एक स्वाद, जिसकी जड़ें बचपन की यादों में हैं
✍️ मोहित धवन
📅 11 सितंबर 2026

परसों सब्ज़ी मंडी जाने लगा तो पत्नी ने चलते-चलते कहा—
“हरी मिर्च मत लाना, घर में रखी हुई है।”
मैंने हाँ कह दिया।
लेकिन मंडी में सब्ज़ियाँ खरीदते-खरीदते जब ताज़ी हरी मिर्च सामने दिखीं, तो उन्हें छोड़कर आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। पता नहीं क्यों, मेरे लिए बिना हरी मिर्च खरीदे सब्ज़ियों की खरीदारी कुछ अधूरी-सी लगती है।
आखिर थोड़ी-सी थैले में आ ही गईं।
शायद यह सिर्फ स्वाद की आदत नहीं है। इसके पीछे बचपन की एक कहानी भी है।
गर्मियों की छुट्टियों में ननिहाल जाना हमारे लिए किसी उत्सव से कम नहीं होता था। मामा लोगों का खूब लाड़ मिलता और कई बार वे सब्ज़ी खरीदने जाते तो हमें भी साथ ले जाते।
वहाँ हमारी एक खास जिम्मेदारी थी—हरी मिर्च चखकर बताना कि वह तीखी है या नहीं।
मामा दुकानदार से मिर्च लेते और हमारी तरफ बढ़ाकर कहते—
“खा कर बताओ, तीखी है?”
अब बच्चा कच्ची मिर्च क्यों खाए? लेकिन बदले में मिल्क बादाम या कोल्ड ड्रिंक मिलने की उम्मीद हो तो हिम्मत आ ही जाती थी।
मिर्च चखी जाती, मुँह जलता, कभी आँखों में पानी आता और फिर फैसला सुनाया जाता—
“हाँ मामा, ये वाली तीखी है… इसे ले लो!”
अगर मिर्च कम तीखी निकली, तो अगले ठेले पर फिर टेस्ट होता।
शायद हरी मिर्च से मेरी दोस्ती वहीं से शुरू हुई। और मजेदार बात यह कि यह प्रेम सिर्फ हरी मिर्च से रहा; लाल मिर्च मुझे कभी खास पसंद नहीं आई।
अचार में बसा घर और ननिहाल
बचपन के उस स्वाद में माँ के हाथ का हरी मिर्च का अचार और ननिहाल में बनने वाला अचार भी शामिल है।
तब शायद हमने कभी गौर नहीं किया कि ये छोटी-छोटी चीज़ें एक दिन इतनी याद आएँगी। खाने के साथ थोड़ा-सा अचार मिल जाना रोजमर्रा की बात थी। आज समझ आता है कि स्वाद केवल मसालों से नहीं बनता—उसमें जगह, लोग और रिश्ते भी घुले होते हैं।
बाजार से अच्छा अचार आज भी खरीदा जा सकता है, लेकिन माँ के हाथ और ननिहाल वाले स्वाद को खरीदा नहीं जा सकता।
मेरा एक झटपट तरीका
हरी मिर्च खाने का एक आसान तरीका भी समय के साथ मेरा पसंदीदा बन गया।
हरी मिर्च और अदरक को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटिए। उसमें नींबू का रस, थोड़ा नमक, हल्दी और जरा-सी हींग मिला दीजिए।
बस!
न लंबी तैयारी, न कोई मुश्किल विधि। दाल-रोटी या पराठे के साथ रख दीजिए और खाने का जायका बदल जाता है।
शायद यही हरी मिर्च की खासियत है—उसे अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए बहुत कुछ नहीं चाहिए।
रोटी, प्याज और हरी मिर्च
हमारे गाँवों की थाली में इसका एक अलग ही स्थान रहा है।
आज भी गाँव में कई लोग बहुत कुछ उपलब्ध न हो तो रोटी, प्याज और हरी मिर्च के साथ आराम से भोजन कर लेते हैं।
गरम रोटी, साथ में कच्चा प्याज और एक हरी मिर्च—बस।
शहरों में हम खाने के लिए लंबे मेन्यू और तरह-तरह के व्यंजन तलाशते हैं, लेकिन इस साधारण-सी थाली में हमारे पुराने जीवन की एक खूबसूरत बात छिपी है—कम में भी स्वाद और संतोष पा लेना।
और मजेदार बात—मिर्च हमेशा से हमारी थी ही नहीं
जिस मिर्च को आज भारतीय भोजन से अलग करना मुश्किल है, उसका मूल भारत में नहीं माना जाता। मिर्च मध्य और दक्षिण अमेरिका से दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुँची और लगभग पाँच सौ साल पहले पुर्तगाली व्यापारियों के माध्यम से भारत आई।
उससे पहले यहाँ तीखेपन के लिए काली मिर्च और पीपली जैसे मसालों का इस्तेमाल होता था।
लेकिन कुछ ही सदियों में मिर्च हमारे भोजन में इस तरह रच-बस गई कि आज यह खेत से लेकर रसोई तक और चटनी से लेकर अचार तक हर जगह दिखाई देती है।
सोचता हूँ, एक मिर्च की भी कितनी लंबी यात्रा रही होगी—एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक… और फिर मेरी थाली तक।
पर मेरी अपनी कहानी इतिहास की किताबों से नहीं, ननिहाल की उस मंडी से शुरू होती है, जहाँ मिल्क बादाम या कोल्ड ड्रिंक की चाह में एक बच्चा कच्ची मिर्च चखने को तैयार हो जाता था।
अब जब पत्नी कहती हैं—
“हरी मिर्च मत लाना, घर में है…”
तो शायद मैं मिर्च देखकर सिर्फ आज की जरूरत नहीं देखता।
उसमें कहीं मामा के साथ बिताई गर्मियों की छुट्टियाँ हैं, कहीं माँ और ननिहाल के अचार का स्वाद है और कहीं वह बेफिक्र बचपन।
इसीलिए कुछ हरी मिर्च थैले में आ ही जाती हैं।
क्योंकि कई बार हम मंडी से सिर्फ सब्ज़ियाँ नहीं खरीदते… अपने बीते दिनों की थोड़ी-सी खुशबू भी घर ले आते हैं। 💚