गणपति बप्पा मोरया: जब बप्पा आते हैं, घर उत्सव बन जाता है

आस्था, परंपरा और सामाजिक जुड़ाव का पर्व, जिसका रंग महाराष्ट्र से निकलकर देश-दुनिया तक पहुंच चुका है

✍️ मोहित धवन
14 सितंबर 2026

गणपति बप्पा मोरया…! 🙏❤️

आज से अगले दस दिनों तक देश के अलग-अलग हिस्सों में यह जयघोष सुनाई देगा। घरों में गणपति विराजेंगे, पंडाल जगमगाएंगे, आरती होगी, मोदक और प्रसाद बंटेंगे। लेकिन गणेशोत्सव की खूबसूरती केवल उसकी भव्यता में नहीं, उस आत्मीयता में भी है, जिसके साथ बप्पा के आने की प्रतीक्षा की जाती है।

महाराष्ट्र में इस भाव को बेहद करीब से महसूस किया जा सकता है। कई दिन पहले से घर सजने लगते हैं, बप्पा के लिए स्थान तैयार होता है और पूरा परिवार स्वागत में जुट जाता है। फिर वह क्षण आता है जब गणपति घर पहुंचते हैं। पूजा की थाली सजती है, चेहरे खिल उठते हैं और वातावरण “गणपति बप्पा मोरया” के जयघोष से भर जाता है।

कोई उन्हें डेढ़ दिन, कोई पांच, सात या दस दिनों तक अपने यहां विराजमान रखता है। सुबह-शाम आरती, मोदक, प्रसाद और मित्रों-रिश्तेदारों का आना-जाना—कुछ ही समय में बप्पा जैसे परिवार का हिस्सा बन जाते हैं।

महाराष्ट्र में गणपति के आगमन से जुड़ी कई लोकमान्यताएं भी सुनने को मिलती हैं। कुछ मान्यताओं में उनके आगमन को ननिहाल आने के पारिवारिक भाव से जोड़ा जाता है। शायद इसीलिए वहां “बप्पा आ रहे हैं” कहना भर अपने आप में उत्सव जैसा लगता है।

भारतीय परंपरा में भगवान गणेश विघ्नहर्ता तथा बुद्धि, विवेक और शुभारंभ के देवता माने गए हैं। हमारे जीवन में उनका स्थान कितना सहज है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि किसी नए कार्य की शुरुआत को हम आज भी ‘श्री गणेश करना’ कहते हैं।

इन दिनों मध्यस्थ दर्शन को समझने की कोशिश में पूजा को देखने की एक और दृष्टि मिली—“श्रेष्ठ आचरण का अनुकरण ही पूजा है।” यह विचार मुझे छूता है। हम जिन गुणों के कारण किसी को श्रेष्ठ मानते हैं, क्या पूजा केवल उनके सामने हाथ जोड़ना है, या उन गुणों को समझकर अपने जीवन में उतारने का प्रयास भी पूजा है? गणपति को बुद्धि और विवेक का देवता मानते हैं तो उनकी आराधना हमें यह भी देखने का अवसर देती है कि हमारे अपने व्यवहार और निर्णयों में कितना विवेक उतर रहा है।

गणेश पूजा की परंपरा प्राचीन है, लेकिन आधुनिक सार्वजनिक गणेशोत्सव के इतिहास में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का विशेष स्थान है। 1890 के दशक में उन्होंने इसे व्यापक सार्वजनिक स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश शासन के दौर में यह आयोजन आस्था के साथ लोगों के मिलने, संवाद करने और सामाजिक एकजुटता का माध्यम बना। समय के साथ इसका विस्तार महाराष्ट्र की सीमाओं से बहुत आगे हो गया।

इस सामूहिकता को मैंने भारत से हजारों किलोमीटर दूर अफ्रीका में भी महसूस किया।

वहां भारतीय समुदाय गणेशोत्सव बड़े उत्साह से मनाता था। शाम को आरती और उसके बाद भंडारा होता। जिन मित्रों के घर गणपति स्थापित होते, वहां से निमंत्रण आते। एक बार मेरे माता-पिता भी हमारे साथ थे। उम्र में वरिष्ठ होने के कारण शाम की आरती का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी मेरी माताजी को दी गई। परदेस में भारतीय परिवारों के बीच मां को आरती कराते देखना आज भी मेरी स्मृतियों का एक आत्मीय हिस्सा है।

उन दिनों की एक और बात दिल को छूती थी। हमारे मुस्लिम, सिख और ईसाई मित्र भी उतनी ही सहजता से उत्सव में शामिल होते। साथ बैठते, प्रसाद लेते और खुशियां साझा करते। कोई यह नहीं पूछता था कि त्योहार किसका है।

बस लगता था—सब अपने हैं।

कभी-कभी सोचता हूं, जब त्योहार हमें इतनी सहजता से करीब ला सकते हैं तो हम अपने बीच दूरियों की खाइयां क्यों बढ़ने देते हैं? शायद उत्सव का एक अर्थ यह भी है—अपनी आस्था को पूरे मन से जीते हुए दूसरे के लिए भी अपने दरवाजे खुले रखना।

बाद में परिवार के मुंबई में रहने के दौरान गणेशोत्सव का एक अलग रंग देखने को मिला। वहां इन दिनों पूरा शहर जैसे बप्पामय हो जाता है। छोटी सोसायटी से लेकर विशाल सार्वजनिक पंडाल तक हर जगह अपनी सजावट, अपनी आरती और अपने गणपति होते हैं।

उत्सव के अंत में विसर्जन भी आता है। अपने बीच कुछ दिन रहे बप्पा को विदा करने का वह क्षण इस परंपरा का बेहद भावुक पक्ष है—लेकिन उसकी बात फिर कभी करेंगे।

अभी तो बप्पा के आगमन का समय है।

इस बार मेरे लिए गणेशोत्सव का यह अनुभव लखनऊ में होगा। यहां भी कई बड़े पंडाल सज चुके हैं और शहर उत्सव के रंग में उतरने को तैयार है। अगले दस दिनों में इस आस्था, संस्कृति और सामूहिक उल्लास को करीब से महसूस करने की कोशिश रहेगी।

त्योहार शायद इसीलिए जरूरी हैं। वे परंपराओं को जीवित रखते हैं, पीढ़ियों को संस्कृति से जोड़ते हैं और कई बार अलग-अलग पहचान वाले लोगों के बीच भी अपनापन पैदा कर देते हैं।

तो आज विदाई की नहीं, स्वागत की बात हो…दरवाजे भी खुले हैं और मन भी,अपने बप्पा जो आ रहे हैं। ❤️🙏

गणपति बप्पा मोरया!

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