हार्टफुलनेस | आधुनिक जीवन के बीच भीतर की तलाश
लेखक – मोहित धवन

दाजी से मेरी व्यक्तिगत मुलाकात कभी नहीं हुई। न ही उनसे सीधे संवाद करने का अवसर मिला है। लेकिन कमलेश डी. पटेल, जिन्हें दुनिया भर में उनके अनुयायी प्रेम से दाजी कहते हैं, उनके प्रति लोगों के मन में जो प्रेम, श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव है, उसे मैंने करीब से जरूर महसूस किया है।
करीब छह-सात माह पूर्व दाजी की गुरु-परंपरा के पूज्य लालाजी महाराज की 153वीं जन्म जयंती के अवसर पर आयोजित समारोह में मुझे उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर स्थित आश्रम में कुछ समय बिताने का अवसर मिला। देश-विदेश से आए हार्टफुलनेस के साधकों के बीच रहना और उनमें से कई से बातचीत करना मेरे लिए किसी आध्यात्मिक आयोजन को देखने भर का अनुभव नहीं था, बल्कि लोगों के जीवन में किसी विचार और साधना के प्रभाव को समझने का अवसर भी था।
अलग-अलग आयु, पेशे और देशों से आए लोगों से बातचीत में एक बात बार-बार सामने आई। कई लोगों ने बताया कि हार्टफुलनेस से जुड़ने, ध्यान को दिनचर्या का हिस्सा बनाने और इसकी शिक्षाओं को जीवन में अपनाने के बाद उन्होंने अपने भीतर बदलाव महसूस किए। किसी ने मानसिक शांति की बात की, किसी ने संबंधों में आए बदलाव की, तो किसी ने जीवन को पहले की तुलना में अधिक सहज और सुखद अनुभव करने की बात कही।
ये उनके व्यक्तिगत अनुभव थे और एक पत्रकार के रूप में मैं उन्हें उसी रूप में देखता हूँ। लेकिन अलग-अलग लोगों से एक जैसा भाव सुनने के बाद जिज्ञासा स्वाभाविक थी—
आखिर ऐसा क्या है इस विचार और साधना में, जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए लोगों को इतनी गहराई से जोड़ता है?
शायद दाजी और हार्टफुलनेस को समझने की मेरी जिज्ञासा की शुरुआत भी यहीं से होती है।
सफलता की दौड़ और भीतर का सवाल
हम जिस समय में जी रहे हैं, वहाँ सफलता की परिभाषा काफी हद तक दिखाई देने वाली उपलब्धियों से तय होने लगी है। बेहतर नौकरी, बड़ा कारोबार, अधिक आय, आलीशान घर, प्रभावशाली पद और सोशल मीडिया पर पहचान—आधुनिक जीवन लगातार हमें बाहर की ओर देखने के लिए प्रेरित करता है।
लेकिन इसी दौड़ के बीच सवाल खड़ा होता है—सब कुछ हासिल करने के बाद भी अगर मन शांत नहीं है, संबंध सहज नहीं हैं और भीतर संतुष्टि नहीं है, तो क्या उसे पूर्ण सफलता कहा जा सकता है?
