झाबुआ संवाद 2026 : “प्रकृति से केवल लेने की नहीं, उसे लौटाने की संस्कृति विकसित करनी होगी” — डॉ. अभय वानखेड़े

झाबुआ, 2 अगस्त 2026
लेखक : मोहित धवन

“आज का मनुष्य प्रकृति से लगातार अधिक ले रहा है, लेकिन उसे लौटाने की भावना बहुत कम होती जा रही है। यदि मानव और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित नहीं हुआ, तो आने वाले समय में समस्याएँ और गहरी होंगी।”

ये विचार मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर के संस्थापक सदस्य डॉ. अभय वानखेड़े ने झाबुआ में आयोजित दो दिवसीय ‘झाबुआ संवाद’ कार्यशाला के तीसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम यूआईटी, झाबुआ द्वारा आयोजित इस कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों से शिक्षाविद, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता और युवा शोधार्थी भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का उद्देश्य परंपरा और उद्यम के बीच सार्थक संवाद स्थापित करना है।

अपने संबोधन में डॉ. वानखेड़े ने कहा कि आज मानव सभ्यता का सबसे बड़ा संकट संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि जीवन को सही दृष्टि से समझने की कमी है। उन्होंने कहा कि प्रकृति से केवल लेने की प्रवृत्ति ने मनुष्य को प्रदुषण व असंतुलन की ओर धकेला है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने जीने के प्रयोजन और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के संबंध को समझे ताकि सभी के साथ पूरकता का भाव विकसित हो सकें।

उन्होंने बताया कि नागराज जी ने अपने जीवन के अनेक वर्षों तक जगत, सत्यता, ज्ञान, न्याय, मानवीय आचरण पर गहन अध्ययन किया। उनका पूरा अनुसंधान इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास था कि “मनुष्य अपनी मौलिकता के साथ कैसे जियें ?” उनके चिंतन का सार था, की प्रत्येक व्यक्ति समाधान, समृद्धि, अभय और सह-अस्तित्व के साथ जीवन जी सके।

डॉ. वानखेड़े ने कहा कि “गाँव में जीवन कठिन है, जबकि शहरों में समस्याएँ अधिक दिखाई देती हैं।” जबकि समस्याएं हमारी नासमझी की ही उपज है, उनका मानना है कि आधुनिक जीवनशैली ने मनुष्य को प्रकृति, परिवार और समाज से दूर कर दिया है। ऐसे समय में मानव चेतना विकास केंद्र, इंदौर ने विश्व के सामने एक ऐसा अनूठा जीवन मॉडल प्रस्तुत किया है, जहाँ बिना भय के, नौकरी या व्यापार पर निर्भर हुए बिना भी श्रम पूर्वक समाधान, समृद्धि और खुशहाल जीवन का अध्ययन,अभ्यास किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि एमसीवीके परिसर में वर्तमान में 51 परिवार एक साथ रहते हैं। यहाँ 150 से अधिक गिर गायों की गौशाला है तथा 150 से अधिक प्रकार के उत्पाद तैयार किए जाते हैं। पूरे परिसर के लिए एक ही रसोई में भोजन बनाया जाता है और आवश्यक खर्चों के लिए एक साझा वॉलेट की व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि एमसीवीके केवल रहने का स्थान नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक शिक्षा संस्थान है, जहाँ मनुष्य, उसके संबंधों और सह-अस्तित्व का अध्ययन एवं व्यवहारिक अभ्यास किया जाता है। यहाँ 70 से अधिक बच्चे जीवन मूल्यों के साथ विभिन्न कौशलों का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।
अपने संबोधन के अंत में डॉ. अभय वानखेड़े ने उपस्थित शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर आने का आमंत्रण दिया। उन्होंने कहा कि “एमसीवीके को केवल सुनकर नहीं समझा जा सकता, उसे देखने, जानने और जीने की आवश्यकता है।” उन्होंने सभी से आग्रह किया कि वे एक बार एमसीवीके आकर वहाँ के जीवन, कार्यपद्धति और जीवन शिक्षा के इस अनूठे मॉडल को स्वयं देखें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह अनुभव जीवन को देखने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है और मनुष्य, परिवार, समाज तथा प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

कार्यशाला के दौरान झाबुआ की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और स्थानीय उद्यमों को भी विशेष रूप से प्रदर्शित किया गया। परिसर में आयोजित प्रदर्शनी में झाबुआ की आदिवासी जनजातियों द्वारा तैयार किए जा रहे विभिन्न पारंपरिक उत्पादों को प्रदर्शित किया गया। इनमें पारंपरिक धनुष-बाण, स्थानीय हस्तशिल्प तथा झाबुआ के प्रसिद्ध गुड़िया उद्योग की आकर्षक झलक देखने को मिली। प्रदर्शनी ने प्रतिभागियों को इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक कौशल और स्थानीय आजीविका के विविध आयामों से परिचित कराया।

कार्यक्रम में उपस्थित प्रतिभागियों ने भी इस संवाद को केवल एक अकादमिक चर्चा न मानकर, शिक्षा, संस्कृति, प्रकृति और मानवीय मूल्यों को व्यवहार में उतारने की दिशा में एक सार्थक पहल बताया। दो दिवसीय ‘झाबुआ संवाद’ में विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञ अपने विचार साझा कर रहे हैं, जिससे परंपरा, शिक्षा, उद्यम और समाज के बीच नए सहयोग की संभावनाओं पर व्यापक विमर्श हो रहा है।

MCVK Family Carnival Celebrates Creativity, Learning and Community Spirit

By Mohit Dhawan

Indore, August 1, 2026:
The campus of Manav Chetna Vikas Kendra (MCVK), Indore, came alive with joy, creativity and togetherness as the MCVK Family Carnival was organized on Saturday evening. The event brought together MCVK families and participants of the 10-day Vikalp Camp, creating an atmosphere of celebration, learning and meaningful interaction.

The carnival began with a series of creative stalls designed and managed by children. The stalls highlighted education, skill development and hands-on learning through activities such as cooking demonstrations, children’s magazines, games and other creative projects. Visitors also enjoyed freshly brewed coffee and roasted corn while exploring the exhibition.

The cultural performances became the highlight of the evening. The energetic hosting by Amit Pandey and Chandan Bhaiya kept the audience engaged throughout the program. A group performance by Navneet, Prachi, Anubhuti, Indu Girija Didi, Purnakshi Didi, Sonu, Amit and Chandan Bhaiya on the popular song “Main Aashiq To Nahi” filled the venue with music and laughter. The graceful dance performance by Pranjal Bhaiya and Purnakshi Didi received warm appreciation from the audience.

A fun-filled Lemon Race was organized for participants of different age groups. Children and adults joined the activity with equal enthusiasm, making it one of the most enjoyable moments of the carnival.

One of the special attractions of the event was the launch of a new Organic Soap developed at MCVK by Navneet Jain, Soumya Pandey and their team. Navneet shared that she had no experience in soap making before joining MCVK. She said that the learning environment, continuous guidance and support from the MCVK family gave her the confidence and skills to develop the product. The Organic Soap was officially launched by her father-in-law and mother-in-law, who attended the event as the chief guests.

Speaking on the occasion, Ajay Dayma, Founder of MCVK, said, “Many people in today’s world have wealth, but very few experience real happiness. At MCVK, every moment is filled with joy, celebration and meaningful relationships. When people live with understanding, cooperation and mutual trust, life itself becomes a celebration.”

