समझ की रोशनी में न्यायपूर्वक जीने का अभ्यास ही साक्षात्कार है: अजय दायमा

इंदौर, 8 अगस्त 2026 | रिपोर्ट – MCVK टीम

मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में आयोजित विकल्प शिविर के एक सत्र में MCVK के संस्थापक अजय दायमा ने कल्पनाशीलता, साक्षात्कार, बोध, अनुभव और परिवार व्यवस्था पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि मनुष्य के पास कल्पनाशीलता की शक्ति है। जब कल्पनाशीलता में सही प्रस्ताव आता है, उसे समझने और जीने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। समझ की रोशनी में न्यायपूर्वक जीने का निरंतर अभ्यास ही साक्षात्कार की दिशा में ले जाता है।

उन्होंने कहा कि केवल किसी विचार को सुन लेना या मान लेना पर्याप्त नहीं है। मनुष्य जब अस्तित्व को सह-अस्तित्व के रूप में समझते हुए अपने व्यवहार और जीवन में उसे प्रमाणित करने लगता है, तभी समझ सार्थक होती है। मध्यस्थ दर्शन में भी अध्ययन की प्रक्रिया को साक्षात्कार, बोध और अनुभव की दिशा में आगे बढ़ने के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

अजय जी दायमा ने श्रद्धेय ए. नागराज जी के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने मानव को समझने, जीने और समझाने का एक मॉडल प्रस्तुत किया। उन्होंने विचार-अभ्यास और व्यवहार-अभ्यास पर जोर देते हुए कहा कि सह-अस्तित्व की दृष्टि से विचार करना आवश्यक है। विचार के अभ्यास से मानव के अध्ययन की शुरुआत होती है और समझदार मानव के अध्ययन से साक्षात्कार की दिशा स्पष्ट होती है। ए. नागराज जी द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ दर्शन का मूल आधार भी “अस्तित्व, सह-अस्तित्व है” की समझ है।

उन्होंने कहा कि हमारी समझ के रास्ते में मुख्यतः तीन संकट—पूर्वाग्रह, पूर्वाभ्यास और पूर्वानुमान आते हैं। हम कई बार वास्तविकता को जैसी वह है वैसा देखने के बजाय अपनी पहले से बनी धारणाओं, आदतों और अनुमानों के आधार पर देखने लगते हैं। इसलिए समझ विकसित करने के लिए इनसे मुक्त होकर वास्तविकता को देखने का अभ्यास जरूरी है।

“परिवार ही व्यवस्था का केंद्र बिंदु” –

परिवार के विषय पर अजय जी ने कहा कि एक से अधिक मानव मिलकर परिवार बनाते हैं, लेकिन केवल साथ रहना ही परिवार नहीं है। एक-दूसरे के साथ संबंधों की पहचान, समाधान और मिलकर समृद्धि को प्राप्त करना परिवार का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। इसी कारण परिवार, व्यवस्था का केंद्र बिंदु है।

उन्होंने सवाल उठाया कि आज मनुष्य बड़ी संख्या में साथ तो रह रहा है, लेकिन क्या वह वास्तव में परिवार विधि से जी पा रहा है? इसका एक कारण यह है कि हमने मानव को कई बार केवल शरीर या आत्मा के रूप में देखने का प्रयास किया, जबकि मानव को उसकी संपूर्णता में समझना आवश्यक है। शरीर के स्तर पर सुविधा-असुविधा का प्रश्न है, जबकि सुख और समाधान को समझने के लिए मानव के चेतन पक्ष को समझना होगा।

उन्होंने संवेदनशीलता के विभिन्न स्तरों की चर्चा करते हुए कहा कि केवल संवेदनशील होना पर्याप्त नहीं है; संवेदनशीलता का सदुपयोग संबंधों और परिवार में होना चाहिए। जब मनुष्य अपनी समझ को संबंधों, व्यवहार और व्यवस्था में प्रमाणित करता है, तभी परिवार में विश्वास, समाधान और समृद्धि की संभावना मजबूत होती है।

सत्र का मूल संदेश यही रहा कि जीवन को केवल विचार के स्तर पर समझना पर्याप्त नहीं है—समझ को व्यवहार में उतारना और परिवार से लेकर समाज व प्रकृति तक सह-अस्तित्व में जीना ही उसकी सार्थकता है।

Don’t Limit Physical Illness to the Body Alone: Saify Saraiya

Indore | August 8, 2026
Writer: Mohit Dhawan

At a special session held at Manav Chetna Vikas Kendra (MCVK), Indore, international life coach, author, and trainer with over 35 years of experience Saify Saraiya shared his insights on the interconnectedness of the body, mind, and consciousness.

He said that understanding human health requires us to look beyond the body and its physical symptoms. According to him, a person’s mind, thoughts, outlook towards life, emotional state, and inner condition also need to be understood while exploring health and well-being.

Author of Zero Medicine Wisdom, Saify Saraiya discussed the concept of “Philosophy of Psychology Impacting Physiology,” highlighting how our mental and emotional states can influence our physical well-being. He emphasised the need to view the human being holistically rather than looking at illness only through its physical manifestations.

He observed that a significant part of today’s approach to health focuses on symptoms, diet, and treatment. At the same time, he raised an important question: How deeply does an individual understand oneself, one’s mind, emotions, and way of living?

