लेखक : मोहित धवन

इंदौर, 1 अगस्त। मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर में शनिवार को 10 दिवसीय ‘विकल्प शिविर’ का शुभारंभ वंदना गीत एवं स्वागत सत्र के साथ हुआ। 1 अगस्त से 10 अगस्त तक चलने वाले इस शिविर में देश के विभिन्न राज्यों के साथ नेपाल से आए 70 से अधिक शिविरार्थी भाग ले रहे हैं। शिविर के दौरान मध्यस्थ दर्शन के विभिन्न आयामों पर संवाद, अध्ययन और अनुभव आधारित सत्र आयोजित किए जाएंगे।
उद्घाटन सत्र में डॉ. अभय वानखेड़े ने सभी शिविरार्थियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह दस दिनों की यात्रा केवल जानकारी प्राप्त करने की नहीं, बल्कि स्वयं को समझने की यात्रा है। उन्होंने कहा कि शिविर में सबसे पहले इस प्रश्न पर विचार किया जाएगा कि मनुष्य क्या है और मानवीय नजरिये के साथ कैसे जिया जा सकता है। इसके साथ ही प्रकृति के साथ शोषण मुक्त और पूरकता के साथ जीना, श्रमपूर्वक स्वस्थ शरीर के साथ जीने की समझ तथा जीवन में उठने वाले विभिन्न प्रश्नों पर खुले संवाद के माध्यम से विचार किया जाएगा। उन्होंने कहा कि शिविर का उद्देश्य किसी विचार को थोपना नहीं, बल्कि प्रत्येक प्रश्न के उत्तर पर मिलकर संवाद करना है।
एमसीवीके की संस्थापक सदस्य वर्षा दायमा ने अपने स्वागत संबोधन में कहा कि संसार का प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने तरीके से बहुत कुछ कर रहा है, लेकिन उसके प्रत्येक प्रयास के पीछे मूल उद्देश्य केवल सुख की प्राप्ति है। उन्होंने स्वर कोकिला लता मंगेशकर का उदाहरण देते हुए कहा कि जब उनके जीवन के अंतिम समय में उनसे पूछा गया कि यदि अगला जन्म मिले तो वे क्या बनना चाहेंगी, तो उनका उत्तर था कि वे फिर से गायिका नहीं, बल्कि स्वयं को जानना चाहेंगी। वर्षा दायमा ने कहा कि पिछले 18 वर्षों से एमसीवीके में भी इसी दिशा में कार्य किया जा रहा है, ताकि मनुष्य स्वयं को समझते हुए समाधान, समृद्धि और अभयता के साथ जीवन जी सके।
एमसीवीके के संस्थापक अजय दायमा ने अपने उद्घाटन उद्बोधन में कहा कि हम सभी किसी भी कार्य की शुरुआत पूरे उत्साह और अच्छे भाव से करते हैं, लेकिन समय के साथ आने वाली बाधाओं के कारण अक्सर उसे उसी रूप में पूरा नहीं कर पाते। उन्होंने कहा कि इस शिविर के पाँच प्रमुख उद्देश्य हैं—पहला, मेरी आपसे हुई बात आपको स्वीकार हो; दूसरा, आपकी स्वयं से हुई बात आपको स्वीकार हो; तीसरा, आपकी दूसरों से हुई बात भी स्वीकार हो; चौथा, स्वीकार्यता के आधार पर जीने वाला एक व्यवस्थागत मॉडल विकसित हो, जिसे हम सिस्टम कहते हैं; और पाँचवाँ, यह समझ अगली पीढ़ी तक सुरक्षित रूप से पहुँच सके।
उन्होंने कहा कि यदि हम दुनिया को बदलने निकलेंगे तो दुनिया हमें बदल देगी। इसलिए हमारा प्रयास दुनिया को बदलने का नहीं, बल्कि स्वयं को समझने और संवाद के माध्यम से व्यवस्था को समझने का होना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी स्वस्थ व्यवस्था का आधार संवाद है। केवल किसी प्रश्न का उत्तर मिल जाना ही समझ नहीं है। वास्तविकता, समझ तब होती है जब हमारी बात हमें भी स्पष्ट हो, सामने वाले तक भी स्पष्ट रूप से पहुँचे और वह उसे सहज रूप से स्वीकार कर सके। यही स्वीकार्यता आगे चलकर व्यवस्था का आधार बनती है।
शिविर में दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, गुजरात, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों से प्रतिभागी पहुँचे हैं। अगले दस दिनों तक मध्यस्थ दर्शन, मानव अध्ययन, प्रकृति, सह-अस्तित्व और जीवन के विभिन्न आयामों पर संवाद एवं अभ्यास सत्र आयोजित किए जाएंगे।
इस अवसर पर नेपाल के काठमांडू से आईं पर्यावरणविद् लीला श्रेष्ठ ने बताया कि उन्हे ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, मलेशिया, श्रीलंका, थाईलैंड और वियतनाम सहित अनेक देशों में पर्यावरण संरक्षण एवं प्राकृतिक चिकित्सा से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि वे एमसीवीके में मानव चेतना पर हो रहे कार्य का अध्ययन करने के साथ-साथ स्वयं का भी अध्ययन करना चाहती हैं। उनका उद्देश्य यहाँ प्राप्त समझ और अनुभव को दुनिया के अन्य देशों के लोगों तक पहुँचाना है, ताकि मानव और प्रकृति के बीच संतुलित एवं समाधानपूर्ण जीवन की दिशा में वैश्विक स्तर पर भी सार्थक संवाद आगे बढ़ सके।
दस दिवसीय यह शिविर 10 अगस्त तक चलेगा, जिसमें प्रतिदिन विभिन्न विषयों पर संवाद, अध्ययन और सहभागिता आधारित सत्र आयोजित किए जाएंगे।


































