Has Rakhi Changed… or Have Relationships?

✍️ Mohit Dhawan

Technology has reduced distances, but has it increased the time we give to our relationships?

Date: 27 August 2026

As Raksha Bandhan approaches, countless old memories come alive. A sister choosing her Rakhi days in advance, sweets arriving at home, a brother saving money for the traditional shagun, and that familiar teasing while tying the Rakhi—“Is that all?”

That time may not be too far behind us, but the way we live our lives and nurture relationships has certainly changed.

The story of Rakhi, however, is not limited to the bond between a brother and sister. In Indian tradition, the idea of a Raksha-Sutra, or sacred thread of protection, is considered very old. Ancient Hindu traditions include the story of Indrani tying a protective thread around Indra’s wrist. The story of Krishna and Draupadi is also deeply popular in Indian culture, although it is not considered a documented historical origin of the modern Raksha Bandhan festival.

Rakhi also has a beautiful connection with our religious traditions. In many temples and homes across India, people offer Rakhis to their deities during Raksha Bandhan. The tradition of offering a Rakhi to Lord Krishna can also be seen today. Here, the Rakhi is not merely a request for protection; it becomes an expression of love, faith and devotion between the devotee and the divine.

History and popular folklore also carry the well-known story of Rani Karnavati of Mewar and Mughal emperor Humayun. However, historians do not agree on all the details of this account.

Over different periods, therefore, this little thread has acquired different meanings—sometimes a promise of protection, sometimes a symbol of sibling affection, and sometimes an expression of devotion towards God.

But now, this little thread has entered the digital age.

Today, you don’t necessarily need to visit a market to buy a Rakhi. Choose one on your phone and it can reach a brother hundreds of kilometres away. There is no need to put shagun money in an envelope either—there is UPI. If a brother or sister is living abroad, the festival can be celebrated through a video call.

Technology has certainly reduced distances.

But it raises an important question—Has Rakhi changed, or have our relationships changed too?

There was a time when brothers and sisters grew up under the same roof. They fought, complained, argued and, after a while, sat together again as if nothing had happened.

Then came education, jobs, marriage and responsibilities. Their paths began to move in different directions. Those who once spent the entire day together may now go weeks without having a proper conversation.

Writing “How are you?” on WhatsApp is easy. Sitting down and talking for half an hour is perhaps more difficult. Gifts arrive online and money can be transferred with a single click.

Everything has become easier—except perhaps the time we give to one another.

Yet, it would be unfair to say that relationships have lost their warmth. Perhaps their roles have simply evolved.

Traditionally, Rakhi was largely associated with a brother’s promise to protect his sister. Today, a sister is equally independent and, when life gets difficult, she may herself become one of her brother’s strongest pillars.

So perhaps the meaning of Rakhi should not remain limited to “I will protect you.”

It can also be a promise between two people:

“No matter how far life takes us, when you need me, I will be there for you.”

The Rakhi thread itself is not very strong. Pull it a little and it can break. Yet, for centuries, it has remained a symbol of strong relationships.

Because strength does not lie in the thread—
it lies in the emotion with which it is tied.

This Raksha Bandhan, along with an expensive Rakhi or a special gift, give your loved ones something even more valuable—your time.

Remember the old stories. Share a laugh. Let go of an old complaint.

Because technology can deliver Rakhis, money and greetings—

but warmth in a relationship still has to be delivered by a human being.

And perhaps then we will find the answer to the question—

Has Rakhi Changed… or Have Relationships?

Wishing you all a very Happy Raksha Bandhan.

न्यूज़ चैनल बदल गए… या दर्शक?

