लेखक : मोहित धवन

सुबह की घड़ी में लगभग साढ़े सात बज रहे थे। इंदौर अभी पूरी तरह जागा भी नहीं था कि हमारी कार महेश्वर की ओर बढ़ चली। रात से हो रही हल्की बारिश अब भी जारी थी। आसमान पर बादलों का साम्राज्य था और सड़क के दोनों ओर फैली हरियाली मानो इस यात्रा का स्वागत कर रही थी। बरसात में मध्य प्रदेश का मालवा अंचल किसी चित्रकार की कैनवास पर उकेरी गई पेंटिंग जैसा दिखाई देता है। ऐसे मौसम में यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचना नहीं रहती, बल्कि हर मोड़ पर एक नया अनुभव बन जाती है।
मेरे साथ पत्नी श्रुति, मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर के डॉ. अभय वानखेड़े और उनकी पत्नी प्रीति जी थे। पूरे रास्ते कभी इतिहास की बातें होतीं, कभी प्रकृति की, तो कभी जीवन की छोटी-छोटी खुशियों की।
स्वाद, जो आधी यात्रा सफल कर देता है
महेश्वर जाने वाले अधिकांश यात्रियों की तरह हमारा पहला पड़ाव था महू।
यहाँ स्थित भँवरीलाल मिठाईवाला पर जैसे ही गरमागरम पोहा और ताज़ी जलेबी सामने आई, लगा कि मध्य प्रदेश के स्वाद की चर्चा यूँ ही नहीं होती। साथ में खस्ता और समोसे ने नाश्ते को और भी यादगार बना दिया।
दुकान के संचालकों से बातचीत में पता चला कि इस प्रतिष्ठान की शुरुआत 1972 में एक छोटी-सी दुकान से हुई थी। आज इंदौर में इसकी कई शाखाएँ हैं, लेकिन स्वाद वही है जिसने पाँच दशक पहले लोगों का दिल जीता था। ऐसे प्रतिष्ठान यह विश्वास दिलाते हैं कि ईमानदारी से किया गया काम समय के साथ केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि विरासत बन जाता है।
महू से गुजरते हुए एक और दिलचस्प जानकारी मिली। प्रसिद्ध क्रिकेट कमेंटेटर दिलीप दोषी का घर भी यहीं है। स्थानीय लोगों ने बताया कि उनके परिवार द्वारा बच्चों के लिए क्रिकेट प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की जाती है। खेल और संस्कृति का यह मेल इस छोटे-से शहर को एक अलग पहचान देता है।
जाम गेट… जहाँ रास्ता रुकने पर मजबूर कर देता है
महू से आगे बढ़ते ही सड़क पहाड़ियों और जंगलों के बीच प्रवेश करने लगी।
बारिश के कारण हर पेड़ धुला हुआ-सा लग रहा था। बादल कभी पहाड़ियों को अपनी आगोश में ले लेते, तो कभी अचानक हट जाते और दूर तक फैली हरी-भरी घाटियाँ दिखाई देने लगतीं। सड़क पर वाहनों की आवाजाही कम थी और प्रकृति का संगीत अधिक।
इसी मार्ग पर स्थित जाम गेट पहुँचे तो कार अपने आप रुक गई। सामने फैली हरियाली, पहाड़ों पर उतरते बादल और हल्की-हल्की फुहारें किसी पोस्टकार्ड जैसे दृश्य का अहसास करा रही थीं।
सड़क किनारे लगी एक पुरानी-सी चारपाई पर बैठकर हमने कुछ देर इस मौसम को महसूस करने का निर्णय लिया। वहीं भुट्टे (कॉर्न) का स्वाद लिया और बारिश के मौसम की सबसे पसंदीदा साथी गरमा-गरम मैगी भी खाई। उस समय भोजन से ज़्यादा आनंद उस माहौल का था—बारिश की फुहारें, सामने फैले हरे-भरे पहाड़, चाय और भुट्टे की खुशबू, और अपनों का साथ।
महेश्वर… जहाँ इतिहास अभी भी जीवित है
कुछ देर बाद नर्मदा के किनारे बसे महेश्वर ने हमारा स्वागत किया।
दूर से दिखाई देता अहिल्याबाई होल्कर का किला जितना भव्य लगता है, उसके भीतर प्रवेश करने पर उससे कहीं अधिक प्रभाव छोड़ता है। पत्थरों से बनी दीवारें, खुले प्रांगण और नर्मदा की ओर खुलती खिड़कियाँ मानो इतिहास के पन्ने जीवंत कर देती हैं।
