बारिश, पहाड़ और नर्मदा के बीच… महेश्वर ने क्यों छू लिया मन?

लेखक : मोहित धवन

सुबह की घड़ी में लगभग साढ़े सात बज रहे थे। इंदौर अभी पूरी तरह जागा भी नहीं था कि हमारी कार महेश्वर की ओर बढ़ चली। रात से हो रही हल्की बारिश अब भी जारी थी। आसमान पर बादलों का साम्राज्य था और सड़क के दोनों ओर फैली हरियाली मानो इस यात्रा का स्वागत कर रही थी। बरसात में मध्य प्रदेश का मालवा अंचल किसी चित्रकार की कैनवास पर उकेरी गई पेंटिंग जैसा दिखाई देता है। ऐसे मौसम में यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचना नहीं रहती, बल्कि हर मोड़ पर एक नया अनुभव बन जाती है।

मेरे साथ पत्नी श्रुति, मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर के डॉ. अभय वानखेड़े और उनकी पत्नी प्रीति जी थे। पूरे रास्ते कभी इतिहास की बातें होतीं, कभी प्रकृति की, तो कभी जीवन की छोटी-छोटी खुशियों की।

स्वाद, जो आधी यात्रा सफल कर देता है

महेश्वर जाने वाले अधिकांश यात्रियों की तरह हमारा पहला पड़ाव था महू।

यहाँ स्थित भँवरीलाल मिठाईवाला पर जैसे ही गरमागरम पोहा और ताज़ी जलेबी सामने आई, लगा कि मध्य प्रदेश के स्वाद की चर्चा यूँ ही नहीं होती। साथ में खस्ता और समोसे ने नाश्ते को और भी यादगार बना दिया।

दुकान के संचालकों से बातचीत में पता चला कि इस प्रतिष्ठान की शुरुआत 1972 में एक छोटी-सी दुकान से हुई थी। आज इंदौर में इसकी कई शाखाएँ हैं, लेकिन स्वाद वही है जिसने पाँच दशक पहले लोगों का दिल जीता था। ऐसे प्रतिष्ठान यह विश्वास दिलाते हैं कि ईमानदारी से किया गया काम समय के साथ केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि विरासत बन जाता है।

महू से गुजरते हुए एक और दिलचस्प जानकारी मिली। प्रसिद्ध क्रिकेट कमेंटेटर दिलीप दोषी का घर भी यहीं है। स्थानीय लोगों ने बताया कि उनके परिवार द्वारा बच्चों के लिए क्रिकेट प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की जाती है। खेल और संस्कृति का यह मेल इस छोटे-से शहर को एक अलग पहचान देता है।

जाम गेट… जहाँ रास्ता रुकने पर मजबूर कर देता है

महू से आगे बढ़ते ही सड़क पहाड़ियों और जंगलों के बीच प्रवेश करने लगी।

बारिश के कारण हर पेड़ धुला हुआ-सा लग रहा था। बादल कभी पहाड़ियों को अपनी आगोश में ले लेते, तो कभी अचानक हट जाते और दूर तक फैली हरी-भरी घाटियाँ दिखाई देने लगतीं। सड़क पर वाहनों की आवाजाही कम थी और प्रकृति का संगीत अधिक।

इसी मार्ग पर स्थित जाम गेट पहुँचे तो कार अपने आप रुक गई। सामने फैली हरियाली, पहाड़ों पर उतरते बादल और हल्की-हल्की फुहारें किसी पोस्टकार्ड जैसे दृश्य का अहसास करा रही थीं।

सड़क किनारे लगी एक पुरानी-सी चारपाई पर बैठकर हमने कुछ देर इस मौसम को महसूस करने का निर्णय लिया। वहीं भुट्टे (कॉर्न) का स्वाद लिया और बारिश के मौसम की सबसे पसंदीदा साथी गरमा-गरम मैगी भी खाई। उस समय भोजन से ज़्यादा आनंद उस माहौल का था—बारिश की फुहारें, सामने फैले हरे-भरे पहाड़, चाय और भुट्टे की खुशबू, और अपनों का साथ।

महेश्वर… जहाँ इतिहास अभी भी जीवित है

कुछ देर बाद नर्मदा के किनारे बसे महेश्वर ने हमारा स्वागत किया।

दूर से दिखाई देता अहिल्याबाई होल्कर का किला जितना भव्य लगता है, उसके भीतर प्रवेश करने पर उससे कहीं अधिक प्रभाव छोड़ता है। पत्थरों से बनी दीवारें, खुले प्रांगण और नर्मदा की ओर खुलती खिड़कियाँ मानो इतिहास के पन्ने जीवंत कर देती हैं।

अहिल्याबाई होल्कर केवल एक शासक नहीं थीं। वे उन विरले व्यक्तित्वों में थीं जिन्होंने सत्ता को जनकल्याण का माध्यम बनाया। उन्होंने देशभर में मंदिर, घाट और धर्मशालाएँ बनवाईं, लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि उन्होंने अपने राज्य के लोगों को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया।

महेश्वर का प्रसिद्ध महेश्वरी साड़ी उद्योग उसी दूरदर्शिता का परिणाम है। स्थानीय बुनकरों को संरक्षण देकर उन्होंने केवल एक उद्योग नहीं बसाया, बल्कि हजारों परिवारों के लिए सम्मानजनक आजीविका का मार्ग खोला। शायद इसी कारण आज भी महेश्वर का नाम लेते ही नर्मदा के साथ महेश्वरी साड़ियों की पहचान भी सामने आती है।

नर्मदा घाट… जहाँ आस्था का अर्थ बदल जाता है

किले की सीढ़ियाँ उतरते ही माँ नर्मदा का विशाल घाट सामने था।

बरसात के कारण नदी अपने पूरे सौंदर्य में बह रही थी। ऊपर खड़ा किला और नीचे शांत जलधारा—यह दृश्य शब्दों में बाँधना कठिन है।

घाट पर श्रद्धालु पूजा कर रहे थे, दीप प्रवाहित कर रहे थे, परिवारों के साथ समय बिता रहे थे। लेकिन जो बात सबसे अधिक प्रभावित कर गई, वह यह थी कि यहाँ वैसा दान-दक्षिणा का आग्रह दिखाई नहीं दिया, जैसा देश के कई बड़े तीर्थस्थलों पर सामान्य बात बन चुका है। श्रद्धा यहाँ सहज लगी, व्यवसाय नहीं।

घाट के आसपास बने प्राचीन शिव मंदिरों की स्थापत्य शैली और उनकी सादगी मन को देर तक बाँधे रखती है।

भोजन, जिसने अपनापन परोस दिया

घूमते-घूमते दोपहर हो चुकी थी। भोजन के लिए हम बाँके बिहारी सात्विक भोजनालय पहुँचे।

यहाँ चौकी पर बैठकर पारंपरिक तरीके से भोजन कराया गया। दाल, सब्ज़ी, रोटी और अन्य व्यंजन स्वादिष्ट तो थे ही, लेकिन उससे कहीं अधिक प्रभावित करने वाली बात थी वहाँ का आत्मीय व्यवहार।

आज जब अधिकांश रेस्तराँ में ग्राहक केवल एक “टेबल नंबर” बनकर रह जाता है, वहाँ ऐसा लगा जैसे किसी अपने के घर भोजन कर रहे हों।

लौटते समय रास्ता वही था, लेकिन मन बदल चुका था

शाम ढल रही थी।

महेश्वर से इंदौर लौटते समय वही पहाड़ियाँ, वही जंगल और वही बारिश फिर हमारे साथ थे, लेकिन अब मन में एक अलग-सी शांति थी।

कार की खिड़की से बाहर देखते हुए मैं और श्रुति बार-बार एक ही बात सोच रहे थे कि यदि डॉ. अभय वानखेड़े और प्रीति जी ने इस यात्रा की योजना न बनाई होती, तो शायद हम महेश्वर को केवल एक पर्यटन स्थल की तरह देखकर लौट आते।

उन्होंने हमें केवल स्थान नहीं दिखाए, बल्कि हर स्थान की कहानी भी समझाई। यही कारण है कि यह यात्रा केवल घूमने की नहीं, बल्कि समझने की यात्रा बन गई।

घर लौटते समय कैमरे में तस्वीरें थीं, मोबाइल में वीडियो थे, लेकिन सबसे कीमती चीज़ हमारे साथ थी—कृतज्ञता।

शायद यात्रा का सबसे बड़ा उद्देश्य भी यही होता है। वह हमें केवल नई जगहें नहीं दिखाती, बल्कि जीवन को देखने का नया दृष्टिकोण भी दे जाती है।

