जब हमारी कामना शुभ है, तो कल्पना अशुभ क्यों? MCVK में विद्यार्थियों ने खोजे जीवन के सवाल

इंदौर, 10 अगस्त 2026 | रिपोर्ट – MCVK टीम,

मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में सोमवार को शासकीय नर्सिंग महाविद्यालय, एमजीएम मेडिकल कॉलेज, डीएवीवी विश्वविद्यालय, इंदौर के 64 विद्यार्थियों एवं फैकल्टी सदस्यों ने शैक्षणिक भ्रमण किया। MCVK परिवार की ओर से विद्यार्थियों एवं शिक्षकों का आत्मीय स्वागत किया गया। इस अवसर पर कॉलेज की फैकल्टी डॉ. श्वेता भोसकर सहित अन्य शिक्षक भी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम की शुरुआत MCVK के परिचय से हुई। डॉ. साधना राव ने विद्यार्थियों को केंद्र की जीवन-पद्धति और उसके पीछे की सोच से परिचित कराया। उन्होंने बताया कि MCVK में परिवार समाधान और समृद्धि के साथ जीने की दिशा में सामूहिक रूप से प्रयास कर रहे हैं। यहां संबंध, सहयोग, विश्वास और सहभागिता केवल चर्चा के विषय नहीं, बल्कि इन्हें दैनिक जीवन में समझने और जीने का अभ्यास किया जाता है।

डॉ. साधना राव ने मानवीय मूल्यों की शिक्षा की आवश्यकता पर भी बात की। उन्होंने कहा कि जीवन में जिन मूल्यों की आवश्यकता हमें परिवार और समाज में एक-दूसरे के साथ जीने के लिए पड़ती है, उनकी व्यवस्थित समझ सामान्यतः स्कूली, कॉलेज की शिक्षा में नहीं मिल पाती। जबकि यही समझ मनुष्य को संबंधों की पहचान करने और साथ मिलकर बेहतर ढंग से जीने में सहायक होती है।

इसके बाद डॉ. अभय वानखेड़े के साथ विद्यार्थियों का संवाद एवं प्रश्नोत्तर सत्र हुआ। विद्यार्थियों ने मानव, जीवन, शिक्षा, कामना और कल्पनाशीलता से जुड़े कई सवाल रखे। इसी दौरान एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आया—

“जब हमारी कामना शुभ है, तो हमारी कल्पना अशुभ क्यों हो जाती है?”

इस पर डॉ. वानखेड़े ने कहा कि मानव की मौलिक चाहना का अध्ययन नहीं होने और चाहना अनुरूप जीने की दिशा से भटकाव के कारण ही शुभ की कामना सफल नहीं होती, आपने यह भी स्पष्ट किया की अध्ययन हमेशा शुभ का वास्तविकता का ही संभव है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “प्रकाश एक वास्तविकता है, इसलिए उसका अध्ययन किया जा सकता है। अंधकार की अपनी कोई वास्तविकता नहीं है। यह प्रकाश की अनुपस्थिति का प्रमाण है. जो वास्तविक है, अध्ययन उसी का होता है।”

उन्होंने कहा कि शिक्षा में मानव का समग्र अध्ययन नहीं होने के कारण मनुष्य की मूल चाहना, कामना और कल्पनाशीलता को समझने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाया। जब मनुष्य स्वयं और अपनी मूल चाहना को ठीक से समझता है, तभी वह अपनी कल्पनाओं को भी सही दिशा में पहचान और व्यवस्थित कर पाता है।

प्रश्नोत्तर सत्र के बाद विद्यार्थियों को तीन समूहों में MCVK परिसर का भ्रमण कराया गया। पहले समूह का मार्गदर्शन अशोक भैया, दूसरे का अमित भैया और तीसरे का तारकेश भैया ने किया। विद्यार्थियों ने परिसर में परिवारों के सामूहिक जीवन, उत्पादन, विभिन्न व्यवस्थाओं और रोजमर्रा की गतिविधियों को करीब से देखा।

भ्रमण के दौरान विद्यार्थियों ने विनिमय केंद्र की कार्यप्रणाली को भी समझा। चंदन भैया ने अपनी टीम के साथ विद्यार्थियों को विनिमय केंद्र की व्यवस्था से परिचित कराया और बताया कि यहां परिवारों की आवश्यकता के अनुरूप विभिन्न वस्तुओं की उपलब्धता और विनिमय को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है।

इस दौरान विद्यार्थियों का डॉ. उमा दीदी के साथ भी आत्मीय संवाद हुआ। उन्होंने विद्यार्थियों को बताया कि उन्होंने भी वर्ष 2005 में इसी कॉलेज से पीजी की पढ़ाई पूरी की थी। पिछले छह वर्षों से वे MCVK परिवार से जुड़ी हुई हैं और यहां परिवारों के साथ इस जीवन-पद्धति को समझते और जीते हुए आगे बढ़ रही हैं।

अपने ही कॉलेज की पूर्व छात्रा से MCVK में मुलाकात विद्यार्थियों के लिए विशेष अनुभव रहा। डॉ. उमा दीदी ने अपने छात्र जीवन से लेकर MCVK परिवार से जुड़ने तक की यात्रा और यहां के अपने अनुभव विद्यार्थियों के साथ साझा किए।

यह शैक्षणिक भ्रमण विद्यार्थियों के लिए केवल एक परिसर को देखने तक सीमित नहीं रहा। इसने उनके सामने एक महत्वपूर्ण विचार भी रखा कि शिक्षा केवल प्रोफेशन और करियर की तैयारी तक सीमित न होकर स्वयं को, संबंधों को और जीवन को समझने का माध्यम भी बन सकती है।

