पुण्डरीक गोस्वामी जी महाराज की कथा का चौथा दिन | डीएवी कॉलेज, लखनऊ
✍️ मोहित धवन
लखनऊ | 8 अक्टूबर 2026
डीएवी कॉलेज, लखनऊ में कथा के चौथे दिन खचाखच भरे पंडाल में भक्ति का एक अलग ही रंग देखने को मिला। कथा के बीच जब पुण्डरीक गोस्वामी जी महाराज ने कृष्ण संकीर्तन किया, तो बड़ी संख्या में उपस्थित भक्तगण भी उनके साथ स्वर मिलाते हुए झूम उठे। कथा, संगीत और संवाद के इसी क्रम में गोस्वामी जी ने परिवार, संस्कार, संबंध, चरित्र और भक्ति को लेकर कई ऐसी बातें कहीं, जिन्हें केवल धार्मिक संदर्भ में ही नहीं, बल्कि मनुष्य के व्यवहार और उसके संबंधों के संदर्भ में भी समझा जा सकता है।
गोस्वामी जी ने कहा कि भारत में दो चीजों का विशेष महत्व रहा है—संस्कार और परिवार। पश्चिमी समाज का उल्लेख करते हुए उन्होंने परिवार की कमजोर होती अवधारणा की ओर भी ध्यान दिलाया। उनका कहना था कि परिवार में सभी का स्वभाव एक जैसा हो, यह आवश्यक नहीं। विचार अलग हो सकते हैं, मतभेद भी हो सकते हैं, लेकिन संबंध के महत्व को पहचानना आवश्यक है। शायद परिवार का अर्थ भी यही है—अलग-अलग स्वभाव के बीच संबंधों को समझना और उनका निर्वाह करना।
इसी बात को समझाने के लिए उन्होंने महाभारत का प्रसंग रखा। युद्ध समाप्त होने के बाद भी युधिष्ठिर का राज्याभिषेक तुरंत नहीं हुआ। पहले कौरव पक्ष के मृत परिजनों से जुड़े अंतिम संस्कार और दायित्व पूरे किए गए। जिनसे इतना बड़ा संघर्ष हुआ, उनके प्रति भी संबंध और संस्कार से जुड़ा दायित्व समाप्त नहीं हुआ। इस प्रसंग को धार्मिक मान्यता से आगे बढ़कर देखें तो एक महत्वपूर्ण मानवीय संकेत मिलता है—विरोध के बावजूद संबंध की पहचान और उससे जुड़े दायित्व का निर्वाह।
गोस्वामी जी की एक बात विशेष रूप से मन को छू गई—“राम जैसा चरित्र और कृष्ण जैसा मित्र मिलना बड़े सौभाग्य की बात है।” राम के प्रसंग में चरित्र और मर्यादा दिखाई देती है, तो कृष्ण के जीवन में मित्रता और संबंध निभाने के अनेक प्रसंग मिलते हैं। शायद जीवन में भी यही महत्वपूर्ण है कि हमारे अपने आचरण में दृढ़ता हो और संबंधों में विश्वास व साथ निभाने का भाव।
चरित्र की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा—“कुलवान होना प्रारब्ध की बात है, यशवान होना प्रारब्ध की बात है, धनवान होना प्रारब्ध की बात है; लेकिन चरित्रवान होना धर्म की बात है।” ‘प्रारब्ध’ को लेकर अलग-अलग दार्शनिक व्याख्याएँ हो सकती हैं, लेकिन इस कथन का व्यावहारिक संदेश स्पष्ट है—मनुष्य की वास्तविक पहचान केवल उसके परिवार, धन या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उसके आचरण से बनती है। हम अपने संबंधों में कैसा व्यवहार करते हैं और अपने दायित्वों को कितनी जिम्मेदारी से निभाते हैं, चरित्र की पहचान शायद यहीं से होती है।
श्राद्ध और पितृपक्ष की चर्चा करते हुए गोस्वामी जी ने संबंधों को लेकर एक बहुत सहज बात कही। यदि हम अपने माता-पिता और परिवार के बुजुर्गों की जीते-जी सेवा, सम्मान और देखभाल कर लें, तो बाद के कर्मकांड में कोई छोटी-मोटी कमी रह भी जाए, तो वह उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जाती। बात सीधी है—श्रद्धा केवल किसी के चले जाने के बाद व्यक्त न हो; जो आज हमारे साथ हैं, उनके प्रति हमारे व्यवहार में भी दिखाई दे।
कथा का सबसे सहज उदाहरण शायद भक्ति और नमक का था। गोस्वामी जी ने कहा कि भोजन बनाते समय नमक डालना भूल जाएँ, तो उसे बाद में भी डाला जा सकता है। दूसरे कई मसाले बाद में उसी तरह भोजन का हिस्सा नहीं बन सकते। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह कि नमक के बिना अच्छे से अच्छा भोजन भी अधूरा लगता है। जिस तरह नमक भोजन में स्वाद लाता है, उसी तरह भक्ति जीवन में स्वाद लाती है।
उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण को आधी-अधूरी नहीं, पूर्ण भक्ति प्रिय है। इस विचार को यदि जीवन के व्यापक संदर्भ में देखें तो एक प्रश्न हमारे सामने भी आता है—जिस मूल्य को हम सही मानते हैं, क्या उसे अपने व्यवहार में भी उतनी ही निष्ठा से जीते हैं? क्योंकि मान्यता तभी सार्थक दिखाई देती है, जब उसका प्रभाव हमारे आचरण और संबंधों में भी दिखाई दे।
कथा के चौथे दिन से मेरे लिए एक सरल-सा सूत्र उभरकर आया—परिवार हमें संबंधों को पहचानने का अवसर देता है, संस्कार उनके निर्वाह की दिशा देते हैं, चरित्र हमारे आचरण में दिखाई देता है और भक्ति जीवन में संवेदनशीलता का भाव जोड़ती है।
अलग-अलग दर्शन और परंपराएँ इन शब्दों की व्याख्या अपने ढंग से कर सकती हैं, लेकिन अंततः प्रश्न मनुष्य के सामने ही आकर खड़ा होता है—मैं अपने संबंधों को कितना समझ पा रहा हूँ, और जो समझ रहा हूँ, वह मेरे आचरण में कितना दिखाई दे रहा है?