महेश्वर से लौटकर महसूस हुआ कि कुछ शहर अपनी भव्यता से प्रभावित करते हैं, कुछ अपने इतिहास से, लेकिन महेश्वर उन दुर्लभ शहरों में है जो अपनी सादगी, संस्कृति, नर्मदा की शांति और अहिल्याबाई की विरासत के कारण सीधे दिल में बस जाता है।

गुरु पूर्णिमा पर एमसीवीके में मनाया गया ‘कृतज्ञता दिवस’, सहयोग और सह-अस्तित्व के संदेश के साथ साझा किए जीवन अनुभव

लेखक : मोहित धवन

इंदौर, 29 जुलाई।मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर में गुरु पूर्णिमा का पर्व इस वर्ष “कृतज्ञता दिवस” के रूप में मनाया गया। कार्यक्रम में गुरु को केवल पूजनीय व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि जीवन में समझ, सहयोग और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाने वाली चेतना के रूप में स्वीकार करने पर बल दिया गया। इस अवसर पर केंद्र से जुड़े अनेक सदस्यों ने अपने अनुभव साझा किए और बताया कि एमसीवीके से जुड़ने के बाद उनके जीवन में किस प्रकार सकारात्मक परिवर्तन आए हैं।

कार्यक्रम का शुभारंभ नागराज जी के चित्र पर माल्यार्पण एवं गुरु वंदना के साथ हुआ। इसके बाद विभिन्न सदस्यों ने अपने अनुभव साझा किए।

एमसीवीके के संस्थापक अजय दायमा ने अपने उद्बोधन में कहा कि “मनुष्य को जीने में सहयोग करना ही गुरुत्व है।” उन्होंने कहा कि समाज में गुरु को अक्सर एक ऐसे महान व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसके जैसा जीवन सामान्य व्यक्ति नहीं जी सकता। जबकि एमसीवीके की दृष्टि में गुरु वह है, जो स्वयं समाधान, समृद्धि और सह-अस्तित्वपूर्ण जीवन जीते हुए दूसरों को भी उसी दिशा में आगे बढ़ने का सहयोग देता है। उनका उद्देश्य अनुयायी तैयार करना नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं समझदार बनाकर जीवन को समझने योग्य बनाना है। उन्होंने कहा कि गुरु का प्रामाणिक आचरण ही सीखने और अभ्यास की प्रक्रिया को सहज बनाता है।

एमसीवीके के संस्थापक सदस्य डॉ. अभय वानखेड़े ने नागराज बाबा के साथ बिताए अपने संस्मरण साझा किए। उन्होंने बताया कि वर्ष 2010 में बांदा सम्मेलन के दौरान सामूहिक जीवन जीने का निर्णय लिया गया था। उन्होंने कहा कि अस्तित्व में योग पहले से ही विद्यमान है, आवश्यकता केवल उसे सहयोग के रूप में जीने की है। लगभग 28 वर्षों की अपनी यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज समाधान के साथ जीवन जी पाना ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

अनीश खान ने कहा कि एमसीवीके में अभ्यास करते हुए उन्हें यह अनुभव हुआ कि कृतज्ञता जीवन का मूल भाव है। उनके अनुसार किसी भी क्षण मनुष्य के भीतर केवल दो ही स्थितियां हो सकती हैं—किसी के प्रति कृतज्ञता या किसी के प्रति समस्या। जब भी किसी व्यक्ति के प्रति शिकायत का भाव आता है, वे यह समझने का प्रयास करते हैं कि उस व्यक्ति ने ऐसा क्या किया है जिसके लिए उसके प्रति कृतज्ञ हुआ जा सके। यही अभ्यास उनके दृष्टिकोण को बदलने का माध्यम बना।

नेहा गंगवार ने कहा कि उन्हें नागराज बाबा से प्रत्यक्ष मिलने का अवसर नहीं मिला, लेकिन जब भी वे अजय दायमा की आंखों में बाबा के प्रति प्रेम और कृतज्ञता के आंसू देखती हैं, तो उन्हें ऐसा अनुभव होता है मानो वे स्वयं बाबा से मिल चुकी हों। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि एक दिन यह अनुभव प्रत्यक्ष भी होगा। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि वे अभी “11.5 इंच की यात्रा” पूरी कर रही हैं, शेष “आधा इंच” अपने आप पूरा हो जाएगा।

ख्याति दीदी ने अजय दायमा के नागराज बाबा के प्रति समर्पण और कृतज्ञता को अपनी प्रेरणा बताते हुए कहा कि वे भी स्वयं को इस मिशन के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित करने का प्रयास कर रही हैं।

प्रीति दीदी ने कहा कि एमसीवीके से जुड़ने के बाद उन्हें मानव और मानवता को एक नई दृष्टि से समझने का अवसर मिला। अब उन्हें अनुभव होता है कि समझ के साथ सामूहिक जीवन जीना ही वास्तविक समृद्धि है और ऐसा जीवन अकेले संभव नहीं है।

कार्यक्रम में रामेंद्र भैया, मिहिर, अनुभव और ईशान सहित कई अन्य सदस्यों ने भी अपने अनुभव साझा किए और एमसीवीके के साथ अपनी जीवन यात्रा के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।

चंद्र प्रकाश पोरवार ने गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि जीवन में जो समझ उन्हें प्राप्त हुई है, उसके लिए वे सदैव आभारी रहेंगे।

सोमेश साहू ने कहा कि उन्होंने वर्षों पहले तिथियों और विशेष दिनों को मनाना छोड़ दिया था, लेकिन आज का दिन उनके लिए वास्तव में “कृतज्ञता दिवस” है।

सफीना खान ने कहा कि पिछले नौ वर्षों में उन्होंने पहली बार किसी एक व्यक्ति पर पूर्ण विश्वास करना सीखा है। अब उन्हें लगता है कि उनके जीवन में एक समझदार व्यक्ति का सहयोग हमेशा उनके साथ खड़ा है।

आलोक धवन ने कहा कि उनका झुकाव प्रारंभ से ही योग और आध्यात्मिक विषयों की ओर रहा है, लेकिन पिछले दो वर्षों में एमसीवीके के माध्यम से मनुष्य को समझने का जो अवसर मिला, वैसा अनुभव उन्हें पहले कभी प्राप्त नहीं हुआ।

एमसीवीके की संस्थापक सदस्य वर्षा दायमा ने कहा कि उन्होंने नागराज बाबा के साथ सदैव निर्विरोध संबंध का अनुभव किया है। उन्होंने अजय दायमा को अपना अध्ययन गुरु बताते हुए कहा कि उनके सान्निध्य में उन्होंने कृतज्ञता के साथ स्वयं का मूल्यांकन करना सीखा। उन्होंने कहा कि यदि किसी समझदार व्यक्ति का साथ मिल जाए तो प्रगति स्वाभाविक हो जाती है। उन्होंने बताया कि वे वर्तमान में जाग्रत मानव के 122 आचरणों के अध्ययन और अभ्यास की प्रक्रिया में हैं।

समापन अवसर पर विजया दीदी तथा अजय दायमा की माताजी गीता दादी ने अपने आशीर्वचन दिए और सभी को कृतज्ञता, सहयोग तथा समझ के साथ जीवन जीने का संदेश दिया।

कार्यक्रम का संचालन प्रांजल वशिष्ठ ने किया। अंत में चंद्र प्रकाश पोरवार एवं आलोक धवन ने एमसीवीके के संस्थापक अजय दायमा का माल्यार्पण कर उन्हें दुशाला ओढ़ाकर सम्मानित किया।

कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन में मिले सहयोग के प्रति कृतज्ञ होने और स्वयं भी दूसरों के जीवन में सहयोगी बनने का संकल्प लेने का अवसर है। इसी भावना के साथ एमसीवीके में इस वर्ष गुरु पूर्णिमा को “कृतज्ञता दिवस” के रूप में मनाया गया।

उन आँसुओं ने ज़िन्दगी का मकसद बदल दिया

44 बार रक्तदान, भूखों को भोजन और लावारिसों की सेवा—अभिषेक सिंह की प्रेरक कहानी

लेखक : राज खन्ना

कुछ लोग गीत केवल गुनगुनाते हैं, कुछ लोग उन्हें जीते हैं। सुल्तानपुर के युवा अभिषेक सिंह उन लोगों में हैं जिन्होंने मानवता को अपने जीवन का धर्म बना लिया है।

वर्ष 2014 में ग्रामीण परिवेश से निकलकर अभिषेक बी.एससी. की पढ़ाई के लिए कमला नेहरू इंस्टीट्यूट (के.एन.आई.), सुल्तानपुर पहुँचे। कॉलेज में आयोजित एक रक्तदान शिविर में उन्होंने पहली बार प्लास्टिक एनीमिया से पीड़ित मरीज राजन के लिए रक्तदान किया। रक्त मिलने के बाद मरीज के पिता की आँखों से छलकते कृतज्ञता के आँसू अभिषेक के मन पर ऐसी अमिट छाप छोड़ गए कि उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि उनका जीवन केवल अपने लिए नहीं होगा।