“मानव को केवल आकार से नहीं, आचरण से मानव होना जरूरी”: अजय दायमा

इंदौर, 9 अगस्त 2026 | रिपोर्ट – MCVK टीम

मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में आयोजित विकल्प शिविर के नौवें दिन के प्रथम सत्र को संबोधित करते हुए MCVK के संस्थापक अजय दायमा जी ने कहा कि मानव के शरीर रूप में जन्म लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके आचरण में भी मानवीयता दिखाई देनी चाहिए। मनुष्य की वास्तविक यात्रा स्वयं को समझने, दूसरे मनुष्य की समझने की संभावना को स्वीकार करने और संबंधों में मूल्यों के साथ जीने से आगे बढ़ती है।

उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य की समझ पूरी नहीं होती, तब तक उससे गलतियाँ होती रहेंगी। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि गलती हुई या नहीं, बल्कि यह है कि व्यक्ति अपने भीतर समझने की संभावना को पहचान रहा है या नहीं।

अजय जी दायमा ने कहा, “जब मुझे यह समझ में आता है कि मैं समझ सकता हूँ, तब मुझे यह भी स्वीकार होता है कि सामने वाला व्यक्ति भी समझ सकता है। यहीं से सम्मान की यात्रा शुरू होती है।”

“जीव चेतना से मानव चेतना की यात्रा”

उन्होंने कहा कि जीव चेतना से मानव चेतना की यात्रा सम्मान की यात्रा है और MCVK इसी दिशा में निरंतर कार्य कर रहा है। इस यात्रा में व्यक्ति सबसे पहले स्वयं का मूल्यांकन करता है और यह देखता है कि जो कुछ उसने समझा है, वह उसके आचरण में कितना दिखाई दे रहा है।

उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल उसके विचारों या कथनों से समझा हुआ नहीं माना जा सकता। समझ का प्रमाण उसके जीने में दिखाई देना चाहिए। समझा हुआ व्यक्ति दूसरे को समझने में सहयोग कर सकता है, उसके प्रश्नों के समाधानपरक उत्तर दे सकता है और दूसरे व्यक्ति के साथ समाधानपूर्वक जी सकता है।

उन्होंने कहा कि ऐसे व्यक्ति के उत्तर तार्किक, व्यावहारिक और उद्देश्यपूर्ण होंगे। उसकी समझ केवल स्वयं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वह दूसरे व्यक्ति की समझ विकसित होने में भी सहयोगी बनेगा।

“समाधान से शुरू होती है परिवार की वास्तविक यात्रा”

अजय दायमा भैया ने कहा कि जब व्यक्ति समाधान के साथ जीने लगता है, तब परिवार का वास्तविक स्वरूप सामने आता है। परिवार केवल कुछ लोगों का एक घर में साथ रहना नहीं है। परिवार में लोग एक-दूसरे को समझने, समझाने में सहयोग करने और समझपूर्वक जीने के लिए साथ होते हैं।

उन्होंने इस पूरी यात्रा को एक क्रम में समझाया—

समझ → समाधान → परिवार → समाज में अभय → प्रकृति में संतुलन → मानव जाति की सुरक्षा → सुखी एवं संपन्न अगली पीढ़ी।

उन्होंने कहा कि समाधानपूर्वक जीने वाले परिवार ही अभय समाज का आधार बन सकते हैं। समाज में अभय होने पर प्रकृति के साथ मनुष्य का व्यवहार संतुलित होता है। प्रकृति का संतुलन मानव जाति की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा बनाता है और सुरक्षित मानव समाज में ही आने वाली पीढ़ियों के सुखी और संपन्न होने की संभावना मजबूत होती है।

“परिवार में संबंधों के साथ मूल्यों की पहचान जरूरी”

अजय दायमा ने कहा कि परिवार को समझने के लिए संबंध, मूल्य और व्यवस्था को समझना आवश्यक है। हर संबंध में मूल्य निहित हैं और इन मूल्यों की पहचान के साथ जीना ही परिवार को सार्थक बनाता है।

उन्होंने सम्मान, विश्वास और स्नेह को संबंधों के आधार मूल्य बताते हुए कहा कि सामने वाले व्यक्ति में समझने की संभावना को स्वीकार करना सम्मान की शुरुआत है। विश्वास और स्नेह संबंधों को मजबूती और निरंतरता प्रदान करते हैं।

उन्होंने ममता और वात्सल्य को अपने से छोटों के साथ जीने के मूल्य बताया। इसका अर्थ केवल बच्चों या छोटों की देखभाल करना नहीं है, बल्कि उनकी समझ पूरी होने में सहयोग करना भी है।

इसी तरह कृतज्ञता, गौरव और श्रद्धा अपने से अधिक समझे हुए व्यक्ति के प्रति उसकी समझ और योगदान की स्वीकृति के मूल्य हैं। जब व्यक्ति यह पहचानता है कि किसी ने उसकी समझ विकसित होने की यात्रा में सहयोग किया है, तब उसके प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा का भाव स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।

“प्रेम—दो समझदार व्यक्तियों की सहमति”

अजय दायमा जी ने प्रेम को संबंधों में पूर्णता से जोड़ते हुए कहा कि जब दो समझदार व्यक्ति पूर्णता की दिशा में रत रहते हुए परस्पर सहमति के साथ जीते हैं, तब प्रेम की अभिव्यक्ति होती है। इस दृष्टि से प्रेम केवल भावनात्मक आकर्षण नहीं, बल्कि समझ, सहमति और पूर्णता की दिशा में साथ जीने की अवस्था है।

उन्होंने कहा कि सम्मान निरंतर विकसित होने की यात्रा है। इसकी शुरुआत स्वयं में समझने की संभावना को पहचानने और वही संभावना दूसरे मनुष्य में स्वीकार करने से होती है।

व्यक्ति में शुरू हुई यही समझ आगे संबंधों में मूल्यों के रूप में अभिव्यक्त होती है, परिवार में समाधान का आधार बनती है और फिर समाज में अभय तथा प्रकृति में संतुलन की दिशा प्रशस्त करती है।

