया, यह अभी नहीं जानता, लेकिन खुद को थोड़ा और देखने की शुरुआत जरूर हो गई है। और पूरे अनुभव को बहुत कम शब्दों में समेटना हो तो श्रुति का जवाब ही सबसे सटीक है—“वहाँ के लोग…” क्योंकि शायद किसी व्यवस्था की खूबसूरती का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि वहाँ से लौटते समय जगह पीछे छूट जाए, शहर बदल जाए, दूरी बढ़ जाए… लेकिन वहाँ मिले लोग आपके भीतर साथ चले आएँ।
शायद संबंध का अर्थ भी यहीं से खुलना शुरू होता है—दूरी बढ़ जाए, लेकिन अपनापन कम न हो।
मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में 1 से 10 अगस्त तक आयोजित दस दिवसीय विकल्प शिविर – ‘जीने की एक नई दिशा’ का सोमवार को समापन हुआ। अंतिम दिन MCVK के संस्थापक श्री अजय दायमा ने जीवन, सुख, कल्पनाशीलता, मानवीय संबंध और परिवार-व्यवस्था पर चर्चा करते हुए कहा कि मनुष्य जिस सुख को दूसरे व्यक्ति, परिस्थितियों या भौतिक साधनों में खोजता है, बल्कि उसका वास्तविक आधार सही समझ में है।
अजय दायमा ने कहा, “दुनिया में कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को सुखी नहीं कर सकता।” मनुष्य के मन में सुख की चाह रहती है, लेकिन वृत्ति में स्पष्टता न होने से कल्पनाशीलता में भ्रमित चित्रण होने लगता है। इसी कारण वह कभी शरीर और सुविधाओं में, तो कभी दूसरे व्यक्ति से अपेक्षाओं की पूर्ति में सुख तलाशता है।
उन्होंने कहा कि वास्तव में व्यवस्था को समझने से ही सुख है। स्वयं, संबंध और अस्तित्व की व्यवस्था की स्पष्टता जीवन में सहजता लाती है। मानवीय संबंध व इसकी समझ को जीने और प्रमाणित करना जीने का महत्वपूर्ण आधार हैं।
अच्छी स्मृतियाँ भी बन सकती हैं बाधा
‘जीवन क्या है’ विषय पर अजय दायमा ने कहा कि सामान्यतः बुरी स्मृतियाँ अच्छी स्मृतियों पर भारी पड़ती हैं, लेकिन यदि व्यक्ति वर्तमान को समझने के बजाय अतीत में उलझा रहे, तो अच्छी स्मृतियाँ भी बाधा बन सकती हैं। इसलिए जीवन को बीते अनुभवों के बजाय वर्तमान में सही समझ के साथ जीना आवश्यक है।
परिवार और जनसंख्या के संदर्भ में उन्होंने कहा कि लंबे समय तक संतान को माता-पिता का ऋण चुकाने, धर्म की रक्षा और वंश आगे बढ़ाने जैसी धारणाओं से जोड़ा गया। आज यह समझने की जरूरत है कि अगली पीढ़ी के प्रति हमारी जिम्मेदारी क्या है और बच्चों को ऐसी शिक्षा कैसे मिले, जिससे वे जीवन, संबंध और व्यवस्था को समझ सकें।
MCVK में जीने और अध्ययन से जुड़ने का विकल्प
अपने संबोधन के अंतिम चरण में अजय दायमा ने शिविरार्थियों के सामने MCVK में परिवार-विधि से जीने का विकल्प रखा। उन्होंने प्रतिभागियों से स्वयं तथा अपने बच्चों की शिक्षा को इस अध्ययन से जोड़ने पर विचार करने का आह्वान किया।
शिविर में मिले प्रस्तावों को और गहराई से समझने के लिए सभी शिविरार्थियों को 20 अक्टूबर से 19 नवंबर 2026 तक आयोजित होने वाले अध्ययन शिविर में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया।
“मैं सीखने आई थी, लगा सीखना अब शुरू हुआ है”
समापन अवसर पर विभिन्न शहरों से आए शिविरार्थियों ने अपने अनुभव साझा किए।
पुणे से आई ईशा गाला ने बताया कि वे बिना किसी तय अपेक्षा के MCVK आई थीं। उनके अनुसार किसी विचार को सुनना और उसे लोगों के जीवन में घटित होते देखना दो अलग अनुभव हैं। यहाँ उनके सामने सवाल आया कि मनुष्य को वास्तव में सुखी होने के लिए क्या चाहिए और क्या हम प्रतिस्पर्धा के बजाय समझ एवं सहयोग के साथ रह सकते हैं?