इसी दौरान गोमती नदी के पुल से गुजरते हुए उनकी नज़र किनारे बैठे एक वृद्ध पर पड़ी। वृद्ध ने केवल पानी माँगा। बातचीत में पता चला कि तीन दिन से उसके पेट में अन्न का एक दाना तक नहीं गया था। शरीर पर खुले घाव थे, जिनमें कीड़े पड़ चुके थे। उस दृश्य ने अभिषेक को भीतर तक झकझोर दिया। वहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई। उन्होंने निःस्वार्थ सेवा को अपना संकल्प बना लिया।

आज उस घटना को ग्यारह वर्ष बीत चुके हैं। अब 28 वर्षीय अभिषेक 44 बार रक्तदान कर चुके हैं। लेकिन उनकी सेवा केवल रक्तदान तक सीमित नहीं रही। उनका प्रयास है कि शहर में कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए। वर्षों से वे “वन डे हंगर स्ट्राइक” अभियान चला रहे हैं। सड़कों, रेलवे स्टेशनों, फुटपाथों और खुले आसमान के नीचे रहने वाले भूखे, बीमार और लावारिस लोगों तक भोजन पहुँचाना, उन्हें नहलाना-धुलाना, साफ कपड़े पहनाना, घावों की सफाई करना, अस्पताल में भर्ती कराना और उनके स्वस्थ होने तक देखभाल करना अब उनके जीवन की दिनचर्या बन चुकी है। यदि किसी जरूरतमंद की पहचान मिल जाती है तो उसे उसके परिवार तक पहुँचाने का प्रयास भी किया जाता है।

सेवा का यह सफर किसी एक दिन के उत्साह का परिणाम नहीं है। भीषण गर्मी हो या कड़ाके की ठंड, अभिषेक और उनके साथी मदद की हर सूचना पर बिना देर किए पहुँच जाते हैं। ऐसे समय में, जब समाज का दायरा अक्सर अपने परिवार तक सिमटता जा रहा है, अभिषेक जैसे युवा उम्मीद की रोशनी बनकर सामने आते हैं।

अभिषेक के जीवन में कई प्रेरणास्रोत भी रहे। के.एन.आई. में रक्तदान शिविर का आयोजन विधि विभाग के प्रोफेसर डॉ. सुशील कुमार सिंह ने किया था, जो स्वयं अब तक 57 बार रक्तदान कर चुके हैं। समाजसेवी डॉ. आशुतोष श्रीवास्तव 75 बार रक्तदान कर चुके हैं, जबकि करतार केशव यादव चार दशकों से सेवा कार्यों में सक्रिय रहते हुए 40 बार रक्तदान कर चुके हैं। इन सभी के व्यक्तित्व और सेवा भावना ने अभिषेक के भीतर मानवता के प्रति समर्पण को और मजबूत किया।

डेढ़ वर्ष पहले अभिषेक का विवाह शिवानी से हुआ। शिवानी भी उसी सेवा पथ की सहभागी हैं। उन्होंने सगाई के अवसर पर रक्तदान किया और विवाह के बाद भी दो बार रक्तदान कर चुकी हैं। उनके लिए वैवाहिक जीवन केवल साथ रहने का नहीं, बल्कि साथ मिलकर समाज के लिए जीने का संकल्प है।

आज अभिषेक और उनके साथी सुल्तानपुर के सरकारी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, रेलवे स्टेशन और शहर की सड़कों पर पड़े उन लोगों की सेवा कर रहे हैं, जिनका कोई अपना नहीं है। इनमें ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अपनी याददाश्त खो दी है, मानसिक संतुलन खो चुके हैं या परिवार द्वारा छोड़ दिए गए हैं। उनके पास न भोजन है, न रहने का ठिकाना और न उपचार की कोई व्यवस्था। कई लोगों के घावों में कीड़े पड़ चुके होते हैं। दर्द उनकी संवेदनाओं को सुन्न कर चुका होता है।

अभिषेक के साथ प्रज्ज्वल, अनिमेष, विपिन अनुज, निशांत, अभिषेक सोनी सहित कई युवा समाजसेवी डॉ. सुधाकर सिंह, अंकुरण फाउंडेशन और गायत्री परिवार के सहयोग से इस सेवा अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं।

उनकी सेवा यात्रा की अनेक कहानियाँ मन को द्रवित कर देती हैं। जिला अस्पताल के सेप्टिक वार्ड में भर्ती एक वृद्ध महिला दो वर्षों तक अभिषेक की प्रतीक्षा करती थीं। वह उनके हाथों से ही भोजन करती थीं। उनके निधन के बाद अंतिम संस्कार भी अभिषेक और उनके साथियों ने ही किया। बिहार के सीतामढ़ी निवासी राजेश्वर सिंह गंभीर अवस्था में मिले। महीनों की सेवा के बाद स्वस्थ हुए और अपने घर लौट सके। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर निवासी शीतल और मध्य प्रदेश के जबलपुर निवासी केशव सहित अनेक लोगों को भी उन्होंने नया जीवन दिया। कई लोगों के नाम दर्ज हैं, लेकिन उससे कहीं अधिक ऐसे लोग हैं जिनकी कोई पहचान नहीं। सेवा करने वालों के लिए उनकी पहचान से अधिक महत्वपूर्ण उनका जीवन है।

ऐसे लोगों की सेवा आसान नहीं होती। कई लोग बातचीत तक नहीं करते। कुछ भोजन लेने से भी इनकार कर देते हैं। विश्वास जीतने में कई दिन लग जाते हैं। घावों की सफाई और मरहम-पट्टी करते समय वे कभी-कभी नाराज़ भी हो जाते हैं। लेकिन अभिषेक और उनके साथी धैर्य नहीं खोते। वे रोज़ उन्हें खोजते हैं, उनके उपचार का ध्यान रखते हैं और तब तक प्रयास करते हैं जब तक वे स्वस्थ न हो जाएँ। यदि कोई अपने घर का पता बता देता है तो उसे परिवार तक पहुँचाने का प्रयास भी किया जाता है।

पिछले तीन वर्षों से अभिषेक की टीम “वन डे हंगर स्ट्राइक” अभियान चला रही है। लोगों से अपील की जाती है कि वे महीने में एक समय उपवास रखें और उस भोजन पर होने वाला लगभग पचास रुपये का खर्च इस अभियान को दें। इस पहल को समाज का भरपूर सहयोग मिला है। अनेक परिवार अपने घर के शुभ अवसरों पर भी इस अभियान के लिए सहयोग राशि देने लगे हैं। हर शाम युवा स्वयंसेवक शहर के विभिन्न इलाकों में जरूरतमंदों की पहचान करते हैं और ढाबों से भोजन पैक कराकर उनके बीच वितरित करते हैं।

अभिषेक कहते हैं कि समाज में सहयोग करने वालों की कोई कमी नहीं है, आवश्यकता केवल भरोसा जीतने की होती है। यदि नीयत साफ हो और प्रयास ईमानदार हों तो लोग स्वयं आगे आकर साथ खड़े होते हैं। यही विश्वास उनकी सबसे बड़ी पूंजी है।

मानवता के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए उन्हें स्वामी विवेकानंद यूथ अवॉर्ड, उत्तर प्रदेश रत्न और रक्तयोद्धा सम्मान सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान किसी असहाय व्यक्ति के चेहरे पर लौटती मुस्कान है।

सच तो यह है कि अभिषेक सिंह केवल यह गीत गुनगुनाते नहीं—

“किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,
किसी के वास्ते हो अपने दिल में प्यार…”

उन्होंने इसे अपने जीवन का आचरण बना लिया है। उनसे एक बार मिलिए, संभव है कि मानवता पर आपका विश्वास और गहरा हो जाए..

लेखक परिचय :

राज खन्ना हिंदी पत्रकारिता के वरिष्ठ और सम्मानित हस्ताक्षरों में से एक हैं। पिछले लगभग पाँच दशकों से वे राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और विभिन्न प्रतिष्ठित प्रकाशनों में निरंतर लेखन कर रहे हैं। सामाजिक सरोकारों, मानवीय संवेदनाओं, समसामयिक विषयों और जीवन-मूल्यों पर उनकी लेखनी ने पाठकों के बीच एक विशिष्ट पहचान बनाई है।

तथ्यों की प्रामाणिकता, संवेदनशील दृष्टि और सहज अभिव्यक्ति उनकी लेखन शैली की विशेषता रही है। यही कारण है कि देशभर में उनका एक बड़ा और समर्पित पाठक वर्ग है, जो वर्षों से उनके लेखों को विश्वास और आत्मीयता के साथ पढ़ता आया है। हिंदी पत्रकारिता में उनका योगदान नई पीढ़ी के लेखकों और पत्रकारों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।

क्या भारत का मिडिल क्लास अब जोखिम लेने लगा है?

