समझ की रोशनी में न्यायपूर्वक जीने का अभ्यास ही साक्षात्कार है: अजय दायमा

इंदौर, 8 अगस्त 2026 | रिपोर्ट – MCVK टीम

मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में आयोजित विकल्प शिविर के एक सत्र में MCVK के संस्थापक अजय दायमा ने कल्पनाशीलता, साक्षात्कार, बोध, अनुभव और परिवार व्यवस्था पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि मनुष्य के पास कल्पनाशीलता की शक्ति है। जब कल्पनाशीलता में सही प्रस्ताव आता है, उसे समझने और जीने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। समझ की रोशनी में न्यायपूर्वक जीने का निरंतर अभ्यास ही साक्षात्कार की दिशा में ले जाता है।

उन्होंने कहा कि केवल किसी विचार को सुन लेना या मान लेना पर्याप्त नहीं है। मनुष्य जब अस्तित्व को सह-अस्तित्व के रूप में समझते हुए अपने व्यवहार और जीवन में उसे प्रमाणित करने लगता है, तभी समझ सार्थक होती है। मध्यस्थ दर्शन में भी अध्ययन की प्रक्रिया को साक्षात्कार, बोध और अनुभव की दिशा में आगे बढ़ने के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

अजय जी दायमा ने श्रद्धेय ए. नागराज जी के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने मानव को समझने, जीने और समझाने का एक मॉडल प्रस्तुत किया। उन्होंने विचार-अभ्यास और व्यवहार-अभ्यास पर जोर देते हुए कहा कि सह-अस्तित्व की दृष्टि से विचार करना आवश्यक है। विचार के अभ्यास से मानव के अध्ययन की शुरुआत होती है और समझदार मानव के अध्ययन से साक्षात्कार की दिशा स्पष्ट होती है। ए. नागराज जी द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ दर्शन का मूल आधार भी “अस्तित्व, सह-अस्तित्व है” की समझ है।

उन्होंने कहा कि हमारी समझ के रास्ते में मुख्यतः तीन संकट—पूर्वाग्रह, पूर्वाभ्यास और पूर्वानुमान आते हैं। हम कई बार वास्तविकता को जैसी वह है वैसा देखने के बजाय अपनी पहले से बनी धारणाओं, आदतों और अनुमानों के आधार पर देखने लगते हैं। इसलिए समझ विकसित करने के लिए इनसे मुक्त होकर वास्तविकता को देखने का अभ्यास जरूरी है।

“परिवार ही व्यवस्था का केंद्र बिंदु” –

परिवार के विषय पर अजय जी ने कहा कि एक से अधिक मानव मिलकर परिवार बनाते हैं, लेकिन केवल साथ रहना ही परिवार नहीं है। एक-दूसरे के साथ संबंधों की पहचान, समाधान और मिलकर समृद्धि को प्राप्त करना परिवार का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। इसी कारण परिवार, व्यवस्था का केंद्र बिंदु है।

उन्होंने सवाल उठाया कि आज मनुष्य बड़ी संख्या में साथ तो रह रहा है, लेकिन क्या वह वास्तव में परिवार विधि से जी पा रहा है? इसका एक कारण यह है कि हमने मानव को कई बार केवल शरीर या आत्मा के रूप में देखने का प्रयास किया, जबकि मानव को उसकी संपूर्णता में समझना आवश्यक है। शरीर के स्तर पर सुविधा-असुविधा का प्रश्न है, जबकि सुख और समाधान को समझने के लिए मानव के चेतन पक्ष को समझना होगा।

उन्होंने संवेदनशीलता के विभिन्न स्तरों की चर्चा करते हुए कहा कि केवल संवेदनशील होना पर्याप्त नहीं है; संवेदनशीलता का सदुपयोग संबंधों और परिवार में होना चाहिए। जब मनुष्य अपनी समझ को संबंधों, व्यवहार और व्यवस्था में प्रमाणित करता है, तभी परिवार में विश्वास, समाधान और समृद्धि की संभावना मजबूत होती है।

सत्र का मूल संदेश यही रहा कि जीवन को केवल विचार के स्तर पर समझना पर्याप्त नहीं है—समझ को व्यवहार में उतारना और परिवार से लेकर समाज व प्रकृति तक सह-अस्तित्व में जीना ही उसकी सार्थकता है।

Leave a comment