उन्होंने कहा, “मैं यहाँ यह सोचकर आई थी कि कुछ सीखकर जाऊँगी, लेकिन लौटते समय लग रहा है कि सीखने की शुरुआत अब हुई है।” उनके लिए ‘जीने की एक नई दिशा’ जीवन को नई दृष्टि से देखने का अवसर है।
“यहाँ आकर पता चला कि जीना कैसे है”
हिसार, हरियाणा से आए रविंदर कुमार ने कहा, “यहाँ आने से पहले तक मैं सिर्फ जिंदा था, यहाँ आकर पता चला कि जीना कैसे है।” उन्होंने बताया कि शिविर से उन्हें जीवन को समझने का आधार, परिवार-व्यवस्था में अपनी उपयोगिता का बोध और इस व्यवस्था में जीने का विश्वास मिला।
“सहज जीवन जीने की प्रेरणा लेकर जा रहा हूँ”
हिसार, हरियाणा से आए सुभाष ने कहा कि विकल्प शिविर ने उन्हें जीवन-यात्रा को अधिक गहराई से समझने की दिशा दी। श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी द्वारा अनुसंधानित दर्शन से उनमें यह स्वीकृति बनी कि अस्तित्व-सहअस्तित्व, परिवार-मूलक व्यवस्था, उपयोगिता-पूरकता तथा समाधान-समृद्धि को शिक्षा-विधि से समझा, जीया और समझाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि अजय दायमा ने दर्शन के प्रस्तावों को सरल शब्दों में समझने में सहायता की। “मैं MCVK से सहज जीवन जीने की प्रेरणा लेकर जा रहा हूँ।”
“MCVK आने के बाद बदल गया मेरा दृष्टिकोण”
भोपाल से आई मीनल गाला ने कहा कि MCVK में उन्हें चेतना और उद्देश्य के साथ जीने तथा मानवता के वास्तविक अर्थ को समझने का अवसर मिला। यहाँ परिवारों और बच्चों के बीच सामंजस्य, सहयोग और सहजता ने उन्हें प्रभावित किया।
उन्होंने बताया कि आने से पहले उनके मन में कई आशंकाएँ थीं, लेकिन यहाँ रहने के बाद उनका दृष्टिकोण बदल गया। उनके बेटे अरहान ने भी प्रसन्नता के साथ कई नई चीजें और कौशल सीखे। उनके अनुसार सीमित आवश्यकताओं और सामंजस्य के साथ शांतिपूर्ण जीवन संभव है।
सह-अस्तित्व को व्यवहार में उतारने की जरूरत
इंदौर से आए आशीष सांखला ने कहा कि शिविर में उन्हें अस्तित्व-सहअस्तित्व और एक-दूसरे के लिए उपयोगी व पूरक होने की अवधारणा समझने का अवसर मिला। यदि इस समझ को दैनिक जीवन में पल-पल व्यवहार में उतारा जाए, तो मनुष्य अधिक सुखी, आनंदित और स्वस्थ जीवन जी सकता है। इससे समाज और दुनिया को भी बेहतर बनाने की दिशा मिल सकती है।
मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में सोमवार को शासकीय नर्सिंग महाविद्यालय, एमजीएम मेडिकल कॉलेज, डीएवीवी विश्वविद्यालय, इंदौर के 64 विद्यार्थियों एवं फैकल्टी सदस्यों ने शैक्षणिक भ्रमण किया। MCVK परिवार की ओर से विद्यार्थियों एवं शिक्षकों का आत्मीय स्वागत किया गया। इस अवसर पर कॉलेज की फैकल्टी डॉ. श्वेता भोसकर सहित अन्य शिक्षक भी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत MCVK के परिचय से हुई। डॉ. साधना राव ने विद्यार्थियों को केंद्र की जीवन-पद्धति और उसके पीछे की सोच से परिचित कराया। उन्होंने बताया कि MCVK में परिवार समाधान और समृद्धि के साथ जीने की दिशा में सामूहिक रूप से प्रयास कर रहे हैं। यहां संबंध, सहयोग, विश्वास और सहभागिता केवल चर्चा के विषय नहीं, बल्कि इन्हें दैनिक जीवन में समझने और जीने का अभ्यास किया जाता है।