Participants of the Vikalp Camp also visited the children’s exhibition and experienced MCVK’s unique community lifestyle through the cultural programs and interactive activities. The evening concluded with a special dinner prepared by the MCVK kitchen team, featuring a variety of delicious chaat, desserts and other traditional dishes.

The MCVK Family Carnival was much more than an entertainment event. It reflected MCVK’s vision of building a community where learning, creativity, self-reliance, cooperation and celebration become a natural part of everyday life. The event left participants with joyful memories and a deeper understanding of the values that bring people together.

एमसीवीके में 10 दिवसीय ‘विकल्प शिविर’ का शुभारंभ, मानव, प्रकृति और व्यवस्था को समझने पर होगा मंथन

लेखक : मोहित धवन

इंदौर, 1 अगस्त। मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर में शनिवार को 10 दिवसीय ‘विकल्प शिविर’ का शुभारंभ वंदना गीत एवं स्वागत सत्र के साथ हुआ। 1 अगस्त से 10 अगस्त तक चलने वाले इस शिविर में देश के विभिन्न राज्यों के साथ नेपाल से आए 70 से अधिक शिविरार्थी भाग ले रहे हैं। शिविर के दौरान मध्यस्थ दर्शन के विभिन्न आयामों पर संवाद, अध्ययन और अनुभव आधारित सत्र आयोजित किए जाएंगे।

उद्घाटन सत्र में डॉ. अभय वानखेड़े ने सभी शिविरार्थियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह दस दिनों की यात्रा केवल जानकारी प्राप्त करने की नहीं, बल्कि स्वयं को समझने की यात्रा है। उन्होंने कहा कि शिविर में सबसे पहले इस प्रश्न पर विचार किया जाएगा कि मनुष्य क्या है और मानवीय नजरिये के साथ कैसे जिया जा सकता है। इसके साथ ही प्रकृति के साथ शोषण मुक्त और पूरकता के साथ जीना, श्रमपूर्वक स्वस्थ शरीर के साथ जीने की समझ तथा जीवन में उठने वाले विभिन्न प्रश्नों पर खुले संवाद के माध्यम से विचार किया जाएगा। उन्होंने कहा कि शिविर का उद्देश्य किसी विचार को थोपना नहीं, बल्कि प्रत्येक प्रश्न के उत्तर पर मिलकर संवाद करना है।

एमसीवीके की संस्थापक सदस्य वर्षा दायमा ने अपने स्वागत संबोधन में कहा कि संसार का प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने तरीके से बहुत कुछ कर रहा है, लेकिन उसके प्रत्येक प्रयास के पीछे मूल उद्देश्य केवल सुख की प्राप्ति है। उन्होंने स्वर कोकिला लता मंगेशकर का उदाहरण देते हुए कहा कि जब उनके जीवन के अंतिम समय में उनसे पूछा गया कि यदि अगला जन्म मिले तो वे क्या बनना चाहेंगी, तो उनका उत्तर था कि वे फिर से गायिका नहीं, बल्कि स्वयं को जानना चाहेंगी। वर्षा दायमा ने कहा कि पिछले 18 वर्षों से एमसीवीके में भी इसी दिशा में कार्य किया जा रहा है, ताकि मनुष्य स्वयं को समझते हुए समाधान, समृद्धि और अभयता के साथ जीवन जी सके।

एमसीवीके के संस्थापक अजय दायमा ने अपने उद्घाटन उद्बोधन में कहा कि हम सभी किसी भी कार्य की शुरुआत पूरे उत्साह और अच्छे भाव से करते हैं, लेकिन समय के साथ आने वाली बाधाओं के कारण अक्सर उसे उसी रूप में पूरा नहीं कर पाते। उन्होंने कहा कि इस शिविर के पाँच प्रमुख उद्देश्य हैं—पहला, मेरी आपसे हुई बात आपको स्वीकार हो; दूसरा, आपकी स्वयं से हुई बात आपको स्वीकार हो; तीसरा, आपकी दूसरों से हुई बात भी स्वीकार हो; चौथा, स्वीकार्यता के आधार पर जीने वाला एक व्यवस्थागत मॉडल विकसित हो, जिसे हम सिस्टम कहते हैं; और पाँचवाँ, यह समझ अगली पीढ़ी तक सुरक्षित रूप से पहुँच सके।

उन्होंने कहा कि यदि हम दुनिया को बदलने निकलेंगे तो दुनिया हमें बदल देगी। इसलिए हमारा प्रयास दुनिया को बदलने का नहीं, बल्कि स्वयं को समझने और संवाद के माध्यम से व्यवस्था को समझने का होना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी स्वस्थ व्यवस्था का आधार संवाद है। केवल किसी प्रश्न का उत्तर मिल जाना ही समझ नहीं है। वास्तविकता, समझ तब होती है जब हमारी बात हमें भी स्पष्ट हो, सामने वाले तक भी स्पष्ट रूप से पहुँचे और वह उसे सहज रूप से स्वीकार कर सके। यही स्वीकार्यता आगे चलकर व्यवस्था का आधार बनती है।

शिविर में दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, गुजरात, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों से प्रतिभागी पहुँचे हैं। अगले दस दिनों तक मध्यस्थ दर्शन, मानव अध्ययन, प्रकृति, सह-अस्तित्व और जीवन के विभिन्न आयामों पर संवाद एवं अभ्यास सत्र आयोजित किए जाएंगे।

इस अवसर पर नेपाल के काठमांडू से आईं पर्यावरणविद् लीला श्रेष्ठ ने बताया कि उन्हे ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, मलेशिया, श्रीलंका, थाईलैंड और वियतनाम सहित अनेक देशों में पर्यावरण संरक्षण एवं प्राकृतिक चिकित्सा से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि वे एमसीवीके में मानव चेतना पर हो रहे कार्य का अध्ययन करने के साथ-साथ स्वयं का भी अध्ययन करना चाहती हैं। उनका उद्देश्य यहाँ प्राप्त समझ और अनुभव को दुनिया के अन्य देशों के लोगों तक पहुँचाना है, ताकि मानव और प्रकृति के बीच संतुलित एवं समाधानपूर्ण जीवन की दिशा में वैश्विक स्तर पर भी सार्थक संवाद आगे बढ़ सके।
दस दिवसीय यह शिविर 10 अगस्त तक चलेगा, जिसमें प्रतिदिन विभिन्न विषयों पर संवाद, अध्ययन और सहभागिता आधारित सत्र आयोजित किए जाएंगे।

स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंस के विद्यार्थियों ने एमसीवीके में समझा जीवन, शिक्षा और व्यवस्था का वैकल्पिक मॉडल

लेखक : मोहित धवन

इंदौर, 31 जुलाई 2026।
रिनेसां यूनिवर्सिटी, इंदौर के स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंस के 60 से अधिक विद्यार्थियों ने शुक्रवार को मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर का शैक्षणिक भ्रमण किया। इस अवसर पर विद्यार्थियों ने एमसीवीके के सह-अस्तित्व आधारित जीवन मॉडल, मानवीय व्यवस्था, जैविक खेती और वैकल्पिक शिक्षा प्रणाली को निकट से समझने का प्रयास किया।

कार्यक्रम की शुरुआत में डॉ. अभय वानखेड़े ने विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए एमसीवीके की कार्यप्रणाली से परिचित कराया। उन्होंने बताया कि वर्तमान में एमसीवीके में 51 परिवारों के 186 सदस्य एक साथ रहते हैं। यहां सभी का कॉमन किचन है और पूरा परिसर सहअस्तित्व वाद के समझ की रौशनी में संचालित होता है। संस्था में कोई नौकर या मालिक नहीं है, बल्कि प्रत्येक सदस्य अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन विवेक पूर्वक स्वयं करता है।