टीवी के शोर से पॉडकास्ट की लंबी बातचीत तक

✍️ मोहित धवन
25 अगस्त 2026

भारतीय टेलीविजन पर रात जैसे-जैसे गहराती है, बहस भी तेज होती जाती है। स्क्रीन कई हिस्सों में बंटती है, चेहरे बढ़ते जाते हैं और आवाजें एक-दूसरे पर चढ़ने लगती हैं। एंकर सवाल पूछता है, जवाब शुरू होता है और उससे पहले कोई दूसरा बोल पड़ता है। कुछ ही देर में यह समझना मुश्किल हो जाता है कि सवाल क्या था और जवाब कौन दे रहा है।

हम इस दृश्य के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि शायद अब इसमें कुछ असामान्य भी नहीं लगता।

लेकिन भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने हाल में भारतीय टीवी न्यूज़ को एक बाहरी व्यक्ति की नजर से देखा तो उनकी टिप्पणी चर्चा का विषय बन गई। नई दिल्ली में Economic Times World Leaders Forum में उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि उन्हें भारतीय टीवी न्यूज़ देखना पसंद है। शाम छह बजे किसी शो में आठ लोग बहस करते दिखाई देते हैं और रात दस बजे तक संख्या बारह हो जाती है—जहां किसी एक व्यक्ति को ठीक से सुनना मुश्किल हो जाता है।

उनकी बात पर हंसा जा सकता है, नाराज भी हुआ जा सकता है। लेकिन इससे एक सवाल जरूर निकलता है—

न्यूज़ चैनल बदल गए हैं… या दर्शक?

एक समय था जब टेलीविजन की चर्चाओं में सीमित संख्या में विशेषज्ञ बैठते थे। सवाल पूछा जाता, जवाब के लिए समय मिलता और असहमति के बावजूद दूसरे पक्ष को सुनने की गुंजाइश रहती थी। आज कई कार्यक्रमों में बड़ी स्क्रीन, कई खिड़कियां, उत्तेजक शीर्षक और टकराव स्वयं कार्यक्रम का आकर्षण बनते दिखाई देते हैं।

लेकिन इसके लिए केवल न्यूज़ चैनलों को कठघरे में खड़ा करना भी उचित नहीं होगा।

आखिर TRP दर्शक से आती है। सोशल मीडिया पर वही वीडियो आगे बढ़ता है जिसे हम क्लिक और शेयर करते हैं। शांत और तथ्यपूर्ण बातचीत की तुलना में तीखी नोकझोंक तेजी से हमारा ध्यान खींचती है। बाजार आखिरकार वही परोसता है जिसकी मांग दिखाई देती है।

लेकिन इसी शोर के बीच एक दूसरा बदलाव भी दिलचस्प है।

राज शमानी, रणवीर अल्लाहबादिया और दूसरे डिजिटल creators के लंबे podcasts को बड़ी संख्या में लोग सुनते और देखते हैं। वहां उद्यमी, खिलाड़ी, कलाकार, वैज्ञानिक या किसी विषय के जानकार को अपनी बात विस्तार से रखने का अवसर मिलता है। दर्शक उस बातचीत के साथ कुछ देर ठहर सकता है, तर्क को समझ सकता है और अपनी राय बना सकता है।

शायद podcasts की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे एक कारण यह भी है।

दर्शक केवल निष्कर्ष नहीं, उस निष्कर्ष तक पहुंचने की पूरी बातचीत भी सुनना चाहता है।

हालांकि podcast होना अपने आप में सार्थक या तथ्यपूर्ण संवाद की गारंटी नहीं है। वहां भी सनसनी, कमजोर सवाल और गलत सूचनाओं की गुंजाइश है। लेकिन इस माध्यम ने लंबी बातचीत के लिए वह जगह जरूर बनाई है जो टीवी की तेज रफ्तार में कम होती दिखाई देती है।

सर्जियो गोर की टिप्पणी को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया का एक दूसरा पक्ष भी है। एक राजनीतिक दल से जुड़े वरिष्ठ नेता लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) शरद शरण इसे व्यापक भू-राजनीतिक नजरिए से देखते हैं। उनका कहना है, “जब विदेश नीति और जियो-स्ट्रैटेजिक फैसलों में राष्ट्रीय हितों से ऊपर राजनीतिक या चुनावी हित आने लगें, तो देश की वैश्विक स्थिति प्रभावित होती है। विदेशी ताकतों को हमारी आंतरिक राजनीति पर टिप्पणी का अवसर नहीं मिलना चाहिए। वैश्विक मंच पर सरकार और विपक्ष—दोनों के लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए।”

