गांधी-मार्ग से मोदी-मार्ग तक… आखिर इस नए रास्ते की पहचान क्या है?

✍️ मोहित धवन
28 सितंबर 2026

कभी-कभी किसी सार्वजनिक मंच से निकला एक शब्द अपने पीछे पूरी बहस छोड़ जाता है।

वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय के 80 वर्ष पूरे होने पर दिल्ली में उनके जीवन और पत्रकारिता पर केंद्रित पुस्तक ‘अस्सी के राय साहब’ का विमोचन हुआ। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित कई प्रमुख लोग इस अवसर पर उपस्थित थे। अपनी बात समाप्त करते हुए राय साहब ने कहा—

“मैं अपनी बात समाप्त करने से पहले यह कहना चाहता हूँ कि आज भारत मोदी-मार्ग पर है। गांधी-मार्ग से स्वाधीन संग्राम की यात्रा प्रारम्भ हुई थी। मोदी-मार्ग और गांधी-मार्ग जहाँ मिलते हैं और जो मिलाता है उनका 110वाँ जन्मदिवस, पंडित दीनदयाल उपाध्याय का, आज है।”

यह वक्तव्य पढ़ते हुए मैं एक शब्द पर ठहर गया—

‘मोदी-मार्ग’।

राम बहादुर राय लंबे समय से भारतीय राजनीति और समाज को करीब से देखते-लिखते आए हैं। विद्यार्थी परिषद से उनकी सक्रियता शुरू हुई, जेपी आंदोलन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद में पत्रकारिता उनकी मुख्य पहचान बनी। गांधी, जयप्रकाश नारायण और दीनदयाल उपाध्याय जैसे अलग-अलग वैचारिक स्रोत उनके सार्वजनिक चिंतन और लेखन में आते रहे हैं।

इसलिए उनके द्वारा ‘मोदी-मार्ग’ शब्द का प्रयोग सामान्य राजनीतिक विशेषण की तरह छोड़ देने के बजाय शायद उसे समझने की कोशिश होनी चाहिए।

गांधी-मार्ग क्या है, इसकी एक तस्वीर हमारे भीतर पहले से मौजूद है।

सत्य और अहिंसा से आगे बढ़ें तो स्वराज, स्वदेशी, ग्राम स्वराज, आत्मनिर्भरता, अंतिम व्यक्ति और सत्ता का विकेंद्रीकरण जैसे कई सूत्र सामने आते हैं। गांधी ने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की बात नहीं की थी; उनके सामने यह प्रश्न भी था कि स्वतंत्र भारत में समाज और सत्ता का रिश्ता कैसा होगा।

लेकिन अगर आज की भारत-यात्रा को ‘मोदी-मार्ग’ कहा जाए, तो उसकी पहचान किन सूत्रों से होगी?

क्या आत्मनिर्भर भारत इसका एक सूत्र है?

क्या स्वच्छता को जन आंदोलन बनाने की कोशिश, डिजिटल तकनीक के माध्यम से शासन को सीधे नागरिक तक पहुंचाना, बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे का निर्माण और कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार इसकी पहचान हैं?

क्या भारत की सांस्कृतिक पहचान को सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाना भी इसका हिस्सा है?

या फिर मजबूत केंद्रीय नेतृत्व और निर्णायक शासन इसका प्रमुख तत्व है?

संभव है कि इनमें से कुछ बातें ‘मोदी-मार्ग’ में हों और कुछ न हों। क्योंकि राय साहब ने अभी इस शब्द की कोई विस्तृत परिभाषा हमारे सामने नहीं रखी है।

लेकिन उनके वक्तव्य में एक और बात शायद इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।

उन्होंने गांधी और मोदी के बीच पंडित दीनदयाल उपाध्याय को रखा है।

यहीं यह वाक्य राजनीतिक टिप्पणी से आगे बढ़कर वैचारिक जिज्ञासा पैदा करता है।

गांधी के चिंतन में ग्राम स्वराज और अंतिम व्यक्ति की चिंता दिखाई देती है। दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद में मनुष्य को केवल आर्थिक इकाई मानने के बजाय उसके समग्र अस्तित्व को देखने की बात आती है। अंत्योदय का विचार भी भारतीय राजनीतिक विमर्श में दीनदयाल से गहराई से जुड़ा।

नरेंद्र मोदी के शासन में भी अंत्योदय, आत्मनिर्भरता, जनभागीदारी, स्वच्छता, तकनीक और कल्याणकारी योजनाओं जैसे शब्द बार-बार सामने आते रहे हैं।

तो क्या राय साहब इन्हीं में कोई साझा सूत्र देख रहे हैं?

शायद।

लेकिन यहीं एक दूसरा सवाल भी जरूरी है।

गांधी का ग्राम स्वराज सत्ता को नीचे तक पहुंचाने की बात करता था। आज के भारत में एक तरफ पंचायतें और स्थानीय निकाय हैं, तो दूसरी तरफ तकनीक ने केंद्र और नागरिक के बीच सीधा रिश्ता भी बनाया है।

दिलचस्प बात यह है कि जिस कार्यक्रम में राय साहब ने ‘मोदी-मार्ग’ की बात कही, उसी अवसर पर उन्होंने संविधान के 73वें और 74वें संशोधनों तथा सत्ता के विकेंद्रीकरण की समीक्षा की आवश्यकता भी उठाई।

इसलिए संभव है कि उनके लिए गांधी-मार्ग से मोदी-मार्ग की यात्रा केवल नेतृत्व परिवर्तन की कहानी न हो, बल्कि बदलते भारत में सत्ता, समाज और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने के तरीकों को समझने का प्रश्न भी हो।

और शायद यहीं ‘मोदी-मार्ग’ पर गंभीर चर्चा की गुंजाइश बनती है।

किसी दौर को किसी व्यक्ति के नाम से जोड़ देना आसान है। लेकिन उसे ‘मार्ग’ कहना बड़ी बात है।

क्योंकि मार्ग केवल यह नहीं बताता कि नेतृत्व कौन कर रहा है। वह यह भी बताता है कि मंजिल क्या है, वहां पहुंचने के साधन क्या हैं और उस यात्रा में समाज की भूमिका क्या है।

इसीलिए राम बहादुर राय का यह एक शब्द मेरे लिए किसी निष्कर्ष से ज्यादा एक प्रश्न बन गया है।

गांधी-मार्ग को अगर एक पंक्ति में ‘ग्राम स्वराज’ जैसे सूत्र से समझने की कोशिश की जा सकती है, तो ‘मोदी-मार्ग’ को आने वाली पीढ़ियां किस एक सूत्र से समझेंगी?

शायद इस प्रश्न का उत्तर अभी लिखा जाना बाकी है।

और संभव है, जिस व्यक्ति ने सार्वजनिक विमर्श में यह शब्द रखा है, वही कभी इसे सबसे बेहतर ढंग से विस्तार भी दे।

शायद एक लेख में।

या फिर एक पूरी पुस्तक में—

‘मोदी-मार्ग’।

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