उन्होंने बताया कि एमसीवीके में 150 से अधिक उत्पादों का निर्माण किया जाता है, जैविक खेती की जाती है तथा गौशाला में 150 गिर नस्ल की गायों की देखभाल भी परिवार के सदस्य स्वयं करते हैं। उनका कहना था कि एमसीवीके का उद्देश्य केवल आत्मनिर्भर जीवन नहीं, बल्कि पूरकता, विश्वास और सह-अस्तित्व पर आधारित अखण्ड समाज सर्वाभौम व्यवस्था को व्यवहार में उतारना है।

इसके बाद प्राची कौल पटेल ने विद्यार्थियों से संवाद करते हुए कहा कि आज हम समाज और देश में होने वाले विरोध प्रदर्शनों की चर्चा तो करते हैं, लेकिन वास्तव में हर व्यक्ति के भीतर भी व्यवस्था (सिस्टम) को लेकर एक निरंतर संघर्ष और एक मौन ‘प्रोटेस्ट’ चलता रहता है। हमारी इच्छाएँ और जीवन की वास्तविकताएँ अक्सर एक-दूसरे से टकराती हैं।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हम चाहते हैं कि हम कम समय में अपने गंतव्य तक पहुँच जाएँ, लेकिन साथ ही यह भी चाहते हैं कि प्रदूषण न फैले। हम विकास भी चाहते हैं और प्रकृति का संरक्षण भी। जब तक इन विरोधाभासों को समझा नहीं जाएगा, तब तक केवल बाहरी बदलाव पर्याप्त नहीं होंगे।

प्राची ने कहा कि मानव चेतना विकास केंद्र इसी आंतरिक संघर्ष को समझने और शांत करने का एक शैक्षणिक मॉडल है। यहां शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना या रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि मनुष्य को स्वयं, समाज और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की समझ विकसित करना है।

इसके बाद सौम्या पांडेय ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर विचार रखते हुए कहा कि बचपन से विद्यार्थियों को यही बताया जाता है कि “यह परीक्षा पास कर लो, फिर जीवन आसान हो जाएगा।” लेकिन वास्तविक जीवन में सफलता केवल डिग्री या नौकरी से तय नहीं होती।

उन्होंने कहा कि आज की शिक्षा व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण गैप्स हैं। शिक्षा व्यक्ति को जीवन की चुनौतियों, संबंधों, निर्णय क्षमता और सामाजिक जिम्मेदारियों के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं कर पाती। एमसीवीके इन कमियों को दूर करने का प्रयास करते हुए ऐसी शिक्षा पर काम कर रहा है, जो व्यक्ति के समग्र विकास पर आधारित हो।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने सवाल किया कि जब यहां रहने वाले लोग पारंपरिक नौकरी या व्यवसाय नहीं करते, तब भी वे आत्मनिर्भर, निडर और विश्वास के साथ जीवन कैसे जीते हैं?

इस प्रश्न का उत्तर देते हुए डॉ. अभय वानखेड़े ने कहा कि एमसीवीके मूल रूप से जीवन जीने का एक व्यावहारिक शिक्षा मॉडल है। यहां केवल कौशल (स्किल) नहीं, बल्कि मानव जीवन को समझने, समझाने को प्रमुखता दी जाती है।

उन्होंने बताया कि वर्षभर परिचय, विकल्प और अध्ययन शिविरों के माध्यम से बच्चों और बड़ों को एमसीवीके आने का आमंत्रण दिया जाता है। इन शिविरों में प्रतिभागियों को जीवन, संबंध, मानवीय व्यवस्था और सह-अस्तित्व को समझने का अवसर मिलता है।

डॉ. वानखेड़े ने कहा कि जब व्यक्ति भयमुक्त होकर समाधान और समृद्धि के साथ जीना सीख लेता है, तब उसके भीतर उदारता पूर्वक जीने का, मानवीय व्यवस्था की परंपरा के लिए सामर्थ स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाता है। ऐसी समझ के आधार पर वह अपनी समझ, क्षमताओं और कौशल का उपयोग करते हुए जीवन में मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनता है। उनका कहना था कि एमसीवीके का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसा व्यक्ति तैयार करना है जो अस्तित्व सहज़ प्रावधानो के अनुसार स्वयं समाधानित हो सके और समृद्धि पूर्वक बिना भय के जीवन जी सके।

कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों ने एमसीवीके परिसर का भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने जैविक खेती, गौशाला, विभिन्न उत्पादन इकाइयों और समझ आधारित जीवन को निकट से देखा तथा सदस्यों से संवाद भी किया।

कैंपस भ्रमण का नेतृत्व एमसीवीके की ओर से अशोक भैया, श्रवण दवे भैया और तारकेश भैया ने किया। वहीं स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंस की ओर से प्रो. ईमा सावरकर, विश्वास पटेल, अमोल पटेल, तनिष लोवंशी, हर्षित, दिगपाल ने कार्यक्रम का समन्वय किया।

बारिश, पहाड़ और नर्मदा के बीच… महेश्वर ने क्यों छू लिया मन?

लेखक : मोहित धवन

सुबह की घड़ी में लगभग साढ़े सात बज रहे थे। इंदौर अभी पूरी तरह जागा भी नहीं था कि हमारी कार महेश्वर की ओर बढ़ चली। रात से हो रही हल्की बारिश अब भी जारी थी। आसमान पर बादलों का साम्राज्य था और सड़क के दोनों ओर फैली हरियाली मानो इस यात्रा का स्वागत कर रही थी। बरसात में मध्य प्रदेश का मालवा अंचल किसी चित्रकार की कैनवास पर उकेरी गई पेंटिंग जैसा दिखाई देता है। ऐसे मौसम में यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचना नहीं रहती, बल्कि हर मोड़ पर एक नया अनुभव बन जाती है।

मेरे साथ पत्नी श्रुति, मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर के डॉ. अभय वानखेड़े और उनकी पत्नी प्रीति जी थे। पूरे रास्ते कभी इतिहास की बातें होतीं, कभी प्रकृति की, तो कभी जीवन की छोटी-छोटी खुशियों की।

स्वाद, जो आधी यात्रा सफल कर देता है

महेश्वर जाने वाले अधिकांश यात्रियों की तरह हमारा पहला पड़ाव था महू

यहाँ स्थित भँवरीलाल मिठाईवाला पर जैसे ही गरमागरम पोहा और ताज़ी जलेबी सामने आई, लगा कि मध्य प्रदेश के स्वाद की चर्चा यूँ ही नहीं होती। साथ में खस्ता और समोसे ने नाश्ते को और भी यादगार बना दिया।

दुकान के संचालकों से बातचीत में पता चला कि इस प्रतिष्ठान की शुरुआत 1972 में एक छोटी-सी दुकान से हुई थी। आज इंदौर में इसकी कई शाखाएँ हैं, लेकिन स्वाद वही है जिसने पाँच दशक पहले लोगों का दिल जीता था। ऐसे प्रतिष्ठान यह विश्वास दिलाते हैं कि ईमानदारी से किया गया काम समय के साथ केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि विरासत बन जाता है।

महू से गुजरते हुए एक और दिलचस्प जानकारी मिली। प्रसिद्ध क्रिकेट कमेंटेटर दिलीप दोषी का घर भी यहीं है। स्थानीय लोगों ने बताया कि उनके परिवार द्वारा बच्चों के लिए क्रिकेट प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की जाती है। खेल और संस्कृति का यह मेल इस छोटे-से शहर को एक अलग पहचान देता है।

