✍️ डॉ. अभय वानखेड़े
एमसीवीके विद्यालय – इंदौर
अक्टूबर 2026
एक बच्चा अच्छे अंक लाता है, अच्छी भाषा बोलता है, तकनीक समझता है और आगे चलकर अच्छी नौकरी भी पा लेता है। माता-पिता के रूप में हमें संतोष होता है कि हमने उसे अच्छी शिक्षा दी। लेकिन जीवन केवल परीक्षा, डिग्री और नौकरी तक सीमित नहीं रहता। जब वही बच्चा रिश्तों की उलझनों, असफलता या मन के असंतोष से गुजरता है, तब एक सवाल सामने आता है—क्या हमने उसे दुनिया में सफल होना तो सिखाया, लेकिन स्वयं को और जीवन को समझना भी सिखाया?
क्या हमने उसे प्रतिस्पर्धा करना तो सिखाया, लेकिन संबंधों में न्याय करना भी सिखाया? क्या हमने उसे प्रकृति से बहुत कुछ लेना सिखाया, लेकिन उसके साथ संतुलन में जीना भी सिखाया? इन्हीं प्रश्नों के बीच मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके) विद्यालय, इंदौर में शिक्षा को लेकर चल रहा एक प्रयोग हमें शिक्षा के मूल उद्देश्य पर फिर से विचार करने का अवसर देता है।
एमसीवीके में कौशल, साक्षरता और शिक्षा को अलग-अलग समझने का प्रयास किया जाता है। कौशल हमें कोई कार्य करना सिखाता है, साक्षरता हमें पढ़ने-लिखने और जानकारी प्राप्त करने योग्य बनाती है, जबकि शिक्षा को स्वयं को समझने, जीवन के उद्देश्य को पहचानने और परिवार, समाज तथा प्रकृति के साथ अपनी सहभागिता समझने से जोड़ा जाता है। यानी बच्चे से केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि “बड़े होकर क्या बनोगे?” शायद उससे पहले यह पूछना भी उतना ही जरूरी है—“बड़े होकर कैसे मनुष्य बनोगे?”
हमने लंबे समय से शिक्षा को कक्षा, किताब, परीक्षा और परिणाम से जोड़कर देखा है। एमसीवीके विद्यालय इस दायरे को थोड़ा व्यापक करने का प्रयास करता है। लगभग 16 एकड़ के आवासीय परिसर और उससे जुड़ी कृषि भूमि के बीच गोष्ठियाँ, संवाद, यात्राएँ, प्रस्तुतियाँ, संगीत, नृत्य, नाटक और प्रकृति के साथ रहने का अनुभव भी सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा बनता है। यहाँ विचार किताबों से दूर जाने का नहीं, बल्कि किताब में पढ़ी हुई बात को जीवन और व्यवहार से जोड़ने का है।
इसी सोच को एक छोटी-सी पंक्ति में व्यक्त किया गया है—“संपूर्ण शिक्षा = भाषा + आचरण।” हम बच्चे की भाषा, अभिव्यक्ति और ज्ञान पर ध्यान देते हैं, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण उसका आचरण भी है। क्या आत्मविश्वास के साथ उसके भीतर संतोष है? क्या संबंधों में न्याय है? क्या परिवार की समृद्धि के साथ समाज के प्रति जिम्मेदारी और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता भी है? शिक्षा यदि इन प्रश्नों तक पहुँचती है, तो वह केवल जानकारी देने से आगे बढ़कर एक समझदार मनुष्य के निर्माण की प्रक्रिया बन सकती है।
एमसीवीके विद्यालय का एक और प्रयोग ध्यान खींचता है—“बच्चों से कोई शुल्क नहीं, शिक्षक को कोई वेतन नहीं।” विद्यालय की आवश्यकताओं को परिवार मिलकर पूरा करते हैं और शिक्षक शिक्षण को केवल वेतन आधारित पेशे के रूप में नहीं, बल्कि अपने दायित्व से जोड़कर देखते हैं। यह व्यवस्था हर विद्यालय में इसी स्वरूप में संभव हो, ऐसा दावा नहीं है। लेकिन इसके पीछे छिपा प्रश्न महत्वपूर्ण है—क्या शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध केवल एक पेशेवर व्यवस्था है, या अगली पीढ़ी के प्रति हमारा कोई बड़ा दायित्व भी है?
इस प्रयोग का उद्देश्य यह कहना नहीं है कि वर्तमान विद्यालयी या महाविद्यालयी शिक्षा गलत है। देश के विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में हजारों शिक्षक समर्पण के साथ नई पीढ़ी का भविष्य बनाने में जुटे हैं और उनके अनुभवों से सीखने के लिए बहुत कुछ है। एमसीवीके विद्यालय का प्रयास इस संवाद में एक और प्रश्न जोड़ता है—क्या रोजगार की तैयारी के साथ शिक्षा को जीवन की तैयारी से भी जोड़ा जा सकता है? क्या आधुनिक ज्ञान, विज्ञान और तकनीक के साथ बच्चे को स्वयं, संबंध, समाज और प्रकृति को समझने का अवसर भी मिल सकता है?
शायद शिक्षा में बड़ा बदलाव किसी एक विद्यालय या किसी एक पद्धति से नहीं आएगा। वह तब आएगा जब शिक्षक, अभिभावक और शिक्षण संस्थान मिलकर एक बार फिर यह प्रश्न पूछेंगे—हम अपने बच्चों को केवल सफल बनाना चाहते हैं, या ऐसा मनुष्य भी बनाना चाहते हैं जो स्वयं के साथ संतुष्ट, संबंधों में न्यायपूर्ण, समाज के प्रति जिम्मेदार और प्रकृति के साथ संतुलित होकर जी सके?
शायद शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य सफलता और समझदारी—दोनों को एक साथ संभव करना है।



