इंदौर, 19 अगस्त 2026।

मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में आज सुबह आयोजित कक्षा में संस्थापक सदस्य वर्षा दायमा ने मनुष्य, संबंध, न्याय, स्वतंत्रता और जागृति को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें साझा कीं।
उन्होंने कहा कि मूल रूप में हर मनुष्य सभी का भला ही चाहता है। कोई भी व्यक्ति भीतर से यह नहीं चाहता कि उसके कारण किसी का अहित हो। लेकिन जब वह अपनी इस चाहत को व्यवहार में उतारने जाता है तो सही समझ के अभाव में कई बार परिणाम उलटा हो जाता है। समस्या मनुष्य की मूल चाहत में नहीं, बल्कि उसे सही ढंग से क्रियान्वित करने की समझ में है।
वर्षा दायमा ने बच्चे के सहज प्रेम का उदाहरण देते हुए कहा कि जब एक बच्चा किसी से प्रेम करता है तो उसका प्रेम पूरी तरह सहज और निर्मल होता है। उसमें न द्वेष होता है, न ईर्ष्या, न छल और न कपट। यही सहजता मनुष्य के मूल स्वभाव की ओर संकेत करती है।
जब मनुष्य स्वयं को सबसे पहले ‘मानव’ के रूप में देखना शुरू करता है और सामने वाले को भी अपने ही समान एक मानव के रूप में पहचानता है, तब उसकी दृष्टि में बड़ा परिवर्तन आता है।
जैसे ही यह दृष्टि हमारे भीतर जागृत होती है, जाति-पाति, ईर्ष्या, द्वेष, भेदभाव और ऊंच-नीच जैसी दीवारें स्वतः समाप्त होने लगती हैं। तब सामने वाला किसी जाति, वर्ग, पद या पहचान का प्रतिनिधि न होकर सबसे पहले हमारे जैसा ही एक मनुष्य दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि अस्तित्व में प्रत्येक इकाई का दूसरी इकाइयों के साथ कोई न कोई संबंध है। चाहे पदार्थ हो, जीव हो या मनुष्य—सब परस्पर संबंध में हैं। मनुष्य के साथ अपने संबंध को पहचानना और उसका न्यायपूर्वक निर्वाह करना जागृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मनुष्य जब स्वयं में दृष्टा होकर वास्तविकता को समझने लगता है, तभी वह दूसरे के साथ न्यायपूर्ण ढंग से जीने की स्थिति में आता है।
कक्षा में ए. नागराज जी द्वारा प्रतिपादित सूत्र का उल्लेख करते हुए वर्षा दायमा ने कहा—
“जीने देकर जीना ही न्याय है।”
अर्थात हमारा जीना केवल अपने लिए नहीं है। हमारे जीने के साथ सामने वाले का जीना भी सुनिश्चित हो—यही न्यायपूर्ण जीवन की दिशा है। संबंधों में केवल अपनी सुविधा, अपेक्षा या लाभ को देखना पर्याप्त नहीं है; दूसरे के अस्तित्व, उसकी गरिमा और उसके विकास को स्वीकार करना भी उतना ही आवश्यक है।
वीरता के अर्थ को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि अन्य को न्याय दिलाने की प्रक्रिया ‘वीरता’ है। लेकिन हम दूसरे को न्याय तभी दिला सकते हैं, जब स्वयं हमारे भीतर समझ और समाधान हो।
इसे सहज रूप में ऐसे समझा जा सकता है कि हम दूसरे का पात्र तभी भर सकते हैं, जब हमारा अपना पात्र भरा हो।
जब हमारा व्यवहार इस स्तर तक पहुँचता है कि हम दूसरे की जागृति और न्याय में सहायक होने लगते हैं, तो यही व्यवहार उपकार का रूप लेता है।
वर्षा दायमा ने एक महत्वपूर्ण बात कही कि जो चीज हमारे भीतर है, उसे बाहर खोजना भ्रम की स्थिति है।
सुख, समाधान और संबंधों में तृप्ति को यदि मनुष्य लगातार बाहरी वस्तुओं, परिस्थितियों या दूसरे व्यक्तियों में खोजता रहेगा, तो उसकी तलाश पूरी नहीं हो सकती। आवश्यकता अपने भीतर उस समझ को पहचानने और विकसित करने की है, जिससे हमारा जीवन संचालित होता है।
कक्षा में स्वतंत्रता पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य को तीन स्तरों पर स्वतंत्रता के लिए कार्य करना चाहिए—
- आर्थिक स्वतंत्रता
- भावनात्मक स्वतंत्रता
- मानसिक या विचारों के स्तर पर स्वतंत्रता
इन तीनों स्तरों पर स्वतंत्रता मनुष्य को अपने निर्णय समझ के आधार पर लेने की क्षमता देती है। इसका उद्देश्य दूसरों से अलग होना नहीं, बल्कि स्वयं में समाधानपूर्वक रहते हुए संबंधों का बेहतर निर्वाह करना है।
अंततः कक्षा का केंद्रीय बिंदु ‘जागृति’ रहा। वर्षा दायमा ने कहा कि हम दुनिया में जो भी कार्य करें, उसका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उपलब्धि या सुविधा नहीं, बल्कि स्वयं की और दूसरे की जागृति में सहायक होना भी होना चाहिए।
जब मनुष्य स्वयं को मानव के रूप में पहचानता है, सामने वाले में भी उसी मानव को देखता है और ‘जीने देकर जीने’ की दृष्टि से संबंधों का निर्वाह करता है, तभी न्याय, वीरता, उपकार और वास्तविक स्वतंत्रता जीवन में व्यवहार का हिस्सा बनने लगते हैं।