अजय जी ने कहा कि इस पूरी यात्रा का उद्देश्य केवल व्यक्ति को बेहतर बनाना नहीं, बल्कि ऐसा मानवीय आचरण विकसित करना है, जिसमें समाधानपूर्ण व्यक्ति, समृद्ध परिवार, भयमुक्त समाज और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन संभव हो सके।

समझ की रोशनी में न्यायपूर्वक जीने का अभ्यास ही साक्षात्कार है: अजय दायमा

इंदौर, 8 अगस्त 2026 | रिपोर्ट – MCVK टीम

मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में आयोजित विकल्प शिविर के एक सत्र में MCVK के संस्थापक अजय दायमा ने कल्पनाशीलता, साक्षात्कार, बोध, अनुभव और परिवार व्यवस्था पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि मनुष्य के पास कल्पनाशीलता की शक्ति है। जब कल्पनाशीलता में सही प्रस्ताव आता है, उसे समझने और जीने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। समझ की रोशनी में न्यायपूर्वक जीने का निरंतर अभ्यास ही साक्षात्कार की दिशा में ले जाता है।

उन्होंने कहा कि केवल किसी विचार को सुन लेना या मान लेना पर्याप्त नहीं है। मनुष्य जब अस्तित्व को सह-अस्तित्व के रूप में समझते हुए अपने व्यवहार और जीवन में उसे प्रमाणित करने लगता है, तभी समझ सार्थक होती है। मध्यस्थ दर्शन में भी अध्ययन की प्रक्रिया को साक्षात्कार, बोध और अनुभव की दिशा में आगे बढ़ने के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

अजय जी दायमा ने श्रद्धेय ए. नागराज जी के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने मानव को समझने, जीने और समझाने का एक मॉडल प्रस्तुत किया। उन्होंने विचार-अभ्यास और व्यवहार-अभ्यास पर जोर देते हुए कहा कि सह-अस्तित्व की दृष्टि से विचार करना आवश्यक है। विचार के अभ्यास से मानव के अध्ययन की शुरुआत होती है और समझदार मानव के अध्ययन से साक्षात्कार की दिशा स्पष्ट होती है। ए. नागराज जी द्वारा प्रतिपादित मध्यस्थ दर्शन का मूल आधार भी “अस्तित्व, सह-अस्तित्व है” की समझ है।

उन्होंने कहा कि हमारी समझ के रास्ते में मुख्यतः तीन संकट—पूर्वाग्रह, पूर्वाभ्यास और पूर्वानुमान आते हैं। हम कई बार वास्तविकता को जैसी वह है वैसा देखने के बजाय अपनी पहले से बनी धारणाओं, आदतों और अनुमानों के आधार पर देखने लगते हैं। इसलिए समझ विकसित करने के लिए इनसे मुक्त होकर वास्तविकता को देखने का अभ्यास जरूरी है।

“परिवार ही व्यवस्था का केंद्र बिंदु” –

परिवार के विषय पर अजय जी ने कहा कि एक से अधिक मानव मिलकर परिवार बनाते हैं, लेकिन केवल साथ रहना ही परिवार नहीं है। एक-दूसरे के साथ संबंधों की पहचान, समाधान और मिलकर समृद्धि को प्राप्त करना परिवार का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। इसी कारण परिवार, व्यवस्था का केंद्र बिंदु है।

उन्होंने सवाल उठाया कि आज मनुष्य बड़ी संख्या में साथ तो रह रहा है, लेकिन क्या वह वास्तव में परिवार विधि से जी पा रहा है? इसका एक कारण यह है कि हमने मानव को कई बार केवल शरीर या आत्मा के रूप में देखने का प्रयास किया, जबकि मानव को उसकी संपूर्णता में समझना आवश्यक है। शरीर के स्तर पर सुविधा-असुविधा का प्रश्न है, जबकि सुख और समाधान को समझने के लिए मानव के चेतन पक्ष को समझना होगा।

उन्होंने संवेदनशीलता के विभिन्न स्तरों की चर्चा करते हुए कहा कि केवल संवेदनशील होना पर्याप्त नहीं है; संवेदनशीलता का सदुपयोग संबंधों और परिवार में होना चाहिए। जब मनुष्य अपनी समझ को संबंधों, व्यवहार और व्यवस्था में प्रमाणित करता है, तभी परिवार में विश्वास, समाधान और समृद्धि की संभावना मजबूत होती है।

सत्र का मूल संदेश यही रहा कि जीवन को केवल विचार के स्तर पर समझना पर्याप्त नहीं है—समझ को व्यवहार में उतारना और परिवार से लेकर समाज व प्रकृति तक सह-अस्तित्व में जीना ही उसकी सार्थकता है।

Don’t Limit Physical Illness to the Body Alone: Saify Saraiya

Indore | August 8, 2026
Writer: Mohit Dhawan

At a special session held at Manav Chetna Vikas Kendra (MCVK), Indore, international life coach, author, and trainer with over 35 years of experience Saify Saraiya shared his insights on the interconnectedness of the body, mind, and consciousness.

He said that understanding human health requires us to look beyond the body and its physical symptoms. According to him, a person’s mind, thoughts, outlook towards life, emotional state, and inner condition also need to be understood while exploring health and well-being.

Author of Zero Medicine Wisdom, Saify Saraiya discussed the concept of “Philosophy of Psychology Impacting Physiology,” highlighting how our mental and emotional states can influence our physical well-being. He emphasised the need to view the human being holistically rather than looking at illness only through its physical manifestations.

He observed that a significant part of today’s approach to health focuses on symptoms, diet, and treatment. At the same time, he raised an important question: How deeply does an individual understand oneself, one’s mind, emotions, and way of living?

During the session, Saraiya explored concepts including the Hero and Herd Minds, our True Nature, Six-Mind Maps, the distractions of the five senses and conscience, and Power, Position, Possession and Purity. Through these themes, he highlighted the importance of self-observation and developing a deeper understanding of life.

