धीरता और वीरता का स्वभाव ही न्यायपूर्ण जीवन की ओर ले जाता है

✍️ लेखक — मोहित धवन

इंदौर, 20 अगस्त 2026।
मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर की आज सुबह की कक्षा में वर्षा दायमा, संस्थापक सदस्य, मानव चेतना विकास केंद्र ने मनुष्य के स्वभाव, संबंधों, मूल्यों और वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें साझा कीं।

उन्होंने कहा कि सबसे पहले हमें अपने स्वभाव को देखने और समझने की आवश्यकता है। वर्तमान में हमारे व्यवहार में कई बार दीनता, हीनता और क्रूरता दिखाई देती है, जबकि हमारा स्वभाव धीरता, वीरता और उपकारिता का होना चाहिए।

संबंधों में जीना अभी सीखना बाकी है

वर्षा दायमा ने कहा कि आज हमारे सामने एक बड़ी समस्या यह है कि हमें संबंधों में कैसे जीना है, इसकी स्पष्ट समझ नहीं है। परिवार और समाज में एक-दूसरे को देखने, सुनने और समझने के बजाय हमारा ध्यान मोबाइल की स्क्रीन पर अधिक केंद्रित हो गया है।

हम न्यायपूर्ण ढंग से जीना तो चाहते हैं, लेकिन व्यवहार में उसे उतार नहीं पाते। इसका उदाहरण फिल्मों में भी दिखाई देता है। जब हम कोई फिल्म देखते हैं तो सामान्यतः हमें वही नायक पसंद आता है, जो दूसरों की मदद करता है, लोगों को संकट से बचाता है और अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है। इससे पता चलता है कि मनुष्य की मूल चाहत अच्छी ही है। लेकिन वास्तविक जीवन में उस चाहत के अनुरूप जीने के लिए सही समझ का होना आवश्यक है।

मूल्यों का निर्वाह ही जीवन में दिखाई देना चाहिए

उन्होंने कहा कि केवल मूल्यों की बात करना पर्याप्त नहीं है। जब हम मूल्यों का सही ढंग से निर्वाह करते हैं, तभी सही ढंग से जी पाते हैं। सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित होने पर ही मनुष्य न्यायपूर्ण पूरकता के साथ जीवन जी सकता है।

हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चे को क्या सिखा रही है?

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि मान लीजिए हमने एक स्कूल खोला, जिसमें एक हजार बच्चे पढ़ते हैं। बच्चा हमारे पास शिक्षा पाने आता है, लेकिन यदि हम फीस, किताबों, यूनिफॉर्म और दूसरी आवश्यकताओं के नाम पर उससे अधिक से अधिक पैसा कमाने लगें, तो वह बच्चा हमसे आखिर क्या सीख रहा है?

यदि उसका अनुभव शुरू से ही शोषण का रहा, तो आगे चलकर जब उसे अवसर मिलेगा, वह भी उसी व्यवहार को दोहरा सकता है। यदि वह डॉक्टर बनता है और सेवा के स्थान पर केवल मरीज से अधिक पैसा कमाने को प्राथमिकता देता है, तो यह उसी हीनता और शोषणकारी सोच का विस्तार है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि स्कूल और कॉलेज केवल डिग्री और रोजगार देने के केंद्र न बनें, बल्कि ऐसे मनुष्य तैयार करें जो न्याय, संबंध और परस्पर पूरकता के साथ जीना समझें।

धीरता और वीरता से बदलता है जीवन

वर्षा दायमा ने कहा कि जब मनुष्य का स्वभाव धीरता और वीरता की ओर बढ़ता है, तब उसके व्यवहार में भी परिवर्तन आता है। वह समाज में दया, करुणा, कृपा और प्रेम की पात्रता के साथ जीना शुरू करता है। वह केवल अपने लाभ को नहीं, बल्कि दूसरे मनुष्य के साथ अपने संबंध और दायित्व को भी समझता है।

मध्यस्थ दर्शन की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि एक बार व्यक्ति इसे गंभीरता से सुन और समझ लेता है तो जीवन को देखने की उसकी दृष्टि बदलने लगती है। संभव है कि वह आज उस समझ के अनुरूप पूरी तरह न जी पा रहा हो, लेकिन उसके भीतर उस दिशा में जीने की चाहत बनी रहती है।

आज की कक्षा का सार यही रहा कि अच्छा मनुष्य बनने की मूल चाहत हम सभी में है, लेकिन उस चाहत को व्यवहार में उतारने के लिए सही समझ और सही निर्णय आवश्यक हैं। जब हमारे स्वभाव में धीरता, वीरता और उपकारिता आती है तथा हम मूल्यों का सही निर्वाह करते हैं, तभी न्यायपूर्ण और पूरकता से भरा जीवन संभव होता है।

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