गुरु पूर्णिमा पर एमसीवीके में मनाया गया ‘कृतज्ञता दिवस’, सहयोग और सह-अस्तित्व के संदेश के साथ साझा किए जीवन अनुभव

लेखक : मोहित धवन

इंदौर, 29 जुलाई।मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर में गुरु पूर्णिमा का पर्व इस वर्ष “कृतज्ञता दिवस” के रूप में मनाया गया। कार्यक्रम में गुरु को केवल पूजनीय व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि जीवन में समझ, सहयोग और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाने वाली चेतना के रूप में स्वीकार करने पर बल दिया गया। इस अवसर पर केंद्र से जुड़े अनेक सदस्यों ने अपने अनुभव साझा किए और बताया कि एमसीवीके से जुड़ने के बाद उनके जीवन में किस प्रकार सकारात्मक परिवर्तन आए हैं।

कार्यक्रम का शुभारंभ नागराज जी के चित्र पर माल्यार्पण एवं गुरु वंदना के साथ हुआ। इसके बाद विभिन्न सदस्यों ने अपने अनुभव साझा किए।

एमसीवीके के संस्थापक अजय दायमा ने अपने उद्बोधन में कहा कि “मनुष्य को जीने में सहयोग करना ही गुरुत्व है।” उन्होंने कहा कि समाज में गुरु को अक्सर एक ऐसे महान व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसके जैसा जीवन सामान्य व्यक्ति नहीं जी सकता। जबकि एमसीवीके की दृष्टि में गुरु वह है, जो स्वयं समाधान, समृद्धि और सह-अस्तित्वपूर्ण जीवन जीते हुए दूसरों को भी उसी दिशा में आगे बढ़ने का सहयोग देता है। उनका उद्देश्य अनुयायी तैयार करना नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं समझदार बनाकर जीवन को समझने योग्य बनाना है। उन्होंने कहा कि गुरु का प्रामाणिक आचरण ही सीखने और अभ्यास की प्रक्रिया को सहज बनाता है।

एमसीवीके के संस्थापक सदस्य डॉ. अभय वानखेड़े ने नागराज बाबा के साथ बिताए अपने संस्मरण साझा किए। उन्होंने बताया कि वर्ष 2010 में बांदा सम्मेलन के दौरान सामूहिक जीवन जीने का निर्णय लिया गया था। उन्होंने कहा कि अस्तित्व में योग पहले से ही विद्यमान है, आवश्यकता केवल उसे सहयोग के रूप में जीने की है। लगभग 28 वर्षों की अपनी यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज समाधान के साथ जीवन जी पाना ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

अनीश खान ने कहा कि एमसीवीके में अभ्यास करते हुए उन्हें यह अनुभव हुआ कि कृतज्ञता जीवन का मूल भाव है। उनके अनुसार किसी भी क्षण मनुष्य के भीतर केवल दो ही स्थितियां हो सकती हैं—किसी के प्रति कृतज्ञता या किसी के प्रति समस्या। जब भी किसी व्यक्ति के प्रति शिकायत का भाव आता है, वे यह समझने का प्रयास करते हैं कि उस व्यक्ति ने ऐसा क्या किया है जिसके लिए उसके प्रति कृतज्ञ हुआ जा सके। यही अभ्यास उनके दृष्टिकोण को बदलने का माध्यम बना।

नेहा गंगवार ने कहा कि उन्हें नागराज बाबा से प्रत्यक्ष मिलने का अवसर नहीं मिला, लेकिन जब भी वे अजय दायमा की आंखों में बाबा के प्रति प्रेम और कृतज्ञता के आंसू देखती हैं, तो उन्हें ऐसा अनुभव होता है मानो वे स्वयं बाबा से मिल चुकी हों। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि एक दिन यह अनुभव प्रत्यक्ष भी होगा। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि वे अभी “11.5 इंच की यात्रा” पूरी कर रही हैं, शेष “आधा इंच” अपने आप पूरा हो जाएगा।

ख्याति दीदी ने अजय दायमा के नागराज बाबा के प्रति समर्पण और कृतज्ञता को अपनी प्रेरणा बताते हुए कहा कि वे भी स्वयं को इस मिशन के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित करने का प्रयास कर रही हैं।

प्रीति दीदी ने कहा कि एमसीवीके से जुड़ने के बाद उन्हें मानव और मानवता को एक नई दृष्टि से समझने का अवसर मिला। अब उन्हें अनुभव होता है कि समझ के साथ सामूहिक जीवन जीना ही वास्तविक समृद्धि है और ऐसा जीवन अकेले संभव नहीं है।

कार्यक्रम में रामेंद्र भैया, मिहिर, अनुभव और ईशान सहित कई अन्य सदस्यों ने भी अपने अनुभव साझा किए और एमसीवीके के साथ अपनी जीवन यात्रा के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।

चंद्र प्रकाश पोरवार ने गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि जीवन में जो समझ उन्हें प्राप्त हुई है, उसके लिए वे सदैव आभारी रहेंगे।

सोमेश साहू ने कहा कि उन्होंने वर्षों पहले तिथियों और विशेष दिनों को मनाना छोड़ दिया था, लेकिन आज का दिन उनके लिए वास्तव में “कृतज्ञता दिवस” है।

सफीना खान ने कहा कि पिछले नौ वर्षों में उन्होंने पहली बार किसी एक व्यक्ति पर पूर्ण विश्वास करना सीखा है। अब उन्हें लगता है कि उनके जीवन में एक समझदार व्यक्ति का सहयोग हमेशा उनके साथ खड़ा है।

आलोक धवन ने कहा कि उनका झुकाव प्रारंभ से ही योग और आध्यात्मिक विषयों की ओर रहा है, लेकिन पिछले दो वर्षों में एमसीवीके के माध्यम से मनुष्य को समझने का जो अवसर मिला, वैसा अनुभव उन्हें पहले कभी प्राप्त नहीं हुआ।

एमसीवीके की संस्थापक सदस्य वर्षा दायमा ने कहा कि उन्होंने नागराज बाबा के साथ सदैव निर्विरोध संबंध का अनुभव किया है। उन्होंने अजय दायमा को अपना अध्ययन गुरु बताते हुए कहा कि उनके सान्निध्य में उन्होंने कृतज्ञता के साथ स्वयं का मूल्यांकन करना सीखा। उन्होंने कहा कि यदि किसी समझदार व्यक्ति का साथ मिल जाए तो प्रगति स्वाभाविक हो जाती है। उन्होंने बताया कि वे वर्तमान में जाग्रत मानव के 122 आचरणों के अध्ययन और अभ्यास की प्रक्रिया में हैं।

समापन अवसर पर विजया दीदी तथा अजय दायमा की माताजी गीता दादी ने अपने आशीर्वचन दिए और सभी को कृतज्ञता, सहयोग तथा समझ के साथ जीवन जीने का संदेश दिया।

कार्यक्रम का संचालन प्रांजल वशिष्ठ ने किया। अंत में चंद्र प्रकाश पोरवार एवं आलोक धवन ने एमसीवीके के संस्थापक अजय दायमा का माल्यार्पण कर उन्हें दुशाला ओढ़ाकर सम्मानित किया।

कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन में मिले सहयोग के प्रति कृतज्ञ होने और स्वयं भी दूसरों के जीवन में सहयोगी बनने का संकल्प लेने का अवसर है। इसी भावना के साथ एमसीवीके में इस वर्ष गुरु पूर्णिमा को “कृतज्ञता दिवस” के रूप में मनाया गया।

Leave a comment