He also encouraged participants to consider illness not merely as a problem, but to explore whether certain bodily experiences may also serve as signals that deserve deeper attention and understanding. His emphasis was on observing and examining the relationship between the body, mind, emotions, and inner consciousness rather than accepting ideas merely as beliefs.

The session at MCVK was not structured as a conventional lecture. Instead, it evolved as a collective enquiry and dialogue, encouraging participants to examine questions around health, well-being, self-understanding, and life from a more integrated perspective.

अस्तित्व को समझकर, सह-अस्तित्व में जीने की योग्यता ही – वास्तविक स्वतंत्रता : अजय दायमा

इंदौर, 7 अगस्त 2026,
रिपोर्ट : MCVK टीम

मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में आयोजित विकल्प शिविर के सातवें दिन केंद्र के संस्थापक अजय दायमा ने अस्तित्व, सह-अस्तित्व, स्वतंत्रता, प्रामाणिकता, परंपरा और मानव की उपयोगिता जैसे विषयों पर विस्तार से संवाद किया। उन्होंने कहा कि “अस्तित्व को समझकर सह-अस्तित्व में जीने की योग्यता ही वास्तविक स्वतंत्रता है।”

उन्होंने कहा कि मनुष्य में कल्पनाशीलता है और इसी के माध्यम से वह अस्तित्व को समझने की क्षमता रखता है। केवल अपनी मनमर्जी करना स्वतंत्रता नहीं है। अपनी कल्पनाशीलता को सही समझ के साथ जोड़कर कर्मशीलता, पूरकता में जीना ही स्वतंत्रता का वास्तविक स्वरूप है।

समझ से प्रामाणिकता और प्रामाणिकता से परंपरा

अजय दायमा ने कहा कि मानवीय व्यवस्था के अस्तित्व सहज़ तरीके से जीने की उपयोगिता को स्वयं समझना और फिर दूसरे व्यक्ति को भी समझा पाना प्रामाणिकता है। एक समझा हुआ व्यक्ति यदि अपनी समझ को दूसरे तक पहुँचा सके और उसके जीवन में भी वह समझ स्पष्ट हो सके, तभी उसकी समझ की प्रामाणिकता सिद्ध होती है।

उन्होंने कहा, “जब तक प्रमाण नहीं है, तब तक परंपरा नहीं बन सकती।” किसी विचार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने के लिए उसका जीवन में प्रमाणित होना आवश्यक है।

उन्होंने परंपरा के चार प्रमुख आधार बताए—संस्था (Institution), शिक्षा (Education), संविधान (Constitution) और व्यवस्था (System)। इन चारों के माध्यम से सही समझ और मानवीय आचरण को समाज में निरंतरता मिल सकती है।

प्रकृति-प्रेम की शुरुआत मानव-प्रेम से

प्रकृति और मानव के संबंध पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि “प्रकृति-प्रेम की शुरुआत मानव-प्रेम से होती है।” जब तक मनुष्य अपने संबंधों में प्रेम, सम्मान और पूरकता को नहीं समझता, तब तक प्रकृति के साथ संतुलित संबंध स्थापित करना भी कठिन है।

उन्होंने बताया कि अस्तित्व में व्यापक ऊर्जा और प्रकृति (इकाईया) दोनों सह-अस्तित्व में हैं। ऊर्जा की पहचान इकइयों में क्रिया के माध्यम से होती है और क्रिया ऊर्जा की अभिव्यक्ति है।

अस्तित्व के नियम को समझाते हुए उन्होंने उपयोगिता और पूरकता को महत्वपूर्ण बताया। अस्तित्व की प्रत्येक इकाई स्वयं में उपयोगी है और समग्रता में दूसरी इकाइयों के लिए पूरक है। इस प्रकार पूरी प्रकृति में परस्पर पूरकता दिखाई देती है।

स्वयं की उपयोगिता को जानना ही समाधान

अजय दायमा जी ने कहा कि भ्रमित अवस्था में मनुष्य अक्सर अच्छे कार्यों के माध्यम से अपनी उपयोगिता सिद्ध करने का प्रयास करता रहता है। जब व्यक्ति स्वयं में अपनी उपयोगिता को नहीं पहचान पाता, तब वह दूसरों की नजर में उपयोगी साबित होने की दौड़ में लगा रहता है।

उन्होंने कहा, “मनुष्य अपनी उपयोगिता को जानकर ही सुखी होता है। स्वयं में अपनी उपयोगिता को जान लेना ही समाधान है।”

समाधान की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि समाधान वह अवस्था है, जहाँ किसी विषय को लेकर भीतर अनिश्चितता और अंतहीन सोच शेष नहीं रहती, बल्कि स्पष्टता स्थापित हो जाती है।

सत्र के अंत में उन्होंने मानव जीवन के मूल उद्देश्य की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि हमारा प्रयास यह समझने का होना चाहिए कि आकार से मनुष्य होने के साथ-साथ आचरण में भी मनुष्य कैसे बनें।

यही समझ संबंधों में सम्मान, व्यवहार में न्याय और जीवन में सह-अस्तित्व का आधार बनती है। आकार में मानव से आचरण में मानव बनने की यात्रा ही सम्मानपूर्वक जीने की दिशा है।

एमसीवीके में जन्मदिन: जहाँ उत्सव के साथ होता है आत्ममूल्यांकन और संबंधों का उत्सव

MCVK, Indore | 6 अगस्त 2026
रिपोर्ट: MCVK Team

मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर में जन्मदिन केवल आयु बढ़ने का उत्सव नहीं होता, बल्कि यह अपने जीवन को देखने, पिछले एक वर्ष की यात्रा का आत्ममूल्यांकन करने और भविष्य की दिशा तय करने का एक विशेष अवसर होता है। यहाँ हर जन्मदिन व्यक्ति के लिए स्वयं को समझने और परिवार के साथ अपनी प्रगति साझा करने का दिन बन जाता है।

