विकास का छलावा या विनाश का बुलावा, अपनी ही जमीन पर बेगाना होता किसान

बिशन नेहवाल
आर्थिकसामाजिक चिंतक एवं लेखक

आजकल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र हो या देश का कोई अन्य बड़ा शहर, इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, शहरीकरण और औद्योगीकरण के नाम पर नए आयाम स्थापित किए जा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की जमीनों का धड़ल्ले से अधिग्रहण किया जा रहा है। मीडिया इसे “प्रगति की नई सुबह” कह रहा है, तो अर्थशास्त्री टीवी चैनलों पर बैठकर जीडीपी के आंकड़ों में आने वाले संभावित उछाल पर तालियां बजा रहे हैं।

लेकिन इस कंक्रीट के चमकते हाईवे और धूल भरे चकबंदी के रास्तों के बीच एक ऐसा खौफनाक सच छिपा है, जिस पर कोई बात नहीं करना चाहता।

पता नहीं हम किस विकास पर गर्व कर रहे हैं? उस विकास पर, जिसने एक स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर उत्पादक—किसान—को एक लाचार, नशेड़ी और साधनहीन उपभोक्ता बना दिया? या उस विकास पर, जहां खेत की उपजाऊ मिट्टी की जगह कंक्रीट का जंगल उग आया और उस जंगल का राजा कोई बाहरी सेठ बन बैठा?

सेठ आएगा, पैसा कमाएगा और निकल जाएगा। लेकिन जो किसान अपनी माटी छोड़कर कागजी नोटों की क्षणिक चमक में अंधे हो गए हैं, उनका क्या?

यह केवल ‘विकास’ नहीं है, यह किसी भी क्षेत्र का धीमा, मीठा और नियोजित विनाश है। यह बाहरी पूंजीपति, जिसे इन्वेस्टर की संज्ञा दी जाती है—यह कोई विकास का मसीहा नहीं, बल्कि आधुनिक समय का वह शिकारी है, जो विकास के नाम पर किसी क्षेत्र की आत्मा, उसकी पहचान और वहां के मूल निवासियों के अस्तित्व को लील रहा है।

हाईवे का कट बनता है, फोर-लेन या सिक्स-लेन चौड़ी सड़कें बनती हैं और उनके साथ ही शुरू होता है एक ऐसा खेल, जिसमें जमीन का असली मालिक यानी किसान हमेशा के लिए कंगाल हो जाता है और बाहर से आया ‘सेठ’ अरबों का साम्राज्य खड़ा कर लेता है।

विकास की योजनाएं जब फाइलों में बनती हैं, तो सबसे पहले उन पर नजर पड़ती है दलालों और कॉरपोरेट इन्वेस्टर्स की। किसी भी नए हाईवे, एक्सप्रेसवे या बायपास का नक्शा पास होने से महीनों पहले ही बाहरी पूंजीपति और रसूखदार सेठ उस इलाके में उतर आते हैं। उन्हें पता होता है कि कौन-सा हिस्सा “प्राइम लोकेशन” बनने वाला है, हाईवे का कौन-सा कट किस गांव की सीमा को छुएगा।

किसान, जो पीढ़ियों से अपनी मिट्टी को सिर्फ अन्न उगाने का माध्यम समझता आया है, उसे इस बाजारीकरण की हवा तक नहीं होती। सेठ आते हैं, पैसे की चमक दिखाते हैं और औने-पौने दामों में हाईवे के किनारे की बहुमूल्य जमीनें—लैंड पार्सल—हड़प लेते हैं।

नीति आयोग और राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में आधारभूत संरचना के विकास के बाद निर्मित 70 प्रतिशत से अधिक व्यावसायिक भूमि पर स्थानीय लोगों का कोई नियंत्रण नहीं रहता। यह पूरी तरह से बाहरी कॉरपोरेट्स और रियल एस्टेट माफिया के कब्जे में चली जाती है।

किसान को जिस जमीन का मुआवजा 20-30 लाख रुपये बीघा या एकड़ मिलता है, वही जमीन हाईवे बनते ही 2 करोड़ से 5 करोड़ रुपये बीघा हो जाती है। किसान को लगता है कि उसे बहुत बड़ा खजाना मिल गया, लेकिन वास्तव में वह अपनी आने वाली दस पीढ़ियों की संपत्ति को कौड़ियों के भाव बेच चुका होता है।

हाईवे के किनारे बड़े-बड़े लैंड पार्सल, फाइव स्टार होटल, मॉल, प्राइवेट अस्पताल और वेयरहाउस इन्हीं पूंजीपतियों के पास होते हैं। और मूल निवासी अपनी ही पैतृक जमीन की चारदीवारी के बाहर ठेला लगाने या उसी सेठ के मॉल में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करने के लिए मजबूर कर दिया जाता है।

मुआवजा आते ही बदलने लगता है बाजार

जमीन अधिग्रहण के साथ केवल भूगोल नहीं बदलता, समाज की जनसांख्यिकी और उसकी मानसिकता भी बदलती है। जैसे ही किसी क्षेत्र में अधिग्रहण का मुआवजा बंटना शुरू होता है, उस इलाके के बाजारों का परिदृश्य रातों-रात बदल जाता है।