लेखक : मोहित धवन

एक समय था, जब भारतीय मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी आकांक्षा एक सुरक्षित नौकरी हुआ करती थी। घर में यदि कोई सरकारी अधिकारी, इंजीनियर, डॉक्टर या बैंक कर्मचारी बन जाए, तो मानो जीवन सफल हो गया। माता-पिता की सबसे बड़ी चिंता यही होती थी कि बच्चे का भविष्य सुरक्षित रहे। जोखिम उठाना समझदारी नहीं, बल्कि लापरवाही माना जाता था।

लेकिन आज जब हम अपने आसपास देखते हैं, तो लगता है कि भारत का मध्यम वर्ग चुपचाप बदल रहा है।

यह बदलाव केवल कमाई के तरीकों का नहीं, बल्कि सोच का है। वह पीढ़ी, जो कभी असफल होने से डरती थी, अब नए रास्ते बनाने का साहस भी जुटा रही है। इंटरनेट, तकनीक और बदलती अर्थव्यवस्था ने अवसरों के ऐसे दरवाज़े खोले हैं, जिनकी कल्पना दो-तीन दशक पहले शायद ही किसी ने की होगी।

याद कीजिए, बचपन में हम सबने एक कहावत सुनी थी—“पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब।” यह केवल कहावत नहीं थी, बल्कि उस दौर के मध्यम वर्ग की सोच थी। खेल, संगीत, कला या व्यवसाय को करियर नहीं माना जाता था। सफलता का रास्ता लगभग तय था—अच्छी पढ़ाई, अच्छी नौकरी और एक सुरक्षित जीवन।

लेकिन नई पीढ़ी ने इस सोच को लगभग उलट दिया है।

भारतीय क्रिकेट इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। महेंद्र सिंह धोनी रांची जैसे शहर से निकलकर विश्व क्रिकेट के सबसे सफल कप्तानों में शामिल होते हैं। जसप्रीत बुमराह साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ तेज़ गेंदबाज़ों में गिने जाते हैं। हार्दिक और क्रुणाल पंड्या के संघर्ष की कहानी आज लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है। महिला क्रिकेट में झूलन गोस्वामी, हर्मनप्रीत कौर और स्मृति मंधाना जैसी खिलाड़ियों ने यह साबित किया कि प्रतिभा आर्थिक स्थिति की मोहताज नहीं होती।

आज देश के लाखों माता-पिता अपने बच्चों को क्रिकेट अकादमी, बैडमिंटन कोर्ट, तैराकी या फुटबॉल के मैदान तक स्वयं छोड़ने जाते हैं। यह दृश्य तीस साल पहले इतना सामान्य नहीं था। खेल अब केवल शौक नहीं, सम्मानजनक करियर भी है।

यही बदलाव डिजिटल दुनिया में भी दिखाई देता है।

यदि यह लेख बीस वर्ष पहले लिखा जाता, तो शायद “यूट्यूबर” शब्द भी इसमें जगह नहीं पाता। आज सौरव जोशी जैसे युवा एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर करोड़ों लोगों तक अपनी पहुँच बना चुके हैं। उनकी सफलता यह बताती है कि आज का भारत केवल डिग्री नहीं, रचनात्मकता और निरंतर मेहनत को भी पहचान देता है। कम उम्र में उन्होंने जिस स्तर की लोकप्रियता और आर्थिक सफलता हासिल की, वह इस बात का संकेत है कि तकनीक ने अवसरों की दुनिया को कितना बदल दिया है।

इसी तरह गौरव तनेजा की कहानी भी नए भारत की कहानी है। आईआईटी से इंजीनियरिंग, एक सफल कमर्शियल पायलट का करियर, और फिर सब कुछ छोड़कर डिजिटल दुनिया में अपनी नई पहचान बनाना—यह केवल पेशा बदलने का निर्णय नहीं था, बल्कि यह विश्वास था कि जीवन में सफलता के रास्ते अब पहले जितने सीमित नहीं रहे।

यह बदलाव केवल कुछ चर्चित चेहरों तक सीमित नहीं है।

शार्क टैंक इंडिया जैसे मंचों पर पहुँचने वाले अधिकांश युवा उद्यमियों को देखिए। उनमें बड़ी संख्या ऐसे परिवारों से आती है जिन्हें हम भारतीय मध्यम वर्ग कहते हैं। उनके पास विरासत में बड़े उद्योग नहीं थे, लेकिन उनके पास एक विचार था, समस्या का समाधान था और उस पर विश्वास करने का साहस था। यही विश्वास आज भारत को दुनिया के सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम में शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ा रहा है।

दरअसल, तकनीक ने अवसरों का लोकतंत्रीकरण कर दिया है। आज किसी छोटे शहर का युवा भी अपने मोबाइल फोन से दुनिया तक पहुँच सकता है। कंटेंट क्रिएशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल मार्केटिंग, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन शिक्षा और फ्रीलांसिंग जैसे क्षेत्रों ने करियर की परिभाषा बदल दी है। अब सफलता केवल नियुक्ति पत्र से नहीं, बल्कि अपने कौशल और विचारों से भी तय होने लगी है।

इसका अर्थ यह नहीं कि सुरक्षित नौकरी का महत्व समाप्त हो गया है। भारत के छोटे शहरों और कस्बों में आज भी सरकारी और स्थायी नौकरियाँ आकर्षण का केंद्र हैं। लेकिन यह भी सच है कि महानगरों और तेजी से बदलते शहरी भारत में युवा अब केवल नौकरी खोजने की नहीं, बल्कि अवसर बनाने की भी सोच रहे हैं।

बेशक, हर स्टार्टअप सफल नहीं होगा, हर यूट्यूब चैनल करोड़ों दर्शक नहीं जुटाएगा और हर खिलाड़ी राष्ट्रीय टीम तक नहीं पहुँचेगा। लेकिन आज का युवा इतना अवश्य समझ गया है कि असफलता जीवन का अंत नहीं होती। कई बार वही अगली सफलता की पहली सीढ़ी बन जाती है।

शायद भारतीय मध्यम वर्ग का सबसे बड़ा परिवर्तन यही है। उसने अपने बच्चों के सपनों की सीमाएँ बढ़ा दी हैं। अब घरों में केवल यह नहीं पूछा जाता कि “नौकरी कहाँ मिलेगी?”, बल्कि यह भी पूछा जाने लगा है—“तुम्हें सचमुच करना क्या है?”

संभव है, आने वाले दशक में भारत की सबसे बड़ी ताकत केवल उसकी युवा आबादी नहीं होगी, बल्कि वही बदलता हुआ मध्यम वर्ग होगा, जिसने सुरक्षा और सपनों के बीच एक नया संतुलन बना लिया है।

और शायद यही नए भारत की सबसे बड़ी कहानी है—जहाँ मध्यम वर्ग अब अपने बच्चों को केवल सुरक्षित भविष्य नहीं, बल्कि अपनी पसंद का भविष्य चुनने का साहस भी देने लगा है।

संपादकीय

लोकतंत्र की खामोशी और एक अनशन का शोर

लेखक : मोहित धवन
दिनांक : 24 जुलाई, 2026

लोकतंत्र की विडंबना देखिए। जिस व्यवस्था का जन्म जनता की आवाज़ सुनने के लिए हुआ था, उसी व्यवस्था में आज जनता को अपनी आवाज़ सुनाने के लिए अनशन करना पड़ रहा है। सवाल यह नहीं कि सोनम वांगचुक ने अपना अनशन समाप्त कर दिया। असली सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र अब केवल तब जागता है, जब कोई नागरिक अपने शरीर को ही प्रतिरोध का अंतिम माध्यम बना ले?

