लखनऊ की चिकनकारी: हुनर बेमिसाल, लेकिन कारीगर के हिस्से में क्या?

एक साड़ी बनाने में लग जाते हैं तीन-चार महीने, फिर भी कुशल कारीगर की दैनिक कमाई महज़ Rs.300–400। बदलते फैशन, महँगाई और मशीनों के दौर में कहाँ खड़ी है लखनऊ की यह विरासत?

लखनऊ, 13 अक्टूबर 2026
✍️ मोहित धवन

लखनऊ की पहचान सिर्फ नवाबी तहज़ीब, अदब और लज़ीज़ खानपान तक सीमित नहीं है। इस शहर की एक और खूबसूरत पहचान है, जो सदियों से सुई और धागे के सहारे कपड़ों पर अपनी कहानी लिखती आ रही है—चिकनकारी। एक ऐसी कला, जिसमें कारीगर का धैर्य, कल्पना और अनुभव मिलकर साधारण कपड़े को बेमिसाल बना देते हैं। लेकिन इस खूबसूरती के पीछे एक ऐसी दुनिया भी है, जिसकी मुश्किलों तक हमारी नज़र शायद ही पहुँचती है।

हाल ही में लखनऊ के सुभाष मार्ग स्थित श्री नाथ चिकन सरोवर जाने का अवसर मिला। दुकान में खूबसूरत सूट, साड़ियाँ और आकर्षक डिज़ाइन सजे थे। दुकानदार एक के बाद एक परिधान दिखा रहे थे, लेकिन मेरी नज़र एक महिला कारीगर पर ठहर गई। वह बड़ी तल्लीनता से कपड़े पर कढ़ाई कर रही थीं। उनकी उँगलियों के बीच चलती सुई हर टाँके के साथ एक नई आकृति उकेर रही थी। उस दृश्य में एक अजीब-सी शांति थी, मानो कपड़ा नहीं, किसी की साधना आकार ले रही हो।

महीनों की मेहनत, रोज़ की कमाई कुछ सौ रुपये!

दुकान के मालिक रितेश कुमार बताते हैं कि बारीक और जटिल चिकनकारी वाली एक साड़ी तैयार होने में कभी-कभी तीन से चार महीने तक लग जाते हैं। जिस परिधान को ग्राहक कुछ मिनटों में देखकर पसंद करता है, उसके पीछे महीनों का श्रम और वर्षों का अभ्यास छिपा हो सकता है।

लेकिन उनकी अगली बात मन को छू गई। उनके अनुसार, एक कुशल कारीगर भी दिनभर मेहनत करके लगभग 300 से 400 रुपये ही कमा पाता है।

सोचिए, जिस कला को देखकर हम वाह-वाह करते हैं, उसे रचने वाले व्यक्ति की रोज़मर्रा की ज़रूरतें इतने सीमित संसाधनों में कैसे पूरी होती होंगी? परिवार का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की चिंताएँ—सब उसी मेहनत से जुड़ी हैं।

पसंद और खरीदने की क्षमता के बीच बढ़ती दूरी

रितेश कुमार के अनुसार, आज चिकनकारी का व्यवसाय पहले जैसा आसान नहीं रहा। ग्राहकों की पसंद बदली है, प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और व्यापार के तौर-तरीके भी बदल गए हैं। जिन्होंने समय के साथ नए डिज़ाइन और बाज़ार की आवश्यकताओं को अपनाया, वे टिके रहे। लेकिन कई लोग इस बदलाव के साथ कदम नहीं मिला सके और उनका पारंपरिक हुनर धीरे-धीरे पीछे छूटता गया।

इस स्थिति में ग्राहक की अपनी मजबूरी भी समझनी होगी। हाथ की चिकनकारी पसंद तो लगभग सभी को आती है, लेकिन बढ़ती महँगाई के बीच हर व्यक्ति महँगे हस्तनिर्मित परिधान खरीदने की स्थिति में नहीं होता।

यही वह जगह है, जहाँ मशीनों की भूमिका बढ़ जाती है। कम समय में अधिक उत्पादन और अपेक्षाकृत सस्ती कीमतें ग्राहकों को आकर्षित करती हैं। तकनीक ने नए अवसर दिए हैं, लेकिन हाथ की कढ़ाई के सामने आर्थिक प्रतिस्पर्धा भी खड़ी कर दी है।

विडंबना देखिए—जिस कला की बारीकी उसकी सबसे बड़ी विशेषता है, वही उसे अधिक समय लेने वाली और महँगी भी बनाती है।

क्या केवल बाज़ार तय करेगा हुनर का भविष्य?

चिकनकारी का इतिहास केवल वस्त्रों का इतिहास नहीं, बल्कि पीढ़ियों से अर्जित कौशल और मानवीय संबंधों की कहानी भी है। एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को सुई पकड़ना सिखाया, टाँकों की बारीकियाँ समझाईं और अपने अनुभव आगे बढ़ाए।

लेकिन आज एक युवा के सामने प्रश्न है—क्या इस काम से उसे सम्मानजनक आजीविका मिल पाएगी?

यदि वर्षों के अभ्यास के बाद भी आर्थिक सुरक्षा न मिले, तो नई पीढ़ी का दूसरे व्यवसायों की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है।

यहाँ आवश्यकता परंपरा और आधुनिकता को आमने-सामने खड़ा करने की नहीं, बल्कि उनके बीच संतुलन बनाने की है। बेहतर बाज़ार, उचित पारिश्रमिक, नए डिज़ाइन और तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग—ये सभी मिलकर इस कला को नई दिशा दे सकते हैं।

किसी विरासत का वास्तविक संरक्षण तभी संभव है, जब उसे जीवित रखने वाले लोग भी सम्मान और समृद्धि के साथ जीवन जी सकें।

कहीं तस्वीरों में ही न रह जाए यह खूबसूरती…

दुकान से लौटते समय रंग-बिरंगी साड़ियों से अधिक उस महिला कारीगर की छवि मन में रह गई। वे हाथ, जो बिना किसी शोर के लखनऊ की पहचान को आगे बढ़ा रहे थे।

मन में एक विचार आया—आज हम चिकनकारी पहनकर गर्व महसूस करते हैं, उसकी तस्वीरें साझा करते हैं, उसकी प्रशंसा करते हैं। लेकिन क्या कभी उन लोगों के जीवन के बारे में भी सोचते हैं, जिनकी मेहनत ने इसे इतना खूबसूरत बनाया?

बदलाव जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। फैशन बदलेगा, तकनीक आगे बढ़ेगी और बाज़ार अपनी दिशा तय करेगा। लेकिन इस यात्रा में यदि कारीगर ही पीछे छूट गया, तो हमारी प्रगति अधूरी रह जाएगी।

अगली बार जब आप चिकनकारी का कोई परिधान देखें, तो उसके रंग और डिज़ाइन के साथ उस अदृश्य मेहनत को भी महसूस करने का प्रयास कीजिएगा।

क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि लखनऊ की चिकनकारी कितनी खूबसूरत है…

सवाल यह है कि इस खूबसूरती को रचने वाले हाथों का जीवन कब खूबसूरत होगा?


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