डॉ. साधना राव ने मानवीय मूल्यों की शिक्षा की आवश्यकता पर भी बात की। उन्होंने कहा कि जीवन में जिन मूल्यों की आवश्यकता हमें परिवार और समाज में एक-दूसरे के साथ जीने के लिए पड़ती है, उनकी व्यवस्थित समझ सामान्यतः स्कूली, कॉलेज की शिक्षा में नहीं मिल पाती। जबकि यही समझ मनुष्य को संबंधों की पहचान करने और साथ मिलकर बेहतर ढंग से जीने में सहायक होती है।
इसके बाद डॉ. अभय वानखेड़े के साथ विद्यार्थियों का संवाद एवं प्रश्नोत्तर सत्र हुआ। विद्यार्थियों ने मानव, जीवन, शिक्षा, कामना और कल्पनाशीलता से जुड़े कई सवाल रखे। इसी दौरान एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आया—
“जब हमारी कामना शुभ है, तो हमारी कल्पना अशुभ क्यों हो जाती है?”
इस पर डॉ. वानखेड़े ने कहा कि मानव की मौलिक चाहना का अध्ययन नहीं होने और चाहना अनुरूप जीने की दिशा से भटकाव के कारण ही शुभ की कामना सफल नहीं होती, आपने यह भी स्पष्ट किया की अध्ययन हमेशा शुभ का वास्तविकता का ही संभव है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “प्रकाश एक वास्तविकता है, इसलिए उसका अध्ययन किया जा सकता है। अंधकार की अपनी कोई वास्तविकता नहीं है। यह प्रकाश की अनुपस्थिति का प्रमाण है. जो वास्तविक है, अध्ययन उसी का होता है।”
उन्होंने कहा कि शिक्षा में मानव का समग्र अध्ययन नहीं होने के कारण मनुष्य की मूल चाहना, कामना और कल्पनाशीलता को समझने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाया। जब मनुष्य स्वयं और अपनी मूल चाहना को ठीक से समझता है, तभी वह अपनी कल्पनाओं को भी सही दिशा में पहचान और व्यवस्थित कर पाता है।
प्रश्नोत्तर सत्र के बाद विद्यार्थियों को तीन समूहों में MCVK परिसर का भ्रमण कराया गया। पहले समूह का मार्गदर्शन अशोक भैया, दूसरे का अमित भैया और तीसरे का तारकेश भैया ने किया। विद्यार्थियों ने परिसर में परिवारों के सामूहिक जीवन, उत्पादन, विभिन्न व्यवस्थाओं और रोजमर्रा की गतिविधियों को करीब से देखा।
भ्रमण के दौरान विद्यार्थियों ने विनिमय केंद्र की कार्यप्रणाली को भी समझा। चंदन भैया ने अपनी टीम के साथ विद्यार्थियों को विनिमय केंद्र की व्यवस्था से परिचित कराया और बताया कि यहां परिवारों की आवश्यकता के अनुरूप विभिन्न वस्तुओं की उपलब्धता और विनिमय को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है।
इस दौरान विद्यार्थियों का डॉ. उमा दीदी के साथ भी आत्मीय संवाद हुआ। उन्होंने विद्यार्थियों को बताया कि उन्होंने भी वर्ष 2005 में इसी कॉलेज से पीजी की पढ़ाई पूरी की थी। पिछले छह वर्षों से वे MCVK परिवार से जुड़ी हुई हैं और यहां परिवारों के साथ इस जीवन-पद्धति को समझते और जीते हुए आगे बढ़ रही हैं।