जंतर-मंतर पर बैठा एक व्यक्ति केवल उपवास नहीं कर रहा था। वह इस लोकतंत्र के सामने एक आईना रखे बैठा था। उस आईने में केवल सरकार का चेहरा नहीं दिख रहा था; उसमें संसद, राजनीतिक दल, नौकरशाही, न्याय व्यवस्था, मीडिया और हम सब दिखाई दे रहे थे। फर्क बस इतना था कि उस आईने में झाँकने का साहस बहुत कम लोगों ने किया।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद मानी जाती है। लेकिन यदि संवाद का दरवाज़ा तब खुलता है, जब किसी की साँसें दाँव पर लग जाएँ, तो इसे लोकतंत्र की परिपक्वता नहीं कहा जा सकता। तब यह मान लेना चाहिए कि कहीं न कहीं संवाद की संस्थाएँ केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं।

यह केवल सोनम वांगचुक का प्रश्न नहीं है। कभी किसान दिल्ली की सीमाओं पर बैठते हैं, कभी छात्र सड़कों पर उतरते हैं, कभी बेरोज़गार युवा रेल की पटरियों पर अपना भविष्य खोजते दिखाई देते हैं। हर बार व्यवस्था कुछ दिन असहज होती है, फिर आश्वासनों का एक नया पुल बना दिया जाता है। लेकिन पुल के नीचे बह रही असंतोष की नदी वहीं की वहीं रहती है।

लोकतंत्र में विरोध समस्या नहीं होता, विरोध की अनसुनी समस्या होती है।

सवाल यह भी नहीं कि सरकार सही है या आंदोलन। सवाल यह है कि क्या हमने लोकतंत्र को केवल बहुमत की गणित तक सीमित कर दिया है? क्या पाँच वर्ष में एक बार मतदान कर देना ही नागरिक होने का प्रमाणपत्र है? क्या उसके बाद प्रश्न पूछना असुविधाजनक और उत्तर देना राजनीतिक जोखिम बन गया है?

लोकतंत्र का संकट तब शुरू होता है, जब सत्ता आलोचना को सलाह नहीं, चुनौती समझने लगे और समाज असहमति को राष्ट्र-विरोध का पर्याय बना दे। उस दिन लोकतंत्र बाहर से नहीं टूटता, भीतर से खोखला होने लगता है।

यह भी उतना ही सच है कि हर समस्या का समाधान सरकार के पास नहीं हो सकता। हर युवा को सरकारी नौकरी देना किसी भी देश के लिए संभव नहीं है। लेकिन यह प्रश्न अवश्य पूछा जाना चाहिए कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था युवाओं को जीवन के लिए तैयार कर रही है या केवल परीक्षाओं के लिए? हमने डिग्रियों का अंबार तो खड़ा कर दिया, लेकिन कौशल, उद्यमिता और जीवनोपयोगी शिक्षा को अभी भी हाशिए पर रखा हुआ है।

यदि भारत को आने वाले दशकों में आत्मनिर्भर बनना है, तो रोजगार की बहस को सरकारी नियुक्तियों से आगे ले जाना होगा। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को ऐसे युवाओं का निर्माण करना होगा, जो अवसर खोजने के बजाय अवसर पैदा करें। शिक्षा का उद्देश्य नौकरी नहीं, क्षमता होना चाहिए।

लेकिन शायद इससे भी बड़ा संकट हमारी विकास-दृष्टि का है।

हमने प्रकृति को संसाधन समझा, संबंध नहीं। नदियों को परियोजना, जंगलों को भूमि और पहाड़ों को खनिज में बदल दिया। विकास की दौड़ में मनुष्य प्रकृति से जितना दूर हुआ, उतना ही स्वयं से भी दूर होता गया। सोनम वांगचुक जैसे लोग बार-बार हमें याद दिलाते हैं कि सभ्यता केवल ऊँची इमारतों से नहीं बनती; वह मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन से बनती है। यदि विकास पृथ्वी को घायल करके होगा, तो अंततः मनुष्य भी सुरक्षित नहीं रहेगा।

शायद अब समय केवल सरकार से अपेक्षा करने का नहीं, समाज से भी प्रश्न पूछने का है।

क्या हमने अपने बीच ऐसे नेतृत्व को तैयार किया है, जो चुनाव जीतने के लिए नहीं, समाज को दिशा देने के लिए खड़ा हो? क्या विश्वविद्यालय केवल डिग्रियाँ बाँट रहे हैं या विचार भी पैदा कर रहे हैं? क्या उद्योग केवल लाभ कमाने तक सीमित हैं या सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने को भी तैयार हैं? क्या बुद्धिजीवी केवल बहस कर रहे हैं या समाज के बीच उतरकर संवाद भी कर रहे हैं?

हर परिवर्तन संसद से नहीं आता। कुछ परिवर्तन समाज की चेतना से जन्म लेते हैं। इतिहास में वही समाज आगे बढ़े हैं, जिन्होंने अपने भीतर ऐसे लोगों को जन्म दिया, जो सत्ता से पहले समाज को बदलने निकले।

आज लोकतंत्र को किसी नए संविधान की आवश्यकता नहीं है। उसे नए नागरिकों की आवश्यकता है। ऐसे नागरिक, जो अधिकारों के साथ अपने दायित्वों को भी समझें। ऐसे नेता, जो सत्ता से पहले समाज के प्रति जवाबदेह हों। ऐसी शिक्षा, जो केवल करियर नहीं, चरित्र भी बनाए। और ऐसा विकास, जिसमें मनुष्य, प्रकृति और अर्थव्यवस्था तीनों साथ चल सकें।

सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त हो गया है। लेकिन लोकतंत्र के सामने रखे गए प्रश्न अभी भी उपवास पर हैं।

शायद किसी लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं होती। उसकी असली परीक्षा तब होती है, जब वह अपने सबसे शांत, सबसे कमजोर और सबसे असुविधाजनक प्रश्न को भी उतनी ही गंभीरता से सुन सके, जितनी गंभीरता से वह चुनावी नारों को सुनता है।

और यदि किसी लोकतंत्र में प्रश्न पूछने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही हो, तो शायद समस्या प्रश्नों में नहीं, उन उत्तरों में है जो अब तक दिए ही नहीं गए।

जब एक बेटे की स्मृतियाँ बन गईं सैकड़ों बच्चों के सपनों की रोशनी

तन्मय फाउंडेशन: शिक्षा के माध्यम से समाज में बदलाव की एक प्रेरक पहल

लेखक : मोहित धवन
लखनऊ | 24 जुलाई, 2026

जीवन में कुछ ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जो किसी भी परिवार को भीतर तक झकझोर देती हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने सबसे बड़े व्यक्तिगत दुःख को समाज के लिए नई आशा और नई ऊर्जा में बदल देते हैं। लखनऊ स्थित तन्मय फाउंडेशन इसी मानवीय संवेदना, सेवा और सकारात्मक सोच का एक प्रेरक उदाहरण है। यह संस्था केवल एक सामाजिक संगठन नहीं, बल्कि एक माता-पिता के अपने बेटे के प्रति प्रेम और समाज के प्रति दायित्व का जीवंत स्वरूप है।

30 जुलाई 2023 का दिन देश दीपक शर्मा और नंदिता शर्मा के जीवन में ऐसा दर्द लेकर आया जिसकी कल्पना भी कोई माता-पिता नहीं करना चाहते। उनके इकलौते पुत्र तन्मय शर्मा का मात्र 25 वर्ष की आयु में आकस्मिक निधन हो गया। तन्मय एक मेधावी, संवेदनशील और होनहार युवा थे। उन्होंने देहरादून से एमबीए की शिक्षा पूरी करने के बाद हाल ही में प्रतिष्ठित वैश्विक कंपनी डेलॉइट (Deloitte) में अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत की थी। उनका भविष्य उज्ज्वल था और परिवार ने उनके लिए अनेक सपने संजोए थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

उस समय उनके पिता देश दीपक शर्मा एक प्रतिष्ठित बेल्जियम की कंपनी में एशिया प्रमुख (Head – Asia) के पद पर कार्यरत थे। बेटे के असमय निधन ने पूरे परिवार को गहरे शोक में डुबो दिया। ऐसे कठिन समय में अधिकांश लोग अपने दुःख तक ही सीमित रह जाते हैं, लेकिन शर्मा दंपत्ति ने अपने बेटे की स्मृतियों को समाज सेवा से जोड़ने का निर्णय लिया। उन्होंने संकल्प लिया कि तन्मय का नाम केवल परिवार की यादों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन बच्चों के जीवन में जीवित रहेगा जिन्हें शिक्षा और अवसरों की सबसे अधिक आवश्यकता है। इसी संकल्प से तन्मय फाउंडेशन की स्थापना हुई।

फाउंडेशन का मूल विश्वास है कि किसी व्यक्ति की सबसे सच्ची श्रद्धांजलि उसके नाम पर स्मारक बनाना नहीं, बल्कि ऐसा कार्य करना है जो समाज में स्थायी परिवर्तन लाए। इसी सोच के साथ संस्था ने शिक्षा को अपना प्रमुख माध्यम बनाया। उनका मानना है कि शिक्षा केवल पुस्तकों का ज्ञान नहीं देती, बल्कि आत्मविश्वास, सोचने की क्षमता, निर्णय लेने की शक्ति और जीवन को नई दिशा देने का माध्यम भी बनती है।

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अनेक ऐसे बच्चे हैं जो प्रतिभाशाली होने के बावजूद संसाधनों, मार्गदर्शन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव में अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुँच पाते। तन्मय फाउंडेशन ने इसी चुनौती को अपना कार्यक्षेत्र बनाया है। संस्था पहली से बारहवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने, उनके समग्र विकास को प्रोत्साहित करने तथा उन्हें एक ऐसा वातावरण देने का प्रयास कर रही है जहाँ वे आत्मविश्वास के साथ सीख सकें और अपने सपनों को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ सकें।

