✍️ मोहित धवन
लखनऊ, 25 सितंबर 2026
गणेश उत्सव के पिछले कुछ दिनों को बहुत करीब से देखने का मौका मिला। अब बप्पा की विदाई के बाद, उन तस्वीरों को पलटते हुए कुछ सवाल मन में ठहर गए हैं।
कहीं विशाल पंडाल सजे थे, कहीं छोटी-सी प्रतिमा के सामने पूरा परिवार बैठा था। कहीं बच्चे बप्पा को चिट्ठियां लिख रहे थे, कहीं मोदक चढ़ रहे थे। शाम होते ही आरती, भजन और ढोल के बीच शहर जैसे कुछ देर के लिए अपनी रोजमर्रा की भागदौड़ भूल जाता था।
कहीं तीन दिन में, कहीं पांच, सात या दस दिनों बाद बप्पा विदा हो गए। पंडाल सिमट गए, ढोल की आवाज़ थम गई और शहर फिर अपनी रोजमर्रा की रफ्तार में लौटने लगा।
“गणपति बप्पा मोरया… अगले बरस तू जल्दी आ…”
इस आवाज़ में उत्साह भी था और विदाई की हल्की-सी उदासी भी।
इन दिनों यह सब देखते हुए मेरे मन में एक सवाल बार-बार आया—हम बप्पा को इतने प्रेम से बुलाते हैं और फिर उनका विसर्जन क्यों करते हैं?
खासकर उत्तर भारत में कुछ लोगों के मन में यह सवाल स्वाभाविक हो सकता है। जिन्हें हम अपना मानते हैं, घर लाते हैं, सुबह-शाम उनके सामने बैठते हैं, फिर कुछ दिनों बाद उनकी विदाई क्यों?
इसकी धार्मिक और पारंपरिक व्याख्याएं अपनी जगह हैं। मुझे लगा, शायद इसका एक अर्थ अपने जीने में भी खोजा जा सकता है।
मिट्टी से एक स्वरूप बनता है। हम उससे जुड़ते हैं, उसे सजाते हैं, उसके सामने अपनी बातें रखते हैं और कुछ दिनों बाद वही स्वरूप फिर प्रकृति में लौट जाता है।
तो क्या स्थायी प्रतिमा नहीं, उससे जुड़ा भाव और उससे मिली समझ है?
यहीं मुझे मध्यस्थ दर्शन में समझी एक बात याद आती है—“श्रेष्ठ आचरण का अनुकरण ही पूजा है।”
मेरे लिए यह छोटी-सी बात पूजा को देखने का एक नया रास्ता खोलती है।
गणेश जी को हम बुद्धि और विवेक से जोड़कर देखते हैं। उन्हें देखते हुए मेरे मन में यह सवाल भी आया कि यह विवेक हमारे अपने जीने में कहां दिखाई देता है?
उन्हें विघ्नहर्ता कहते हुए एक और सवाल उठा—जिन विघ्नों को हम दूर करने की प्रार्थना करते हैं, उनमें से कुछ कहीं हमारे अपने भीतर तो नहीं?
ये किसी निष्कर्ष की तरह नहीं हैं। बस वे सवाल हैं जो इस उत्सव के बीच मेरे भीतर उठे।
मध्यस्थ दर्शन में एक और बात मुझे छूती है—सह-अस्तित्व। यानी हम अकेले नहीं हैं; हमारा होना संबंधों और प्रकृति से जुड़ा है।
इन दिनों पंडालों के आसपास इसका एक छोटा-सा रूप भी दिखाई दिया। कोई प्रतिमा बना रहा था, कोई सजावट में लगा था, कोई प्रसाद बांट रहा था, तो कोई व्यवस्था संभाल रहा था। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं, युवा—अलग-अलग लोग किसी एक भाव के आसपास साथ दिखाई दिए।
शायद उत्सव की खूबसूरती भी यहीं है—कुछ समय के लिए ‘मैं’ थोड़ा पीछे होता है और ‘हम’ सामने दिखाई देने लगता है।
अब विसर्जन हो चुका है। पंडाल हटने लगे हैं, रोशनियां उतर गई हैं और ढोल की आवाज़ भी धीरे-धीरे थम गई है।
लेकिन शायद एक सवाल अभी भी वहीं है—
इन दिनों में जो महसूस किया, उसमें से कितना हमारे साथ आया?
जरूरी नहीं कि इसका कोई बहुत बड़ा उत्तर मिले। लेकिन अगर इन दिनों की कोई छोटी-सी अनुभूति हमारे रिश्तों, हमारे फैसलों या प्रकृति को देखने के ढंग में कहीं ठहर जाए, तो शायद उत्सव हमारे भीतर भी थोड़ा-सा बचा रहता है।
तब विसर्जन केवल विदाई नहीं रह जाता।
बप्पा विदा हो गए हैं। मिट्टी का स्वरूप प्रकृति में लौट गया। लेकिन उससे जुड़ा कोई भाव, कोई सवाल या शायद कोई छोटी-सी समझ हमारे भीतर रह गई हो—तो संभव है उत्सव अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
अगले बरस जब बप्पा फिर आएं, शायद यही देखना दिलचस्प होगा कि इस बार के उत्सव से हमारे भीतर कुछ बचा भी था या नहीं।
मेरे लिए इस बार के गणेश उत्सव का शायद यही सबसे सुंदर प्रसाद है।