अहिल्याबाई होल्कर केवल एक शासक नहीं थीं। वे उन विरले व्यक्तित्वों में थीं जिन्होंने सत्ता को जनकल्याण का माध्यम बनाया। उन्होंने देशभर में मंदिर, घाट और धर्मशालाएँ बनवाईं, लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि उन्होंने अपने राज्य के लोगों को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया।
महेश्वर का प्रसिद्ध महेश्वरी साड़ी उद्योग उसी दूरदर्शिता का परिणाम है। स्थानीय बुनकरों को संरक्षण देकर उन्होंने केवल एक उद्योग नहीं बसाया, बल्कि हजारों परिवारों के लिए सम्मानजनक आजीविका का मार्ग खोला। शायद इसी कारण आज भी महेश्वर का नाम लेते ही नर्मदा के साथ महेश्वरी साड़ियों की पहचान भी सामने आती है।
नर्मदा घाट… जहाँ आस्था का अर्थ बदल जाता है
किले की सीढ़ियाँ उतरते ही माँ नर्मदा का विशाल घाट सामने था।
बरसात के कारण नदी अपने पूरे सौंदर्य में बह रही थी। ऊपर खड़ा किला और नीचे शांत जलधारा—यह दृश्य शब्दों में बाँधना कठिन है।
घाट पर श्रद्धालु पूजा कर रहे थे, दीप प्रवाहित कर रहे थे, परिवारों के साथ समय बिता रहे थे। लेकिन जो बात सबसे अधिक प्रभावित कर गई, वह यह थी कि यहाँ वैसा दान-दक्षिणा का आग्रह दिखाई नहीं दिया, जैसा देश के कई बड़े तीर्थस्थलों पर सामान्य बात बन चुका है। श्रद्धा यहाँ सहज लगी, व्यवसाय नहीं।
घाट के आसपास बने प्राचीन शिव मंदिरों की स्थापत्य शैली और उनकी सादगी मन को देर तक बाँधे रखती है।
भोजन, जिसने अपनापन परोस दिया
घूमते-घूमते दोपहर हो चुकी थी। भोजन के लिए हम बाँके बिहारी सात्विक भोजनालय पहुँचे।
यहाँ चौकी पर बैठकर पारंपरिक तरीके से भोजन कराया गया। दाल, सब्ज़ी, रोटी और अन्य व्यंजन स्वादिष्ट तो थे ही, लेकिन उससे कहीं अधिक प्रभावित करने वाली बात थी वहाँ का आत्मीय व्यवहार।
आज जब अधिकांश रेस्तराँ में ग्राहक केवल एक “टेबल नंबर” बनकर रह जाता है, वहाँ ऐसा लगा जैसे किसी अपने के घर भोजन कर रहे हों।
लौटते समय रास्ता वही था, लेकिन मन बदल चुका था
शाम ढल रही थी।
महेश्वर से इंदौर लौटते समय वही पहाड़ियाँ, वही जंगल और वही बारिश फिर हमारे साथ थे, लेकिन अब मन में एक अलग-सी शांति थी।
कार की खिड़की से बाहर देखते हुए मैं और श्रुति बार-बार एक ही बात सोच रहे थे कि यदि डॉ. अभय वानखेड़े और प्रीति जी ने इस यात्रा की योजना न बनाई होती, तो शायद हम महेश्वर को केवल एक पर्यटन स्थल की तरह देखकर लौट आते।
उन्होंने हमें केवल स्थान नहीं दिखाए, बल्कि हर स्थान की कहानी भी समझाई। यही कारण है कि यह यात्रा केवल घूमने की नहीं, बल्कि समझने की यात्रा बन गई।
घर लौटते समय कैमरे में तस्वीरें थीं, मोबाइल में वीडियो थे, लेकिन सबसे कीमती चीज़ हमारे साथ थी—कृतज्ञता।
शायद यात्रा का सबसे बड़ा उद्देश्य भी यही होता है। वह हमें केवल नई जगहें नहीं दिखाती, बल्कि जीवन को देखने का नया दृष्टिकोण भी दे जाती है।
महेश्वर से लौटकर महसूस हुआ कि कुछ शहर अपनी भव्यता से प्रभावित करते हैं, कुछ अपने इतिहास से, लेकिन महेश्वर उन दुर्लभ शहरों में है जो अपनी सादगी, संस्कृति, नर्मदा की शांति और अहिल्याबाई की विरासत के कारण सीधे दिल में बस जाता है।