जहां कभी खाद, बीज और खेती के औजारों की दुकानें हुआ करती थीं, वहां अचानक चमकते हुए गाड़ियों के शोरूम खुल जाते हैं। हाई-एंड शराब के ठेके, मॉडल शॉप और बार आ जाते हैं। महंगे रेस्टोरेंट और हुक्का बार गली-गली में उग आते हैं।

यह कोई इत्तेफाक नहीं है। यह एक सोची-समझी बाजारी रणनीति है।

पूंजीवादी व्यवस्था जानती है कि जिस किसान के हाथ में अचानक जीवन में पहली बार करोड़ों रुपये का कैश आया है, उसकी वित्तीय साक्षरता—फाइनेंशियल लिटरेसी—शून्य के बराबर है। उसने कभी इतने पैसे एक साथ नहीं देखे।

मार्केटिंग की यह गिद्ध संस्कृति किसान के उसी मनोविज्ञान पर हमला करती है। शराब के ठेके गांव के पास इसलिए नहीं खुलते कि वहां विकास हुआ है, बल्कि इसलिए खुलते हैं क्योंकि वहां मुआवजे का वह ‘आसान पैसा’ बह रहा है, जिसे निचोड़ना पूंजीपतियों का मुख्य लक्ष्य है।

करोड़ों का मुआवजा और चकाचौंध

जब एक किसान के बैंक खाते में अचानक 1 करोड़, 2 करोड़ या 5 करोड़ रुपये आते हैं, तो एक अंधी चकाचौंध पैदा होती है। यह पैसा मेहनत से कमाया हुआ नहीं, बल्कि मिट्टी बेचने से आया पैसा है। इसलिए इसकी उम्र बहुत छोटी होती है।

एक आम किसान परिवार को जब मुआवजे का पैसा मिलता है, तो उसका पहला निवेश दिखावे की दीवारें और लोहे का हाथी होता है। सबसे पहले पुराना पक्का या कच्चा मकान तोड़ा जाता है। उसकी जगह एक विशाल, बेढंगा और अति-आधुनिक मकान खड़ा किया जाता है। उसमें लाखों के झूमर और टाइल्स लगती हैं।

इसके तुरंत बाद दरवाजे पर खड़ी होती है एक बड़ी, चमचमाती लग्जरी कार। कार चलाने का हुनर आए न आए, लेकिन आसपास में धाक जमाने के लिए बड़ी गाड़ी जरूरी है।

जिस किसान ने पूरी जिंदगी बाजरे की रोटी, छाछ और खेतों में बहाए पसीने के बीच गुजारी थी, अचानक उसके हाथ में असीमित पैसा आ जाता है। दोस्तों की मंडली जमने लगती है। शामें महंगे रेस्टोरेंटों में बीतने लगती हैं। देसी की जगह महंगी अंग्रेजी शराब ले लेती है।

जब थोड़ा होश आता है कि खेती के बिना जीवन कैसे चलेगा, तो किसान आसपास के क्षेत्रों में जमीन तलाशने निकलता है। लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है।

बाहरी निवेशकों और सट्टेबाजों ने आसपास की बची-कुची जमीनों के दाम भी चार से पांच गुना बढ़ा दिए होते हैं। किसान जिस जमीन को 10-20 लाख में बेचकर हटा था, वही जमीन अब उसे 50 लाख में भी नहीं मिलती। लाचार होकर वह एक छोटा-मोटा, अनुत्पादक प्लॉट खरीदकर संतोष कर लेता है।

क्या यह केवल एक काल्पनिक कहानी है?

यह कोई काल्पनिक कहानी या केवल एक भावना नहीं है। अगर आप भारत के किसी भी ऐसे क्षेत्र का अध्ययन करें, जहां बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हुआ है—चाहे वह ग्रेटर नोएडा का यमुना एक्सप्रेसवे हो, हरियाणा का गुड़गांव-मानेसर बेल्ट हो, गुजरात का धोलेरा हो या फिर महाराष्ट्र का समृद्धि महामार्ग—हर जगह की कहानी लगभग एक जैसी दिखाई देती है।

अधिग्रहीत भूमि के मुआवजे का अध्ययन करने वाले विभिन्न स्वतंत्र शोध बताते हैं कि 90 से 95 प्रतिशत किसान अपने मुआवजे की रकम को अगले 5 से 8 वर्षों के भीतर पूरी तरह से गैर-उत्पादक संपत्तियों जैसे गाड़ी, मकान, शादियों के दिखावे, शराब और अय्याशी में गंवा देते हैं।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के वित्तीय समावेशन आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण भारत में केवल 2 से 3 प्रतिशत लोगों को ही इक्विटी, म्यूचुअल फंड या सुरक्षित दीर्घकालिक निवेश की समझ है।

यमुना एक्सप्रेसवे और दिल्ली-एनसीआर के आसपास के क्षेत्रों पर हुए कई समाजशास्त्रीय अध्ययनों में यह बात सामने आई कि मुआवजा मिलने के पांच साल बाद उन गांवों में गृह-कलह, संपत्ति विवाद, हत्या और युवाओं में ड्रग्स/शराब की लत के मामलों में 40 से 60 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