इस दिन पूरे परिसर में उत्सव जैसा वातावरण रहता है। परिवार मिलकर विशेष व्यंजन बनाते हैं, मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं, गीत गाए जाते हैं और हर चेहरा आत्मीय मुस्कान से खिल उठता है। यहाँ जन्मदिन किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे परिवार का उत्सव बन जाता है। हर किसी के मन में स्नेह, अपनापन और एक-दूसरे की प्रगति की सच्ची खुशी दिखाई देती है।

इसी आत्मीय वातावरण के बीच आज डॉ. अभय वानखेड़े और नेहा दीदी की पुत्री गुड्डू का जन्मदिन पूरे एमसीवीके परिवार ने बड़े उत्साह और प्रेम के साथ मनाया। सभी परिवारों ने उन्हें शुभकामनाएँ दीं और उनके सुखद एवं सार्थक जीवन की कामना की।

शाम को एमसीवीके ऑडिटोरियम में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर डॉ. अभय वानखेड़े ने अपनी जीवन-यात्रा साझा करते हुए पिछले एक वर्ष में अपने भीतर आए परिवर्तनों, सीख और प्रगति का आत्ममूल्यांकन सभी के सामने रखा। उनके अनुभवों ने उपस्थित लोगों को यह महसूस कराया कि वास्तविक प्रगति केवल उपलब्धियों में नहीं, बल्कि व्यक्ति की समझ, व्यवहार और संबंधों में दिखाई देती है।

इस अवसर पर गीता दायमा जी ने डॉ. अभय की निष्ठा, समर्पण और निरंतरता की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे कार्यकर्ता किसी भी विचार-यात्रा की वास्तविक शक्ति होते हैं।

एमसीवीके के संस्थापक अजय दायमा ने कहा कि डॉ. अभय का जीवन निरंतर आत्मसंतुष्टि और प्रामाणिक आचरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने उनके कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि जब व्यक्ति स्वयं बदलता है, तभी उसका जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है।

एमसीवीके की संस्थापक सदस्य वर्षा दायमा ने उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि नागराज जी के विचारों और इस संस्थान के प्रति उनकी निष्ठा अत्यंत मूल्यवान है। यही निष्ठा व्यक्ति को भीतर से समृद्ध बनाती है और उसे समाज के लिए उपयोगी बनाती है।

कार्यक्रम का सबसे भावुक क्षण तब आया जब डॉ. अभय वानखेड़े की जीवनसंगिनी प्रीति दीदी ने अपने मन की बात साझा की। उन्होंने कहा कि इस पूरी यात्रा में उन्होंने हमेशा डॉ. अभय को स्वयं से आगे बढ़ते हुए देखा है। उनका विश्वास, धैर्य और साथ ही पूरे परिवार का सबसे बड़ा संबल रहा है। उनके शब्दों ने वहाँ उपस्थित अनेक लोगों की आँखें नम कर दीं।

इस अवसर पर विकल्प शिविर में भाग लेने के लिए लखनऊ से आए मोहित धवन ने भी अपने भाव व्यक्त किए। उन्होंने कहा,

“अभय भैया से मेरा संबंध वर्षों पुराना नहीं है, लेकिन जितना भी समय उनके साथ बिताने का अवसर मिला, उसमें उनका स्नेह, अपनापन और सहज सहयोग हमेशा महसूस हुआ। पिछले कुछ सप्ताहों में उनके साथ हुई यात्राओं और संवादों ने मुझे बहुत प्रेरित किया। उनका आत्मीय व्यवहार हर नए व्यक्ति को यह एहसास कराता है कि वह किसी संस्था में नहीं, बल्कि अपने ही परिवार के बीच है।”

जन्मदिन का यह आयोजन एक बार फिर यह संदेश देकर समाप्त हुआ कि एमसीवीके में जन्मदिन केवल केक काटने या शुभकामनाएँ देने का अवसर नहीं, बल्कि जीवन की दिशा पर विचार करने, अपनी प्रगति साझा करने और पूरे परिवार के साथ मिलकर एक-दूसरे की यात्रा का उत्सव मनाने का अवसर है। शायद यही आत्मीयता एमसीवीके को केवल एक संस्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत परिवार बनाती है।

मानव को समझे बिना सही व्यवहार संभव नहीं

भाषा, तकनीक और सेवा—मानव जाति की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ

रिपोर्ट : एमसीवीके टीम

इंदौर, 6 अगस्त 2026 | विकल्प शिविर – छठा दिन

मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके) में आयोजित दस दिवसीय विकल्प शिविर के छठे दिन संस्थापक अजय दायमा ने मानव जीवन के सबसे मूल प्रश्न—मनुष्य को मौलिक स्वरूप में कैसे समझें और उसके साथ कैसा व्यवहार करें—पर गहन विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य के स्वरूप और उद्देश्य की स्पष्ट समझ विकसित नहीं होगी, तब तक हमारे व्यवहार में स्थायी समाधान नहीं आ सकता।

उन्होंने कहा कि मनुष्य अपने कार्यों से नहीं, बल्कि अपने आचरण से संतुष्ट होता है। हम अक्सर मानते हैं कि प्रशंसा करना या प्रशंसा प्राप्त करना ही सुख है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अलग है। यदि प्रशंसा सही समझ पर आधारित न हो, तो वह केवल स्वार्थ या अहंकार को पोषित करती है। उन्होंने कहा कि अधूरी समझ के साथ की गई सराहना कई बार अनजाने में व्यक्ति के विकास को रोक देती है। इसलिए सच्चा व्यवहार वही है, जो मनुष्य की वास्तविक उन्नति में सहयोगी बने।

अजय दायमा जी ने कहा कि मानव जाति की अभी तक की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ भाषा, तकनीक और सेवा हैं। इन्हीं तीन आधारों ने मनुष्य को अन्य जीवों से अलग पहचान दी है और इन्हीं के सही उपयोग से मानव जीवन अधिक सार्थक बन सकता है।