यह दृष्टिकोण अपनी जगह है, लेकिन किसी विदेशी राजदूत की टिप्पणी को भारतीय मीडिया पर अंतिम फैसला मान लेना भी उचित नहीं होगा। भारतीय पत्रकारिता ने सत्ता से कठिन सवाल पूछे हैं, घोटाले उजागर किए हैं और समाज के उन हिस्सों की आवाज को राष्ट्रीय मंच दिया है जो अन्यथा शायद सुनाई नहीं देते।

इसलिए सवाल टीवी न्यूज़ को खारिज करने का नहीं, उसके बदलते स्वरूप को समझने का है।

अगर लोग अपनी इच्छा से एक या दो घंटे का podcast सुन सकते हैं, तो यह धारणा भी कमजोर पड़ती है कि आज के दर्शक के पास लंबी और गंभीर बातचीत के लिए धैर्य नहीं बचा।

शायद धैर्य आज भी है।

सवाल सिर्फ इतना है—हम उसे सुनने लायक क्या दे रहे हैं?

Gen-Z को वोटर नहीं, ऑडियंस की तरह क्यों देखने लगी है राजनीति?

मोदी की रील्स से राहुल के युवा संवाद तक—क्या 2029 की सियासी लड़ाई अब मोबाइल स्क्रीन पर लड़ी जाएगी?

लेखक ✍️ मोहित धवन
24 अगस्त 2026

सुबह उठते ही मोबाइल हाथ में आता है। कुछ मैसेज, कुछ खबरें, कोई मजेदार मीम और फिर एक के बाद एक रील्स। इन्हीं के बीच अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई वीडियो दिखाई देता है या राहुल गांधी किसी युवा से सवाल-जवाब करते नजर आते हैं।

हम कुछ सेकंड रुकते हैं, देखते हैं और फिर आगे स्क्रॉल कर देते हैं।

लेकिन शायद राजनीति हमारी इस छोटी-सी आदत को हमसे कहीं ज्यादा गंभीरता से देख रही है।

भारत की राजनीति में कभी बड़ी रैली और उसमें जुटी भीड़ राजनीतिक ताकत का पैमाना मानी जाती थी। फिर टेलीविजन आया, उसके बाद फेसबुक, एक्स और यूट्यूब। अब मुकाबला इंस्टाग्राम की रील और मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन तक पहुँच चुका है।

प्रधानमंत्री मोदी की हाल की सोशल मीडिया शैली इसका दिलचस्प उदाहरण है। औपचारिक भाषणों और कार्यक्रमों के बीच अब अपेक्षाकृत सहज वीडियो, सेल्फी-स्टाइल बातचीत और युवाओं को ‘दोस्त’ कहकर संबोधित करने जैसी कोशिशें दिखाई देती हैं। भाषा भी ऐसी रखने का प्रयास है जिससे नई पीढ़ी खुद को जोड़ सके।

लेकिन यह कोशिश केवल सत्ता पक्ष में नहीं दिखती।

विपक्ष के नेता राहुल गांधी के हाल के कार्यक्रमों में भी युवाओं पर जोर दिखाई देता है। प्रयागराज और पुणे में उनके हालिया संवाद युवाओं के साथ रहे। सवाल-जवाब और बातचीत के छोटे वीडियो सोशल मीडिया पर रील्स के रूप में खूब प्रसारित हुए।

मोदी और राहुल की शैली अलग हो सकती है, लेकिन दोनों जिस दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं, वह एक ही है—युवा मतदाता की मोबाइल स्क्रीन।

वजह समझना मुश्किल नहीं है।

आज का युवा अखबार के पहले पन्ने या रात के समाचार का इंतजार नहीं करता। खबर, मनोरंजन, बहस और काफी हद तक दुनिया को देखने का उसका नजरिया भी मोबाइल स्क्रीन पर बन रहा है।

वह एक ही घंटे में प्रधानमंत्री की रील देख सकता है, राहुल गांधी का वीडियो सुन सकता है, किसी इन्फ्लुएंसर की राय देख सकता है और फिर किसी राजनीतिक मीम पर हँसते हुए आगे बढ़ सकता है।

राजनीति के सामने इसलिए नई चुनौती है—स्क्रॉल करती उँगली को आखिर रोका कैसे जाए?