जाम गेट… जहाँ रास्ता रुकने पर मजबूर कर देता है

महू से आगे बढ़ते ही सड़क पहाड़ियों और जंगलों के बीच प्रवेश करने लगी।

बारिश के कारण हर पेड़ धुला हुआ-सा लग रहा था। बादल कभी पहाड़ियों को अपनी आगोश में ले लेते, तो कभी अचानक हट जाते और दूर तक फैली हरी-भरी घाटियाँ दिखाई देने लगतीं। सड़क पर वाहनों की आवाजाही कम थी और प्रकृति का संगीत अधिक।

इसी मार्ग पर स्थित जाम गेट पहुँचे तो कार अपने आप रुक गई। सामने फैली हरियाली, पहाड़ों पर उतरते बादल और हल्की-हल्की फुहारें किसी पोस्टकार्ड जैसे दृश्य का अहसास करा रही थीं।

सड़क किनारे लगी एक पुरानी-सी चारपाई पर बैठकर हमने कुछ देर इस मौसम को महसूस करने का निर्णय लिया। वहीं भुट्टे (कॉर्न) का स्वाद लिया और बारिश के मौसम की सबसे पसंदीदा साथी गरमा-गरम मैगी भी खाई। उस समय भोजन से ज़्यादा आनंद उस माहौल का था—बारिश की फुहारें, सामने फैले हरे-भरे पहाड़, चाय और भुट्टे की खुशबू, और अपनों का साथ।

महेश्वर… जहाँ इतिहास अभी भी जीवित है

कुछ देर बाद नर्मदा के किनारे बसे महेश्वर ने हमारा स्वागत किया।

दूर से दिखाई देता अहिल्याबाई होल्कर का किला जितना भव्य लगता है, उसके भीतर प्रवेश करने पर उससे कहीं अधिक प्रभाव छोड़ता है। पत्थरों से बनी दीवारें, खुले प्रांगण और नर्मदा की ओर खुलती खिड़कियाँ मानो इतिहास के पन्ने जीवंत कर देती हैं।

अहिल्याबाई होल्कर केवल एक शासक नहीं थीं। वे उन विरले व्यक्तित्वों में थीं जिन्होंने सत्ता को जनकल्याण का माध्यम बनाया। उन्होंने देशभर में मंदिर, घाट और धर्मशालाएँ बनवाईं, लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि उन्होंने अपने राज्य के लोगों को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया।

महेश्वर का प्रसिद्ध महेश्वरी साड़ी उद्योग उसी दूरदर्शिता का परिणाम है। स्थानीय बुनकरों को संरक्षण देकर उन्होंने केवल एक उद्योग नहीं बसाया, बल्कि हजारों परिवारों के लिए सम्मानजनक आजीविका का मार्ग खोला। शायद इसी कारण आज भी महेश्वर का नाम लेते ही नर्मदा के साथ महेश्वरी साड़ियों की पहचान भी सामने आती है।

नर्मदा घाट… जहाँ आस्था का अर्थ बदल जाता है

किले की सीढ़ियाँ उतरते ही माँ नर्मदा का विशाल घाट सामने था।

बरसात के कारण नदी अपने पूरे सौंदर्य में बह रही थी। ऊपर खड़ा किला और नीचे शांत जलधारा—यह दृश्य शब्दों में बाँधना कठिन है।

घाट पर श्रद्धालु पूजा कर रहे थे, दीप प्रवाहित कर रहे थे, परिवारों के साथ समय बिता रहे थे। लेकिन जो बात सबसे अधिक प्रभावित कर गई, वह यह थी कि यहाँ वैसा दान-दक्षिणा का आग्रह दिखाई नहीं दिया, जैसा देश के कई बड़े तीर्थस्थलों पर सामान्य बात बन चुका है। श्रद्धा यहाँ सहज लगी, व्यवसाय नहीं।

घाट के आसपास बने प्राचीन शिव मंदिरों की स्थापत्य शैली और उनकी सादगी मन को देर तक बाँधे रखती है।

भोजन, जिसने अपनापन परोस दिया

घूमते-घूमते दोपहर हो चुकी थी। भोजन के लिए हम बाँके बिहारी सात्विक भोजनालय पहुँचे।

यहाँ चौकी पर बैठकर पारंपरिक तरीके से भोजन कराया गया। दाल, सब्ज़ी, रोटी और अन्य व्यंजन स्वादिष्ट तो थे ही, लेकिन उससे कहीं अधिक प्रभावित करने वाली बात थी वहाँ का आत्मीय व्यवहार।

आज जब अधिकांश रेस्तराँ में ग्राहक केवल एक “टेबल नंबर” बनकर रह जाता है, वहाँ ऐसा लगा जैसे किसी अपने के घर भोजन कर रहे हों।

लौटते समय रास्ता वही था, लेकिन मन बदल चुका था

शाम ढल रही थी।

महेश्वर से इंदौर लौटते समय वही पहाड़ियाँ, वही जंगल और वही बारिश फिर हमारे साथ थे, लेकिन अब मन में एक अलग-सी शांति थी।

कार की खिड़की से बाहर देखते हुए मैं और श्रुति बार-बार एक ही बात सोच रहे थे कि यदि डॉ. अभय वानखेड़े और प्रीति जी ने इस यात्रा की योजना न बनाई होती, तो शायद हम महेश्वर को केवल एक पर्यटन स्थल की तरह देखकर लौट आते।

उन्होंने हमें केवल स्थान नहीं दिखाए, बल्कि हर स्थान की कहानी भी समझाई। यही कारण है कि यह यात्रा केवल घूमने की नहीं, बल्कि समझने की यात्रा बन गई।

घर लौटते समय कैमरे में तस्वीरें थीं, मोबाइल में वीडियो थे, लेकिन सबसे कीमती चीज़ हमारे साथ थी—कृतज्ञता।

शायद यात्रा का सबसे बड़ा उद्देश्य भी यही होता है। वह हमें केवल नई जगहें नहीं दिखाती, बल्कि जीवन को देखने का नया दृष्टिकोण भी दे जाती है।

महेश्वर से लौटकर महसूस हुआ कि कुछ शहर अपनी भव्यता से प्रभावित करते हैं, कुछ अपने इतिहास से, लेकिन महेश्वर उन दुर्लभ शहरों में है जो अपनी सादगी, संस्कृति, नर्मदा की शांति और अहिल्याबाई की विरासत के कारण सीधे दिल में बस जाता है।

गुरु पूर्णिमा पर एमसीवीके में मनाया गया ‘कृतज्ञता दिवस’, सहयोग और सह-अस्तित्व के संदेश के साथ साझा किए जीवन अनुभव

लेखक : मोहित धवन

इंदौर, 29 जुलाई।मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर में गुरु पूर्णिमा का पर्व इस वर्ष “कृतज्ञता दिवस” के रूप में मनाया गया। कार्यक्रम में गुरु को केवल पूजनीय व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि जीवन में समझ, सहयोग और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाने वाली चेतना के रूप में स्वीकार करने पर बल दिया गया। इस अवसर पर केंद्र से जुड़े अनेक सदस्यों ने अपने अनुभव साझा किए और बताया कि एमसीवीके से जुड़ने के बाद उनके जीवन में किस प्रकार सकारात्मक परिवर्तन आए हैं।

कार्यक्रम का शुभारंभ नागराज जी के चित्र पर माल्यार्पण एवं गुरु वंदना के साथ हुआ। इसके बाद विभिन्न सदस्यों ने अपने अनुभव साझा किए।