इसी उद्देश्य को साकार करने के लिए फाउंडेशन ने ग्रामीण क्षेत्रों में ‘तन्मय स्टडी सेंटर्स’ की शुरुआत की। वर्तमान में ऐसे छह अध्ययन केंद्र पूरी सक्रियता के साथ संचालित हो रहे हैं। यहाँ प्रतिदिन शाम चार बजे से छह बजे तक नियमित कक्षाएँ लगती हैं। ये केंद्र केवल अतिरिक्त पढ़ाई का स्थान नहीं हैं, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण और सीखने की संस्कृति विकसित करने का माध्यम भी हैं।

इन स्टडी सेंटर्स की सबसे बड़ी विशेषता उनका अनूठा शिक्षण मॉडल है। बच्चों को पढ़ाने का दायित्व उन स्थानीय युवाओं को सौंपा गया है जिन्होंने बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण की है और स्वयं विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। इससे ग्रामीण बच्चों को अपने ही क्षेत्र के प्रेरित और ऊर्जावान शिक्षक मिलते हैं, जबकि युवाओं को समाज सेवा के साथ-साथ नेतृत्व और शिक्षण का व्यावहारिक अनुभव भी प्राप्त होता है। यह मॉडल समुदाय को स्वयं अपने विकास की प्रक्रिया का सहभागी बनाता है।

शिक्षा की गुणवत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए फाउंडेशन ने यह व्यवस्था बनाई है कि एक शिक्षक अधिकतम 25 विद्यार्थियों को ही पढ़ाएगा। इससे प्रत्येक बच्चे पर व्यक्तिगत ध्यान दिया जा सकता है और उसकी शैक्षणिक प्रगति पर निरंतर निगरानी रखी जा सकती है। यही व्यवस्था इन अध्ययन केंद्रों को सामान्य ट्यूशन कक्षाओं से अलग पहचान देती है।

तन्मय फाउंडेशन का प्रयास केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है। संस्था बच्चों के बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक विकास को समान महत्व देती है। प्रत्येक अध्ययन केंद्र पर कंप्यूटर उपलब्ध कराए गए हैं ताकि ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे भी डिजिटल शिक्षा से जुड़ सकें। बच्चों में पढ़ने की आदत और सकारात्मक सोच विकसित करने के लिए प्रेरणादायक कहानी-पुस्तकों की लाइब्रेरी बनाई गई है। साथ ही उनके शारीरिक विकास, टीम भावना और आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए खेल सामग्री भी उपलब्ध कराई गई है।

ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक संसाधनों की कमी अक्सर बच्चों की शिक्षा में सबसे बड़ी बाधा बनती है। इस चुनौती को समझते हुए तन्मय फाउंडेशन अध्ययन केंद्रों की लगभग सभी आवश्यकताओं का खर्च स्वयं वहन करता है। बच्चों को स्टेशनरी, गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री, विशेष स्टडी सेंटर टी-शर्ट तथा अन्य आवश्यक शैक्षणिक संसाधन पूरी तरह निःशुल्क उपलब्ध कराए जाते हैं, ताकि कोई भी बच्चा केवल आर्थिक कारणों से शिक्षा से वंचित न रहे।

इतना ही नहीं, इन केंद्रों में अपनी सेवाएँ देने वाले युवा शिक्षकों को भी नियमित रूप से सम्मानजनक मानदेय (ऑनरेरियम) प्रदान किया जाता है। इससे उनके कार्य का सम्मान भी होता है और वे पूरी निष्ठा एवं निरंतरता के साथ बच्चों का मार्गदर्शन कर पाते हैं।

तन्मय फाउंडेशन का विज़न केवल छह अध्ययन केंद्रों तक सीमित नहीं है। संस्था एक ऐसे समाज की कल्पना करती है जहाँ प्रत्येक बच्चे को उसकी आर्थिक या सामाजिक परिस्थितियों से परे समान अवसर प्राप्त हों। विशेष रूप से सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के बीच गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, उत्कृष्टता और सामुदायिक सहभागिता की संस्कृति विकसित करना फाउंडेशन की प्राथमिकताओं में शामिल है। उनका विश्वास है कि यदि बच्चों को सही मार्गदर्शन और अवसर मिलें, तो वही बच्चे भविष्य में अपने परिवार, अपने गाँव और पूरे समाज के विकास के वाहक बन सकते हैं।

आज तन्मय शर्मा भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका नाम उन सैकड़ों बच्चों की मुस्कान, उनकी पढ़ाई और उनके सपनों में जीवित है जो प्रतिदिन इन अध्ययन केंद्रों में नई उम्मीदों के साथ पहुँचते हैं। देश दीपक शर्मा और नंदिता शर्मा की यह पहल इस बात का प्रेरक उदाहरण है कि व्यक्तिगत दुःख को भी समाज सेवा के संकल्प में बदला जा सकता है।

तन्मय फाउंडेशन आज केवल एक संस्था नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, शिक्षा और निस्वार्थ सेवा का एक सशक्त अभियान बन चुका है। यह पहल हमें विश्वास दिलाती है कि जब किसी परिवार का प्रेम समाज के कल्याण से जुड़ जाता है, तब वह केवल एक स्मृति को जीवित नहीं रखता, बल्कि अनगिनत बच्चों के भविष्य को भी नई रोशनी से आलोकित कर देता है। यही तन्मय शर्मा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है और यही इस प्रेरक यात्रा का सबसे सुंदर संदेश भी।

38 वर्षों से मानवता की सेवा का पर्याय बना अंकितग्राम सेवाधाम आश्रम

दिवंगत अंकित की 42वीं जयंती पर सेवा, संस्कार, पर्यावरण संरक्षण और मानवीय शिक्षा का प्रेरक आयोजन

लेखक : मोहित धवन

उज्जैन, 22 जुलाई। सेवा, संवेदना और मानवीय मूल्यों को समर्पित अंकितग्राम सेवाधाम आश्रम में दिवंगत अंकित की 42वीं जयंती के अवसर पर सेवा, सम्मान, पर्यावरण संरक्षण एवं सामाजिक जागरूकता से जुड़े विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK) के संस्थापक अजय दायमा रहे। उन्होंने दिवंगत अंकित की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर दीप प्रज्ज्वलित किया तथा पौधारोपण कर 45 दिवसीय राष्ट्रीय हरित अभियान का शुभारंभ किया।

अपने प्रेरक उद्बोधन में अजय दायमा ने कहा कि आज समाज जिस व्यवस्था को शिक्षा मान रहा है, वह वास्तविक शिक्षा नहीं, बल्कि केवल साक्षरता है। उन्होंने कहा कि डिग्री प्राप्त कर लेना, प्रशिक्षण हासिल कर लेना अथवा डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस या अन्य किसी प्रतिष्ठित पद तक पहुँच जाना व्यक्ति को केवल पेशेवर बनाता है, लेकिन वास्तविक अर्थों में शिक्षित नहीं बनाता।

उन्होंने कहा कि मानव सभ्यता ने पशु-पक्षियों, प्रकृति, चाँद, अंतरिक्ष, चिकित्सा विज्ञान और अनेक विषयों पर गहन अध्ययन किया है, लेकिन आज तक मनुष्य ने स्वयं मनुष्य को समझने का गंभीर प्रयास नहीं किया। यही कारण है कि भौतिक प्रगति के बावजूद समाज में तनाव, असंतोष और रिश्तों में दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। उन्होंने कहा, “जिस दिन हम मनुष्य को समझना सीख जाएंगे और यह जान जाएंगे कि समाधान, समृद्धि और खुशहाली के साथ एक-दूसरे के साथ कैसे जीना है, उसी दिन हम वास्तविक अर्थों में शिक्षित कहलाएँगे।”

अजय दायमा ने बताया कि मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK) वर्षों से इसी मानवीय शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि MCVK से जुड़े लोगों ने समाज के सामने ऐसा जीवन मॉडल प्रस्तुत किया है, जहाँ धन कमाने की अंधी दौड़, वेतन की चिंता या भविष्य की असुरक्षा के बजाय समाधान, समृद्धि, सहयोग, विश्वास और खुशहाली के साथ सामूहिक जीवन जीने का प्रयास किया जाता है। उन्होंने सेवाधाम से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं और सदस्यों का आह्वान किया कि वे MCVK आकर इस जीवन मॉडल को समझें और अनुभव करें। उनका कहना था कि यदि यह मानवीय शिक्षा का मॉडल व्यापक स्तर पर समाज तक पहुँचा, तो सेवाधाम जिन हजारों लोगों के जीवन से जुड़ा है, उन्हें केवल सेवा ही नहीं, बल्कि बेहतर इंसान बनने की दिशा भी मिल सकेगी।

