“कोई व्यक्ति किसी दूसरे को सुखी नहीं कर सकता, सुख समझने से है”: अजय दायमा

इंदौर, 10 अगस्त 2026
लेखक – मोहित धवन

मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में 1 से 10 अगस्त तक आयोजित दस दिवसीय विकल्प शिविर – ‘जीने की एक नई दिशा’ का सोमवार को समापन हुआ। अंतिम दिन MCVK के संस्थापक श्री अजय दायमा ने जीवन, सुख, कल्पनाशीलता, मानवीय संबंध और परिवार-व्यवस्था पर चर्चा करते हुए कहा कि मनुष्य जिस सुख को दूसरे व्यक्ति, परिस्थितियों या भौतिक साधनों में खोजता है, बल्कि उसका वास्तविक आधार सही समझ में है।

अजय दायमा ने कहा, “दुनिया में कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को सुखी नहीं कर सकता।” मनुष्य के मन में सुख की चाह रहती है, लेकिन वृत्ति में स्पष्टता न होने से कल्पनाशीलता में भ्रमित चित्रण होने लगता है। इसी कारण वह कभी शरीर और सुविधाओं में, तो कभी दूसरे व्यक्ति से अपेक्षाओं की पूर्ति में सुख तलाशता है।

उन्होंने कहा कि वास्तव में व्यवस्था को समझने से ही सुख है। स्वयं, संबंध और अस्तित्व की व्यवस्था की स्पष्टता जीवन में सहजता लाती है। मानवीय संबंध व इसकी समझ को जीने और प्रमाणित करना जीने का महत्वपूर्ण आधार हैं।

अच्छी स्मृतियाँ भी बन सकती हैं बाधा

‘जीवन क्या है’ विषय पर अजय दायमा ने कहा कि सामान्यतः बुरी स्मृतियाँ अच्छी स्मृतियों पर भारी पड़ती हैं, लेकिन यदि व्यक्ति वर्तमान को समझने के बजाय अतीत में उलझा रहे, तो अच्छी स्मृतियाँ भी बाधा बन सकती हैं। इसलिए जीवन को बीते अनुभवों के बजाय वर्तमान में सही समझ के साथ जीना आवश्यक है।

परिवार और जनसंख्या के संदर्भ में उन्होंने कहा कि लंबे समय तक संतान को माता-पिता का ऋण चुकाने, धर्म की रक्षा और वंश आगे बढ़ाने जैसी धारणाओं से जोड़ा गया। आज यह समझने की जरूरत है कि अगली पीढ़ी के प्रति हमारी जिम्मेदारी क्या है और बच्चों को ऐसी शिक्षा कैसे मिले, जिससे वे जीवन, संबंध और व्यवस्था को समझ सकें।

MCVK में जीने और अध्ययन से जुड़ने का विकल्प

अपने संबोधन के अंतिम चरण में अजय दायमा ने शिविरार्थियों के सामने MCVK में परिवार-विधि से जीने का विकल्प रखा। उन्होंने प्रतिभागियों से स्वयं तथा अपने बच्चों की शिक्षा को इस अध्ययन से जोड़ने पर विचार करने का आह्वान किया।

शिविर में मिले प्रस्तावों को और गहराई से समझने के लिए सभी शिविरार्थियों को 20 अक्टूबर से 19 नवंबर 2026 तक आयोजित होने वाले अध्ययन शिविर में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया।

“मैं सीखने आई थी, लगा सीखना अब शुरू हुआ है”

समापन अवसर पर विभिन्न शहरों से आए शिविरार्थियों ने अपने अनुभव साझा किए।

पुणे से आई ईशा गाला ने बताया कि वे बिना किसी तय अपेक्षा के MCVK आई थीं। उनके अनुसार किसी विचार को सुनना और उसे लोगों के जीवन में घटित होते देखना दो अलग अनुभव हैं। यहाँ उनके सामने सवाल आया कि मनुष्य को वास्तव में सुखी होने के लिए क्या चाहिए और क्या हम प्रतिस्पर्धा के बजाय समझ एवं सहयोग के साथ रह सकते हैं?

उन्होंने कहा, “मैं यहाँ यह सोचकर आई थी कि कुछ सीखकर जाऊँगी, लेकिन लौटते समय लग रहा है कि सीखने की शुरुआत अब हुई है।” उनके लिए ‘जीने की एक नई दिशा’ जीवन को नई दृष्टि से देखने का अवसर है।

“यहाँ आकर पता चला कि जीना कैसे है”

हिसार, हरियाणा से आए रविंदर कुमार ने कहा, “यहाँ आने से पहले तक मैं सिर्फ जिंदा था, यहाँ आकर पता चला कि जीना कैसे है।” उन्होंने बताया कि शिविर से उन्हें जीवन को समझने का आधार, परिवार-व्यवस्था में अपनी उपयोगिता का बोध और इस व्यवस्था में जीने का विश्वास मिला।

“सहज जीवन जीने की प्रेरणा लेकर जा रहा हूँ”

हिसार, हरियाणा से आए सुभाष ने कहा कि विकल्प शिविर ने उन्हें जीवन-यात्रा को अधिक गहराई से समझने की दिशा दी। श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी द्वारा अनुसंधानित दर्शन से उनमें यह स्वीकृति बनी कि अस्तित्व-सहअस्तित्व, परिवार-मूलक व्यवस्था, उपयोगिता-पूरकता तथा समाधान-समृद्धि को शिक्षा-विधि से समझा, जीया और समझाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि अजय दायमा ने दर्शन के प्रस्तावों को सरल शब्दों में समझने में सहायता की। “मैं MCVK से सहज जीवन जीने की प्रेरणा लेकर जा रहा हूँ।”

“MCVK आने के बाद बदल गया मेरा दृष्टिकोण”

भोपाल से आई मीनल गाला ने कहा कि MCVK में उन्हें चेतना और उद्देश्य के साथ जीने तथा मानवता के वास्तविक अर्थ को समझने का अवसर मिला। यहाँ परिवारों और बच्चों के बीच सामंजस्य, सहयोग और सहजता ने उन्हें प्रभावित किया।

उन्होंने बताया कि आने से पहले उनके मन में कई आशंकाएँ थीं, लेकिन यहाँ रहने के बाद उनका दृष्टिकोण बदल गया। उनके बेटे अरहान ने भी प्रसन्नता के साथ कई नई चीजें और कौशल सीखे। उनके अनुसार सीमित आवश्यकताओं और सामंजस्य के साथ शांतिपूर्ण जीवन संभव है।

सह-अस्तित्व को व्यवहार में उतारने की जरूरत

इंदौर से आए आशीष सांखला ने कहा कि शिविर में उन्हें अस्तित्व-सहअस्तित्व और एक-दूसरे के लिए उपयोगी व पूरक होने की अवधारणा समझने का अवसर मिला। यदि इस समझ को दैनिक जीवन में पल-पल व्यवहार में उतारा जाए, तो मनुष्य अधिक सुखी, आनंदित और स्वस्थ जीवन जी सकता है। इससे समाज और दुनिया को भी बेहतर बनाने की दिशा मिल सकती है।

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