एमसीवीके के संस्थापक अजय दायमा ने अपने उद्बोधन में कहा कि “मनुष्य को जीने में सहयोग करना ही गुरुत्व है।” उन्होंने कहा कि समाज में गुरु को अक्सर एक ऐसे महान व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसके जैसा जीवन सामान्य व्यक्ति नहीं जी सकता। जबकि एमसीवीके की दृष्टि में गुरु वह है, जो स्वयं समाधान, समृद्धि और सह-अस्तित्वपूर्ण जीवन जीते हुए दूसरों को भी उसी दिशा में आगे बढ़ने का सहयोग देता है। उनका उद्देश्य अनुयायी तैयार करना नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं समझदार बनाकर जीवन को समझने योग्य बनाना है। उन्होंने कहा कि गुरु का प्रामाणिक आचरण ही सीखने और अभ्यास की प्रक्रिया को सहज बनाता है।

एमसीवीके के संस्थापक सदस्य डॉ. अभय वानखेड़े ने नागराज बाबा के साथ बिताए अपने संस्मरण साझा किए। उन्होंने बताया कि वर्ष 2010 में बांदा सम्मेलन के दौरान सामूहिक जीवन जीने का निर्णय लिया गया था। उन्होंने कहा कि अस्तित्व में योग पहले से ही विद्यमान है, आवश्यकता केवल उसे सहयोग के रूप में जीने की है। लगभग 28 वर्षों की अपनी यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज समाधान के साथ जीवन जी पाना ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

अनीश खान ने कहा कि एमसीवीके में अभ्यास करते हुए उन्हें यह अनुभव हुआ कि कृतज्ञता जीवन का मूल भाव है। उनके अनुसार किसी भी क्षण मनुष्य के भीतर केवल दो ही स्थितियां हो सकती हैं—किसी के प्रति कृतज्ञता या किसी के प्रति समस्या। जब भी किसी व्यक्ति के प्रति शिकायत का भाव आता है, वे यह समझने का प्रयास करते हैं कि उस व्यक्ति ने ऐसा क्या किया है जिसके लिए उसके प्रति कृतज्ञ हुआ जा सके। यही अभ्यास उनके दृष्टिकोण को बदलने का माध्यम बना।

नेहा गंगवार ने कहा कि उन्हें नागराज बाबा से प्रत्यक्ष मिलने का अवसर नहीं मिला, लेकिन जब भी वे अजय दायमा की आंखों में बाबा के प्रति प्रेम और कृतज्ञता के आंसू देखती हैं, तो उन्हें ऐसा अनुभव होता है मानो वे स्वयं बाबा से मिल चुकी हों। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि एक दिन यह अनुभव प्रत्यक्ष भी होगा। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि वे अभी “11.5 इंच की यात्रा” पूरी कर रही हैं, शेष “आधा इंच” अपने आप पूरा हो जाएगा।

ख्याति दीदी ने अजय दायमा के नागराज बाबा के प्रति समर्पण और कृतज्ञता को अपनी प्रेरणा बताते हुए कहा कि वे भी स्वयं को इस मिशन के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित करने का प्रयास कर रही हैं।

प्रीति दीदी ने कहा कि एमसीवीके से जुड़ने के बाद उन्हें मानव और मानवता को एक नई दृष्टि से समझने का अवसर मिला। अब उन्हें अनुभव होता है कि समझ के साथ सामूहिक जीवन जीना ही वास्तविक समृद्धि है और ऐसा जीवन अकेले संभव नहीं है।

कार्यक्रम में रामेंद्र भैया, मिहिर, अनुभव और ईशान सहित कई अन्य सदस्यों ने भी अपने अनुभव साझा किए और एमसीवीके के साथ अपनी जीवन यात्रा के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।

चंद्र प्रकाश पोरवार ने गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि जीवन में जो समझ उन्हें प्राप्त हुई है, उसके लिए वे सदैव आभारी रहेंगे।

सोमेश साहू ने कहा कि उन्होंने वर्षों पहले तिथियों और विशेष दिनों को मनाना छोड़ दिया था, लेकिन आज का दिन उनके लिए वास्तव में “कृतज्ञता दिवस” है।

सफीना खान ने कहा कि पिछले नौ वर्षों में उन्होंने पहली बार किसी एक व्यक्ति पर पूर्ण विश्वास करना सीखा है। अब उन्हें लगता है कि उनके जीवन में एक समझदार व्यक्ति का सहयोग हमेशा उनके साथ खड़ा है।

आलोक धवन ने कहा कि उनका झुकाव प्रारंभ से ही योग और आध्यात्मिक विषयों की ओर रहा है, लेकिन पिछले दो वर्षों में एमसीवीके के माध्यम से मनुष्य को समझने का जो अवसर मिला, वैसा अनुभव उन्हें पहले कभी प्राप्त नहीं हुआ।

एमसीवीके की संस्थापक सदस्य वर्षा दायमा ने कहा कि उन्होंने नागराज बाबा के साथ सदैव निर्विरोध संबंध का अनुभव किया है। उन्होंने अजय दायमा को अपना अध्ययन गुरु बताते हुए कहा कि उनके सान्निध्य में उन्होंने कृतज्ञता के साथ स्वयं का मूल्यांकन करना सीखा। उन्होंने कहा कि यदि किसी समझदार व्यक्ति का साथ मिल जाए तो प्रगति स्वाभाविक हो जाती है। उन्होंने बताया कि वे वर्तमान में जाग्रत मानव के 122 आचरणों के अध्ययन और अभ्यास की प्रक्रिया में हैं।

समापन अवसर पर विजया दीदी तथा अजय दायमा की माताजी गीता दादी ने अपने आशीर्वचन दिए और सभी को कृतज्ञता, सहयोग तथा समझ के साथ जीवन जीने का संदेश दिया।

कार्यक्रम का संचालन प्रांजल वशिष्ठ ने किया। अंत में चंद्र प्रकाश पोरवार एवं आलोक धवन ने एमसीवीके के संस्थापक अजय दायमा का माल्यार्पण कर उन्हें दुशाला ओढ़ाकर सम्मानित किया।

कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन में मिले सहयोग के प्रति कृतज्ञ होने और स्वयं भी दूसरों के जीवन में सहयोगी बनने का संकल्प लेने का अवसर है। इसी भावना के साथ एमसीवीके में इस वर्ष गुरु पूर्णिमा को “कृतज्ञता दिवस” के रूप में मनाया गया।

उन आँसुओं ने ज़िन्दगी का मकसद बदल दिया

44 बार रक्तदान, भूखों को भोजन और लावारिसों की सेवा—अभिषेक सिंह की प्रेरक कहानी

लेखक : राज खन्ना

कुछ लोग गीत केवल गुनगुनाते हैं, कुछ लोग उन्हें जीते हैं। सुल्तानपुर के युवा अभिषेक सिंह उन लोगों में हैं जिन्होंने मानवता को अपने जीवन का धर्म बना लिया है।

वर्ष 2014 में ग्रामीण परिवेश से निकलकर अभिषेक बी.एससी. की पढ़ाई के लिए कमला नेहरू इंस्टीट्यूट (के.एन.आई.), सुल्तानपुर पहुँचे। कॉलेज में आयोजित एक रक्तदान शिविर में उन्होंने पहली बार प्लास्टिक एनीमिया से पीड़ित मरीज राजन के लिए रक्तदान किया। रक्त मिलने के बाद मरीज के पिता की आँखों से छलकते कृतज्ञता के आँसू अभिषेक के मन पर ऐसी अमिट छाप छोड़ गए कि उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि उनका जीवन केवल अपने लिए नहीं होगा।

