इंदौर, 7 अगस्त 2026,
रिपोर्ट : MCVK टीम

मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में आयोजित विकल्प शिविर के सातवें दिन केंद्र के संस्थापक अजय दायमा ने अस्तित्व, सह-अस्तित्व, स्वतंत्रता, प्रामाणिकता, परंपरा और मानव की उपयोगिता जैसे विषयों पर विस्तार से संवाद किया। उन्होंने कहा कि “अस्तित्व को समझकर सह-अस्तित्व में जीने की योग्यता ही वास्तविक स्वतंत्रता है।”
उन्होंने कहा कि मनुष्य में कल्पनाशीलता है और इसी के माध्यम से वह अस्तित्व को समझने की क्षमता रखता है। केवल अपनी मनमर्जी करना स्वतंत्रता नहीं है। अपनी कल्पनाशीलता को सही समझ के साथ जोड़कर कर्मशीलता, पूरकता में जीना ही स्वतंत्रता का वास्तविक स्वरूप है।
समझ से प्रामाणिकता और प्रामाणिकता से परंपरा
अजय दायमा ने कहा कि मानवीय व्यवस्था के अस्तित्व सहज़ तरीके से जीने की उपयोगिता को स्वयं समझना और फिर दूसरे व्यक्ति को भी समझा पाना प्रामाणिकता है। एक समझा हुआ व्यक्ति यदि अपनी समझ को दूसरे तक पहुँचा सके और उसके जीवन में भी वह समझ स्पष्ट हो सके, तभी उसकी समझ की प्रामाणिकता सिद्ध होती है।
उन्होंने कहा, “जब तक प्रमाण नहीं है, तब तक परंपरा नहीं बन सकती।” किसी विचार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने के लिए उसका जीवन में प्रमाणित होना आवश्यक है।
उन्होंने परंपरा के चार प्रमुख आधार बताए—संस्था (Institution), शिक्षा (Education), संविधान (Constitution) और व्यवस्था (System)। इन चारों के माध्यम से सही समझ और मानवीय आचरण को समाज में निरंतरता मिल सकती है।
प्रकृति-प्रेम की शुरुआत मानव-प्रेम से
प्रकृति और मानव के संबंध पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि “प्रकृति-प्रेम की शुरुआत मानव-प्रेम से होती है।” जब तक मनुष्य अपने संबंधों में प्रेम, सम्मान और पूरकता को नहीं समझता, तब तक प्रकृति के साथ संतुलित संबंध स्थापित करना भी कठिन है।
उन्होंने बताया कि अस्तित्व में व्यापक ऊर्जा और प्रकृति (इकाईया) दोनों सह-अस्तित्व में हैं। ऊर्जा की पहचान इकइयों में क्रिया के माध्यम से होती है और क्रिया ऊर्जा की अभिव्यक्ति है।
अस्तित्व के नियम को समझाते हुए उन्होंने उपयोगिता और पूरकता को महत्वपूर्ण बताया। अस्तित्व की प्रत्येक इकाई स्वयं में उपयोगी है और समग्रता में दूसरी इकाइयों के लिए पूरक है। इस प्रकार पूरी प्रकृति में परस्पर पूरकता दिखाई देती है।
स्वयं की उपयोगिता को जानना ही समाधान
अजय दायमा जी ने कहा कि भ्रमित अवस्था में मनुष्य अक्सर अच्छे कार्यों के माध्यम से अपनी उपयोगिता सिद्ध करने का प्रयास करता रहता है। जब व्यक्ति स्वयं में अपनी उपयोगिता को नहीं पहचान पाता, तब वह दूसरों की नजर में उपयोगी साबित होने की दौड़ में लगा रहता है।
उन्होंने कहा, “मनुष्य अपनी उपयोगिता को जानकर ही सुखी होता है। स्वयं में अपनी उपयोगिता को जान लेना ही समाधान है।”
समाधान की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि समाधान वह अवस्था है, जहाँ किसी विषय को लेकर भीतर अनिश्चितता और अंतहीन सोच शेष नहीं रहती, बल्कि स्पष्टता स्थापित हो जाती है।
सत्र के अंत में उन्होंने मानव जीवन के मूल उद्देश्य की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि हमारा प्रयास यह समझने का होना चाहिए कि आकार से मनुष्य होने के साथ-साथ आचरण में भी मनुष्य कैसे बनें।
यही समझ संबंधों में सम्मान, व्यवहार में न्याय और जीवन में सह-अस्तित्व का आधार बनती है। आकार में मानव से आचरण में मानव बनने की यात्रा ही सम्मानपूर्वक जीने की दिशा है।