शायद इसी वजह से राजनीतिक संवाद भी छोटा, सहज और व्यक्तिगत होता जा रहा है।

एक घंटे के भाषण को देखने वाले लोग सीमित हो सकते हैं, लेकिन उसी कार्यक्रम से निकली 30 सेकंड की दिलचस्प क्लिप लाखों लोगों तक पहुँच सकती है। नेता अब केवल यह नहीं सोच रहे कि ‘क्या कहा जाए’, बल्कि यह भी कि ‘कैसे कहा जाए’ ताकि बात सोशल मीडिया पर आगे बढ़े।

यहीं राजनीति और ‘कंटेंट’ के बीच की दूरी कम होने लगती है।

लेकिन एक सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए—

क्या युवा तक पहुँचना और युवा को समझना एक ही बात है?

Gen-Z को केवल उसकी भाषा बोलकर, ट्रेंडिंग शब्द इस्तेमाल करके या उसके पसंदीदा प्लेटफॉर्म पर दिखाई देकर लंबे समय तक अपने साथ रखना आसान नहीं होगा।

यह ऐसी पीढ़ी है जिसके सामने विकल्प भी सबसे ज्यादा हैं। वह सत्ता पक्ष की बात सुन सकती है, विपक्ष का जवाब देख सकती है, किसी स्वतंत्र पत्रकार का विश्लेषण सुन सकती है और कुछ ही मिनटों में आम लोगों की प्रतिक्रियाएँ भी पढ़ सकती है।

और फिर उसके अपने सवाल हैं।

नौकरी कहाँ है? अच्छी शिक्षा कितनी सुलभ है? अपना घर खरीद पाना कितना संभव होगा? महंगाई उसके जीवन को कहाँ ले जाएगी? उसकी योग्यता के मुताबिक अवसर मिलेंगे या नहीं?

इन सवालों के जवाब 30 सेकंड की रील में नहीं समा सकते।

इसका मतलब यह नहीं कि राजनीति में रील्स का आना गलत है। यदि किसी छोटे वीडियो को देखकर कोई युवा पहली बार रोजगार, अर्थव्यवस्था, संविधान या किसी सरकारी नीति के बारे में जानना चाहता है, तो वही रील लोकतांत्रिक बातचीत का पहला दरवाजा भी बन सकती है।

समस्या रील में नहीं है।

सवाल यह है कि रील के बाद क्या है?

मोदी हों या राहुल गांधी, दोनों की बदलती संवाद शैली एक बात साफ करती है—भारत का युवा अब राजनीतिक संचार के केंद्र में है। 2029 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन Gen-Z से संवाद की लड़ाई शायद शुरू हो चुकी है।

इस बार मैदान केवल संसद, चुनावी सभा या विश्वविद्यालय परिसर नहीं होगा। उसका एक बड़ा हिस्सा हमारी जेब में रखा मोबाइल भी होगा।

राजनीतिक दल युवा की स्क्रीन तक तो पहुँच रहे हैं।

अब असली परीक्षा यह है कि क्या वे उसकी चिंताओं, उम्मीदों और भविष्य तक भी पहुँच पाएँगे।

क्योंकि रील कुछ सेकंड के लिए उँगली रोक सकती है, लेकिन भरोसा जीतने के लिए जवाब चाहिए।

कभी-कभी अपनी कहानी भी कहनी चाहिए… आशीष विद्यार्थी आज लखनऊ में

✍️ मोहित धवन
लखनऊ, 23 अगस्त 2026

जिंदगी में हम सब कोई न कोई किरदार निभाते रहते हैं—किसी के बेटे, किसी के पिता, किसी के साथी, किसी संस्थान के कर्मचारी। इन्हें निभाते-निभाते कभी अचानक मन पूछ बैठता है—इन सबके बीच मेरी अपनी कहानी कहाँ है?