During the session, Saraiya explored concepts including the Hero and Herd Minds, our True Nature, Six-Mind Maps, the distractions of the five senses and conscience, and Power, Position, Possession and Purity. Through these themes, he highlighted the importance of self-observation and developing a deeper understanding of life.

He also encouraged participants to consider illness not merely as a problem, but to explore whether certain bodily experiences may also serve as signals that deserve deeper attention and understanding. His emphasis was on observing and examining the relationship between the body, mind, emotions, and inner consciousness rather than accepting ideas merely as beliefs.

The session at MCVK was not structured as a conventional lecture. Instead, it evolved as a collective enquiry and dialogue, encouraging participants to examine questions around health, well-being, self-understanding, and life from a more integrated perspective.

अस्तित्व को समझकर, सह-अस्तित्व में जीने की योग्यता ही – वास्तविक स्वतंत्रता : अजय दायमा

इंदौर, 7 अगस्त 2026,
रिपोर्ट : MCVK टीम

मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में आयोजित विकल्प शिविर के सातवें दिन केंद्र के संस्थापक अजय दायमा ने अस्तित्व, सह-अस्तित्व, स्वतंत्रता, प्रामाणिकता, परंपरा और मानव की उपयोगिता जैसे विषयों पर विस्तार से संवाद किया। उन्होंने कहा कि “अस्तित्व को समझकर सह-अस्तित्व में जीने की योग्यता ही वास्तविक स्वतंत्रता है।”

उन्होंने कहा कि मनुष्य में कल्पनाशीलता है और इसी के माध्यम से वह अस्तित्व को समझने की क्षमता रखता है। केवल अपनी मनमर्जी करना स्वतंत्रता नहीं है। अपनी कल्पनाशीलता को सही समझ के साथ जोड़कर कर्मशीलता, पूरकता में जीना ही स्वतंत्रता का वास्तविक स्वरूप है।

समझ से प्रामाणिकता और प्रामाणिकता से परंपरा

अजय दायमा ने कहा कि मानवीय व्यवस्था के अस्तित्व सहज़ तरीके से जीने की उपयोगिता को स्वयं समझना और फिर दूसरे व्यक्ति को भी समझा पाना प्रामाणिकता है। एक समझा हुआ व्यक्ति यदि अपनी समझ को दूसरे तक पहुँचा सके और उसके जीवन में भी वह समझ स्पष्ट हो सके, तभी उसकी समझ की प्रामाणिकता सिद्ध होती है।

उन्होंने कहा, “जब तक प्रमाण नहीं है, तब तक परंपरा नहीं बन सकती।” किसी विचार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने के लिए उसका जीवन में प्रमाणित होना आवश्यक है।

उन्होंने परंपरा के चार प्रमुख आधार बताए—संस्था (Institution), शिक्षा (Education), संविधान (Constitution) और व्यवस्था (System)। इन चारों के माध्यम से सही समझ और मानवीय आचरण को समाज में निरंतरता मिल सकती है।

प्रकृति-प्रेम की शुरुआत मानव-प्रेम से

प्रकृति और मानव के संबंध पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि “प्रकृति-प्रेम की शुरुआत मानव-प्रेम से होती है।” जब तक मनुष्य अपने संबंधों में प्रेम, सम्मान और पूरकता को नहीं समझता, तब तक प्रकृति के साथ संतुलित संबंध स्थापित करना भी कठिन है।

उन्होंने बताया कि अस्तित्व में व्यापक ऊर्जा और प्रकृति (इकाईया) दोनों सह-अस्तित्व में हैं। ऊर्जा की पहचान इकइयों में क्रिया के माध्यम से होती है और क्रिया ऊर्जा की अभिव्यक्ति है।

अस्तित्व के नियम को समझाते हुए उन्होंने उपयोगिता और पूरकता को महत्वपूर्ण बताया। अस्तित्व की प्रत्येक इकाई स्वयं में उपयोगी है और समग्रता में दूसरी इकाइयों के लिए पूरक है। इस प्रकार पूरी प्रकृति में परस्पर पूरकता दिखाई देती है।

स्वयं की उपयोगिता को जानना ही समाधान

अजय दायमा जी ने कहा कि भ्रमित अवस्था में मनुष्य अक्सर अच्छे कार्यों के माध्यम से अपनी उपयोगिता सिद्ध करने का प्रयास करता रहता है। जब व्यक्ति स्वयं में अपनी उपयोगिता को नहीं पहचान पाता, तब वह दूसरों की नजर में उपयोगी साबित होने की दौड़ में लगा रहता है।

उन्होंने कहा, “मनुष्य अपनी उपयोगिता को जानकर ही सुखी होता है। स्वयं में अपनी उपयोगिता को जान लेना ही समाधान है।”

समाधान की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि समाधान वह अवस्था है, जहाँ किसी विषय को लेकर भीतर अनिश्चितता और अंतहीन सोच शेष नहीं रहती, बल्कि स्पष्टता स्थापित हो जाती है।

सत्र के अंत में उन्होंने मानव जीवन के मूल उद्देश्य की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि हमारा प्रयास यह समझने का होना चाहिए कि आकार से मनुष्य होने के साथ-साथ आचरण में भी मनुष्य कैसे बनें।

यही समझ संबंधों में सम्मान, व्यवहार में न्याय और जीवन में सह-अस्तित्व का आधार बनती है। आकार में मानव से आचरण में मानव बनने की यात्रा ही सम्मानपूर्वक जीने की दिशा है।