कल्पनाशीलता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जब मनुष्य अपनी कल्पना को पूर्ण प्रस्ताव (Complete Proposal) के आधार पर विकसित करता है, तभी ज्ञान का उदय होता है। यही ज्ञान आगे चलकर मानवीय -व्यवस्था को सही दिशा देता है और व्यक्ति समाधान, समृद्धि तथा सह-अस्तित्व की ओर बढ़ता है।

भाषा के संदर्भ में उन्होंने एक रोचक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया का सबसे अधिक बोला जाने वाला वाक्य “I Love You” है, लेकिन अधिकांश लोग उसके वास्तविक अर्थ को समझे बिना ही उसका प्रयोग करते हैं। शब्दों का सही अर्थ जाने बिना जीवन में सही संबंध स्थापित नहीं हो सकते। उन्होंने आचार्य ए. नागराज जी के दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि जब शब्दों का वास्तविक अर्थ स्पष्ट हो जाता है, तभी मनुष्य सही ढंग से जीना सीखता है।

तकनीक के विषय में उन्होंने कहा कि तकनीक का उद्देश्य केवल सुविधा नहीं, बल्कि समृद्धि है। जब तकनीक का उपयोग मानव और प्रकृति के हित में किया जाता है, तब वह समाज के विकास का माध्यम बनता है।

सेवा पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि आज जीवन का उद्देश्य स्पष्ट न होने के कारण सेवा भी व्यापार का रूप ले चुकी है। शिक्षा, विवाह और समाज की अनेक व्यवस्थाएँ, जो मूलतः सेवा के क्षेत्र थे, आज आर्थिक लेन-देन के केंद्र बन गए हैं। उनका कहना था कि जब जीवन का उद्देश्य स्पष्ट होगा, तब शिक्षा, सेवा, विनिमय और संयम के आधार पर वास्तविक सेवा स्थापित होगी और समाज धीरे-धीरे व्यापार-केंद्रित मानसिकता से मुक्त हो सकेगा।

उन्होंने वर्तमान व्यवस्था पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि आज मनुष्य शरीर की आवश्यकताओं—अन्न और पानी—को भी खरीदने के लिए विवश है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पक्षी के लिए पूरा आकाश उसका संसार है और मछली के लिए पूरा जल उसका संसार है। उसी प्रकार पृथ्वी ने ही मनुष्य को जन्म दिया है, लेकिन सही समझ के अभाव में हम उसके साथ कृतज्ञता और सह-अस्तित्व का व्यवहार विकसित नहीं कर पाए हैं।

अपने उद्बोधन के अंत में अजय दायमा ने कहा कि यदि मानव जाति अपनी तीन महान उपलब्धियों—भाषा, तकनीक और सेवा—का उपयोग सही समझ, सही उद्देश्य और सही व्यवहार के साथ करे, तो ऐसा समाज निर्मित हो सकता है जहाँ जीवन व्यापार नहीं, बल्कि सहयोग, समृद्धि और सह-अस्तित्व का माध्यम बने। उनके अनुसार मानव जीवन की वास्तविक सफलता बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि सही समझ के साथ सही ढंग से जीने में है।

प्रकृति का संतुलन तभी बचेगा, जब मानव अपना आचरण बदले – अजय दायमा

✍️ एमसीवीके टीम द्वारा

इंदौर, 5 अगस्त 2026। (एमसीवीके),विकल्प शिविर के पाँचवें दिन के प्रथम सत्र में एमसीवीके के संस्थापक अजय दायमा ने प्रकृति, पर्यावरण और मानव की भूमिका पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि आज पर्यावरण संरक्षण की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन समाधान केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं हो सकता। जब तक मनुष्य अपनी जीवनशैली, उपभोग और प्रकृति के साथ अपने संबंध को नहीं बदलेगा, तब तक पर्यावरणीय संकट का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

उन्होंने कहा कि आज हम चाहे जितने भी पेड़ लगा लें, यदि दूसरी ओर प्रकृति का अंधाधुंध दोहन जारी रहेगा तो कुछ समय बाद वायु और वातावरण का संतुलन फिर बिगड़ जाएगा। उनके अनुसार केवल पेड़ लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह समझना अधिक आवश्यक है कि हम प्रकृति से कितना ले रहे हैं और उसके बदले उसे क्या लौटा रहे हैं।

अजय दायमा ने कहा कि आज जिस गति से हम धरती के भीतर से कोयला, खनिज और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं, उसका प्रभाव आने वाले वर्षों में पृथ्वी के तापमान पर अवश्य दिखाई देगा। उन्होंने कहा कि धरती के भीतर मौजूद खनिज केवल आर्थिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि वे पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यदि इनका लगातार दोहन होता रहा, तो तापमान को संतुलित रखने वाली प्राकृतिक व्यवस्था कमजोर होती जाएगी और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएँ और गंभीर रूप लेंगी।

उन्होंने वृक्षारोपण अभियानों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि कई बार यह अभियान केवल फोटो खिंचवाने तक सीमित रह जाते हैं। जंगल बढ़ाने के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन वास्तविकता में अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं देते। उनका मानना है कि यदि मनुष्य प्रकृति का दोहन कम कर दे, तो धरती स्वयं को संतुलित करने में सक्षम है। प्रकृति में स्वयं को पुनर्जीवित और संतुलित करने की अद्भुत क्षमता है, आवश्यकता केवल उसे अवसर देने की है।

अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कोरोना काल का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जब महामारी के दौरान मानव की गतिविधियाँ सीमित हो गई थीं, तब प्रकृति ने स्वयं को ठीक करना शुरू कर दिया था। अनेक स्थानों पर वायु पहले से अधिक स्वच्छ हुई, प्रदूषण कम हुआ और हरियाली में बढ़ोतरी हुई। उनके अनुसार यह इस बात का प्रमाण है कि जब मानव का हस्तक्षेप कम होता है, तो प्रकृति स्वयं अपने संतुलन की दिशा में कार्य करने लगती है।