यहीं दाजी एक दूसरी दिशा की ओर देखने की बात करते दिखाई देते हैं—अपने भीतर की ओर।
वर्ष 1956 में गुजरात में जन्मे कमलेश डी. पटेल ने अहमदाबाद में फार्मेसी की पढ़ाई की। छात्र जीवन में ही वे ध्यान से जुड़े। बाद में वे अमेरिका चले गए, जहाँ उन्होंने परिवार बसाया और न्यूयॉर्क में फार्मेसी का सफल व्यवसाय खड़ा किया। यानी जिस पेशेवर और भौतिक सफलता को पाने के लिए लाखों लोग प्रयास करते हैं, दाजी स्वयं उस दुनिया से होकर आए हैं।
इसके समानांतर उनकी आध्यात्मिक यात्रा चलती रही। आगे चलकर वे पार्थसारथी राजगोपालाचारी, जिन्हें चारीजी कहा जाता है, के उत्तराधिकारी बने और वर्ष 2014 के बाद श्री रामचंद्र मिशन के अध्यक्ष तथा हार्टफुलनेस परंपरा के मार्गदर्शक की जिम्मेदारी संभाली।
शायद यही पृष्ठभूमि उनके विचारों को दिलचस्प बनाती है। पेशे, कारोबार और परिवार के बीच रहते हुए उन्होंने अपनी आंतरिक यात्रा को भी आगे बढ़ाया।
बाहर की उपलब्धि, भीतर की स्थिति
दाजी के विचारों में चेतना और मनुष्य के आंतरिक विकास का प्रश्न बार-बार सामने आता है। हार्टफुलनेस में ध्यान को केवल तनाव कम करने की तकनीक नहीं, बल्कि स्वयं को समझने और चेतना के विकास की प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है।
हमने प्रगति को मापने के कई पैमाने बना लिए हैं—आय, संपत्ति, पद, कारोबार और सामाजिक प्रतिष्ठा। लेकिन मनुष्य अपने भीतर कितना सहज है, इसे मापने का हमारे पास कौन-सा पैमाना है?
उसके संबंध कैसे हैं? वह असफलता और असहमति को कैसे संभालता है? और क्या उसे यह स्पष्ट है कि जिस गति से वह दौड़ रहा है, आखिर जाना कहाँ चाहता है?
आज हमारे पास पहले से कहीं तेज संचार है, लेकिन क्या संवाद भी बेहतर हुआ है? मोबाइल में सैकड़ों संपर्क हैं, लेकिन क्या संबंध अधिक गहरे हुए हैं? जानकारी तक पहुँच लगभग असीमित है, लेकिन क्या उसी अनुपात में हमारे भीतर स्पष्टता भी बढ़ी है?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे अनेक प्रश्नों के उत्तर कुछ ही क्षणों में दे सकती है, लेकिन जीवन के कुछ सवाल अब भी हमें स्वयं से पूछने पड़ते हैं—
मैं किस दिशा में जा रहा हूँ? मुझे वास्तव में क्या चाहिए? जो कुछ मैं हासिल कर रहा हूँ, क्या वह मुझे भीतर से भी सुखी कर रहा है?
हार्टफुलनेस इसी आंतरिक यात्रा को ध्यान के माध्यम से समझने का एक रास्ता प्रस्तुत करता है। दाजी के कार्य को राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली और वर्ष 2023 में भारत सरकार ने उन्हें आध्यात्मिकता के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया।
लेकिन मेरे लिए दाजी को समझने की शुरुआत उनके पद्म भूषण या वैश्विक पहचान से नहीं हुई।
वह शाहजहाँपुर में हुई।
वहाँ अलग-अलग देशों और जीवन-पृष्ठभूमियों से आए लोगों में अपनी गुरु-परंपरा और हार्टफुलनेस के प्रति दिखाई देने वाला प्रेम और कृतज्ञता मुझे सोचने पर मजबूर करता रहा।
किसी आध्यात्मिक पद्धति के प्रभाव का आकलन शायद केवल उसके अनुयायियों की संख्या से नहीं किया जा सकता। एक कसौटी यह भी हो सकती है कि उससे जुड़ा व्यक्ति अपने जीवन, संबंधों और व्यवहार में क्या बदलाव अनुभव करता है।
आधुनिक दुनिया ने हमें आगे बढ़ना खूब सिखाया है—तेज चलना, अधिक कमाना, बड़ा सोचना और लगातार कुछ हासिल करना। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। लेकिन शायद जीवन का अगला सवाल यह होना चाहिए—
इस पूरी दौड़ में हम स्वयं कहाँ हैं?
दाजी का संदेश शायद बाहर की दुनिया को छोड़ने का नहीं, बल्कि बाहर की यात्रा के साथ भीतर की यात्रा को भी महत्व देने का है।
और शाहजहाँपुर में बिताए उस समय के बाद मेरे मन में भी एक सवाल रह गया—
क्या जीवन को थोड़ा अधिक सहज और सुखद बनाने के लिए हमें भी कभी-कभी बाहर से अपनी नजर हटाकर अपने भीतर देखने की जरूरत है?