एमसीवीके में जन्मदिन: जहाँ उत्सव के साथ होता है आत्ममूल्यांकन और संबंधों का उत्सव

MCVK, Indore | 6 अगस्त 2026
रिपोर्ट: MCVK Team

मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर में जन्मदिन केवल आयु बढ़ने का उत्सव नहीं होता, बल्कि यह अपने जीवन को देखने, पिछले एक वर्ष की यात्रा का आत्ममूल्यांकन करने और भविष्य की दिशा तय करने का एक विशेष अवसर होता है। यहाँ हर जन्मदिन व्यक्ति के लिए स्वयं को समझने और परिवार के साथ अपनी प्रगति साझा करने का दिन बन जाता है।

इस दिन पूरे परिसर में उत्सव जैसा वातावरण रहता है। परिवार मिलकर विशेष व्यंजन बनाते हैं, मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं, गीत गाए जाते हैं और हर चेहरा आत्मीय मुस्कान से खिल उठता है। यहाँ जन्मदिन किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे परिवार का उत्सव बन जाता है। हर किसी के मन में स्नेह, अपनापन और एक-दूसरे की प्रगति की सच्ची खुशी दिखाई देती है।

इसी आत्मीय वातावरण के बीच आज डॉ. अभय वानखेड़े और नेहा दीदी की पुत्री गुड्डू का जन्मदिन पूरे एमसीवीके परिवार ने बड़े उत्साह और प्रेम के साथ मनाया। सभी परिवारों ने उन्हें शुभकामनाएँ दीं और उनके सुखद एवं सार्थक जीवन की कामना की।

शाम को एमसीवीके ऑडिटोरियम में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर डॉ. अभय वानखेड़े ने अपनी जीवन-यात्रा साझा करते हुए पिछले एक वर्ष में अपने भीतर आए परिवर्तनों, सीख और प्रगति का आत्ममूल्यांकन सभी के सामने रखा। उनके अनुभवों ने उपस्थित लोगों को यह महसूस कराया कि वास्तविक प्रगति केवल उपलब्धियों में नहीं, बल्कि व्यक्ति की समझ, व्यवहार और संबंधों में दिखाई देती है।

इस अवसर पर गीता दायमा जी ने डॉ. अभय की निष्ठा, समर्पण और निरंतरता की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे कार्यकर्ता किसी भी विचार-यात्रा की वास्तविक शक्ति होते हैं।

एमसीवीके के संस्थापक अजय दायमा ने कहा कि डॉ. अभय का जीवन निरंतर आत्मसंतुष्टि और प्रामाणिक आचरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने उनके कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि जब व्यक्ति स्वयं बदलता है, तभी उसका जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है।

एमसीवीके की संस्थापक सदस्य वर्षा दायमा ने उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि नागराज जी के विचारों और इस संस्थान के प्रति उनकी निष्ठा अत्यंत मूल्यवान है। यही निष्ठा व्यक्ति को भीतर से समृद्ध बनाती है और उसे समाज के लिए उपयोगी बनाती है।

कार्यक्रम का सबसे भावुक क्षण तब आया जब डॉ. अभय वानखेड़े की जीवनसंगिनी प्रीति दीदी ने अपने मन की बात साझा की। उन्होंने कहा कि इस पूरी यात्रा में उन्होंने हमेशा डॉ. अभय को स्वयं से आगे बढ़ते हुए देखा है। उनका विश्वास, धैर्य और साथ ही पूरे परिवार का सबसे बड़ा संबल रहा है। उनके शब्दों ने वहाँ उपस्थित अनेक लोगों की आँखें नम कर दीं।

इस अवसर पर विकल्प शिविर में भाग लेने के लिए लखनऊ से आए मोहित धवन ने भी अपने भाव व्यक्त किए। उन्होंने कहा,

“अभय भैया से मेरा संबंध वर्षों पुराना नहीं है, लेकिन जितना भी समय उनके साथ बिताने का अवसर मिला, उसमें उनका स्नेह, अपनापन और सहज सहयोग हमेशा महसूस हुआ। पिछले कुछ सप्ताहों में उनके साथ हुई यात्राओं और संवादों ने मुझे बहुत प्रेरित किया। उनका आत्मीय व्यवहार हर नए व्यक्ति को यह एहसास कराता है कि वह किसी संस्था में नहीं, बल्कि अपने ही परिवार के बीच है।”

जन्मदिन का यह आयोजन एक बार फिर यह संदेश देकर समाप्त हुआ कि एमसीवीके में जन्मदिन केवल केक काटने या शुभकामनाएँ देने का अवसर नहीं, बल्कि जीवन की दिशा पर विचार करने, अपनी प्रगति साझा करने और पूरे परिवार के साथ मिलकर एक-दूसरे की यात्रा का उत्सव मनाने का अवसर है। शायद यही आत्मीयता एमसीवीके को केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत परिवार बनाती है।

मानव को समझे बिना सही व्यवहार संभव नहीं

भाषा, तकनीक और सेवा—मानव जाति की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ

रिपोर्ट : एमसीवीके टीम

इंदौर, 6 अगस्त 2026 | विकल्प शिविर – छठा दिन

मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके) में आयोजित दस दिवसीय विकल्प शिविर के छठे दिन संस्थापक अजय दायमा ने मानव जीवन के सबसे मूल प्रश्न—मनुष्य को मौलिक स्वरूप में कैसे समझें और उसके साथ कैसा व्यवहार करें—पर गहन विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य के स्वरूप और उद्देश्य की स्पष्ट समझ विकसित नहीं होगी, तब तक हमारे व्यवहार में स्थायी समाधान नहीं आ सकता।