कार्यक्रम में आश्रम के संस्थापक सुधीर भाई गोयल ने कहा कि अंकितग्राम सेवाधाम आश्रम पिछले 38 वर्षों से निराश्रित, दिव्यांग, परित्यक्त महिलाओं, बेसहारा बुजुर्गों और बच्चों की सेवा में समर्पित है। वर्ष 1989 में स्थापित इस संस्था ने अब तक 10 हजार से अधिक लोगों को आश्रय, चिकित्सा, शिक्षा, पुनर्वास और सम्मानपूर्ण जीवन प्रदान किया है। वर्तमान में आश्रम में एक हजार से अधिक लोग निवास कर रहे हैं, जिनमें नवजात शिशुओं से लेकर 90 वर्ष तक के बुजुर्ग शामिल हैं।

उन्होंने बताया कि आश्रम में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को परिवार जैसा वातावरण दिया जाता है। कई ऐसे सदस्य, जो कभी स्वयं आश्रम के आश्रित थे, आज स्वस्थ होकर यहीं दूसरों की सेवा कर रहे हैं। यह सेवाधाम की पुनर्वास व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता है। उन्होंने यह भी बताया कि आश्रम के अनेक बच्चे योग, संगीत, कला और खेलों में असाधारण प्रतिभा रखते हैं तथा उचित मार्गदर्शन मिलने पर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँच सकते हैं।

कार्यक्रम के दौरान सेवाधाम परिवार ने MCVK से आए अतिथियों का पारंपरिक रूप से पगड़ी एवं दुशाला पहनाकर सम्मान किया। इसके बाद अतिथियों ने आश्रम का भ्रमण कर विभिन्न सेवा गतिविधियों, चिकित्सा व्यवस्था और पुनर्वास कार्यों का अवलोकन किया।

इस अवसर पर सेवाधाम के बच्चों ने योग एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से सभी का मन मोह लिया। साथ ही 22 जुलाई से 4 सितंबर तक चलने वाले 45 दिवसीय राष्ट्रीय हरित अभियान का शुभारंभ किया गया। अभियान के अंतर्गत प्रतिदिन एक लाख पौधे लगाने का संकल्प लिया गया है। इसी दौरान गुरुग्राम के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् एवं ‘ट्री मैन’ डॉ. दीपक रमेश गौर को सेवाधाम के साथ हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत राष्ट्रीय ग्रीन एम्बेसडर नियुक्त किए जाने की घोषणा भी की गई।

कार्यक्रम के सफल आयोजन में सेवाधाम की ओर से कांता बहन, मोनिका गौरी, मंजू बनवासी, सचिन गोयल, अनीता जी, पार्थ गोयल एवं कोमल गोयल ने विशेष भूमिका निभाई। वहीं MCVK की ओर से आलोक धवन, अंजली, श्रुति धवन, सुमन जी, सोनू सचान, योग्या भूमि, शिवानी एवं दीक्षा ने सहभागिता करते हुए सेवा कार्यों का अवलोकन किया।

उल्लेखनीय है कि अंकितग्राम सेवाधाम आश्रम की अध्यक्षता समय-समय पर हिन्दी साहित्य की अनेक प्रतिष्ठित विभूतियों ने की है। इनमें राष्ट्रकवि डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ तथा प्रख्यात साहित्यकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक जैसे सम्मानित नाम शामिल रहे हैं। वर्तमान में संस्था के अध्यक्ष डॉ. ऋषि मोहन भटनागर हैं। दिवंगत अंकित की 42वीं जयंती पर आयोजित यह कार्यक्रम सेवा, मानवीय शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण के समन्वय का प्रेरक उदाहरण बनकर सामने आया।

बाजपेयी जी की कचौड़ी: एक दोना, दो कचौड़ियाँ और पूरा लखनऊ

— मोहित धवन

किसी शहर की पहचान सिर्फ़ उसके स्मारकों से नहीं होती, उसकी सुबहों से भी होती है। लखनऊ की सुबह का अपना अलग ही मिज़ाज है। कहीं गोमती किनारे टहलते लोग, कहीं कुल्हड़ की चाय से उठती भाप, कहीं अख़बार हाथ में लिए बुज़ुर्ग… और इन्हीं सबके बीच हज़रतगंज की एक ऐसी खुशबू, जो दशकों से लोगों को अपनी ओर खींचती चली आ रही है—बाजपेयी कचौड़ी भंडार की गरमागरम कचौड़ियाँ।

लखनऊ में एक कहावत-सी सुनने को मिलती है—“हुज़ूर, शहर को समझना है तो उसकी रसोई तक जाइए।” शायद यही वजह है कि इस शहर की पहचान सिर्फ़ टुंडे के कबाब या मक्खन मलाई तक सीमित नहीं है। सुबह के लखनऊ की अपनी एक अलग थाली है, और उस थाली का सबसे आत्मीय स्वाद है—बाजपेयी जी की गरमागरम कचौड़ी।

साल 1995। नौकरी के सिलसिले में पहली बार लखनऊ आया था। जेब में कुछ सपने थे, हाथ में एक छोटा-सा बैग और मन में एक अनजान शहर को अपनाने की उत्सुकता। उन दिनों शहरों को गूगल नहीं, लोग समझाते थे।

ऑफिस के एक वरिष्ठ साथी ने कहा, “मोहित जी, किसी सुबह हज़रतगंज जाइए। वहाँ बाजपेयी जी की कचौड़ी खाइए। लखनऊ आपको अपना परिचय खुद दे देगा।”

दूसरे दिन सुबह मैं हज़रतगंज पहुँच गया।

दुकान खुल चुकी थी और कढ़ाही में कचौड़ियाँ छन रही थीं। गरम तेल की छन-छन, मसालों की महक और लोगों की हल्की-फुल्की बातचीत मिलकर एक ऐसा दृश्य बना रही थीं, जिसे शब्दों में पूरी तरह बाँध पाना आसान नहीं। वहाँ कोई आलीशान रेस्तराँ नहीं था। न वातानुकूलित हॉल, न आरामदेह कुर्सियाँ। लोग कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे, लेकिन किसी को शिकायत नहीं थी।

एक कागज़ हाथ में थमाया गया। उसके ऊपर रखा था दोना। दोने में दो गरमागरम खस्ता कचौड़ियाँ, साथ में 25 मसालों से तैयार आलू की रसेदार, हल्की तीखी सब्ज़ी, काबुली चने और थोड़ा-सा अचार।

बस… इतना ही।

लेकिन कई बार “बस इतना ही” जीवन भर के लिए काफ़ी हो जाता है।

पहला कौर मुँह में गया तो लगा, जैसे मसालों का स्वाद नहीं, लखनऊ का अपनापन ज़ुबान पर उतर आया हो। चनों की गहराई, आलू की सब्ज़ी का अनोखा स्वाद और मसालों का संतुलन ऐसा कि तीखापन स्वाद पर हावी नहीं होता, बल्कि उसे और यादगार बना देता है।

उसी क्षण मन ने कहा—

“वाह जनाब… यही तो है लखनऊ।”

उस दिन मुझे एहसास हुआ कि किसी शहर से रिश्ता हमेशा बड़ी घटनाओं से नहीं बनता। कभी-कभी एक दोना कचौड़ी भी उम्र भर का अपनापन दे जाती है।

दरअसल, बाजपेयी कचौड़ी भंडार सिर्फ़ एक दुकान नहीं, बल्कि लखनऊ की लगभग आधी सदी पुरानी विरासत है। इसकी शुरुआत वर्ष 1974 में स्वर्गीय बालकिशन बाजपेयी और उनकी पत्नी शांति बाजपेयी ने की थी। उस समय बालकिशन बाजपेयी आटे की चक्की चलाते थे, जबकि शांति बाजपेयी घर पर मसालेदार कचौड़ियाँ और आलू की सब्ज़ी तैयार करती थीं। दोनों ने हज़रतगंज में एक पेड़ के नीचे मात्र 150 रुपये मासिक किराए पर इस छोटे-से सफ़र की शुरुआत की। किसी ने शायद तब नहीं सोचा होगा कि यही ठेला आगे चलकर लखनऊ की पहचान बन जाएगा।

आज इस दुकान को परिवार की तीसरी पीढ़ी संभाल रही है। वर्षों बाद भी स्वाद की वही निरंतरता इसकी सबसे बड़ी पहचान है। खासकर 25 अलग-अलग मसालों से तैयार होने वाली आलू की सब्ज़ी आज भी लोगों को दूर-दूर से यहाँ खींच लाती है। यही कारण है कि देश ही नहीं, विदेशों से आने वाले पर्यटक भी हज़रतगंज पहुँचकर इस स्वाद का अनुभव करना नहीं भूलते।