अपने ही कॉलेज की पूर्व छात्रा से MCVK में मुलाकात विद्यार्थियों के लिए विशेष अनुभव रहा। डॉ. उमा दीदी ने अपने छात्र जीवन से लेकर MCVK परिवार से जुड़ने तक की यात्रा और यहां के अपने अनुभव विद्यार्थियों के साथ साझा किए।
यह शैक्षणिक भ्रमण विद्यार्थियों के लिए केवल एक परिसर को देखने तक सीमित नहीं रहा। इसने उनके सामने एक महत्वपूर्ण विचार भी रखा कि शिक्षा केवल प्रोफेशन और करियर की तैयारी तक सीमित न होकर स्वयं को, संबंधों को और जीवन को समझने का माध्यम भी बन सकती है।
मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में आयोजित विकल्प शिविर के नौवें दिन के प्रथम सत्र को संबोधित करते हुए MCVK के संस्थापक अजय दायमा जी ने कहा कि मानव के शरीर रूप में जन्म लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके आचरण में भी मानवीयता दिखाई देनी चाहिए। मनुष्य की वास्तविक यात्रा स्वयं को समझने, दूसरे मनुष्य की समझने की संभावना को स्वीकार करने और संबंधों में मूल्यों के साथ जीने से आगे बढ़ती है।
उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य की समझ पूरी नहीं होती, तब तक उससे गलतियाँ होती रहेंगी। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि गलती हुई या नहीं, बल्कि यह है कि व्यक्ति अपने भीतर समझने की संभावना को पहचान रहा है या नहीं।
अजय जी दायमा ने कहा, “जब मुझे यह समझ में आता है कि मैं समझ सकता हूँ, तब मुझे यह भी स्वीकार होता है कि सामने वाला व्यक्ति भी समझ सकता है। यहीं से सम्मान की यात्रा शुरू होती है।”
“जीव चेतना से मानव चेतना की यात्रा”
उन्होंने कहा कि जीव चेतना से मानव चेतना की यात्रा सम्मान की यात्रा है और MCVK इसी दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। इस यात्रा में व्यक्ति सबसे पहले स्वयं का मूल्यांकन करता है और यह देखता है कि जो कुछ उसने समझा है, वह उसके आचरण में कितना दिखाई दे रहा है।
उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल उसके विचारों या कथनों से समझा हुआ नहीं माना जा सकता। समझ का प्रमाण उसके जीने में दिखाई देना चाहिए। समझा हुआ व्यक्ति दूसरे को समझने में सहयोग कर सकता है, उसके प्रश्नों के समाधानपरक उत्तर दे सकता है और दूसरे व्यक्ति के साथ समाधानपूर्वक जी सकता है।
उन्होंने कहा कि ऐसे व्यक्ति के उत्तर तार्किक, व्यावहारिक और उद्देश्यपूर्ण होंगे। उसकी समझ केवल स्वयं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वह दूसरे व्यक्ति की समझ विकसित होने में भी सहयोगी बनेगा।
“समाधान से शुरू होती है परिवार की वास्तविक यात्रा”
अजय दायमा भैया ने कहा कि जब व्यक्ति समाधान के साथ जीने लगता है, तब परिवार का वास्तविक स्वरूप सामने आता है। परिवार केवल कुछ लोगों का एक घर में साथ रहना नहीं है। परिवार में लोग एक-दूसरे को समझने, समझाने में सहयोग करने और समझपूर्वक जीने के लिए साथ होते हैं।