उन्होंने कहा कि मनुष्य अपने कार्यों से नहीं, बल्कि अपने आचरण से संतुष्ट होता है। हम अक्सर मानते हैं कि प्रशंसा करना या प्रशंसा प्राप्त करना ही सुख है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अलग है। यदि प्रशंसा सही समझ पर आधारित न हो, तो वह केवल स्वार्थ या अहंकार को पोषित करती है। उन्होंने कहा कि अधूरी समझ के साथ की गई सराहना कई बार अनजाने में व्यक्ति के विकास को रोक देती है। इसलिए सच्चा व्यवहार वही है, जो मनुष्य की वास्तविक उन्नति में सहयोगी बने।

अजय दायमा जी ने कहा कि मानव जाति की अभी तक की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ भाषा, तकनीक और सेवा हैं। इन्हीं तीन आधारों ने मनुष्य को अन्य जीवों से अलग पहचान दी है और इन्हीं के सही उपयोग से मानव जीवन अधिक सार्थक बन सकता है।

कल्पनाशीलता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जब मनुष्य अपनी कल्पना को पूर्ण प्रस्ताव (Complete Proposal) के आधार पर विकसित करता है, तभी ज्ञान का उदय होता है। यही ज्ञान आगे चलकर मानवीय -व्यवस्था को सही दिशा देता है और व्यक्ति समाधान, समृद्धि तथा सह-अस्तित्व की ओर बढ़ता है।

भाषा के संदर्भ में उन्होंने एक रोचक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया का सबसे अधिक बोला जाने वाला वाक्य “I Love You” है, लेकिन अधिकांश लोग उसके वास्तविक अर्थ को समझे बिना ही उसका प्रयोग करते हैं। शब्दों का सही अर्थ जाने बिना जीवन में सही संबंध स्थापित नहीं हो सकते। उन्होंने आचार्य ए. नागराज जी के दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि जब शब्दों का वास्तविक अर्थ स्पष्ट हो जाता है, तभी मनुष्य सही ढंग से जीना सीखता है।

तकनीक के विषय में उन्होंने कहा कि तकनीक का उद्देश्य केवल सुविधा नहीं, बल्कि समृद्धि है। जब तकनीक का उपयोग मानव और प्रकृति के हित में किया जाता है, तब वह समाज के विकास का माध्यम बनता है।

सेवा पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि आज जीवन का उद्देश्य स्पष्ट न होने के कारण सेवा भी व्यापार का रूप ले चुकी है। शिक्षा, विवाह और समाज की अनेक व्यवस्थाएँ, जो मूलतः सेवा के क्षेत्र थे, आज आर्थिक लेन-देन के केंद्र बन गए हैं। उनका कहना था कि जब जीवन का उद्देश्य स्पष्ट होगा, तब शिक्षा, सेवा, विनिमय और संयम के आधार पर वास्तविक सेवा स्थापित होगी और समाज धीरे-धीरे व्यापार-केंद्रित मानसिकता से मुक्त हो सकेगा।

उन्होंने वर्तमान व्यवस्था पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि आज मनुष्य शरीर की आवश्यकताओं—अन्न और पानी—को भी खरीदने के लिए विवश है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पक्षी के लिए पूरा आकाश उसका संसार है और मछली के लिए पूरा जल उसका संसार है। उसी प्रकार पृथ्वी ने ही मनुष्य को जन्म दिया है, लेकिन सही समझ के अभाव में हम उसके साथ कृतज्ञता और सह-अस्तित्व का व्यवहार विकसित नहीं कर पाए हैं।

अपने उद्बोधन के अंत में अजय दायमा ने कहा कि यदि मानव जाति अपनी तीन महान उपलब्धियों—भाषा, तकनीक और सेवा—का उपयोग सही समझ, सही उद्देश्य और सही व्यवहार के साथ करे, तो ऐसा समाज निर्मित हो सकता है जहाँ जीवन व्यापार नहीं, बल्कि सहयोग, समृद्धि और सह-अस्तित्व का माध्यम बने। उनके अनुसार मानव जीवन की वास्तविक सफलता बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि सही समझ के साथ सही ढंग से जीने में है।

प्रकृति का संतुलन तभी बचेगा, जब मानव अपना आचरण बदले – अजय दायमा

✍️ एमसीवीके टीम द्वारा

इंदौर, 5 अगस्त 2026। (एमसीवीके),विकल्प शिविर के पाँचवें दिन के प्रथम सत्र में एमसीवीके के संस्थापक अजय दायमा ने प्रकृति, पर्यावरण और मानव की भूमिका पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि आज पर्यावरण संरक्षण की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन समाधान केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं हो सकता। जब तक मनुष्य अपनी जीवनशैली, उपभोग और प्रकृति के साथ अपने संबंध को नहीं बदलेगा, तब तक पर्यावरणीय संकट का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

उन्होंने कहा कि आज हम चाहे जितने भी पेड़ लगा लें, यदि दूसरी ओर प्रकृति का अंधाधुंध दोहन जारी रहेगा तो कुछ समय बाद वायु और वातावरण का संतुलन फिर बिगड़ जाएगा। उनके अनुसार केवल पेड़ लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह समझना अधिक आवश्यक है कि हम प्रकृति से कितना ले रहे हैं और उसके बदले उसे क्या लौटा रहे हैं।