तीन दशक बीत चुके हैं।

बीच के वर्षों में न जाने कितने शहर देखे, कितने होटल, कितने रेस्तराँ और कितने नामचीन स्वाद। लेकिन जब भी लखनऊ लौटता हूँ, मन सबसे पहले हज़रतगंज की उसी दुकान की ओर खिंच जाता है।

आज भी सुबह का वही नज़ारा मिलता है।

एक ओर दफ़्तर जाने की जल्दी में खड़ा युवक दो मिनट में अपना दोना ख़त्म कर रहा है। दूसरी ओर एक बुज़ुर्ग आराम से हर कौर का स्वाद ले रहे हैं। पास ही एक पिता अपने छोटे बेटे से कह रहे हैं, “धीरे खाओ बेटा… गरम है।” कुछ कॉलेज के छात्र हँसी-मज़ाक करते हुए दूसरी बार लाइन में लग चुके हैं। कोई किसी को नहीं जानता, फिर भी माहौल ऐसा कि सब अपने लगते हैं।

यही तो लखनऊ है।

यहाँ अनजान चेहरों के बीच भी अपनापन मिल जाता है।

हज़रतगंज की “गंजिंग” का ज़िक्र अक्सर होता है। लेकिन मेरे लिए गंजिंग का मतलब सिर्फ़ सड़क पर टहलना नहीं है। गंजिंग तब पूरी होती है, जब हाथ में बाजपेयी जी की कचौड़ी का दोना हो और सामने से आती हवा में मसालेदार आलू की सब्ज़ी की महक घुल रही हो।

मैंने एक बार वहीं खड़े-खड़े एक पुराने ग्राहक से यूँ ही पूछ लिया, “आप कब से आ रहे हैं यहाँ?”

उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया, “इतना याद नहीं… लेकिन जब मेरे पिता मुझे उँगली पकड़कर यहाँ लाते थे, तब मैं दो कचौड़ियाँ भी पूरी नहीं खा पाता था। अब पोते को लेकर आता हूँ।”

उस एक वाक्य ने बता दिया कि बाजपेयी जी की कचौड़ी केवल नाश्ते की दुकान नहीं, पीढ़ियों के बीच चलती आ रही एक परंपरा है।

आज के दौर में चमकदार कैफ़े हैं, विदेशी व्यंजन हैं और सोशल मीडिया पर रोज़ नए-नए फ़ूड ट्रेंड हैं। लेकिन बाजपेयी कचौड़ी भंडार ने कभी अपने स्वरूप को बदलने की कोशिश नहीं की। शायद इसलिए कि उसे पता है—विश्वास का कोई आधुनिक विकल्प नहीं होता।

सुबह से शुरू होने वाली यह रौनक शाम तक धीरे-धीरे थम जाती है। कढ़ाही की आँच मंद पड़ जाती है, लेकिन दिन भर वहाँ से गुज़रने वाले सैकड़ों लोगों के साथ लखनऊ का एक स्वाद घर तक चला जाता है।

आज जब 1995 की उस पहली सुबह को याद करता हूँ, तो महसूस होता है कि मैंने उस दिन सिर्फ़ दो कचौड़ियाँ नहीं खाई थीं। मैंने लखनऊ की तहज़ीब का पहला कौर चखा था।

हो सकता है कि आने वाले वर्षों में हज़रतगंज और बदल जाए। नई इमारतें बनें, नए ब्रांड आएँ, नए कैफ़े खुलें। लेकिन जब तक किसी सुबह एक कागज़ पर रखा दोना, उसमें दो गरमागरम खस्ता कचौड़ियाँ और 25 मसालों वाली आलू की वही मशहूर सब्ज़ी लोगों के हाथों तक पहुँचती रहेगी, तब तक लखनऊ अपनी असली पहचान नहीं खोएगा।

क्योंकि कुछ स्वाद पेट नहीं भरते…

वे शहरों की स्मृतियों को ज़िंदा रखते हैं।

और मेरे लिए हज़रतगंज का बाजपेयी कचौड़ी भंडार सिर्फ़ एक नाश्ता नहीं, बल्कि 1995 से आज तक चला आ रहा लखनऊ का सबसे आत्मीय सलाम है।

फर्रुखाबाद का नमकीन उद्योग: स्वाद की विरासत…

मोहित धवन

फर्रुखाबाद का नाम लेते ही लोगों के मन में सबसे पहले यदि किसी स्वाद की याद ताजा होती है, तो वह है यहां का सेम का बीज, दालमोठ, आलू का लच्छा और गड़वड़ नमकीन। यह केवल खाने की चीजें नहीं हैं, बल्कि जिले की सांस्कृतिक पहचान और वर्षों से चली आ रही एक समृद्ध परंपरा का हिस्सा हैं। देश के किसी भी कोने में रहने वाला फर्रुखाबाद का व्यक्ति जब अपने शहर को याद करता है तो अक्सर यही कहता है”फर्रुखाबाद का सेम का बीज भेज देना।” यही एक वाक्य इस उद्योग की लोकप्रियता और लोगों के भावनात्मक जुड़ाव को बयां कर देता है।
करीब एक शताब्दी पहले घरों और छोटी दुकानों से शुरू हुआ यह उद्योग आज हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का आधार बन चुका है। उत्पादन, मसाला निर्माण, पैकिंग, परिवहन और विपणन से जुड़े हजारों लोग इस कारोबार से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। फर्रुखाबाद का नमकीन उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र और देश के अनेक हिस्सों तक अपनी खास पहचान बना चुका है।
यदि इस उद्योग की विरासत की बात करें तो कभी देशराज नमकीन गुणवत्ता और भरोसे का पर्याय माना जाता था। आज भी पुराने लोग उसके स्वाद को याद करते हैं। समय के साथ उद्योग ने नया रूप लिया और वर्तमान में सूर्या नमकीन ने अपनी गुणवत्ता, आधुनिक सोच और ग्राहकों के विश्वास के बल पर प्रदेश ही नहीं, देशभर में अलग पहचान बनाई है। इसके साथ गणेश नमकीन, किशन नमकीन सहित कई प्रतिष्ठित संस्थान इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
फिर भी एक सवाल आज भी सामने खड़ा है—क्या फर्रुखाबाद का नमकीन उद्योग अपनी पूरी क्षमता तक पहुंच पाया है?
उत्तर स्पष्ट है—अभी नहीं।
जिस स्वाद की मांग पूरे देश में है, वह आज भी सीमित बाजारों तक सिमटा हुआ है। देश के बड़े ब्रांड आधुनिक पैकेजिंग, डिजिटल मार्केटिंग, मजबूत वितरण नेटवर्क और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से करोड़ों का कारोबार कर रहे हैं, जबकि फर्रुखाबाद का नमकीन अभी भी मुख्यतः अपने स्वाद और पुराने ग्राहकों के भरोसे आगे बढ़ रहा है।

आज जरूरत केवल स्वाद बनाने की नहीं, बल्कि ब्रांड बनाने की है। आकर्षक पैकेजिंग, एकरूप गुणवत्ता, डिजिटल प्रचार, सोशल मीडिया कैंपेन, ऑनलाइन बिक्री और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उत्पादन इस उद्योग की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुके हैं। यदि जिले के प्रमुख निर्माता प्रतिस्पर्धा छोड़कर “फर्रुखाबाद नमकीन” के नाम से सामूहिक ब्रांड पहचान विकसित करें, तो यह केवल एक व्यापार नहीं, बल्कि पूरे जिले की आर्थिक पहचान बन सकता है।

सरकार की भूमिका भी यहां बेहद महत्वपूर्ण है। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग योजनाओं के माध्यम से आसान ऋण, आधुनिक मशीनों पर अनुदान, गुणवत्ता प्रमाणन, निर्यात प्रोत्साहन, व्यापार मेलों में भागीदारी और सबसे महत्वपूर्ण “फर्रुखाबाद के सेम के बीज” तथा “फर्रुखाबाद के दालमोठ” को जीआई (जियोग्राफिकल इंडिकेशन ) टैग दिलाने की दिशा में ठोस प्रयास होने चाहिए। इससे इस उद्योग को कानूनी पहचान के साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई ताकत मिलेगी।
फर्रुखाबाद का नमकीन केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि जिले की सांस्कृतिक धरोहर, आर्थिक शक्ति और सामाजिक पहचान है। जिस तरह आगरा पेठे, बीकानेर भुजिया और इंदौर नमकीन के लिए दुनिया भर में पहचाना जाता है, उसी तरह फर्रुखाबाद भी अपने सेम के बीज और दालमोठ के दम पर वैश्विक पहचान बना सकता है।