आज लखनऊ आ रहे अभिनेता आशीष विद्यार्थी को देखकर कुछ ऐसा ही सवाल मन में आता है।

सिनेमा के पर्दे पर हमने उन्हें दशकों तक अलग-अलग किरदारों में देखा। कभी उनकी आंखों का गुस्सा याद रहा, कभी आवाज की कठोरता। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित इस अभिनेता ने अनेक भाषाओं की फिल्मों में अपनी पहचान बनाई।

लेकिन आशीष विद्यार्थी की कहानी शायद फिल्मों से आगे जाकर और दिलचस्प हो जाती है।

पिछले कुछ वर्षों में हमने उन्हें एक मुसाफिर की तरह भी देखा—कभी किसी छोटे शहर में, कभी सड़क किनारे किसी दुकान पर खाना खाते, तो कभी किसी अनजान व्यक्ति से आत्मीयता से बातें करते हुए। इन यात्राओं में सबसे खूबसूरत चीज जगह या खाना नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी को लेकर बची हुई जिज्ञासा दिखाई देती है।

आज यही मुसाफिर लखनऊ में ‘Kahanibaaz’ के मंच पर अपनी कहानियाँ लेकर आ रहा है।

कहानियाँ सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं। कभी किसी की यात्रा हमें अपनी छूटी हुई यात्रा याद दिला देती है, किसी का संघर्ष अपना-सा लगता है और किसी को जिंदगी का नया अध्याय शुरू करते देखकर भीतर से आवाज आती है—शायद अभी देर नहीं हुई।

लखनऊ भी तो किस्सों का शहर है। यहाँ गलियों, इमारतों, चाय की दुकानों और दस्तरख्वान तक की अपनी कहानियाँ हैं। आज इसी शहर में एक कहानीबाज़ अपनी कहानी लेकर आ रहा है।

शायद इस शाम की असली खूबसूरती तब होगी, जब लौटते हुए कोई दर्शक खुद से पूछे—

“दुनिया के दिए हुए किरदार तो खूब निभाए…लेकिन अपनी कहानी आखिरी बार कब जी थी?”

क्योंकि कुछ कहानियाँ मंच पर खत्म नहीं होतीं,
वे हमारे भीतर से शुरू होती हैं।

The Road to the Weekly Market… Are We Slowly Forgetting It?

✍️ Mohit Dhawan
Lucknow, 23 August 2026

Perhaps there is a weekly market somewhere near your home too. There may be someone’s father or uncle sitting behind a small stall, earning a living and supporting his family through what he sells that day.

There was a time when such markets were a natural part of our lives. But in the age of online deliveries and large supermarkets, the way we shop is changing rapidly. A few taps on a phone, and everything from vegetables to groceries arrives at our doorstep. Convenience has increased, but somewhere along the way, perhaps we are slowly forgetting the road that once took us to our neighbourhood market.

Recently, I visited one such weekly market in Arjunganj, Lucknow. It comes alive twice a week—on Wednesdays and Saturdays. As evening approaches, stalls line the roadside, and soon the area is filled with colours, voices and the familiar bustle of a local bazaar.

It may be called a vegetable market, but there is much more to it. Fruits, spices, clothes, utensils, household goods and food stalls can all be found here. The crowd grows between 6 and 9 pm, with many people stopping on their way home from work.

Local shoppers say several items are available here at lower prices than on online platforms or in supermarkets, although vegetable prices naturally change with season and supply.

Walking through the market brought back memories of my childhood. My father would hold my hand and take me along to buy vegetables. Occasionally, when he was not around, I would get the responsibility of going to the market myself—and that came with a little extra excitement. The reason was innocent: whatever loose change remained after shopping often became my pocket money.

Despite all those visits, there are two skills I never really mastered—choosing vegetables and bargaining.

My mother used to complain about it, and after marriage, my wife took over the same responsibility: “You never learnt how to select vegetables or bargain. Whatever the shopkeeper gives you, you simply bring home!”

