लखनऊ, 16 सितंबर 2026
लेखक ✍️ मोहित धवन

आज तय हुआ कि शाम को बप्पा के दर्शन के लिए जाना है। मन में सहज ही ख्याल आया—उनके प्रिय मोदक तो साथ होने चाहिए। इसी बहाने मिठाई की दुकान पहुंचा। सामने सजे मोदकों पर नजर पड़ी तो कुछ देर ठहर गई। मावा, केसर, मेवे से लेकर चॉकलेट और स्ट्रॉबेरी तक—एक ही मिठाई के इतने रूप। मन में सवाल उठा कि आखिर गणेश जी और मोदक का रिश्ता इतना गहरा क्यों है?
भारतीय परंपरा में भगवान गणेश को ‘मोदकप्रिय’ माना गया है। उनकी अनेक प्रतिमाओं और चित्रों में हाथ में मोदक दिखाई देता है। ‘मोद’ शब्द का संबंध आनंद और प्रसन्नता से माना जाता है। इस अर्थ में मोदक केवल मिठास नहीं, बल्कि तृप्ति और आनंद का प्रतीक भी बन जाता है।
गणेश जी को मोदक प्रिय होने के पीछे कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं प्रचलित हैं। उनके विवरण भिन्न हो सकते हैं, लेकिन उनमें ज्ञान, विवेक और संतोष का भाव प्रमुखता से उभरता है। गणेश स्वयं बुद्धि और विवेक के देवता माने गए हैं। शायद इसीलिए उनके हाथ में रखा छोटा-सा मोदक भी अपने भीतर एक बड़ा अर्थ समेटे दिखाई देता है।
महाराष्ट्र में यह परंपरा आज भी घरों की रसोई में जीवित है। गणेश चतुर्थी पर बनने वाले ‘उकडीचे मोदक’ उत्सव का विशेष हिस्सा हैं। चावल के आटे के आवरण में गुड़ और नारियल की भरावन डालकर इन्हें भाप में पकाया जाता है। अनेक परिवारों में इन्हें बनाने की विधि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चली आ रही है। इस प्रक्रिया में केवल एक व्यंजन बनाना नहीं सीखा जाता, परिवार की स्मृतियां और संस्कार भी आगे बढ़ते हैं।
गणेश उत्सव का विस्तार महाराष्ट्र से बाहर हुआ तो मोदक भी देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचा। उत्तर भारत में कभी गणेश पूजा के प्रसाद के रूप में लड्डू अधिक दिखाई देते थे, लेकिन अब यहां भी उत्सव के दिनों में मिठाई की दुकानों पर मोदक की अलग मौजूदगी नजर आती है। लखनऊ में भी पिछले कुछ वर्षों में इसका चलन बढ़ता दिखाई देता है।
समय के साथ इसके स्वाद भी बदले हैं। पारंपरिक गुड़-नारियल और मावा के साथ केसर-पिस्ता, ड्राई फ्रूट, चॉकलेट और फलों के स्वाद ने जगह बनाई है। यह बदलाव बताता है कि परंपराएं हमेशा एक ही रूप में स्थिर नहीं रहतीं। वे नए समय और नई पीढ़ी की पसंद को अपने भीतर जगह देते हुए आगे बढ़ती हैं।
कान्हा भोग स्वीट्स,लखनऊ के मालिक संजीव यादव बताते हैं कि गणेश चतुर्थी और गणेश उत्सव के दौरान मोदक की मांग काफी बढ़ जाती है। उनके यहां अलग-अलग किस्मों के मोदक तैयार किए जाते हैं, लेकिन ग्राहकों के बीच स्ट्रॉबेरी मोदक खासा लोकप्रिय है। कई बार इसकी मांग इतनी अधिक हो जाती है कि यह ‘आउट ऑफ स्टॉक’ तक हो जाता है।
एक पारंपरिक धार्मिक मिठाई में स्ट्रॉबेरी जैसे आधुनिक स्वाद की लोकप्रियता पहली नजर में बाजार का बदलाव लग सकती है, लेकिन इसके भीतर एक दूसरा संकेत भी है। नई पीढ़ी परंपरा को छोड़ नहीं रही, बल्कि कई बार अपने स्वाद और तरीके से उससे जुड़ रही है। रूप नया हो सकता है, पर उससे जुड़ा सांस्कृतिक संदर्भ बना रहता है।
मोदक की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष शायद उसका स्वाद भी नहीं है। सवाल यह है कि कोई वस्तु प्रसाद कब बनती है? दुकान के काउंटर पर रखा मोदक एक मिठाई है, लेकिन श्रद्धा के साथ अर्पित होते ही उसके प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है। वस्तु वही है, पर उसके साथ जुड़ा भाव उसे नया अर्थ देता है।
यहीं पूजा के अर्थ पर भी विचार किया जा सकता है। यदि पूजा केवल किसी वस्तु को अर्पित करने तक सीमित रह जाए तो उसका दायरा छोटा हो जाता है। जिस श्रेष्ठता को हम पूजते हैं, उसे समझने और अपने आचरण में उतारने की कोशिश भी उससे जुड़े, तो पूजा जीवन से संबंध बनाने लगती है।
शायद इसीलिए हमारी परंपराओं में प्रसाद बांटने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है। जो अर्पित हुआ, वह अकेले अपने लिए नहीं रखा गया। उसे दूसरों के साथ साझा किया गया। यहां मिठास के साथ सहभागिता का भाव भी जुड़ता है।
एक छोटा-सा मोदक इस तरह कई पड़ाव पार करता है। रसोई में वह व्यंजन है, बाजार में मिठाई, पूजा में प्रसाद और बांटने पर संबंधों में मिठास का माध्यम।
“आखिर बप्पा को मोदक इतना प्रिय क्यों है? इसका जवाब सिर्फ स्वाद में नहीं, सदियों पुरानी हमारी परंपरा और मोदक के पीछे छिपे भाव में है…” ❤️🙏
यही शायद मोदक की वास्तविक यात्रा है—स्वाद से प्रसाद तक, प्रसाद से संबंध तक और संबंध से भाव तक।