मानव चेतना विकास केंद्र में एक माह के अध्ययन शिविर का शुभारंभ
✍️ मोहित धवन
इंदौर | 20 अक्टूबर 2026
जीवन की एक विचित्र सच्चाई है। हम दुनिया को समझने में अपना अधिकांश समय लगा देते हैं, लेकिन स्वयं को और अपने आसपास के मनुष्यों को कितना समझ पाते हैं? शिक्षा, व्यवसाय, परिवार और सामाजिक संबंधों के बीच हम अनेक भूमिकाएँ निभाते हैं। धीरे-धीरे यही भूमिकाएँ हमारी पहचान बन जाती हैं। लेकिन एक बुनियादी प्रश्न कहीं पीछे छूट जाता है—आखिर मानव होना क्या है?
इसी प्रश्न को समझने की एक नई यात्रा आज मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में शुरू हुई। अवसर था एक माह के अध्ययन शिविर का, जिसका शुभारंभ प्रीति दीदी, ख्याति दीदी और नागेश्वरी दीदी की वंदना से हुआ। वातावरण में आत्मीयता थी और प्रतिभागियों के मन में जीवन को नए दृष्टिकोण से समझने की उत्सुकता भी।
प्रथम सत्र में केंद्र के संस्थापक अजय दायमा जी ने प्रतिभागियों से उनकी अपेक्षाएँ पूछीं। यह सामान्य-सा प्रश्न था, लेकिन इसके पीछे अध्ययन की दिशा छिपी थी। हम यहाँ क्यों आए हैं? कुछ नई जानकारी प्राप्त करने, अपनी पुरानी मान्यताओं की पुष्टि करने या जीवन को वास्तव में समझने?
अजय जी ने अपनी बात एक सरल किंतु गहरे विचार से शुरू की—“सबसे पहले हम एक मानव हैं, उसके बाद बाकी कुछ।” हम स्वयं को पिता, पुत्र, पति, मित्र, अधिकारी या व्यवसायी के रूप में पहचानते हैं। लेकिन क्या हमने कभी यह जानने का प्रयास किया कि इन सभी भूमिकाओं के पीछे जो मानव है, उसकी वास्तविकता क्या है?
उन्होंने अस्तित्व में पहचान और निर्वाह के संबंध को स्पष्ट किया। प्रत्येक इकाई दूसरी इकाई को पहचानती है और उसके अनुसार ही निर्वाह करती है। मानव जीवन में भी यही क्रम है। जब पहचान अधूरी होती है, तो वही कमी संबंधों और व्यवहार में संकट बनकर सामने आती है।
यह विचार हमारे रोजमर्रा के जीवन से गहराई से जुड़ा है। परिवारों में मतभेद, संबंधों में तनाव और समाज में बढ़ता अविश्वास क्या केवल परिस्थितियों का परिणाम हैं? या इनके पीछे एक-दूसरे को ठीक से न पहचान पाने की समस्या भी है? अक्सर हम व्यवहार सुधारने का प्रयास करते हैं, लेकिन उस समझ की ओर ध्यान नहीं देते, जिससे व्यवहार जन्म लेता है।
मानव की कल्पनाशीलता पर चर्चा करते हुए अजय जी ने बताया कि यह हमारी महत्वपूर्ण क्षमता है। लेकिन जब कल्पनाशीलता में भ्रम शामिल हो जाता है, तब निर्वाह में संकट उत्पन्न होने लगते हैं। हम वास्तविकता को जानने के बजाय अपनी धारणाओं के आधार पर निष्कर्ष बनाने लगते हैं।
यहीं से चर्चा एक महत्वपूर्ण विषय पर पहुँची—मानना और जानना। अजय जी के शब्द थे, “जानना बहुत आवश्यक है, मानना बहुत सरल है।” यह अंतर सुनने में छोटा है, लेकिन जीवन पर इसका प्रभाव व्यापक हो सकता है।
हम बचपन से अनेक बातें मानते आए हैं। परिवार, समाज और परंपरा से मिली धारणाएँ हमारी सोच का हिस्सा बन जाती हैं। लेकिन क्या किसी बात को लंबे समय तक मानते रहना, उसे जान लेने का प्रमाण है? आस्था और वास्तविक ज्ञान के बीच यही अंतर अध्ययन की आवश्यकता को सामने लाता है।
अजय जी ने स्पष्ट किया कि मानव को केवल बाहरी अवलोकन से नहीं समझा जा सकता। वास्तविकता को जानना और अनुभव के स्तर पर उसकी पुष्टि आवश्यक है। पूर्णता की पहचान के आधार पर ही हम अपूर्णता को सही अर्थों में समझ सकते हैं।
सत्र का एक और महत्वपूर्ण पक्ष था—भाव की उत्पत्ति। अजय जी ने कहा, “भाव एक आदमी से दूसरे आदमी तक नहीं पहुँचता, भाव हर व्यक्ति के भीतर स्वयं में ही उदय होता है।”
जब हम सच्चाई को जानते हैं, तब दूसरे मानव के प्रति हमारे भीतर स्वाभाविक स्वीकृति उत्पन्न होती है। इसी स्वीकृति से भाव का उदय होता है। जिस व्यक्ति में यह भाव उदय होता है, वह सुखी रहता है और उसकी क्रियाओं को भी उसी से दिशा मिलती है।
लगभग तीन दशक के व्यावसायिक जीवन में मैंने लोगों को समझने और उनके साथ संबंधों का निर्वाह करने का निरंतर प्रयास किया है। लेकिन आज के संवाद ने एक अलग प्रश्न खड़ा किया—क्या लोगों के व्यवहार को समझ लेना ही मानव को समझ लेना है?
शायद नहीं। व्यवहार के पीछे जो विचार, समझ, मान्यता और भाव काम करते हैं, उन्हें जाने बिना हमारी पहचान अधूरी रह सकती है।
अध्ययन शिविर का पहला सत्र किसी अंतिम निष्कर्ष के बजाय एक नई जिज्ञासा के साथ पूरा हुआ। आने वाला एक महीना इन्हीं प्रश्नों पर अध्ययन, संवाद और आत्मपरीक्षण का अवसर होगा।