इसी दौरान गोमती नदी के पुल से गुजरते हुए उनकी नज़र किनारे बैठे एक वृद्ध पर पड़ी। वृद्ध ने केवल पानी माँगा। बातचीत में पता चला कि तीन दिन से उसके पेट में अन्न का एक दाना तक नहीं गया था। शरीर पर खुले घाव थे, जिनमें कीड़े पड़ चुके थे। उस दृश्य ने अभिषेक को भीतर तक झकझोर दिया। वहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई। उन्होंने निःस्वार्थ सेवा को अपना संकल्प बना लिया।

आज उस घटना को ग्यारह वर्ष बीत चुके हैं। अब 28 वर्षीय अभिषेक 44 बार रक्तदान कर चुके हैं। लेकिन उनकी सेवा केवल रक्तदान तक सीमित नहीं रही। उनका प्रयास है कि शहर में कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए। वर्षों से वे “वन डे हंगर स्ट्राइक” अभियान चला रहे हैं। सड़कों, रेलवे स्टेशनों, फुटपाथों और खुले आसमान के नीचे रहने वाले भूखे, बीमार और लावारिस लोगों तक भोजन पहुँचाना, उन्हें नहलाना-धुलाना, साफ कपड़े पहनाना, घावों की सफाई करना, अस्पताल में भर्ती कराना और उनके स्वस्थ होने तक देखभाल करना अब उनके जीवन की दिनचर्या बन चुकी है। यदि किसी जरूरतमंद की पहचान मिल जाती है तो उसे उसके परिवार तक पहुँचाने का प्रयास भी किया जाता है।

सेवा का यह सफर किसी एक दिन के उत्साह का परिणाम नहीं है। भीषण गर्मी हो या कड़ाके की ठंड, अभिषेक और उनके साथी मदद की हर सूचना पर बिना देर किए पहुँच जाते हैं। ऐसे समय में, जब समाज का दायरा अक्सर अपने परिवार तक सिमटता जा रहा है, अभिषेक जैसे युवा उम्मीद की रोशनी बनकर सामने आते हैं।

अभिषेक के जीवन में कई प्रेरणास्रोत भी रहे। के.एन.आई. में रक्तदान शिविर का आयोजन विधि विभाग के प्रोफेसर डॉ. सुशील कुमार सिंह ने किया था, जो स्वयं अब तक 57 बार रक्तदान कर चुके हैं। समाजसेवी डॉ. आशुतोष श्रीवास्तव 75 बार रक्तदान कर चुके हैं, जबकि करतार केशव यादव चार दशकों से सेवा कार्यों में सक्रिय रहते हुए 40 बार रक्तदान कर चुके हैं। इन सभी के व्यक्तित्व और सेवा भावना ने अभिषेक के भीतर मानवता के प्रति समर्पण को और मजबूत किया।

डेढ़ वर्ष पहले अभिषेक का विवाह शिवानी से हुआ। शिवानी भी उसी सेवा पथ की सहभागी हैं। उन्होंने सगाई के अवसर पर रक्तदान किया और विवाह के बाद भी दो बार रक्तदान कर चुकी हैं। उनके लिए वैवाहिक जीवन केवल साथ रहने का नहीं, बल्कि साथ मिलकर समाज के लिए जीने का संकल्प है।

आज अभिषेक और उनके साथी सुल्तानपुर के सरकारी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, रेलवे स्टेशन और शहर की सड़कों पर पड़े उन लोगों की सेवा कर रहे हैं, जिनका कोई अपना नहीं है। इनमें ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अपनी याददाश्त खो दी है, मानसिक संतुलन खो चुके हैं या परिवार द्वारा छोड़ दिए गए हैं। उनके पास न भोजन है, न रहने का ठिकाना और न उपचार की कोई व्यवस्था। कई लोगों के घावों में कीड़े पड़ चुके होते हैं। दर्द उनकी संवेदनाओं को सुन्न कर चुका होता है।

अभिषेक के साथ प्रज्ज्वल, अनिमेष, विपिन अनुज, निशांत, अभिषेक सोनी सहित कई युवा समाजसेवी डॉ. सुधाकर सिंह, अंकुरण फाउंडेशन और गायत्री परिवार के सहयोग से इस सेवा अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं।

उनकी सेवा यात्रा की अनेक कहानियाँ मन को द्रवित कर देती हैं। जिला अस्पताल के सेप्टिक वार्ड में भर्ती एक वृद्ध महिला दो वर्षों तक अभिषेक की प्रतीक्षा करती थीं। वह उनके हाथों से ही भोजन करती थीं। उनके निधन के बाद अंतिम संस्कार भी अभिषेक और उनके साथियों ने ही किया। बिहार के सीतामढ़ी निवासी राजेश्वर सिंह गंभीर अवस्था में मिले। महीनों की सेवा के बाद स्वस्थ हुए और अपने घर लौट सके। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर निवासी शीतल और मध्य प्रदेश के जबलपुर निवासी केशव सहित अनेक लोगों को भी उन्होंने नया जीवन दिया। कई लोगों के नाम दर्ज हैं, लेकिन उससे कहीं अधिक ऐसे लोग हैं जिनकी कोई पहचान नहीं। सेवा करने वालों के लिए उनकी पहचान से अधिक महत्वपूर्ण उनका जीवन है।

ऐसे लोगों की सेवा आसान नहीं होती। कई लोग बातचीत तक नहीं करते। कुछ भोजन लेने से भी इनकार कर देते हैं। विश्वास जीतने में कई दिन लग जाते हैं। घावों की सफाई और मरहम-पट्टी करते समय वे कभी-कभी नाराज़ भी हो जाते हैं। लेकिन अभिषेक और उनके साथी धैर्य नहीं खोते। वे रोज़ उन्हें खोजते हैं, उनके उपचार का ध्यान रखते हैं और तब तक प्रयास करते हैं जब तक वे स्वस्थ न हो जाएँ। यदि कोई अपने घर का पता बता देता है तो उसे परिवार तक पहुँचाने का प्रयास भी किया जाता है।

पिछले तीन वर्षों से अभिषेक की टीम “वन डे हंगर स्ट्राइक” अभियान चला रही है। लोगों से अपील की जाती है कि वे महीने में एक समय उपवास रखें और उस भोजन पर होने वाला लगभग पचास रुपये का खर्च इस अभियान को दें। इस पहल को समाज का भरपूर सहयोग मिला है। अनेक परिवार अपने घर के शुभ अवसरों पर भी इस अभियान के लिए सहयोग राशि देने लगे हैं। हर शाम युवा स्वयंसेवक शहर के विभिन्न इलाकों में जरूरतमंदों की पहचान करते हैं और ढाबों से भोजन पैक कराकर उनके बीच वितरित करते हैं।

अभिषेक कहते हैं कि समाज में सहयोग करने वालों की कोई कमी नहीं है, आवश्यकता केवल भरोसा जीतने की होती है। यदि नीयत साफ हो और प्रयास ईमानदार हों तो लोग स्वयं आगे आकर साथ खड़े होते हैं। यही विश्वास उनकी सबसे बड़ी पूंजी है।

मानवता के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए उन्हें स्वामी विवेकानंद यूथ अवॉर्ड, उत्तर प्रदेश रत्न और रक्तयोद्धा सम्मान सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान किसी असहाय व्यक्ति के चेहरे पर लौटती मुस्कान है।

सच तो यह है कि अभिषेक सिंह केवल यह गीत गुनगुनाते नहीं—

“किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,किसी के वास्ते हो अपने दिल में प्यार…”

उन्होंने इसे अपने जीवन का आचरण बना लिया है। उनसे एक बार मिलिए, संभव है कि मानवता पर आपका विश्वास और गहरा हो जाए..