अजय दायमा ने कहा कि आज जिस गति से हम धरती के भीतर से कोयला, खनिज और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं, उसका प्रभाव आने वाले वर्षों में पृथ्वी के तापमान पर अवश्य दिखाई देगा। उन्होंने कहा कि धरती के भीतर मौजूद खनिज केवल आर्थिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि वे पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यदि इनका लगातार दोहन होता रहा, तो तापमान को संतुलित रखने वाली प्राकृतिक व्यवस्था कमजोर होती जाएगी और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएँ और गंभीर रूप लेंगी।

उन्होंने वृक्षारोपण अभियानों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि कई बार यह अभियान केवल फोटो खिंचवाने तक सीमित रह जाते हैं। जंगल बढ़ाने के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता में अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं देते। उनका मानना है कि यदि मनुष्य प्रकृति का दोहन कम कर दे, तो धरती स्वयं को संतुलित करने में सक्षम है। प्रकृति में स्वयं को पुनर्जीवित और संतुलित करने की अद्भुत क्षमता है, आवश्यकता केवल उसे अवसर देने की है।

अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कोरोना काल का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जब महामारी के दौरान मानव की गतिविधियाँ सीमित हो गई थीं, तब प्रकृति ने स्वयं को ठीक करना शुरू कर दिया था। अनेक स्थानों पर वायु पहले से अधिक स्वच्छ हुई, प्रदूषण कम हुआ और हरियाली में बढ़ोतरी हुई। उनके अनुसार यह इस बात का प्रमाण है कि जब मानव का हस्तक्षेप कम होता है, तो प्रकृति स्वयं अपने संतुलन की दिशा में कार्य करने लगती है।

उन्होंने यह भी कहा कि आज अधिकांश वैश्विक समस्याओं की जड़ स्वयं मनुष्य है। जब तक मानव अपने आचरण, उपभोग और प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन नहीं करेगा, तब तक कोई भी तकनीक या अभियान स्थायी समाधान नहीं दे सकता।

आपने स्पष्ट रूप से यह भी कहा कि कोरोना जैसी घटनाओं पर हमें केवल चिकित्सा के दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि अपने जीवन और प्रकृति के साथ संबंधों के संदर्भ में भी विचार करना चाहिए। उनके अनुसार यदि मनुष्य अन्य जीवों और प्रकृति के साथ असंतुलित व्यवहार करता रहेगा, तो उसके परिणाम अंततः पूरे मानव समाज को भुगतने पड़ेंगे। उन्होंने कहा कि कोरोना काल के बाद भी यदि मानव अपने आचरण में परिवर्तन नहीं लाता, तो भविष्य में भी प्रकृति हमें इसी प्रकार चेतावनी देती रहेगी।

सत्र के अंत में अजय दायमा ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल वृक्षारोपण का अभियान नहीं, बल्कि मानव चेतना का विषय है। जब मनुष्य आवश्यकता से अधिक उपभोग छोड़कर प्रकृति के साथ संतुलित और उत्तरदायी जीवन जीना सीख लेगा, तभी धरती, पर्यावरण और मानव समाज के बीच वास्तविक संतुलन स्थापित हो सकेगा।

हरियाणा के हिसार से आए अजीत सिंह, जो पिछले 13 वर्षों से जीवन विद्या से जुड़े हुए हैं, ने एमसीवीके में अपने अनुभव साझा किए। वे शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं और कई स्कूलों एवं कॉलेजों का संचालन कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि एमसीवीके (मानव चेतना विकास केंद्र), मध्यस्थ दर्शन सह-अस्तित्ववाद के लोकव्यापीकरण के लिए मानवीय शिक्षा का एक जीवंत केंद्र है। यहाँ परिवार विधि के माध्यम से शिक्षा के मानवीयकरण और जीवन विद्या योजना पर निरंतर कार्य किया जा रहा है।

अजीत सिंह के अनुसार, एमसीवीके में सह-अस्तित्ववादी विचार-अभ्यास, कर्म-अभ्यास और व्यवहार-अभ्यास को जीवन का हिस्सा बनाकर कार्य किया जा रहा है। यहाँ केवल सिद्धांत नहीं पढ़ाए जाते, बल्कि उन्हें दैनिक जीवन में जीने का अभ्यास भी कराया जाता है।

उन्होंने कहा कि एमसीवीके की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ रहने वाले परिवार इन मूल्यों को अपने जीवन में व्यवहारिक रूप से जीते हुए दिखाई देते हैं। जब कोई व्यक्ति इन परिवारों के बीच रहता है, तो उसे सहज रूप से यह अनुभव होता है कि यदि ये परिवार इस समझ के साथ समृद्ध, समाधानपूर्ण और सहयोगी जीवन जी सकते हैं, तो हम भी इस समझ को प्राप्त कर उसी प्रकार का जीवन जी सकते हैं।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि मानवीय शिक्षा और जीवन विद्या पर आधारित यह प्रयास समाज में सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन सकता है तथा अधिक से अधिक लोगों तक इस विचार का पहुँचना समय की आवश्यकता है।

