28 जनवरी से 4 फरवरी 2027 तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन, पिता कृष्ण चंद्र शास्त्री जी महाराज भी होंगे साथ
✍️ मोहित धवन | लखनऊ, 8 Oct’2026
लखनऊ का इंतज़ार अब खत्म होता नज़र आ रहा है। देश के सबसे चर्चित युवा कथावाचकों में अपनी विशेष पहचान बना चुके इंद्रेश जी महाराज पहली बार लखनऊ आ रहे हैं। उनकी कथा और संकीर्तन को अब तक विभिन्न माध्यमों से सुनते और देखते आए श्रद्धालुओं को जनवरी 2027 में उन्हें प्रत्यक्ष सुनने का अवसर मिलेगा। 28 जनवरी से 4 फरवरी तक शहर में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन होगा। इस अवसर को और विशेष बनाती है उनके पिता, प्रसिद्ध भागवत कथाव्यास कृष्ण चंद्र शास्त्री जी महाराज की उपस्थिति, जिन्हें श्रद्धालु ठाकुर जी महाराज के नाम से भी जानते हैं।
यह पहला अवसर होगा जब लखनऊ के श्रद्धालुओं को पिता-पुत्र की इस आध्यात्मिक परंपरा से एक साथ जुड़ने का अवसर मिलेगा। एक ओर वर्षों का अनुभव और कथा परंपरा की गहरी समझ है, तो दूसरी ओर नई पीढ़ी को भक्ति और संकीर्तन से जोड़ने की एक अलग शैली। दो पीढ़ियों का यह संगम आयोजन के प्रमुख आकर्षणों में शामिल होगा।
इंद्रेश जी महाराज की लोकप्रियता का एक महत्वपूर्ण पहलू युवाओं के बीच उनकी बढ़ती पहचान है। उनके कथा आयोजनों में भजन और संकीर्तन के दौरान श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता है। कहीं लोग भावविभोर होकर सुनते हैं, तो कहीं भजनों की धुन पर झूमने लगते हैं। यह दृश्य एक दिलचस्प सामाजिक बदलाव की ओर भी संकेत करता है। जिस युवा पीढ़ी को अक्सर आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं में उलझा हुआ माना जाता है, उसका एक वर्ग आज भक्ति और आध्यात्मिक आयोजनों में भी रुचि दिखा रहा है।
कार्यक्रम के आयोजक कुलदीप मिश्रा ने बताया कि इंद्रेश जी महाराज और उनके पिता कृष्ण चंद्र शास्त्री जी महाराज के लखनऊ आगमन की तिथियाँ निश्चित हो चुकी हैं। आयोजन की तैयारियाँ शुरू कर दी गई हैं। कथा स्थल, समय और अन्य व्यवस्थाओं की जानकारी जल्द ही श्रद्धालुओं के साथ साझा की जाएगी।
श्रीमद्भागवत कथा भारतीय समाज की उस परंपरा का हिस्सा है, जिसमें कहानियों के माध्यम से जीवन के गहरे प्रश्नों को समझने का प्रयास किया जाता रहा है। कृष्ण और सुदामा की मित्रता हो, यशोदा का वात्सल्य या अर्जुन के सामने खड़ी दुविधाएँ, इन प्रसंगों में केवल धार्मिक भावनाएँ ही नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों, कर्तव्य और जीवन के निर्णयों से जुड़े अनेक संदेश भी मिलते हैं। शायद यही कारण है कि सदियों पुरानी ये कथाएँ आज भी अलग-अलग पीढ़ियों को अपने जीवन से जुड़ी हुई महसूस होती हैं।
लखनऊ की सांस्कृतिक पहचान हमेशा से विविधता और परंपराओं के सम्मान से जुड़ी रही है। यहाँ साहित्य और संगीत के साथ धार्मिक आयोजनों की भी समृद्ध विरासत रही है। ऐसे में इंद्रेश जी महाराज का पहला आगमन शहर के सांस्कृतिक कैलेंडर में एक उल्लेखनीय आयोजन के रूप में देखा जा सकता है।
जनवरी की ठंडी सुबहों और शामों के बीच होने वाला यह आठ दिवसीय आयोजन श्रद्धालुओं के लिए केवल कथा सुनने का अवसर नहीं, बल्कि परिवार और मित्रों के साथ कुछ समय बिताने, भक्ति संगीत का आनंद लेने और जीवन से जुड़े विचारों पर मनन करने का अवसर भी हो सकता है।
आखिर किसी कथा की सार्थकता केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसे सुनने कितने लोग पहुँचे, बल्कि इससे भी होती है कि वहाँ से लौटते समय वे अपने साथ क्या लेकर गए।
लखनऊ अब जनवरी के उन आठ दिनों की प्रतीक्षा कर रहा है, जब शहर में पहली बार इंद्रेश जी महाराज और उनके पिता कृष्ण चंद्र शास्त्री जी महाराज का एक साथ स्वागत होगा।