डिग्रियां बढ़ती गईं… और जंगल घटते गए!

शिक्षा ने हमें सक्षम तो बनाया, लेकिन क्या समझदार भी बनाया?

✍️ लेखक : अमित जैन | MCVK, इंदौर

📅 30 अक्टूबर 2026, शुक्रवार

एक अनपढ़ व्यक्ति पेड़ काटता है तो कुल्हाड़ी लेकर जंगल जाता है, लेकिन एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति उसी जंगल को साफ करने की पूरी परियोजना तैयार कर सकता है। उसके पास डिग्री है, तकनीक है, पूंजी है और व्यवस्था तक पहुंच भी। सवाल यह नहीं कि दोनों में अधिक शिक्षित कौन है, बल्कि यह है कि अपने निर्णयों के परिणामों को समझने की क्षमता किसमें कितनी है?

आज मानव इतिहास के सबसे शिक्षित और तकनीकी रूप से विकसित दौर में खड़ा है। हमारे पास अत्याधुनिक मशीनें हैं, अंतरिक्ष तक पहुंच है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीक भी। लेकिन इसी दौर में नदियां प्रदूषित हो रही हैं, जंगल सिमट रहे हैं, मिट्टी की उर्वरता घट रही है और जलवायु परिवर्तन गंभीर चुनौती बन गया है।

आखिर यह कैसा विकास है, जिसमें सुविधाएं बढ़ रही हैं, लेकिन जीवन के आधार कमजोर होते जा रहे हैं?

शिक्षा बढ़ी, समझदारी कहां रह गई?

एक व्यक्ति नदी से अपनी आवश्यकता भर पानी लेता है, जबकि कोई औद्योगिक इकाई उसी नदी से लाखों लीटर पानी लेकर उसमें प्रदूषित अपशिष्ट छोड़ सकती है।

यह अंतर केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि शक्ति, तकनीक और उनके उपयोग की दिशा का है।

शिक्षा ने मनुष्य की कार्यक्षमता बढ़ाई है। वह बड़े बांध बना सकता है, पहाड़ काट सकता है और नदियों की दिशा बदल सकता है। लेकिन क्या हमारी शिक्षा ने यह भी सिखाया कि ऐसा करना कितना आवश्यक है और इसके परिणाम क्या होंगे?

ज्ञान का वास्तविक प्रमाण केवल कुछ कर सकने की क्षमता नहीं, बल्कि यह समझ भी है कि क्या करना उचित है और क्या नहीं।

जब प्रकृति संबंध से संसाधन बन गई

भारतीय परंपरा में धरती को माता, नदियों को जीवनदायिनी और वृक्षों को पूजनीय माना गया। यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और संबंध का सांस्कृतिक भाव था।

आधुनिक आर्थिक व्यवस्था में यही धरती भूमि संसाधन, जंगल वन संसाधन और नदियां जल संसाधन कहलाने लगीं।

संसाधन शब्द गलत नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब प्रकृति को केवल आर्थिक लाभ का साधन मान लिया जाता है।

जब जंगल का मूल्य उसकी लकड़ी से, नदी का मूल्य उसके पानी से और पहाड़ का मूल्य उसमें छिपे खनिजों से निर्धारित होने लगे, तब प्रकृति के साथ हमारा संबंध अधूरा हो जाता है।

हम भूल जाते हैं कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि असंख्य जीवों का आश्रय है।

क्या अनपढ़ व्यक्ति अधिक समझदार था?

यह कहना उचित नहीं होगा कि हर अनपढ़ व्यक्ति प्रकृति के प्रति संवेदनशील था और हर शिक्षित व्यक्ति उसका विनाश कर रहा है।

लेकिन एक बात विचारणीय है।

पहले मनुष्य की तकनीकी क्षमता सीमित थी, इसलिए उसके गलत निर्णयों का प्रभाव भी अपेक्षाकृत सीमित रहता था। आज एक गलत औद्योगिक निर्णय हजारों परिवारों और आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित कर सकता है।

जितनी बड़ी हमारी क्षमता होती है, उतनी ही बड़ी हमारी जिम्मेदारी भी होनी चाहिए।

दुर्भाग्य से हमारी शिक्षा व्यवस्था ने क्षमता बढ़ाने पर जितना ध्यान दिया, जिम्मेदारी और सह-अस्तित्व की समझ विकसित करने पर उतना नहीं।

मध्यस्थ दर्शन : शिक्षा की नई दिशा

मध्यस्थ दर्शन मानव जीवन को केवल भौतिक सुविधाओं की प्राप्ति तक सीमित नहीं मानता। यह समाधान, समृद्धि, अभय और सह-अस्तित्व की दिशा में जीने का प्रस्ताव रखता है।

इसके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना या तकनीकी दक्षता विकसित करना नहीं, बल्कि मनुष्य में समझदारी और मानवीय आचरण की योग्यता विकसित करना भी है।

एक इंजीनियर तकनीक का उपयोग करना जानता है, लेकिन क्या वह उसके सामाजिक और पर्यावरणीय परिणामों को भी समझता है?

एक उद्योगपति उत्पादन बढ़ाना जानता है, लेकिन क्या वह प्रकृति और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी समझता है?

एक अर्थशास्त्री विकास दर की गणना कर सकता है, लेकिन क्या वह यह भी देखता है कि उस विकास से मानव जीवन में वास्तविक सुख कितना बढ़ा?

यही प्रश्न शिक्षा के केंद्र में आने चाहिए।

डिग्री नहीं, दिशा बदलने की जरूरत

हमें ऐसे वैज्ञानिक चाहिए जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर खोज करें। ऐसे उद्योगपति चाहिए जो लाभ के साथ सामाजिक जिम्मेदारी समझें। और ऐसे नागरिक चाहिए जो अपनी आवश्यकताओं और असीमित उपभोग की इच्छाओं के बीच अंतर कर सकें।

मानवीय शिक्षा तभी सार्थक है, जब व्यक्ति स्वयं को, परिवार को, समाज को और प्रकृति के साथ अपने संबंध को समझ सके।

हम बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर और सफल उद्यमी बनाना चाहते हैं। लेकिन क्या उतनी ही गंभीरता से उन्हें एक जिम्मेदार, संवेदनशील और समझदार मनुष्य बनाना चाहते हैं?

धरती डिग्रियों से बर्बाद नहीं हुई, बल्कि शिक्षा में सह-अस्तित्व की समझ के अभाव और उसके गलत उपयोग से संकट में पड़ी है।

इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि हम कितने पढ़े-लिखे हैं।

प्रश्न यह है कि इतना पढ़-लिखकर भी क्या हम समझदार हो पाए हैं?


✍️ लेखक परिचय : अमित जैन

पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर अमित जैन जर्मनी और अमेरिका में भी काम कर चुके हैं। पिछले दो वर्षों से वे अपने परिवार के साथ MCVK, इंदौर से जुड़े हुए हैं। ए. नागराज जी द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ दर्शन से गहराई से जुड़े अमित इस दर्शन को केवल समझने तक सीमित न रखकर अपने जीवन में उतारने और समाधानपूर्वक जीने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

प्रकृति के करीब रहकर सहज, संतुलित और सह-अस्तित्वपूर्ण जीवन जीने की इसी चाह ने उन्हें विदेश की चमक-दमक छोड़कर वापस भारत लौटने के लिए प्रेरित किया।

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