मुश्किल से 5 प्रतिशत किसान ऐसे होते हैं, जो समझदारी दिखाते हैं। वे मुआवजे के पैसे से किसी दूर-दराज के इलाके में उतनी ही या उससे ज्यादा उपजाऊ जमीन खरीद लेते हैं या कोई बड़ा, टिकाऊ व्यवसाय शुरू कर लेते हैं। बाकी 95 प्रतिशत लोग अपनी ही आंखों के सामने अपनी भावी पीढ़ियों का भविष्य स्वाहा कर देते हैं।

आखिर किसान के पास बचता क्या है?

यह व्यवस्था इतनी शातिर है कि यह पहले किसान से उसकी जीविका का साधन—उसकी ‘जमीन’—छीनती है। फिर उसे ‘मुआवजे’ का झुनझुना थमाती है। उसके बाद अपने ही बनाए गए बाजार—शोरूम, शराब के ठेके, मॉल—के जरिए वह सारा मुआवजा किसान की जेब से निकालकर वापस पूंजीपति की तिजोरी में डाल देती है।

अंत में किसान के पास क्या बचता है?

एक बड़ी गाड़ी, जिसकी री-सेल वैल्यू पांच साल बाद कौड़ियों की हो जाती है। एक बड़ा मकान, जिसकी मरम्मत कराने के लिए उसके पास पैसे नहीं होते। और एक बेरोजगार, दिशाहीन नई पीढ़ी, जो न खेती के लायक बची, न पढ़ाई के और न ही किसी व्यापार के।

अगर यही मॉडल चलता रहा, तो आने वाले कुछ दशकों में ग्रामीण भारत का अस्तित्व केवल इतिहास की किताबों में रह जाएगा।

इन्वेस्टर समृद्ध होगा, उसकी बैलेंस शीट अरबों में होगी। हाईवे पर सरपट दौड़ती गाड़ियों की रफ्तार देश की तरक्की का ढोल पीटेगी। लेकिन उस हाईवे के दोनों तरफ, रोशनी से जगमगाते ढाबों और शोरूमों के ठीक पीछे, अंधेरे में डूबे वे गांव होंगे, जहां के मूल निवासी अपनी ही जमीन पर बेगाने हो चुके होंगे।

यदि सरकारें और नीति निर्माता केवल ‘भूमि अधिग्रहण’ और ‘इन्वेस्टमेंट’ के आंकड़ों पर अपनी पीठ थपथपाते रहे और मुआवजे के साथ-साथ स्थानीय लोगों के पुनर्वास, वित्तीय साक्षरता और उनकी परिसंपत्तियों की सुरक्षा का कोई ठोस ढांचा नहीं बनाया, तो यह कंक्रीट का विकास भारत के ग्रामीण ढांचे की चिता पर ही खड़ा होगा।


लेखक परिचय

बिशन नेहवाल आर्थिक-सामाजिक चिंतक एवं लेखक हैं। भारतीय कृषि, अर्थव्यवस्था, ग्रामीण समाज और किसानों के अधिकारों से जुड़े विषय उनके लेखन के केंद्र में रहे हैं। वे समसामयिक आर्थिक-सामाजिक मुद्दों पर विभिन्न हिंदी समाचार पत्रों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए वैचारिक लेख लिखते रहे हैं। वरिष्ठ राजनेता के.सी. त्यागी के साथ भी उनके कई वैचारिक लेख सह-लेखक के रूप में प्रकाशित हुए हैं।

संपादकीय टिप्पणी

विकास की चमक के पीछे छूटते किसान, भूमि के बदलते अर्थ और ग्रामीण समाज के भविष्य पर गंभीर सवाल उठाता यह विचारोत्तेजक लेख हमें अमित जैन के माध्यम से प्राप्त हुआ।

अमित जैन पिछले दो वर्षों से अपने परिवार के साथ MCVK, इंदौर से जुड़े हुए हैं। पेशे से वे सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और जर्मनी व अमेरिका में भी काम कर चुके हैं। ऑर्गेनिक फार्मिंग में उनकी हमेशा से गहरी रुचि रही है। प्रकृति के करीब रहकर और उसके साथ सामंजस्य में जीवन जीने की इसी चाह ने उन्हें विदेश की चमक-दमक छोड़कर वापस भारत 🇮🇳 लौटने के लिए प्रेरित किया।

भूमि, किसान और विकास को देखने का यह नजरिया कई असहज लेकिन जरूरी सवाल हमारे सामने रखता है। जरूरी नहीं कि पाठक लेख में व्यक्त हर निष्कर्ष से सहमत हो, लेकिन विकास की किसी भी यात्रा में उस किसान के भविष्य पर चर्चा जरूर होनी चाहिए, जिसकी जमीन पर उस विकास की नींव रखी गई है।

बिशन नेहवाल जी के प्रति साभार, यह लेख पाठकों के लिए प्रस्तुत है।

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