✍️ एमसीवीके टीम द्वारा

इंदौर, 5 अगस्त 2026। (एमसीवीके),विकल्प शिविर के पाँचवें दिन के प्रथम सत्र में एमसीवीके के संस्थापक अजय दायमा ने प्रकृति, पर्यावरण और मानव की भूमिका पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि आज पर्यावरण संरक्षण की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन समाधान केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं हो सकता। जब तक मनुष्य अपनी जीवनशैली, उपभोग और प्रकृति के साथ अपने संबंध को नहीं बदलेगा, तब तक पर्यावरणीय संकट का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
उन्होंने कहा कि आज हम चाहे जितने भी पेड़ लगा लें, यदि दूसरी ओर प्रकृति का अंधाधुंध दोहन जारी रहेगा तो कुछ समय बाद वायु और वातावरण का संतुलन फिर बिगड़ जाएगा। उनके अनुसार केवल पेड़ लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह समझना अधिक आवश्यक है कि हम प्रकृति से कितना ले रहे हैं और उसके बदले उसे क्या लौटा रहे हैं।
अजय दायमा ने कहा कि आज जिस गति से हम धरती के भीतर से कोयला, खनिज और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं, उसका प्रभाव आने वाले वर्षों में पृथ्वी के तापमान पर अवश्य दिखाई देगा। उन्होंने कहा कि धरती के भीतर मौजूद खनिज केवल आर्थिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि वे पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यदि इनका लगातार दोहन होता रहा, तो तापमान को संतुलित रखने वाली प्राकृतिक व्यवस्था कमजोर होती जाएगी और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएँ और गंभीर रूप लेंगी।
उन्होंने वृक्षारोपण अभियानों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि कई बार यह अभियान केवल फोटो खिंचवाने तक सीमित रह जाते हैं। जंगल बढ़ाने के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता में अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं देते। उनका मानना है कि यदि मनुष्य प्रकृति का दोहन कम कर दे, तो धरती स्वयं को संतुलित करने में सक्षम है। प्रकृति में स्वयं को पुनर्जीवित और संतुलित करने की अद्भुत क्षमता है, आवश्यकता केवल उसे अवसर देने की है।
अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कोरोना काल का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जब महामारी के दौरान मानव की गतिविधियाँ सीमित हो गई थीं, तब प्रकृति ने स्वयं को ठीक करना शुरू कर दिया था। अनेक स्थानों पर वायु पहले से अधिक स्वच्छ हुई, प्रदूषण कम हुआ और हरियाली में बढ़ोतरी हुई। उनके अनुसार यह इस बात का प्रमाण है कि जब मानव का हस्तक्षेप कम होता है, तो प्रकृति स्वयं अपने संतुलन की दिशा में कार्य करने लगती है।
उन्होंने यह भी कहा कि आज अधिकांश वैश्विक समस्याओं की जड़ स्वयं मनुष्य है। जब तक मानव अपने आचरण, उपभोग और प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन नहीं करेगा, तब तक कोई भी तकनीक या अभियान स्थायी समाधान नहीं दे सकता।
आपने स्पष्ट रूप से यह भी कहा कि कोरोना जैसी घटनाओं पर हमें केवल चिकित्सा के दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि अपने जीवन और प्रकृति के साथ संबंधों के संदर्भ में भी विचार करना चाहिए। उनके अनुसार यदि मनुष्य अन्य जीवों और प्रकृति के साथ असंतुलित व्यवहार करता रहेगा, तो उसके परिणाम अंततः पूरे मानव समाज को भुगतने पड़ेंगे। उन्होंने कहा कि कोरोना काल के बाद भी यदि मानव अपने आचरण में परिवर्तन नहीं लाता, तो भविष्य में भी प्रकृति हमें इसी प्रकार चेतावनी देती रहेगी।
सत्र के अंत में अजय दायमा ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल वृक्षारोपण का अभियान नहीं, बल्कि मानव चेतना का विषय है। जब मनुष्य आवश्यकता से अधिक उपभोग छोड़कर प्रकृति के साथ संतुलित और उत्तरदायी जीवन जीना सीख लेगा, तभी धरती, पर्यावरण और मानव समाज के बीच वास्तविक संतुलन स्थापित हो सकेगा।
हरियाणा के हिसार से आए अजीत सिंह, जो पिछले 13 वर्षों से जीवन विद्या से जुड़े हुए हैं, ने एमसीवीके में अपने अनुभव साझा किए। वे शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं और कई स्कूलों एवं कॉलेजों का संचालन कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि एमसीवीके (मानव चेतना विकास केंद्र), मध्यस्थ दर्शन सह-अस्तित्ववाद के लोकव्यापीकरण के लिए मानवीय शिक्षा का एक जीवंत केंद्र है। यहाँ परिवार विधि के माध्यम से शिक्षा के मानवीयकरण और जीवन विद्या योजना पर निरंतर कार्य किया जा रहा है।
अजीत सिंह के अनुसार, एमसीवीके में सह-अस्तित्ववादी विचार-अभ्यास, कर्म-अभ्यास और व्यवहार-अभ्यास को जीवन का हिस्सा बनाकर कार्य किया जा रहा है। यहाँ केवल सिद्धांत नहीं पढ़ाए जाते, बल्कि उन्हें दैनिक जीवन में जीने का अभ्यास भी कराया जाता है।
उन्होंने कहा कि एमसीवीके की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ रहने वाले परिवार इन मूल्यों को अपने जीवन में व्यवहारिक रूप से जीते हुए दिखाई देते हैं। जब कोई व्यक्ति इन परिवारों के बीच रहता है, तो उसे सहज रूप से यह अनुभव होता है कि यदि ये परिवार इस समझ के साथ समृद्ध, समाधानपूर्ण और सहयोगी जीवन जी सकते हैं, तो हम भी इस समझ को प्राप्त कर उसी प्रकार का जीवन जी सकते हैं।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि मानवीय शिक्षा और जीवन विद्या पर आधारित यह प्रयास समाज में सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन सकता है तथा अधिक से अधिक लोगों तक इस विचार का पहुँचना समय की आवश्यकता है।