इतिहास के अनछुए अध्यायों को सामने लाने का एक गंभीर प्रयास

पुस्तक समीक्षा

लेखक: मोहित धवन

इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का विवरण नहीं होता, बल्कि वह किसी राष्ट्र की स्मृति, चेतना और पहचान का आधार भी होता है। देश दीपक शर्मा की पुस्तक “भारतवर्ष में इस्लाम का इतिहास: हिन्दू दृष्टिकोण” इतिहास के ऐसे ही कम चर्चित अध्यायों को पाठकों के सामने रखने का एक गंभीर और अध्ययनपूर्ण प्रयास है। पुस्तक का प्रथम खंड 712 ईस्वी से 1194 ईस्वी तक के लगभग पाँच सौ वर्षों के कालखंड को भारतीय सभ्यता के प्रतिरोध और संघर्ष के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है।

देश दीपक जी और उनकी सहधर्मिणी नंदिता जी से हमारे परिवार का परिचय भले ही कुछ महीनों पुराना हो, लेकिन उनके स्नेह, आत्मीयता और सहज अपनत्व ने इस संबंध को बहुत निकटता का एहसास दिया है। अपने दिवंगत पुत्र तन्मय की स्मृति को समाज सेवा का माध्यम बनाते हुए लखनऊ के ग्रामीण अंचलों में बच्चों के लिए अध्ययन केंद्रों का संचालन करना उनके व्यक्तित्व की संवेदनशीलता और सामाजिक प्रतिबद्धता का परिचायक है। उनका यह सेवा कार्य हमें निरंतर प्रेरित करता रहा है। यही संवेदनशीलता इस पुस्तक की भूमिका में भी दिखाई देती है, जहाँ उन्होंने इस कृति को अपने पुत्र की स्मृति को समर्पित करते हुए उसे एक भावनात्मक आयाम प्रदान किया है।

एक पाठक के रूप में इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भाषा और प्रस्तुति लगी। इतिहास जैसे गंभीर विषय को लेखक ने सरल, प्रवाहपूर्ण और रोचक शैली में प्रस्तुत किया है। घटनाओं का वर्णन केवल तिथियों और तथ्यों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कथा शैली में आगे बढ़ता है, जिससे पाठक सहज रूप से पुस्तक के साथ जुड़ जाता है।

पुस्तक की विषय-सूची ही लेखक के व्यापक अध्ययन का परिचय देती है। सिंध के युद्ध से लेकर बप्पा रावल, सम्राट मिहिर भोज, महाराजा सुहेलदेव, नायकी देवी और पृथ्वीराज चौहान जैसे अनेक ऐतिहासिक व्यक्तित्वों और घटनाओं को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। साथ ही आगे प्रकाशित होने वाले खंडों की रूपरेखा यह संकेत देती है कि लेखक इस विषय पर एक विस्तृत और दीर्घकालिक श्रृंखला तैयार कर रहे हैं।
यह पुस्तक केवल ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन नहीं करती, बल्कि पाठक को इतिहास के अनेक पहलुओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। पढ़ते समय बार-बार यह अनुभव होता है कि लेखक केवल घटनाएँ नहीं बता रहे, बल्कि इतिहास के कुछ ऐसे प्रसंगों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं, जिन पर वे अधिक संवाद और अध्ययन की आवश्यकता महसूस करते हैं।

समग्र रूप से, “भारतवर्ष में इस्लाम का इतिहास: हिन्दू दृष्टिकोण” एक ऐसी कृति है, जो अपने विषय, अध्ययन और प्रभावशाली प्रस्तुति के कारण पाठक का ध्यान आकर्षित करती है। इतिहास में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक न केवल एक रोचक अध्ययन है, बल्कि भारतीय इतिहास के एक वैकल्पिक दृष्टिकोण को समझने का अवसर भी प्रदान करती है। ऐसी शोधपरक और विचारोत्तेजक पुस्तकों का स्वागत होना चाहिए, क्योंकि वे इतिहास के प्रति जिज्ञासा और संवाद—दोनों को आगे बढ़ाती हैं।

संपर्क से संबंध की यात्रा ही जीवन की वास्तविक यात्रा है : अजय दायमा

✍️ लेखक : मोहित धवन

इंदौर, 3 अगस्त 2026। मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर मे आयोजित दस दिवसीय विकल्प शिविर के तीसरे दिन के प्रथम सत्र में संस्थापक अजय दायमा ने “संपर्क से संबंध की यात्रा” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मानव जीवन का उद्देश्य केवल लोगों के संपर्क में आना नहीं, बल्कि समझ, विश्वास और स्वीकृति के आधार पर सार्थक संबंधों का निर्माण करना है।

उन्होंने कहा कि जब किसी परिवार में बच्चे का जन्म होता है या विवाह के माध्यम से दो व्यक्ति एक साथ आते हैं, तब केवल संपर्क स्थापित होता है। वास्तविक संबंध तब बनता है, जब दोनों एक-दूसरे को समझते हैं, स्वीकार करते हैं और परस्पर सहयोग के साथ जीवन जीना सीखते हैं। उनके अनुसार संपर्क से संबंध तक की यह यात्रा ही मानव जीवन को सार्थक बनाती है।

अजय दायमा ने कहा कि इस संसार में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति प्रारंभ में एक-दूसरे के लिए अजनबी होता है। हम सभी इस धरती पर मेहमान बनकर आए हैं। अजनबी से परिचय, परिचय से सहमति और सहमति से स्वीकृति तक की यात्रा ही स्वस्थ और स्थायी संबंधों का आधार है।