Perhaps it is these little moments that keep markets alive in our memories. Even today, a vegetable market reminds me not merely of shopping, but of my father’s hand, the happiness of saving a few coins and the complaints waiting for me when I returned home.

This time, however, my visit was not limited to nostalgia. I spoke to several vendors, and their conversations revealed another side of the bazaar.

Some have been coming to these markets for four or five years, while others have been doing so for nearly 42 years. They have witnessed not just changing prices, but a transformation in customers and the culture of shopping.

One thought repeatedly emerged from these conversations. They say earnings were lower in the past, yet household expenses could somehow be managed. Today, earnings may have increased, but expenses have risen much faster. Education, rent, electricity, healthcare and everyday necessities have made running a household far more difficult.

Changing shopping habits are another concern. Several vendors see online shopping and large supermarkets as part of this shift. Buying through a phone is convenient, products are delivered home, and discounts often attract customers.

But it would be unfair to turn this into a battle between online shopping and traditional markets. Customers will naturally choose convenience and value. The real question is: how do we ensure that small vendors continue to have a place in this changing marketplace?

Parking and traffic are other challenges. When the Arjunganj market is busy, the number of vehicles increases and inadequate parking can lead to congestion. This is not unique to Lucknow. Across Indian cities and towns, weekly markets are trying to find their place within rapidly changing urban landscapes.

Perhaps your city or town also has a market that appears on a particular day—Wednesday Market, Saturday Market, or simply a bazaar known by a local name. For a few hours, a small economy comes alive. Behind every vegetable, fruit, clothes or utensil stall is a family and its everyday needs.

The answer, perhaps, is not to remove these markets but to organise them better. Proper parking, cleanliness, lighting, waste management and traffic arrangements could make them more convenient for shoppers as well as vendors.

Today, vegetables can reach our doorstep with a few taps on a screen. That convenience is part of modern life. But a screen does not carry the voice of a familiar vendor, the little exchange over prices, or the warmth of recognising a face week after week.

So, the next time you pass a weekly market in your city, stop for a while. Carry a bag, choose your vegetables, exchange a few words with the vendor—and perhaps bargain a little too, something I still haven’t managed to learn!

Who knows, your purchase may bring a smile to a small vendor’s face…

and as you return with a bag full of vegetables, an old childhood memory may quietly return home with you too.

Ghevar, Rain and Rakhi… A Story of Flavour and Relationships

Writer ✍️ Mohit Dhawan
Lucknow, 22 August 2026

The gentle showers of rain, the earthy fragrance of wet soil, and the greenery of Sawan bring back countless memories. For me, one such beautiful memory of the monsoon has always been connected with Ghevar.

Ghevar has always been one of my favourite Indian sweets. Especially during Sawan and around Raksha Bandhan, it becomes difficult for me to resist its unique taste. The moment I see those beautifully arranged, honeycomb-like Ghevars at sweet shops, I know that the rains have also brought the festive season along with them.

But Ghevar is special not just because of its taste. It also carries a fascinating story of tradition, family bonds and emotions.

Ghevar is primarily considered a traditional sweet of Rajasthan and is particularly associated with Jaipur. There is no single, well-documented historical account establishing exactly when or how it originated, but it has long been a part of Rajasthan’s food culture and is closely associated with festivals such as Hariyali Teej, Sawan and Raksha Bandhan.

Its distinctive texture also sets it apart from most Indian sweets. A thin batter made from flour and ghee is carefully poured into hot ghee or oil to create its characteristic porous, honeycomb-like structure. It is then soaked or coated with sugar syrup. Over time, several variations have become popular, including plain Ghevar, Malai Ghevar, Mawa Ghevar and Rabri Ghevar.

For me, however, the most beautiful story of Ghevar lies not in its recipe, but in the relationships associated with it.

In many North Indian families, there has long been a tradition of sending Ghevar and gifts from a woman’s parental home to her marital home during Teej and Sawan. In Rajasthan, this is also associated with traditions such as Sinjara. When Ghevar arrives along with clothes, bangles, mehendi and other gifts, it carries something much more precious—the love and affection of the parental home.

