MCVK से लौट तो आया हूँ… मन अभी वहीं है

लेखक – मोहित धवन

कल इंदौर से लखनऊ लौटते हुए गाड़ी लगातार आगे बढ़ रही थी, लेकिन मन बार-बार पीछे जा रहा था। रास्ते भर MCVK में बिताए पिछले 21 दिन किसी फिल्म की तरह दिमाग में चलते रहे। कभी परिसर की सुबह याद आती, कभी Kitchen में साथ काम करते लोग, कभी किसी के साथ हुई छोटी-सी बातचीत, कभी ठहाके और कभी विदाई के वे पल, जब मन कह रहा था—कुछ दिन और रुक जाते तो अच्छा होता। ऐसा लग रहा था कि हम MCVK से निकल तो आए हैं, लेकिन MCVK अभी हमारे भीतर से नहीं निकला है। और इन तमाम यादों के बीच सबसे ज्यादा अजय भैया के सत्र घूम रहे थे—उनकी बातें, उनका समझाने का अंदाज और वे तमाम characters, जो पता नहीं कहाँ-कहाँ से उनके सत्रों में चले आते थे।

विकल्प शिविर के शुरुआती दिनों का अनुभव अपने आप में मजेदार था। अजय भैया अपनी सहज शैली में समझा रहे होते और हम लोग कई बार कुछ शब्दों का अर्थ समझने की कोशिश कर रहे होते—समाधान, समृद्धि, सह-अस्तित्व, कल्पनाशीलता, प्रमाणिकता, साक्षात्कार, बोध, अनुभव… हिंदी अपनी ही थी, लेकिन कई शब्द बड़े गूढ़ लगते थे! कभी एक शब्द का अर्थ समझने बैठो तो उसके पीछे दो नए शब्द खड़े मिल जाते। मन में आता—“अजय भैया, इसका थोड़ा आसान वाला version भी है क्या?” लेकिन धीरे-धीरे वही शब्द परिचित होने लगे और उनके मायने भी खुलने लगे। तब लगा कि मुश्किल शायद शब्दों में नहीं थी; हमारी जिंदगी में इन विषयों पर बातचीत ही कितनी होती है? Career, business, target, EMI, investment और promotion की भाषा हम तुरंत समझ लेते हैं, लेकिन सुख क्या है, संबंध क्या है, विश्वास क्या है, समृद्धि किसे कहें और आखिर मनुष्य के रूप में जीना कैसे है—इन सवालों के साथ बैठने का मौका ही कहाँ मिलता है?

और फिर अजय भैया का अपना अंदाज! विषय कितना भी गंभीर हो, उसे बोझिल न होने देना शायद उनकी खासियत है। कभी भुट्टा, कभी जामगेट, कभी कब्जा, कभी बैडमिंटन, कभी हरियाणा, कभी गुजराती और कभी अचानक—“हाय मेरा लाल रंग!” पता नहीं इन दस दिनों में कितने characters आए, पूरे हॉल को गुदगुदाया और अपना संदेश देकर चले गए। कई बार लगता था कि दर्शन का सत्र चल रहा है या किसी कहानी का नया episode! लेकिन कमाल यह था कि जिस character पर हम कुछ क्षण पहले ठहाके लगा रहे होते, वही थोड़ी देर बाद जीवन की कोई बड़ी बात समझा जाता। अजय भैया रोजमर्रा की कोई घटना उठाते, उसमें कोई character डालते, सटीक उदाहरण देते और बिना किसी लाग-लपेट के बात सामने रख देते। कई बार हँसी थमते ही भीतर से आवाज आती—“अरे! ये character तो कहीं मेरे अंदर भी बैठा है…” बातें गहरी थीं, अंदाज हल्का था; किरदार अनेक थे, हँसी सबकी थी, लेकिन सवाल हर किसी का अपना था।

और सवाल भी ऐसे कि सत्र खत्म हो जाए, लेकिन सवाल खत्म न हो। हम सभी सुखी होना चाहते हैं, लेकिन सुख आखिर है क्या? हम परिवार में रहते हैं, लेकिन क्या केवल एक छत के नीचे रहना ही परिवार है? हम कहते हैं—मेरी जिंदगी, मेरी मर्जी—लेकिन क्या मनमर्जी ही स्वतंत्रता है? हम जीवन भर पैसा और सुविधाएँ जुटाते हैं, लेकिन किस बिंदु पर कह पाएँगे कि अब मैं समृद्ध हूँ? इन सवालों का असर शायद इसलिए भी ज्यादा हुआ क्योंकि MCVK में बात केवल सत्र तक सीमित नहीं रहती। सुबह कोई बात सुनिए और दिन में कहीं न कहीं जिंदगी उसका practical आपके सामने रख देती है। संबंध में विश्वास की बात करना आसान है, लेकिन सामने वाला आपकी बात से सहमत न हो तब आपका व्यवहार क्या रहता है—यह असली practical है। सहयोग की बात करना आसान है, लेकिन काम अपनी पसंद का न मिले तब मुस्कान कितनी देर रहती है—वहाँ पता चलता है। Kitchen हो, कोई सामूहिक काम हो या परिवारों के बीच सहज बातचीत—सुबह सुनी कई बातें दिन में जीवन के बीच दिखाई देने लगती थीं।