उन्होंने बच्चों और बड़ों की सोच का अंतर बताते हुए कहा कि छोटे बच्चों को घर में मेहमान का आना अच्छा लगता है और उनका जाना बुरा लगता है, जबकि बड़े लोगों को अक्सर मेहमान का आना असुविधाजनक और उनका जाना राहत देने वाला प्रतीत होता है। यह अंतर उम्र का नहीं, बल्कि जीवन की समझ का है। सही समझ विकसित होने पर व्यक्ति का दृष्टिकोण और व्यवहार दोनों बदल जाते हैं।

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि प्रत्येक बालक जन्म से गलती करने का अधिकार लेकर पैदा होता है। प्रत्येक मनुष्य अपनी कल्पनाशीलता के साथ है और उसकी कल्पनाशीलता ही उसे सृजन, नवाचार और विकास की क्षमता प्रदान करती है। लेकिन जब यही कल्पनाशीलता सही समझ के बिना संचालित होती है, तब भ्रम उत्पन्न होता है और व्यक्ति गलतियाँ कर बैठता है। इसलिए गलती को दंड का विषय नहीं, बल्कि सीखने और सही समझ विकसित करने की प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि शिक्षा, सामाजिक व्यवस्था और परिवार, व्यक्ति को सही समझ विकसित करने का अवसर प्रदान करते हैं। इसी सही समझ के आधार पर मनुष्य समाधान, समृद्धि और अभयता के साथ सार्थक एवं संतुलित जीवन जी सकता है। यदि परिवार और शिक्षा व्यवस्था व्यक्ति की कल्पनाशीलता को सही दिशा दें, तो वही कल्पनाशीलता भ्रम का कारण बनने के बजाय समाधान, सहयोग और सह-अस्तित्व की आधारशिला बन जाती है।

इस अवसर पर चेन्नई से आए अंतरराष्ट्रीय लाइफ कोच, लेखक एवं पिछले 35 वर्षों से प्रशिक्षण दे रहे सैफी सरैया ने भी अपने विचार साझा किए। Zero Medicine Wisdom पुस्तक के लेखक सैफी सरैया ने कहा कि वे एमसीवीके में चल रहे जीवन विद्या के कार्यों से गहराई से प्रभावित हैं। उनका मानना है कि जीवन विद्या मनुष्य को स्वयं, परिवार और समाज को समझने का एक व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि वे इस विचार को और गहराई से समझकर एमसीवीके के साथ जुड़ना चाहते हैं तथा जीवन विद्या के संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में अपना योगदान देना चाहते हैं। उनके अनुसार आज की दुनिया में मानसिक तनाव, असंतुलन और सामाजिक संघर्षों का स्थायी समाधान सही जीवन-दृष्टि और सही समझ के माध्यम से ही संभव है, और जीवन विद्या इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

झाबुआ संवाद 2026 : “प्रकृति से केवल लेने की नहीं, उसे लौटाने की संस्कृति विकसित करनी होगी” — डॉ. अभय वानखेड़े

झाबुआ, 2 अगस्त 2026
लेखक : मोहित धवन

“आज का मनुष्य प्रकृति से लगातार अधिक ले रहा है, लेकिन उसे लौटाने की भावना बहुत कम होती जा रही है। यदि मानव और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित नहीं हुआ, तो आने वाले समय में समस्याएँ और गहरी होंगी।”

ये विचार मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर के संस्थापक सदस्य डॉ. अभय वानखेड़े ने झाबुआ में आयोजित दो दिवसीय ‘झाबुआ संवाद’ कार्यशाला के तीसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम यूआईटी, झाबुआ द्वारा आयोजित इस कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों से शिक्षाविद, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता और युवा शोधार्थी भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का उद्देश्य परंपरा और उद्यम के बीच सार्थक संवाद स्थापित करना है।

अपने संबोधन में डॉ. वानखेड़े ने कहा कि आज मानव सभ्यता का सबसे बड़ा संकट संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि जीवन को सही दृष्टि से समझने की कमी है। उन्होंने कहा कि प्रकृति से केवल लेने की प्रवृत्ति ने मनुष्य को प्रदुषण व असंतुलन की ओर धकेला है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने जीने के प्रयोजन और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के संबंध को समझे ताकि सभी के साथ पूरकता का भाव विकसित हो सकें।

उन्होंने बताया कि नागराज जी ने अपने जीवन के अनेक वर्षों तक जगत, सत्यता, ज्ञान, न्याय, मानवीय आचरण पर गहन अध्ययन किया। उनका पूरा अनुसंधान इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास था कि “मनुष्य अपनी मौलिकता के साथ कैसे जियें ?” उनके चिंतन का सार था, की प्रत्येक व्यक्ति समाधान, समृद्धि, अभय और सह-अस्तित्व के साथ जीवन जी सके।

