झाबुआ, 2 अगस्त 2026
लेखक : मोहित धवन

“आज का मनुष्य प्रकृति से लगातार अधिक ले रहा है, लेकिन उसे लौटाने की भावना बहुत कम होती जा रही है। यदि मानव और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित नहीं हुआ, तो आने वाले समय में समस्याएँ और गहरी होंगी।”
ये विचार मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर के संस्थापक सदस्य डॉ. अभय वानखेड़े ने झाबुआ में आयोजित दो दिवसीय ‘झाबुआ संवाद’ कार्यशाला के तीसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम यूआईटी, झाबुआ द्वारा आयोजित इस कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों से शिक्षाविद, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता और युवा शोधार्थी भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का उद्देश्य परंपरा और उद्यम के बीच सार्थक संवाद स्थापित करना है।
अपने संबोधन में डॉ. वानखेड़े ने कहा कि आज मानव सभ्यता का सबसे बड़ा संकट संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि जीवन को सही दृष्टि से समझने की कमी है। उन्होंने कहा कि प्रकृति से केवल लेने की प्रवृत्ति ने मनुष्य को प्रदुषण व असंतुलन की ओर धकेला है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने जीने के प्रयोजन और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के संबंध को समझे ताकि सभी के साथ पूरकता का भाव विकसित हो सकें।
उन्होंने बताया कि नागराज जी ने अपने जीवन के अनेक वर्षों तक जगत, सत्यता, ज्ञान, न्याय, मानवीय आचरण पर गहन अध्ययन किया। उनका पूरा अनुसंधान इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास था कि “मनुष्य अपनी मौलिकता के साथ कैसे जियें ?” उनके चिंतन का सार था, की प्रत्येक व्यक्ति समाधान, समृद्धि, अभय और सह-अस्तित्व के साथ जीवन जी सके।
डॉ. वानखेड़े ने कहा कि “गाँव में जीवन कठिन है, जबकि शहरों में समस्याएँ अधिक दिखाई देती हैं।” जबकि समस्याएं हमारी नासमझी की ही उपज है, उनका मानना है कि आधुनिक जीवनशैली ने मनुष्य को प्रकृति, परिवार और समाज से दूर कर दिया है। ऐसे समय में मानव चेतना विकास केंद्र, इंदौर ने विश्व के सामने एक ऐसा अनूठा जीवन मॉडल प्रस्तुत किया है, जहाँ बिना भय के, नौकरी या व्यापार पर निर्भर हुए बिना भी श्रम पूर्वक समाधान, समृद्धि और खुशहाल जीवन का अध्ययन,अभ्यास किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि एमसीवीके परिसर में वर्तमान में 51 परिवार एक साथ रहते हैं। यहाँ 150 से अधिक गिर गायों की गौशाला है तथा 150 से अधिक प्रकार के उत्पाद तैयार किए जाते हैं। पूरे परिसर के लिए एक ही रसोई में भोजन बनाया जाता है और आवश्यक खर्चों के लिए एक साझा वॉलेट की व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि एमसीवीके केवल रहने का स्थान नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक शिक्षा संस्थान है, जहाँ मनुष्य, उसके संबंधों और सह-अस्तित्व का अध्ययन एवं व्यवहारिक अभ्यास किया जाता है। यहाँ 70 से अधिक बच्चे जीवन मूल्यों के साथ विभिन्न कौशलों का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।
अपने संबोधन के अंत में डॉ. अभय वानखेड़े ने उपस्थित शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर आने का आमंत्रण दिया। उन्होंने कहा कि “एमसीवीके को केवल सुनकर नहीं समझा जा सकता, उसे देखने, जानने और जीने की आवश्यकता है।” उन्होंने सभी से आग्रह किया कि वे एक बार एमसीवीके आकर वहाँ के जीवन, कार्यपद्धति और जीवन शिक्षा के इस अनूठे मॉडल को स्वयं देखें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह अनुभव जीवन को देखने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है और मनुष्य, परिवार, समाज तथा प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
कार्यशाला के दौरान झाबुआ की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और स्थानीय उद्यमों को भी विशेष रूप से प्रदर्शित किया गया। परिसर में आयोजित प्रदर्शनी में झाबुआ की आदिवासी जनजातियों द्वारा तैयार किए जा रहे विभिन्न पारंपरिक उत्पादों को प्रदर्शित किया गया। इनमें पारंपरिक धनुष-बाण, स्थानीय हस्तशिल्प तथा झाबुआ के प्रसिद्ध गुड़िया उद्योग की आकर्षक झलक देखने को मिली। प्रदर्शनी ने प्रतिभागियों को इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक कौशल और स्थानीय आजीविका के विविध आयामों से परिचित कराया।
कार्यक्रम में उपस्थित प्रतिभागियों ने भी इस संवाद को केवल एक अकादमिक चर्चा न मानकर, शिक्षा, संस्कृति, प्रकृति और मानवीय मूल्यों को व्यवहार में उतारने की दिशा में एक सार्थक पहल बताया। दो दिवसीय ‘झाबुआ संवाद’ में विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञ अपने विचार साझा कर रहे हैं, जिससे परंपरा, शिक्षा, उद्यम और समाज के बीच नए सहयोग की संभावनाओं पर व्यापक विमर्श हो रहा है।