उन्होंने यह भी कहा कि आज अधिकांश वैश्विक समस्याओं की जड़ स्वयं मनुष्य है। जब तक मानव अपने आचरण, उपभोग और प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन नहीं करेगा, तब तक कोई भी तकनीक या अभियान स्थायी समाधान नहीं दे सकता।

आपने स्पष्ट रूप से यह भी कहा कि कोरोना जैसी घटनाओं पर हमें केवल चिकित्सा के दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि अपने जीवन और प्रकृति के साथ संबंधों के संदर्भ में भी विचार करना चाहिए। उनके अनुसार यदि मनुष्य अन्य जीवों और प्रकृति के साथ असंतुलित व्यवहार करता रहेगा, तो उसके परिणाम अंततः पूरे मानव समाज को भुगतने पड़ेंगे। उन्होंने कहा कि कोरोना काल के बाद भी यदि मानव अपने आचरण में परिवर्तन नहीं लाता, तो भविष्य में भी प्रकृति हमें इसी प्रकार चेतावनी देती रहेगी।

सत्र के अंत में अजय दायमा ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल वृक्षारोपण का अभियान नहीं, बल्कि मानव चेतना का विषय है। जब मनुष्य आवश्यकता से अधिक उपभोग छोड़कर प्रकृति के साथ संतुलित और उत्तरदायी जीवन जीना सीख लेगा, तभी धरती, पर्यावरण और मानव समाज के बीच वास्तविक संतुलन स्थापित हो सकेगा।

हरियाणा के हिसार से आए अजीत सिंह, जो पिछले 13 वर्षों से जीवन विद्या से जुड़े हुए हैं, ने एमसीवीके में अपने अनुभव साझा किए। वे शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं और कई स्कूलों एवं कॉलेजों का संचालन कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि एमसीवीके (मानव चेतना विकास केंद्र), मध्यस्थ दर्शन सह-अस्तित्ववाद के लोकव्यापीकरण के लिए मानवीय शिक्षा का एक जीवंत केंद्र है। यहाँ परिवार विधि के माध्यम से शिक्षा के मानवीयकरण और जीवन विद्या योजना पर निरंतर कार्य किया जा रहा है।

अजीत सिंह के अनुसार, एमसीवीके में सह-अस्तित्ववादी विचार-अभ्यास, कर्म-अभ्यास और व्यवहार-अभ्यास को जीवन का हिस्सा बनाकर कार्य किया जा रहा है। यहाँ केवल सिद्धांत नहीं पढ़ाए जाते, बल्कि उन्हें दैनिक जीवन में जीने का अभ्यास भी कराया जाता है।

उन्होंने कहा कि एमसीवीके की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ रहने वाले परिवार इन मूल्यों को अपने जीवन में व्यवहारिक रूप से जीते हुए दिखाई देते हैं। जब कोई व्यक्ति इन परिवारों के बीच रहता है, तो उसे सहज रूप से यह अनुभव होता है कि यदि ये परिवार इस समझ के साथ समृद्ध, समाधानपूर्ण और सहयोगी जीवन जी सकते हैं, तो हम भी इस समझ को प्राप्त कर उसी प्रकार का जीवन जी सकते हैं।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि मानवीय शिक्षा और जीवन विद्या पर आधारित यह प्रयास समाज में सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन सकता है तथा अधिक से अधिक लोगों तक इस विचार का पहुँचना समय की आवश्यकता है।

इतिहास के अनछुए अध्यायों को सामने लाने का एक गंभीर प्रयास

पुस्तक समीक्षा

लेखक: मोहित धवन

इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का विवरण नहीं होता, बल्कि वह किसी राष्ट्र की स्मृति, चेतना और पहचान का आधार भी होता है। देश दीपक शर्मा की पुस्तक “भारतवर्ष में इस्लाम का इतिहास: हिन्दू दृष्टिकोण” इतिहास के ऐसे ही कम चर्चित अध्यायों को पाठकों के सामने रखने का एक गंभीर और अध्ययनपूर्ण प्रयास है। पुस्तक का प्रथम खंड 712 ईस्वी से 1194 ईस्वी तक के लगभग पाँच सौ वर्षों के कालखंड को भारतीय सभ्यता के प्रतिरोध और संघर्ष के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है।

देश दीपक जी और उनकी सहधर्मिणी नंदिता जी से हमारे परिवार का परिचय भले ही कुछ महीनों पुराना हो, लेकिन उनके स्नेह, आत्मीयता और सहज अपनत्व ने इस संबंध को बहुत निकटता का एहसास दिया है। अपने दिवंगत पुत्र तन्मय की स्मृति को समाज सेवा का माध्यम बनाते हुए लखनऊ के ग्रामीण अंचलों में बच्चों के लिए अध्ययन केंद्रों का संचालन करना उनके व्यक्तित्व की संवेदनशीलता और सामाजिक प्रतिबद्धता का परिचायक है। उनका यह सेवा कार्य हमें निरंतर प्रेरित करता रहा है। यही संवेदनशीलता इस पुस्तक की भूमिका में भी दिखाई देती है, जहाँ उन्होंने इस कृति को अपने पुत्र की स्मृति को समर्पित करते हुए उसे एक भावनात्मक आयाम प्रदान किया है।

एक पाठक के रूप में इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भाषा और प्रस्तुति लगी। इतिहास जैसे गंभीर विषय को लेखक ने सरल, प्रवाहपूर्ण और रोचक शैली में प्रस्तुत किया है। घटनाओं का वर्णन केवल तिथियों और तथ्यों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कथा शैली में आगे बढ़ता है, जिससे पाठक सहज रूप से पुस्तक के साथ जुड़ जाता है।