लेखक परिचय :

राज खन्ना हिंदी पत्रकारिता के वरिष्ठ और सम्मानित हस्ताक्षरों में से एक हैं। पिछले लगभग पाँच दशकों से वे राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और विभिन्न प्रतिष्ठित प्रकाशनों में निरंतर लेखन कर रहे हैं। सामाजिक सरोकारों, मानवीय संवेदनाओं, समसामयिक विषयों और जीवन-मूल्यों पर उनकी लेखनी ने पाठकों के बीच एक विशिष्ट पहचान बनाई है।

तथ्यों की प्रामाणिकता, संवेदनशील दृष्टि और सहज अभिव्यक्ति उनकी लेखन शैली की विशेषता रही है। यही कारण है कि देशभर में उनका एक बड़ा और समर्पित पाठक वर्ग है, जो वर्षों से उनके लेखों को विश्वास और आत्मीयता के साथ पढ़ता आया है। हिंदी पत्रकारिता में उनका योगदान नई पीढ़ी के लेखकों और पत्रकारों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।

क्या भारत का मिडिल क्लास अब जोखिम लेने लगा है?

लेखक : मोहित धवन

एक समय था, जब भारतीय मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी आकांक्षा एक सुरक्षित नौकरी हुआ करती थी। घर में यदि कोई सरकारी अधिकारी, इंजीनियर, डॉक्टर या बैंक कर्मचारी बन जाए, तो मानो जीवन सफल हो गया। माता-पिता की सबसे बड़ी चिंता यही होती थी कि बच्चे का भविष्य सुरक्षित रहे। जोखिम उठाना समझदारी नहीं, बल्कि लापरवाही माना जाता था।

लेकिन आज जब हम अपने आसपास देखते हैं, तो लगता है कि भारत का मध्यम वर्ग चुपचाप बदल रहा है।

यह बदलाव केवल कमाई के तरीकों का नहीं, बल्कि सोच का है। वह पीढ़ी, जो कभी असफल होने से डरती थी, अब नए रास्ते बनाने का साहस भी जुटा रही है। इंटरनेट, तकनीक और बदलती अर्थव्यवस्था ने अवसरों के ऐसे दरवाज़े खोले हैं, जिनकी कल्पना दो-तीन दशक पहले शायद ही किसी ने की होगी।

याद कीजिए, बचपन में हम सबने एक कहावत सुनी थी—“पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब।” यह केवल कहावत नहीं थी, बल्कि उस दौर के मध्यम वर्ग की सोच थी। खेल, संगीत, कला या व्यवसाय को करियर नहीं माना जाता था। सफलता का रास्ता लगभग तय था—अच्छी पढ़ाई, अच्छी नौकरी और एक सुरक्षित जीवन।

लेकिन नई पीढ़ी ने इस सोच को लगभग उलट दिया है।

भारतीय क्रिकेट इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। महेंद्र सिंह धोनी रांची जैसे शहर से निकलकर विश्व क्रिकेट के सबसे सफल कप्तानों में शामिल होते हैं। जसप्रीत बुमराह साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ तेज़ गेंदबाज़ों में गिने जाते हैं। हार्दिक और क्रुणाल पंड्या के संघर्ष की कहानी आज लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है। महिला क्रिकेट में झूलन गोस्वामी, हर्मनप्रीत कौर और स्मृति मंधाना जैसी खिलाड़ियों ने यह साबित किया कि प्रतिभा आर्थिक स्थिति की मोहताज नहीं होती।

आज देश के लाखों माता-पिता अपने बच्चों को क्रिकेट अकादमी, बैडमिंटन कोर्ट, तैराकी या फुटबॉल के मैदान तक स्वयं छोड़ने जाते हैं। यह दृश्य तीस साल पहले इतना सामान्य नहीं था। खेल अब केवल शौक नहीं, सम्मानजनक करियर भी है।

यही बदलाव डिजिटल दुनिया में भी दिखाई देता है।

यदि यह लेख बीस वर्ष पहले लिखा जाता, तो शायद “यूट्यूबर” शब्द भी इसमें जगह नहीं पाता। आज सौरव जोशी जैसे युवा एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर करोड़ों लोगों तक अपनी पहुँच बना चुके हैं। उनकी सफलता यह बताती है कि आज का भारत केवल डिग्री नहीं, रचनात्मकता और निरंतर मेहनत को भी पहचान देता है। कम उम्र में उन्होंने जिस स्तर की लोकप्रियता और आर्थिक सफलता हासिल की, वह इस बात का संकेत है कि तकनीक ने अवसरों की दुनिया को कितना बदल दिया है।

इसी तरह गौरव तनेजा की कहानी भी नए भारत की कहानी है। आईआईटी से इंजीनियरिंग, एक सफल कमर्शियल पायलट का करियर, और फिर सब कुछ छोड़कर डिजिटल दुनिया में अपनी नई पहचान बनाना—यह केवल पेशा बदलने का निर्णय नहीं था, बल्कि यह विश्वास था कि जीवन में सफलता के रास्ते अब पहले जितने सीमित नहीं रहे।

यह बदलाव केवल कुछ चर्चित चेहरों तक सीमित नहीं है।

शार्क टैंक इंडिया जैसे मंचों पर पहुँचने वाले अधिकांश युवा उद्यमियों को देखिए। उनमें बड़ी संख्या ऐसे परिवारों से आती है जिन्हें हम भारतीय मध्यम वर्ग कहते हैं। उनके पास विरासत में बड़े उद्योग नहीं थे, लेकिन उनके पास एक विचार था, समस्या का समाधान था और उस पर विश्वास करने का साहस था। यही विश्वास आज भारत को दुनिया के सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम में शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ा रहा है।

दरअसल, तकनीक ने अवसरों का लोकतंत्रीकरण कर दिया है। आज किसी छोटे शहर का युवा भी अपने मोबाइल फोन से दुनिया तक पहुँच सकता है। कंटेंट क्रिएशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल मार्केटिंग, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन शिक्षा और फ्रीलांसिंग जैसे क्षेत्रों ने करियर की परिभाषा बदल दी है। अब सफलता केवल नियुक्ति पत्र से नहीं, बल्कि अपने कौशल और विचारों से भी तय होने लगी है।

इसका अर्थ यह नहीं कि सुरक्षित नौकरी का महत्व समाप्त हो गया है। भारत के छोटे शहरों और कस्बों में आज भी सरकारी और स्थायी नौकरियाँ आकर्षण का केंद्र हैं। लेकिन यह भी सच है कि महानगरों और तेजी से बदलते शहरी भारत में युवा अब केवल नौकरी खोजने की नहीं, बल्कि अवसर बनाने की भी सोच रहे हैं।

बेशक, हर स्टार्टअप सफल नहीं होगा, हर यूट्यूब चैनल करोड़ों दर्शक नहीं जुटाएगा और हर खिलाड़ी राष्ट्रीय टीम तक नहीं पहुँचेगा। लेकिन आज का युवा इतना अवश्य समझ गया है कि असफलता जीवन का अंत नहीं होती। कई बार वही अगली सफलता की पहली सीढ़ी बन जाती है।

शायद भारतीय मध्यम वर्ग का सबसे बड़ा परिवर्तन यही है। उसने अपने बच्चों के सपनों की सीमाएँ बढ़ा दी हैं। अब घरों में केवल यह नहीं पूछा जाता कि “नौकरी कहाँ मिलेगी?”, बल्कि यह भी पूछा जाने लगा है—“तुम्हें सचमुच करना क्या है?”