उन्होंने इस पूरी यात्रा को एक क्रम में समझाया—
समझ → समाधान → परिवार → समाज में अभय → प्रकृति में संतुलन → मानव जाति की सुरक्षा → सुखी एवं संपन्न अगली पीढ़ी।
उन्होंने कहा कि समाधानपूर्वक जीने वाले परिवार ही अभय समाज का आधार बन सकते हैं। समाज में अभय होने पर प्रकृति के साथ मनुष्य का व्यवहार संतुलित होता है। प्रकृति का संतुलन मानव जाति की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा बनाता है और सुरक्षित मानव समाज में ही आने वाली पीढ़ियों के सुखी और संपन्न होने की संभावना मजबूत होती है।
“परिवार में संबंधों के साथ मूल्यों की पहचान जरूरी”
अजय दायमा ने कहा कि परिवार को समझने के लिए संबंध, मूल्य और व्यवस्था को समझना आवश्यक है। हर संबंध में मूल्य निहित हैं और इन मूल्यों की पहचान के साथ जीना ही परिवार को सार्थक बनाता है।
उन्होंने सम्मान, विश्वास और स्नेह को संबंधों के आधार मूल्य बताते हुए कहा कि सामने वाले व्यक्ति में समझने की संभावना को स्वीकार करना सम्मान की शुरुआत है। विश्वास और स्नेह संबंधों को मजबूती और निरंतरता प्रदान करते हैं।
उन्होंने ममता और वात्सल्य को अपने से छोटों के साथ जीने के मूल्य बताया। इसका अर्थ केवल बच्चों या छोटों की देखभाल करना नहीं है, बल्कि उनकी समझ पूरी होने में सहयोग करना भी है।
इसी तरह कृतज्ञता, गौरव और श्रद्धा अपने से अधिक समझे हुए व्यक्ति के प्रति उसकी समझ और योगदान की स्वीकृति के मूल्य हैं। जब व्यक्ति यह पहचानता है कि किसी ने उसकी समझ विकसित होने की यात्रा में सहयोग किया है, तब उसके प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा का भाव स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।
“प्रेम—दो समझदार व्यक्तियों की सहमति”
अजय दायमा जी ने प्रेम को संबंधों में पूर्णता से जोड़ते हुए कहा कि जब दो समझदार व्यक्ति पूर्णता की दिशा में रत रहते हुए परस्पर सहमति के साथ जीते हैं, तब प्रेम की अभिव्यक्ति होती है। इस दृष्टि से प्रेम केवल भावनात्मक आकर्षण नहीं, बल्कि समझ, सहमति और पूर्णता की दिशा में साथ जीने की अवस्था है।
उन्होंने कहा कि सम्मान निरंतर विकसित होने की यात्रा है। इसकी शुरुआत स्वयं में समझने की संभावना को पहचानने और वही संभावना दूसरे मनुष्य में स्वीकार करने से होती है।
व्यक्ति में शुरू हुई यही समझ आगे संबंधों में मूल्यों के रूप में अभिव्यक्त होती है, परिवार में समाधान का आधार बनती है और फिर समाज में अभय तथा प्रकृति में संतुलन की दिशा प्रशस्त करती है।
अजय जी ने कहा कि इस पूरी यात्रा का उद्देश्य केवल व्यक्ति को बेहतर बनाना नहीं, बल्कि ऐसा मानवीय आचरण विकसित करना है, जिसमें समाधानपूर्ण व्यक्ति, समृद्ध परिवार, भयमुक्त समाज और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन संभव हो सके।