Perhaps this is what makes Indian food culture so beautiful. A sweet is not merely something to eat; sometimes, it becomes a messenger of love between families.

Anil Tripathi, founder of Mishri Malai Sweets in Lucknow, says, “Ghevar is connected with both the season and tradition. Its demand begins to rise with the arrival of Sawan and continues through Teej and Raksha Bandhan. Even today, many families continue the tradition of sending Ghevar to their married daughters.”

Today, almost every sweet is available throughout the year. Modern markets and technology have largely erased seasonal boundaries. Yet some flavours are best enjoyed in their own season. Mangoes in summer, Gajar ka Halwa in winter, and for me, Ghevar during the monsoon—the wait itself makes them taste even more special.

Perhaps that is why Ghevar has never been just another sweet for me.

It is the taste of Sawan showers, the sweetness of Rakhi, the tradition of Teej, and the affection that travels from a daughter’s parental home to her new family.

घेवर, बारिश और राखी… स्वाद से रिश्तों तक की कहानी

लेखक ✍️ मोहित धवन

लखनऊ, 22 अगस्त 2026

बारिश की हल्की फुहारें, मिट्टी की सौंधी खुशबू और सावन की हरियाली अपने साथ न जाने कितनी यादें लेकर आती हैं। मेरे लिए सावन की ऐसी ही एक खूबसूरत याद घेवर से जुड़ी है।

मिठाइयों में घेवर मुझे हमेशा से बेहद पसंद रहा है। खासतौर पर सावन और राखी के आसपास इसका स्वाद लिए बिना रहना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है। बाजार में सजे जालीदार घेवर देखते ही जैसे अहसास होने लगता है कि बारिश के साथ त्योहारों का मौसम भी दस्तक दे चुका है।

घेवर केवल अपने स्वाद के कारण खास नहीं है। इसके साथ हमारी परंपराओं और रिश्तों की भी एक दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है।

घेवर को मुख्य रूप से राजस्थान की पारंपरिक मिठाई माना जाता है और जयपुर से इसकी खास पहचान रही है। इसकी शुरुआत ठीक कब और कैसे हुई, इसे लेकर कोई एक प्रमाणित ऐतिहासिक कहानी नहीं मिलती, लेकिन राजस्थान की खान-पान संस्कृति में घेवर लंबे समय से सावन, हरियाली तीज और रक्षाबंधन जैसे त्योहारों से जुड़ा रहा है।

इसकी बनावट भी इसे दूसरी मिठाइयों से अलग करती है। मैदा और घी से तैयार पतले घोल को गर्म घी या तेल में खास तरीके से डालकर इसका जालीदार आकार तैयार किया जाता है। फिर चाशनी इसकी मिठास बढ़ाती है। समय के साथ पारंपरिक सादे घेवर के अलावा मलाई, मावा और रबड़ी घेवर जैसे कई स्वाद भी लोकप्रिय हुए हैं।

लेकिन मेरे लिए घेवर की सबसे खूबसूरत कहानी उसके स्वाद से ज्यादा रिश्तों में छिपी है।

उत्तर भारत के बहुत से परिवारों में तीज और सावन जैसे अवसरों पर विवाहित बेटी के घर मायके से घेवर और अन्य उपहार भेजने की परंपरा रही है। राजस्थान में इसे सिंजारा जैसी परंपराओं से भी जोड़ा जाता है। कपड़े, चूड़ियां और मेहंदी के साथ जब घेवर बेटी के घर पहुंचता है, तो उसके साथ मायके का स्नेह और अपनापन भी पहुंचता है।

यही शायद हमारी खान-पान संस्कृति की खूबसूरती है—यहां मिठाई सिर्फ मिठास नहीं देती, बल्कि कई बार रिश्तों को भी और मीठा कर जाती है।

लखनऊ के ‘मिश्री मलाई स्वीट्स’ के संस्थापक अनिल त्रिपाठी बताते हैं, “घेवर का स्वाद मौसम और परंपरा दोनों से जुड़ा है। सावन शुरू होते ही इसकी मांग बढ़ने लगती है और तीज-रक्षाबंधन तक इसकी मिठास रिश्तों का हिस्सा बन जाती है। आज भी कई परिवारों में बेटियों के घर घेवर भेजने की परंपरा कायम है।”

