“मानव को केवल आकार से नहीं, आचरण से मानव होना जरूरी”: अजय दायमा

इंदौर, 9 अगस्त 2026 | रिपोर्ट – MCVK टीम

मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में आयोजित विकल्प शिविर के नौवें दिन के प्रथम सत्र को संबोधित करते हुए MCVK के संस्थापक अजय दायमा जी ने कहा कि मानव के शरीर रूप में जन्म लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके आचरण में भी मानवीयता दिखाई देनी चाहिए। मनुष्य की वास्तविक यात्रा स्वयं को समझने, दूसरे मनुष्य की समझने की संभावना को स्वीकार करने और संबंधों में मूल्यों के साथ जीने से आगे बढ़ती है।

उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य की समझ पूरी नहीं होती, तब तक उससे गलतियाँ होती रहेंगी। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि गलती हुई या नहीं, बल्कि यह है कि व्यक्ति अपने भीतर समझने की संभावना को पहचान रहा है या नहीं।

अजय जी दायमा ने कहा, “जब मुझे यह समझ में आता है कि मैं समझ सकता हूँ, तब मुझे यह भी स्वीकार होता है कि सामने वाला व्यक्ति भी समझ सकता है। यहीं से सम्मान की यात्रा शुरू होती है।”

“जीव चेतना से मानव चेतना की यात्रा”

उन्होंने कहा कि जीव चेतना से मानव चेतना की यात्रा सम्मान की यात्रा है और MCVK इसी दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। इस यात्रा में व्यक्ति सबसे पहले स्वयं का मूल्यांकन करता है और यह देखता है कि जो कुछ उसने समझा है, वह उसके आचरण में कितना दिखाई दे रहा है।

उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल उसके विचारों या कथनों से समझा हुआ नहीं माना जा सकता। समझ का प्रमाण उसके जीने में दिखाई देना चाहिए। समझा हुआ व्यक्ति दूसरे को समझने में सहयोग कर सकता है, उसके प्रश्नों के समाधानपरक उत्तर दे सकता है और दूसरे व्यक्ति के साथ समाधानपूर्वक जी सकता है।

उन्होंने कहा कि ऐसे व्यक्ति के उत्तर तार्किक, व्यावहारिक और उद्देश्यपूर्ण होंगे। उसकी समझ केवल स्वयं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वह दूसरे व्यक्ति की समझ विकसित होने में भी सहयोगी बनेगा।

“समाधान से शुरू होती है परिवार की वास्तविक यात्रा”

अजय दायमा भैया ने कहा कि जब व्यक्ति समाधान के साथ जीने लगता है, तब परिवार का वास्तविक स्वरूप सामने आता है। परिवार केवल कुछ लोगों का एक घर में साथ रहना नहीं है। परिवार में लोग एक-दूसरे को समझने, समझाने में सहयोग करने और समझपूर्वक जीने के लिए साथ होते हैं।

उन्होंने इस पूरी यात्रा को एक क्रम में समझाया—

समझ → समाधान → परिवार → समाज में अभय → प्रकृति में संतुलन → मानव जाति की सुरक्षा → सुखी एवं संपन्न अगली पीढ़ी।

उन्होंने कहा कि समाधानपूर्वक जीने वाले परिवार ही अभय समाज का आधार बन सकते हैं। समाज में अभय होने पर प्रकृति के साथ मनुष्य का व्यवहार संतुलित होता है। प्रकृति का संतुलन मानव जाति की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा बनाता है और सुरक्षित मानव समाज में ही आने वाली पीढ़ियों के सुखी और संपन्न होने की संभावना मजबूत होती है।

“परिवार में संबंधों के साथ मूल्यों की पहचान जरूरी”

अजय दायमा ने कहा कि परिवार को समझने के लिए संबंध, मूल्य और व्यवस्था को समझना आवश्यक है। हर संबंध में मूल्य निहित हैं और इन मूल्यों की पहचान के साथ जीना ही परिवार को सार्थक बनाता है।

उन्होंने सम्मान, विश्वास और स्नेह को संबंधों के आधार मूल्य बताते हुए कहा कि सामने वाले व्यक्ति में समझने की संभावना को स्वीकार करना सम्मान की शुरुआत है। विश्वास और स्नेह संबंधों को मजबूती और निरंतरता प्रदान करते हैं।

उन्होंने ममता और वात्सल्य को अपने से छोटों के साथ जीने के मूल्य बताया। इसका अर्थ केवल बच्चों या छोटों की देखभाल करना नहीं है, बल्कि उनकी समझ पूरी होने में सहयोग करना भी है।

इसी तरह कृतज्ञता, गौरव और श्रद्धा अपने से अधिक समझे हुए व्यक्ति के प्रति उसकी समझ और योगदान की स्वीकृति के मूल्य हैं। जब व्यक्ति यह पहचानता है कि किसी ने उसकी समझ विकसित होने की यात्रा में सहयोग किया है, तब उसके प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा का भाव स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।

“प्रेम—दो समझदार व्यक्तियों की सहमति”

अजय दायमा जी ने प्रेम को संबंधों में पूर्णता से जोड़ते हुए कहा कि जब दो समझदार व्यक्ति पूर्णता की दिशा में रत रहते हुए परस्पर सहमति के साथ जीते हैं, तब प्रेम की अभिव्यक्ति होती है। इस दृष्टि से प्रेम केवल भावनात्मक आकर्षण नहीं, बल्कि समझ, सहमति और पूर्णता की दिशा में साथ जीने की अवस्था है।

उन्होंने कहा कि सम्मान निरंतर विकसित होने की यात्रा है। इसकी शुरुआत स्वयं में समझने की संभावना को पहचानने और वही संभावना दूसरे मनुष्य में स्वीकार करने से होती है।

व्यक्ति में शुरू हुई यही समझ आगे संबंधों में मूल्यों के रूप में अभिव्यक्त होती है, परिवार में समाधान का आधार बनती है और फिर समाज में अभय तथा प्रकृति में संतुलन की दिशा प्रशस्त करती है।

अजय जी ने कहा कि इस पूरी यात्रा का उद्देश्य केवल व्यक्ति को बेहतर बनाना नहीं, बल्कि ऐसा मानवीय आचरण विकसित करना है, जिसमें समाधानपूर्ण व्यक्ति, समृद्ध परिवार, भयमुक्त समाज और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन संभव हो सके।

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