इन 21 दिनों में MCVK के परिवारों को करीब से देखने का अवसर मिला। किसी व्यवस्था को पूरी तरह समझने के लिए 21 दिन बहुत लंबा समय नहीं है। लेकिन इतना जरूर महसूस हुआ कि यहाँ साथ जीने की कोशिश केवल विचार में नहीं, व्यवहार में भी दिखाई देती है। और शायद इसी अनुभव का सबसे सुंदर उत्तर मुझे लौटते समय श्रुति से मिला। रास्ते में मैंने उससे पूछा—“तुम MCVK से क्या लेकर वापस आ रही हो?” मुझे लगा कि वह जीवन विद्या की कोई समझ, विकल्प शिविर की कोई सीख या जीवन को देखने का कोई नया नजरिया बताएगी। लेकिन उसका जवाब सिर्फ तीन शब्दों का था—“वहाँ के लोग…” मैंने पूछा, “मतलब?” उसने सहजता से कहा—“वहाँ सब लोग बहुत अच्छे हैं।” उसका छोटा-सा जवाब मुझे कुछ देर के लिए चुप कर गया। किसी जगह से लौटते हुए अगर आपको वहाँ की इमारतें और सुविधाएँ नहीं, बल्कि वहाँ के लोग सबसे ज्यादा याद आएँ, तो शायद कहीं न कहीं संबंध बन चुका होता है।

और फिर लगा—श्रुति जो कह रही है, वही तो मैं भी महसूस कर रहा हूँ। किसी एक व्यक्ति का नाम लेना यहाँ बेमानी होगा। इन 21 दिनों में MCVK परिवार के कुछ लोग इतने निकट आ गए कि उस निकटता को दिनों में मापना मुश्किल लगता है। किसी का सहज अपनापन, किसी का बिना कहे ख्याल रखना, किसी की हँसी, किसी के साथ हुई लंबी बातचीत और कभी किसी का बस पास बैठ जाना—पता ही नहीं चला कि कब कुछ चेहरे परिचित से अपने हो गए। हम अक्सर मानते हैं कि गहरे संबंध बनने में वर्षों लगते हैं, लेकिन शायद हर संबंध कैलेंडर देखकर नहीं बनता। लौटते समय कुछ चेहरे बार-बार याद आते रहे; कभी मुस्कान आती और कभी भीतर एक कसक। एक अपनापन, स्नेह, प्रेम और फिर मिलने की ऐसी इच्छा, जिसमें अलग न होने की एक मासूम-सी तड़प भी थी।

तब लगा कि शिविर में जिन विश्वास, सम्मान, स्नेह, ममता और प्रेम जैसे मूल्यों को हम शब्दों में समझने की कोशिश कर रहे थे, उनमें से कुछ शायद अनजाने में हमारे साथ घट भी रहे थे। किताब में ‘स्नेह’ पढ़ना एक बात है और किसी का स्नेह महसूस करना बिल्कुल दूसरी। ‘संबंध’ को समझना एक बात है और किसी से विदा होते समय उसके फिर मिलने की इच्छा होना दूसरी। शायद इसीलिए MCVK से विदाई किसी परिसर से बाहर निकल जाना भर नहीं लगी। कुछ लोग वहाँ रह गए थे, लेकिन उनका अपनापन, स्नेह और प्रेम हमारे साथ लखनऊ तक चला आया।

अब घर लौट आया हूँ। शहर वही है, घर वही है और दिनचर्या भी धीरे-धीरे अपनी पुरानी रफ्तार पकड़ लेगी। क्या इन 21 दिनों में जीवन के सारे जवाब मिल गए? नहीं। शायद जवाबों से ज्यादा कुछ नए सवाल साथ आए हैं। मैं MCVK से कोई certificate लेकर नहीं लौटा कि अब जीवन समझ में आ गया है। उल्टा, जिन्हें अब तक आसानी से समझा हुआ मानता था, उन्हें शायद पहली बार थोड़ा ध्यान से देखने की शुरुआत हुई है।

21 दिन पहले मैं MCVK को देखने और समझने गया था। लौटते समय महसूस हुआ—MCVK को कितना समझ पाया, यह अभी नहीं जानता, लेकिन खुद को थोड़ा और देखने की शुरुआत जरूर हो गई है। और पूरे अनुभव को बहुत कम शब्दों में समेटना हो तो श्रुति का जवाब ही सबसे सटीक है—“वहाँ के लोग…” क्योंकि शायद किसी व्यवस्था की खूबसूरती का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि वहाँ से लौटते समय जगह पीछे छूट जाए, शहर बदल जाए, दूरी बढ़ जाए… लेकिन वहाँ मिले लोग आपके भीतर साथ चले आएँ।

शायद संबंध का अर्थ भी यहीं से खुलना शुरू होता है—दूरी बढ़ जाए, लेकिन अपनापन कम न हो।

Leave a comment