पुस्तक की विषय-सूची ही लेखक के व्यापक अध्ययन का परिचय देती है। सिंध के युद्ध से लेकर बप्पा रावल, सम्राट मिहिर भोज, महाराजा सुहेलदेव, नायकी देवी और पृथ्वीराज चौहान जैसे अनेक ऐतिहासिक व्यक्तित्वों और घटनाओं को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। साथ ही आगे प्रकाशित होने वाले खंडों की रूपरेखा यह संकेत देती है कि लेखक इस विषय पर एक विस्तृत और दीर्घकालिक श्रृंखला तैयार कर रहे हैं।
यह पुस्तक केवल ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन नहीं करती, बल्कि पाठक को इतिहास के अनेक पहलुओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। पढ़ते समय बार-बार यह अनुभव होता है कि लेखक केवल घटनाएँ नहीं बता रहे, बल्कि इतिहास के कुछ ऐसे प्रसंगों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं, जिन पर वे अधिक संवाद और अध्ययन की आवश्यकता महसूस करते हैं।

समग्र रूप से, “भारतवर्ष में इस्लाम का इतिहास: हिन्दू दृष्टिकोण” एक ऐसी कृति है, जो अपने विषय, अध्ययन और प्रभावशाली प्रस्तुति के कारण पाठक का ध्यान आकर्षित करती है। इतिहास में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक न केवल एक रोचक अध्ययन है, बल्कि भारतीय इतिहास के एक वैकल्पिक दृष्टिकोण को समझने का अवसर भी प्रदान करती है। ऐसी शोधपरक और विचारोत्तेजक पुस्तकों का स्वागत होना चाहिए, क्योंकि वे इतिहास के प्रति जिज्ञासा और संवाद—दोनों को आगे बढ़ाती हैं।

संपर्क से संबंध की यात्रा ही जीवन की वास्तविक यात्रा है : अजय दायमा

✍️ लेखक : मोहित धवन

इंदौर, 3 अगस्त 2026। मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके), इंदौर मे आयोजित दस दिवसीय विकल्प शिविर के तीसरे दिन के प्रथम सत्र में संस्थापक अजय दायमा ने “संपर्क से संबंध की यात्रा” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मानव जीवन का उद्देश्य केवल लोगों के संपर्क में आना नहीं, बल्कि समझ, विश्वास और स्वीकृति के आधार पर सार्थक संबंधों का निर्माण करना है।

उन्होंने कहा कि जब किसी परिवार में बच्चे का जन्म होता है या विवाह के माध्यम से दो व्यक्ति एक साथ आते हैं, तब केवल संपर्क स्थापित होता है। वास्तविक संबंध तब बनता है, जब दोनों एक-दूसरे को समझते हैं, स्वीकार करते हैं और परस्पर सहयोग के साथ जीवन जीना सीखते हैं। उनके अनुसार संपर्क से संबंध तक की यह यात्रा ही मानव जीवन को सार्थक बनाती है।

अजय दायमा ने कहा कि इस संसार में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति प्रारंभ में एक-दूसरे के लिए अजनबी होता है। हम सभी इस धरती पर मेहमान बनकर आए हैं। अजनबी से परिचय, परिचय से सहमति और सहमति से स्वीकृति तक की यात्रा ही स्वस्थ और स्थायी संबंधों का आधार है।

उन्होंने बच्चों और बड़ों की सोच का अंतर बताते हुए कहा कि छोटे बच्चों को घर में मेहमान का आना अच्छा लगता है और उनका जाना बुरा लगता है, जबकि बड़े लोगों को अक्सर मेहमान का आना असुविधाजनक और उनका जाना राहत देने वाला प्रतीत होता है। यह अंतर उम्र का नहीं, बल्कि जीवन की समझ का है। सही समझ विकसित होने पर व्यक्ति का दृष्टिकोण और व्यवहार दोनों बदल जाते हैं।

अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि प्रत्येक बालक जन्म से गलती करने का अधिकार लेकर पैदा होता है। प्रत्येक मनुष्य अपनी कल्पनाशीलता के साथ है और उसकी कल्पनाशीलता ही उसे सृजन, नवाचार और विकास की क्षमता प्रदान करती है। लेकिन जब यही कल्पनाशीलता सही समझ के बिना संचालित होती है, तब भ्रम उत्पन्न होता है और व्यक्ति गलतियाँ कर बैठता है। इसलिए गलती को दंड का विषय नहीं, बल्कि सीखने और सही समझ विकसित करने की प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि शिक्षा, सामाजिक व्यवस्था और परिवार, व्यक्ति को सही समझ विकसित करने का अवसर प्रदान करते हैं। इसी सही समझ के आधार पर मनुष्य समाधान, समृद्धि और अभयता के साथ सार्थक एवं संतुलित जीवन जी सकता है। यदि परिवार और शिक्षा व्यवस्था व्यक्ति की कल्पनाशीलता को सही दिशा दें, तो वही कल्पनाशीलता भ्रम का कारण बनने के बजाय समाधान, सहयोग और सह-अस्तित्व की आधारशिला बन जाती है।

इस अवसर पर चेन्नई से आए अंतरराष्ट्रीय लाइफ कोच, लेखक एवं पिछले 35 वर्षों से प्रशिक्षण दे रहे सैफी सरैया ने भी अपने विचार साझा किए। Zero Medicine Wisdom पुस्तक के लेखक सैफी सरैया ने कहा कि वे एमसीवीके में चल रहे जीवन विद्या के कार्यों से गहराई से प्रभावित हैं। उनका मानना है कि जीवन विद्या मनुष्य को स्वयं, परिवार और समाज को समझने का एक व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि वे इस विचार को और गहराई से समझकर एमसीवीके के साथ जुड़ना चाहते हैं तथा जीवन विद्या के संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में अपना योगदान देना चाहते हैं। उनके अनुसार आज की दुनिया में मानसिक तनाव, असंतुलन और सामाजिक संघर्षों का स्थायी समाधान सही जीवन-दृष्टि और सही समझ के माध्यम से ही संभव है, और जीवन विद्या इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।