संभव है, आने वाले दशक में भारत की सबसे बड़ी ताकत केवल उसकी युवा आबादी नहीं होगी, बल्कि वही बदलता हुआ मध्यम वर्ग होगा, जिसने सुरक्षा और सपनों के बीच एक नया संतुलन बना लिया है।

और शायद यही नए भारत की सबसे बड़ी कहानी है—जहाँ मध्यम वर्ग अब अपने बच्चों को केवल सुरक्षित भविष्य नहीं, बल्कि अपनी पसंद का भविष्य चुनने का साहस भी देने लगा है।

संपादकीय

लोकतंत्र की खामोशी और एक अनशन का शोर

लेखक : मोहित धवन
दिनांक : 24 जुलाई, 2026

लोकतंत्र की विडंबना देखिए। जिस व्यवस्था का जन्म जनता की आवाज़ सुनने के लिए हुआ था, उसी व्यवस्था में आज जनता को अपनी आवाज़ सुनाने के लिए अनशन करना पड़ रहा है। सवाल यह नहीं कि सोनम वांगचुक ने अपना अनशन समाप्त कर दिया। असली सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र अब केवल तब जागता है, जब कोई नागरिक अपने शरीर को ही प्रतिरोध का अंतिम माध्यम बना ले?

जंतर-मंतर पर बैठा एक व्यक्ति केवल उपवास नहीं कर रहा था। वह इस लोकतंत्र के सामने एक आईना रखे बैठा था। उस आईने में केवल सरकार का चेहरा नहीं दिख रहा था; उसमें संसद, राजनीतिक दल, नौकरशाही, न्याय व्यवस्था, मीडिया और हम सब दिखाई दे रहे थे। फर्क बस इतना था कि उस आईने में झाँकने का साहस बहुत कम लोगों ने किया।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद मानी जाती है। लेकिन यदि संवाद का दरवाज़ा तब खुलता है, जब किसी की साँसें दाँव पर लग जाएँ, तो इसे लोकतंत्र की परिपक्वता नहीं कहा जा सकता। तब यह मान लेना चाहिए कि कहीं न कहीं संवाद की संस्थाएँ केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं।

यह केवल सोनम वांगचुक का प्रश्न नहीं है। कभी किसान दिल्ली की सीमाओं पर बैठते हैं, कभी छात्र सड़कों पर उतरते हैं, कभी बेरोज़गार युवा रेल की पटरियों पर अपना भविष्य खोजते दिखाई देते हैं। हर बार व्यवस्था कुछ दिन असहज होती है, फिर आश्वासनों का एक नया पुल बना दिया जाता है। लेकिन पुल के नीचे बह रही असंतोष की नदी वहीं की वहीं रहती है।

लोकतंत्र में विरोध समस्या नहीं होता, विरोध की अनसुनी समस्या होती है।

सवाल यह भी नहीं कि सरकार सही है या आंदोलन। सवाल यह है कि क्या हमने लोकतंत्र को केवल बहुमत की गणित तक सीमित कर दिया है? क्या पाँच वर्ष में एक बार मतदान कर देना ही नागरिक होने का प्रमाणपत्र है? क्या उसके बाद प्रश्न पूछना असुविधाजनक और उत्तर देना राजनीतिक जोखिम बन गया है?

लोकतंत्र का संकट तब शुरू होता है, जब सत्ता आलोचना को सलाह नहीं, चुनौती समझने लगे और समाज असहमति को राष्ट्र-विरोध का पर्याय बना दे। उस दिन लोकतंत्र बाहर से नहीं टूटता, भीतर से खोखला होने लगता है।

यह भी उतना ही सच है कि हर समस्या का समाधान सरकार के पास नहीं हो सकता। हर युवा को सरकारी नौकरी देना किसी भी देश के लिए संभव नहीं है। लेकिन यह प्रश्न अवश्य पूछा जाना चाहिए कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था युवाओं को जीवन के लिए तैयार कर रही है या केवल परीक्षाओं के लिए? हमने डिग्रियों का अंबार तो खड़ा कर दिया, लेकिन कौशल, उद्यमिता और जीवनोपयोगी शिक्षा को अभी भी हाशिए पर रखा हुआ है।

यदि भारत को आने वाले दशकों में आत्मनिर्भर बनना है, तो रोजगार की बहस को सरकारी नियुक्तियों से आगे ले जाना होगा। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को ऐसे युवाओं का निर्माण करना होगा, जो अवसर खोजने के बजाय अवसर पैदा करें। शिक्षा का उद्देश्य नौकरी नहीं, क्षमता होना चाहिए।

लेकिन शायद इससे भी बड़ा संकट हमारी विकास-दृष्टि का है।

हमने प्रकृति को संसाधन समझा, संबंध नहीं। नदियों को परियोजना, जंगलों को भूमि और पहाड़ों को खनिज में बदल दिया। विकास की दौड़ में मनुष्य प्रकृति से जितना दूर हुआ, उतना ही स्वयं से भी दूर होता गया। सोनम वांगचुक जैसे लोग बार-बार हमें याद दिलाते हैं कि सभ्यता केवल ऊँची इमारतों से नहीं बनती; वह मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन से बनती है। यदि विकास पृथ्वी को घायल करके होगा, तो अंततः मनुष्य भी सुरक्षित नहीं रहेगा।

शायद अब समय केवल सरकार से अपेक्षा करने का नहीं, समाज से भी प्रश्न पूछने का है।

क्या हमने अपने बीच ऐसे नेतृत्व को तैयार किया है, जो चुनाव जीतने के लिए नहीं, समाज को दिशा देने के लिए खड़ा हो? क्या विश्वविद्यालय केवल डिग्रियाँ बाँट रहे हैं या विचार भी पैदा कर रहे हैं? क्या उद्योग केवल लाभ कमाने तक सीमित हैं या सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने को भी तैयार हैं? क्या बुद्धिजीवी केवल बहस कर रहे हैं या समाज के बीच उतरकर संवाद भी कर रहे हैं?

हर परिवर्तन संसद से नहीं आता। कुछ परिवर्तन समाज की चेतना से जन्म लेते हैं। इतिहास में वही समाज आगे बढ़े हैं, जिन्होंने अपने भीतर ऐसे लोगों को जन्म दिया, जो सत्ता से पहले समाज को बदलने निकले।

आज लोकतंत्र को किसी नए संविधान की आवश्यकता नहीं है। उसे नए नागरिकों की आवश्यकता है। ऐसे नागरिक, जो अधिकारों के साथ अपने दायित्वों को भी समझें। ऐसे नेता, जो सत्ता से पहले समाज के प्रति जवाबदेह हों। ऐसी शिक्षा, जो केवल करियर नहीं, चरित्र भी बनाए। और ऐसा विकास, जिसमें मनुष्य, प्रकृति और अर्थव्यवस्था तीनों साथ चल सकें।

सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त हो गया है। लेकिन लोकतंत्र के सामने रखे गए प्रश्न अभी भी उपवास पर हैं।

शायद किसी लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं होती। उसकी असली परीक्षा तब होती है, जब वह अपने सबसे शांत, सबसे कमजोर और सबसे असुविधाजनक प्रश्न को भी उतनी ही गंभीरता से सुन सके, जितनी गंभीरता से वह चुनावी नारों को सुनता है।

और यदि किसी लोकतंत्र में प्रश्न पूछने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही हो, तो शायद समस्या प्रश्नों में नहीं, उन उत्तरों में है जो अब तक दिए ही नहीं गए।