आख़िर हमें आज़ादी किससे चाहिए?

लेखक ✍️ – अमित जैन
इंदौर, 16 अगस्त 2026

कल पूरे देश ने 80वाँ स्वतंत्रता दिवस पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाया। जगह-जगह तिरंगा फहराया गया, देशभक्ति के गीत गूँजे और विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया गया और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई।

लेकिन इन सबके बीच मन में एक सवाल बार-बार उठता रहा—क्या देश के स्वतंत्र हो जाने भर से मनुष्य भी भीतर से स्वतंत्र हो गया?

एक समय था जब आज़ादी का अर्थ विदेशी शासन से मुक्ति था। देश ने लंबा संघर्ष किया, असंख्य लोगों ने बलिदान दिए और अंततः हमें राजनीतिक स्वतंत्रता मिली। लेकिन आज, स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद, शायद समय आ गया है कि हम आज़ादी के अर्थ को अपने भीतर भी तलाशें।

“हम लेकर रहेंगे आज़ादी!” का स्वर जब आज सुनाई देता है तो स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है—आख़िर आज़ादी किससे? और आज हम किसके ग़ुलाम हैं?

मध्यस्थ दर्शन यानी जीवन विद्या के प्रकाश में इस प्रश्न को देखें तो आज हमारे ऊपर किसी विदेशी सत्ता का शासन नहीं है, लेकिन हमारे निर्णय, हमारा सुख-दुःख और हमारा व्यवहार आज भी कई ऐसी चीज़ों से संचालित होता है, जिन्हें हमने ठीक से समझा ही नहीं है।

कहीं हम सुनी-सुनाई मान्यताओं के आधार पर जीवन जी रहे हैं, कहीं धन, पद, प्रतिष्ठा और सुविधाओं को सफलता का अंतिम पैमाना मान बैठे हैं। कहीं अहंकार हमें अपनी बात पर अड़े रहने के लिए मजबूर करता है, तो कहीं भविष्य का भय और कुछ खो देने की आशंका हमें लगातार असुरक्षित बनाए रखती है।

ज़रा सोचिए—यदि किसी दूसरे व्यक्ति का व्यवहार यह तय कर सकता है कि मैं खुश रहूँगा या दुखी, शांत रहूँगा या क्रोधित, तो मेरी स्वतंत्रता कहाँ है?

यहीं से स्वतंत्रता का एक नया अर्थ सामने आता है।

जीवन विद्या में स्वतंत्रता को केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति के रूप में नहीं, बल्कि ‘स्व-तंत्र’ होने के रूप में देखा जाता है। अर्थात ऐसा जीवन, जिसमें व्यक्ति अपने विवेक, सही समझ और मानवीय मूल्यों के आधार पर निर्णय ले सके।

यह आज़ादी किसी आंदोलन से नहीं मिलती और न ही इसे किसी दूसरे से छीना जा सकता है। इसकी यात्रा स्वयं के भीतर से शुरू होती है।

जब मनुष्य अपने जीवन से जुड़े मूल प्रश्नों—मैं कौन हूँ, मुझे वास्तव में चाहिए क्या, सुख क्या है, संबंधों में मेरी भूमिका क्या है और प्रकृति के साथ मेरा संबंध कैसा होना चाहिए—के उत्तर खोजने और समझने लगता है, तब धीरे-धीरे भ्रम की जगह स्पष्टता आने लगती है।

शरीर और उसकी सुविधाएँ जीवन के लिए आवश्यक हैं, लेकिन यदि पूरा जीवन केवल रूप, धन, पद, भोग और संग्रह के इर्द-गिर्द घूमने लगे, तो मनुष्य अनजाने में इन्हीं का आश्रित बन जाता है। इसके विपरीत, जब जीवन में विश्वास, सम्मान, स्नेह, जिम्मेदारी और न्याय जैसे मानवीय मूल्यों की पहचान होने लगती है, तब जीवन केवल सुविधा-केंद्रित न रहकर समझ-केंद्रित होने लगता है।

जीवन विद्या इसी अवस्था को समाधान की दिशा में बढ़ना मानती है—जहाँ जीवन के ‘क्या’, ‘क्यों’ और ‘कैसे’ को लेकर स्पष्टता बढ़ती जाती है।

शायद स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाने के साथ हमें एक और संकल्प की आवश्यकता है।

देश को मिली स्वतंत्रता हमारे पूर्वजों के संघर्ष और बलिदान की देन है। अब अगली यात्रा हमें स्वयं करनी है—अपने भीतर के भय, भ्रम, अहंकार और अज्ञान से स्वतंत्र होने की यात्रा।

वास्तविक स्वतंत्रता शायद वहीं से शुरू होती है, जहाँ हमारा सुख किसी दूसरे के व्यवहार का मोहताज नहीं रहता; जहाँ परिवार में संबंध विश्वास पर टिके हों, समाज में मनुष्य मनुष्य से भयभीत न हो और प्रकृति हमारे उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का हिस्सा दिखाई दे।

मध्यस्थ दर्शन इस स्थिति को व्यापक रूप में देखता है—व्यक्ति में समाधान, परिवार में समृद्धि, समाज में अभय और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व।

कल हमने पूरे उत्साह से देश की आज़ादी का उत्सव मनाया। आज शायद स्वयं से एक सवाल पूछने का दिन है—

देश तो आज़ाद है…क्या हम भी वास्तव में आज़ाद हैं?

लेखक परिचय

अमित जैन पिछले दो वर्षों से अपने परिवार के साथ MCVK, इंदौर से जुड़े हुए हैं। पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर अमित जर्मनी और अमेरिका में भी काम कर चुके हैं। ऑर्गेनिक फार्मिंग और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन में उनकी हमेशा से गहरी रुचि रही है। प्रकृति के करीब रहकर एक सहज और संतुलित जीवन जीने की इसी चाह ने उन्हें विदेश की चमक-दमक छोड़कर वापस भारत 🇮🇳 लौटने के लिए प्रेरित किया।

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