डॉ. वानखेड़े ने कहा कि “गाँव में जीवन कठिन है, जबकि शहरों में समस्याएँ अधिक दिखाई देती हैं।” जबकि समस्याएं हमारी नासमझी की ही उपज है, उनका मानना है कि आधुनिक जीवनशैली ने मनुष्य को प्रकृति, परिवार और समाज से दूर कर दिया है। ऐसे समय में मानव चेतना विकास केंद्र, इंदौर ने विश्व के सामने एक ऐसा अनूठा जीवन मॉडल प्रस्तुत किया है, जहाँ बिना भय के, नौकरी या व्यापार पर निर्भर हुए बिना भी श्रम पूर्वक समाधान, समृद्धि और खुशहाल जीवन का अध्ययन,अभ्यास किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि एमसीवीके परिसर में वर्तमान में 51 परिवार एक साथ रहते हैं। यहाँ 150 से अधिक गिर गायों की गौशाला है तथा 150 से अधिक प्रकार के उत्पाद तैयार किए जाते हैं। पूरे परिसर के लिए एक ही रसोई में भोजन बनाया जाता है और आवश्यक खर्चों के लिए एक साझा वॉलेट की व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि एमसीवीके केवल रहने का स्थान नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक शिक्षा संस्थान है, जहाँ मनुष्य, उसके संबंधों और सह-अस्तित्व का अध्ययन एवं व्यवहारिक अभ्यास किया जाता है। यहाँ 70 से अधिक बच्चे जीवन मूल्यों के साथ विभिन्न कौशलों का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।
अपने संबोधन के अंत में डॉ. अभय वानखेड़े ने उपस्थित शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर आने का आमंत्रण दिया। उन्होंने कहा कि “एमसीवीके को केवल सुनकर नहीं समझा जा सकता, उसे देखने, जानने और जीने की आवश्यकता है।” उन्होंने सभी से आग्रह किया कि वे एक बार एमसीवीके आकर वहाँ के जीवन, कार्यपद्धति और जीवन शिक्षा के इस अनूठे मॉडल को स्वयं देखें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह अनुभव जीवन को देखने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है और मनुष्य, परिवार, समाज तथा प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

कार्यशाला के दौरान झाबुआ की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और स्थानीय उद्यमों को भी विशेष रूप से प्रदर्शित किया गया। परिसर में आयोजित प्रदर्शनी में झाबुआ की आदिवासी जनजातियों द्वारा तैयार किए जा रहे विभिन्न पारंपरिक उत्पादों को प्रदर्शित किया गया। इनमें पारंपरिक धनुष-बाण, स्थानीय हस्तशिल्प तथा झाबुआ के प्रसिद्ध गुड़िया उद्योग की आकर्षक झलक देखने को मिली। प्रदर्शनी ने प्रतिभागियों को इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक कौशल और स्थानीय आजीविका के विविध आयामों से परिचित कराया।

कार्यक्रम में उपस्थित प्रतिभागियों ने भी इस संवाद को केवल एक अकादमिक चर्चा न मानकर, शिक्षा, संस्कृति, प्रकृति और मानवीय मूल्यों को व्यवहार में उतारने की दिशा में एक सार्थक पहल बताया। दो दिवसीय ‘झाबुआ संवाद’ में विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञ अपने विचार साझा कर रहे हैं, जिससे परंपरा, शिक्षा, उद्यम और समाज के बीच नए सहयोग की संभावनाओं पर व्यापक विमर्श हो रहा है।

MCVK Family Carnival Celebrates Creativity, Learning and Community Spirit

By Mohit Dhawan

Indore, August 1, 2026:
The campus of Manav Chetna Vikas Kendra (MCVK), Indore, came alive with joy, creativity and togetherness as the MCVK Family Carnival was organized on Saturday evening. The event brought together MCVK families and participants of the 10-day Vikalp Camp, creating an atmosphere of celebration, learning and meaningful interaction.

The carnival began with a series of creative stalls designed and managed by children. The stalls highlighted education, skill development and hands-on learning through activities such as cooking demonstrations, children’s magazines, games and other creative projects. Visitors also enjoyed freshly brewed coffee and roasted corn while exploring the exhibition.

The cultural performances became the highlight of the evening. The energetic hosting by Amit Pandey and Chandan Bhaiya kept the audience engaged throughout the program. A group performance by Navneet, Prachi, Anubhuti, Indu Girija Didi, Purnakshi Didi, Sonu, Amit and Chandan Bhaiya on the popular song “Main Aashiq To Nahi” filled the venue with music and laughter. The graceful dance performance by Pranjal Bhaiya and Purnakshi Didi received warm appreciation from the audience.

A fun-filled Lemon Race was organized for participants of different age groups. Children and adults joined the activity with equal enthusiasm, making it one of the most enjoyable moments of the carnival.

One of the special attractions of the event was the launch of a new Organic Soap developed at MCVK by Navneet Jain, Soumya Pandey and their team. Navneet shared that she had no experience in soap making before joining MCVK. She said that the learning environment, continuous guidance and support from the MCVK family gave her the confidence and skills to develop the product. The Organic Soap was officially launched by her father-in-law and mother-in-law, who attended the event as the chief guests.

Speaking on the occasion, Ajay Dayma, Founder of MCVK, said, “Many people in today’s world have wealth, but very few experience real happiness. At MCVK, every moment is filled with joy, celebration and meaningful relationships. When people live with understanding, cooperation and mutual trust, life itself becomes a celebration.”

Participants of the Vikalp Camp also visited the children’s exhibition and experienced MCVK’s unique community lifestyle through the cultural programs and interactive activities. The evening concluded with a special dinner prepared by the MCVK kitchen team, featuring a variety of delicious chaat, desserts and other traditional dishes.

The MCVK Family Carnival was much more than an entertainment event. It reflected MCVK’s vision of building a community where learning, creativity, self-reliance, cooperation and celebration become a natural part of everyday life. The event left participants with joyful memories and a deeper understanding of the values that bring people together.