✍️ मोहित धवन
लखनऊ, 26 सितंबर 2026
आज इंटरनेट पर प्रभाष जोशी का ‘कागद कारे’ तलाशते हुए अचानक वे रविवार याद आ गए, जब जनसत्ता का इंतजार हुआ करता था। जहां मैं रहता था, वहां अख़बार आसानी से नहीं मिलता था। कई बार उसे पाने के लिए ऑटो या रिक्शे में दस रुपये खर्च कर देता था। वजह थी—रविवार को छपने वाला ‘कागद कारे’ पढ़ना है।
आज वह दस रुपये वाली बात छोटी लग सकती है, लेकिन शायद किसी लेखक के प्रति पाठक की बेचैनी का अपना हिसाब होता है।
प्रभाष जोशी को पढ़ने का आकर्षण उनकी बात कहने की शैली में था। वे अपने किसी अनुभव, मुलाकात, क्रिकेट के प्रसंग या रोजमर्रा की छोटी-सी घटना से बात शुरू करते। भाषा ऐसी होती जैसे कोई सामने बैठकर बतिया रहा हो। पढ़ते-पढ़ते वही सामान्य-सा किस्सा कब समाज, राजनीति या अपने समय के किसी गंभीर सवाल तक पहुंच जाता, पता ही नहीं चलता था। एक बार शुरू किया तो पूरा पढ़े बिना छोड़ना मुश्किल होता।
प्रभाष जोशी हिंदी पत्रकारिता के उन संपादकों में रहे जिन्होंने अख़बार की भाषा को अपनी अलग पहचान दी। मध्य प्रदेश में जन्मे जोशी 1983 में शुरू हुए जनसत्ता के संस्थापक संपादक थे। गांधी उनके चिंतन में रहे, क्रिकेट उनके लेखन का प्रिय विषय था और राजनीति तथा समाज पर उनकी अपनी स्पष्ट दृष्टि थी। बोलचाल और देशज शब्दों को संपादकीय गंभीरता के साथ बरतने की उनकी शैली ने हिंदी पत्रकारिता में अलग जगह बनाई। 1992 में शुरू हुआ ‘कागद कारे’ आगे चलकर उनकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।
उस स्तंभ की शुरुआत भी दिलचस्प थी। 5 अप्रैल 1992 को पहले ‘कागद कारे’ में उन्होंने क्रिकेट के ‘कोकाकोलाकरण’ की बात उठाई। क्रिकेट उनके लिए केवल स्कोर, हार और जीत नहीं था। खेल के साथ बढ़ता बाजार भी उनकी निगाह में था। ‘कोकाकोलाकरण’ जैसा एक शब्द उस बदलाव की तरफ इशारा कर रहा था, जो आने वाले वर्षों में कहीं ज्यादा बड़ा दिखाई देने वाला था। आज के क्रिकेट को देखते हुए उस समय उठाई गई बात को फिर पढ़ना अपने आप में दिलचस्प अनुभव है।
शायद प्रभाष जोशी को इतने वर्षों तक पढ़ने का कुछ असर मेरे अपने पत्रकारिता लेखन पर भी रहा। मेरे भीतर यह बात कहीं बैठ गई कि पाठक से रिश्ता बने बिना बात उसके भीतर तक नहीं पहुंचती। इसीलिए किसी बड़ी घटना के बीच खड़ा सामान्य आदमी, बाजार की कोई पुरानी दुकान, रास्ते में हुई बातचीत या किसी व्यक्ति का छोटा-सा अनुभव मुझे अक्सर लिखने की वजह देता है।
यह प्रभाष जोशी जैसा लिख पाने का दावा नहीं है। इतना जरूर है कि उन्हें पढ़ते हुए लेखन को देखने का एक तरीका मिला।
आज ‘कागद कारे’ ऑनलाइन खोजते हुए यह भी लगा कि इन वर्षों में पत्रकारिता की दुनिया कितनी बदल गई है। तब अख़बार के लिए अगली सुबह का इंतजार था; अब खबर घटना के साथ स्क्रीन पर है। पाठक की चिट्ठी की जगह तत्काल प्रतिक्रिया ने ले ली है और अख़बार के पन्नों से निकलकर पत्रकारिता वेबसाइट, यूट्यूब और सोशल मीडिया तक फैल गई है।
इसी बदलाव के बीच एक सवाल मन में आया—
प्रभाष जोशी होते तो आज की पत्रकारिता को कैसे देखते?
शायद उन्हें यह दुनिया दिलचस्प लगती, जहां किसी लेखक को अपनी बात कहने के लिए हमेशा अख़बार के पन्ने की जरूरत नहीं। लेकिन खबर की रफ्तार, वायरल होने की होड़, बदलती भाषा और पाठक के घटते ठहराव को वे किस नजर से देखते—यह जानना और भी दिलचस्प होता।
उनकी ओर से इसका जवाब देना ठीक नहीं होगा।
आज उन्हें याद करते हुए मेरे सामने किसी बड़े संपादक की कुर्सी नहीं, एक पुरानी-सी तस्वीर उभरती है—रविवार का दिन, हाथ में जनसत्ता और उसमें खुला ‘कागद कारे’।
तब उसे तलाशने के लिए घर से निकलना पड़ता था।
आज स्क्रीन पर तलाश रहा हूं।
बीच में तीन दशक से ज्यादा का समय गुजर गया है।
शायद कुछ अच्छे लेख समय के साथ पुराने हो जाते हैं, लेकिन उन्हें पढ़ने की वजह पुरानी नहीं होती।