पाँच दशक की पत्रकारिता, कानून में मुकाम और शब्दों-रिश्तों से बना एक सफर
✍️ मोहित धवन
12 सितंबर 2026

कुछ लोगों को जानने के लिए उनके पद, पेशे या मिले सम्मानों की सूची पर्याप्त नहीं होती। उन्हें समझना हो तो देखना पड़ता है कि उन्होंने क्या पढ़ा, क्या लिखा, किन रिश्तों को निभाया और जब किसी को उनकी जरूरत पड़ी तो वे कहाँ खड़े थे।
राज खन्ना जी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं।
उनके घर में किताबों के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है। अलमारियाँ भर चुकी हैं, दूसरे कोनों तक किताबें पहुँच गई हैं—फिर भी कोई नई और अच्छी किताब सामने आ जाए तो उसे घर लाने का मोह आज भी नहीं छूटता। शायद राज जी को समझने के लिए इससे बेहतर कोई तस्वीर नहीं हो सकती।
करीब पाँच दशक पहले उन्होंने खेल पत्रकारिता से लेखन की शुरुआत की। आगे चलकर इतिहास, राजनीति, स्वतंत्रता आंदोलन, संविधान और समाज उनके प्रमुख विषय बने। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख लगातार प्रकाशित होते रहे।
उनके लेखन की खासियत केवल विषय नहीं, उसे कहने का अंदाज भी है। वे किसी विषय को सिर्फ बताते नहीं, पाठक को अपने साथ लेकर चलते हैं। उनका लेख पढ़ना किसी यात्रा पर निकलने जैसा होता है। कोई पुराना प्रसंग सामने आता है, इतिहास वर्तमान से जुड़ता है और अगली पंक्ति में क्या मिलेगा, यह जिज्ञासा पाठक को अंत तक बाँधे रखती है।
एक दौर में पत्रकारिता और राजनीति से जुड़े कई मित्र चाहते थे कि वे दिल्ली आकर सक्रिय पत्रकारिता करें। अवसर बड़े थे, लेकिन राज जी ने उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में रहना चुना।
नौ भाई-बहनों में सबसे छोटे राज जी के लिए माता-पिता की सेवा और परिवार की जिम्मेदारियाँ करियर से कम महत्वपूर्ण नहीं थीं। बाद में दो बेटियों के पिता बने तो दायित्वों का एक और अध्याय जुड़ा। शायद जिंदगी के कुछ फैसलों का हिसाब इससे नहीं लगाया जाता कि हमने क्या पाया, बल्कि इससे भी कि आगे बढ़ते हुए हमने किसका हाथ नहीं छोड़ा।
राज जी सुल्तानपुर में रहे, लेकिन उनकी कलम वहाँ तक सीमित नहीं रही।
वे दिल्ली नहीं गए, लेकिन उनका लिखा दिल्ली पहुँचता रहा।
इतिहास, राजनीति और सामाजिक विषयों पर उनके लेख लखनऊ से दिल्ली तक पत्रकारिता और राजनीतिक हलकों में पढ़े और चर्चा किए जाते रहे। उनका सफर बताता है कि विचारों को राजधानी पहुँचने के लिए लेखक का राजधानी में रहना जरूरी नहीं।
वर्षों का अध्ययन ‘आजादी से पहले–आजादी के बाद’ और ‘इंडिया अर्थात् भारत’ जैसी पुस्तकों में भी उतरा। इनमें इतिहास केवल तारीखों और घटनाओं में नहीं सिमटता, बल्कि वर्तमान से संवाद करता दिखाई देता है।
पत्रकारिता से इतना लंबा रिश्ता होने के बावजूद राज जी ने इसे अपनी मुख्य आजीविका नहीं बनाया। उनके लिए लेखन कमाई से अधिक रुचि और सामाजिक सरोकार रहा। आजीविका के लिए उन्होंने वकालत को अपना पेशा बनाया। पेशेवर जीवन में अधिवक्ता के रूप में अपनी समझ, स्पष्टता और निर्भीकता से उन्होंने सम्मानजनक मुकाम बनाया। कानून की फाइलों के बीच भी किताब और कलम से उनका रिश्ता बना रहा।
राज जी को केवल पत्रकार, लेखक या अधिवक्ता के परिचय में बाँधना उन्हें अधूरा जानना होगा। उनके स्वभाव का एक खास हिस्सा है—किसी के काम आना।
वे अक्सर कहते हैं—
“किसी की मदद एक हाथ से करो, तो दूसरे हाथ को भी पता नहीं चलना चाहिए।”
पत्रकारिता, साहित्य और सामाजिक क्षेत्र में उन्हें समय-समय पर अनेक सम्मान मिले। ‘सुलतानपुर रत्न’ जैसे सम्मान भी इनमें शामिल हैं। जब भी किसी सम्मान के साथ पुरस्कार राशि मिली, उन्होंने उसे जरूरतमंदों की सेवा में लगा देना बेहतर समझा। शायद इसीलिए उनके जीवन में किताबों के साथ लोगों की भी एक बड़ी दुनिया है।
मेरे लिए राज जी के व्यक्तित्व का एक पक्ष और भी खास है। लिखने-पढ़ने में मेरी अपनी रुचि के पीछे कहीं न कहीं उनसे मिली प्रेरणा भी है।
कुछ लोग आपको लिखना सिखाने के लिए सामने बैठाकर कलम नहीं पकड़ाते। आप बस उन्हें पढ़ते, लिखते और किताबों में कुछ खोजते देखते हैं—और धीरे-धीरे शब्दों से आपका अपना रिश्ता बनने लगता है।
शायद प्रेरणा का सबसे सुंदर रूप वही है, जो दी नहीं जाती—अपने आप मिल जाती है।
पाँच दशक में पत्रकारिता कागज से स्क्रीन तक पहुँच गई। माध्यम बदले, पढ़ने की आदतें बदलीं, लेकिन राज जी की एक तस्वीर आज भी वैसी ही है—किताबों से भरा घर और उसमें एक नई किताब के लिए जगह तलाशता हुआ पाठक।
जन्मदिन पर मेरी कामना बस इतनी है—
घर में किताबों के लिए जगह कम पड़ती रहे, लेकिन नई किताबों का आना कभी कम न हो। उनकी कलम पाठकों को यूँ ही अपने साथ यात्राओं पर ले जाती रहे और किसी के काम आने की उनकी यह सहज बेचैनी हमेशा बनी रहे।
जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई राज जी।
स्वस्थ रहें, सक्रिय रहें और लिखते रहें। 🌸🙏