आज लगभग हर मिठाई पूरे साल उपलब्ध है। बाजार और तकनीक ने मौसम की सीमाएं काफी हद तक मिटा दी हैं। फिर भी कुछ स्वादों का आनंद उनके मौसम में ही कुछ और होता है। गर्मियों में आम, सर्दियों में गाजर का हलवा और मेरे लिए सावन की बारिश में घेवर—इनका इंतजार ही इनके स्वाद को और खास बना देता है।

शायद इसीलिए घेवर मेरे लिए सिर्फ एक मिठाई नहीं है।

यह सावन की फुहारों का स्वाद है, राखी की मिठास है, तीज की परंपरा है और मायके से बेटी के घर तक पहुंचता रिश्तों का स्नेह भी।

धीरता और वीरता का स्वभाव ही न्यायपूर्ण जीवन की ओर ले जाता है

✍️ लेखक — मोहित धवन

इंदौर, 20 अगस्त 2026।
मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर की आज सुबह की कक्षा में वर्षा दायमा, संस्थापक सदस्य, मानव चेतना विकास केंद्र ने मनुष्य के स्वभाव, संबंधों, मूल्यों और वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें साझा कीं।

उन्होंने कहा कि सबसे पहले हमें अपने स्वभाव को देखने और समझने की आवश्यकता है। वर्तमान में हमारे व्यवहार में कई बार दीनता, हीनता और क्रूरता दिखाई देती है, जबकि हमारा स्वभाव धीरता, वीरता और उपकारिता का होना चाहिए।

संबंधों में जीना अभी सीखना बाकी है

वर्षा दायमा ने कहा कि आज हमारे सामने एक बड़ी समस्या यह है कि हमें संबंधों में कैसे जीना है, इसकी स्पष्ट समझ नहीं है। परिवार और समाज में एक-दूसरे को देखने, सुनने और समझने के बजाय हमारा ध्यान मोबाइल की स्क्रीन पर अधिक केंद्रित हो गया है।

हम न्यायपूर्ण ढंग से जीना तो चाहते हैं, लेकिन व्यवहार में उसे उतार नहीं पाते। इसका उदाहरण फिल्मों में भी दिखाई देता है। जब हम कोई फिल्म देखते हैं तो सामान्यतः हमें वही नायक पसंद आता है, जो दूसरों की मदद करता है, लोगों को संकट से बचाता है और अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है। इससे पता चलता है कि मनुष्य की मूल चाहत अच्छी ही है। लेकिन वास्तविक जीवन में उस चाहत के अनुरूप जीने के लिए सही समझ का होना आवश्यक है।

मूल्यों का निर्वाह ही जीवन में दिखाई देना चाहिए

उन्होंने कहा कि केवल मूल्यों की बात करना पर्याप्त नहीं है। जब हम मूल्यों का सही ढंग से निर्वाह करते हैं, तभी सही ढंग से जी पाते हैं। सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित होने पर ही मनुष्य न्यायपूर्ण पूरकता के साथ जीवन जी सकता है।

हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चे को क्या सिखा रही है?

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि मान लीजिए हमने एक स्कूल खोला, जिसमें एक हजार बच्चे पढ़ते हैं। बच्चा हमारे पास शिक्षा पाने आता है, लेकिन यदि हम फीस, किताबों, यूनिफॉर्म और दूसरी आवश्यकताओं के नाम पर उससे अधिक से अधिक पैसा कमाने लगें, तो वह बच्चा हमसे आखिर क्या सीख रहा है?

यदि उसका अनुभव शुरू से ही शोषण का रहा, तो आगे चलकर जब उसे अवसर मिलेगा, वह भी उसी व्यवहार को दोहरा सकता है। यदि वह डॉक्टर बनता है और सेवा के स्थान पर केवल मरीज से अधिक पैसा कमाने को प्राथमिकता देता है, तो यह उसी हीनता और शोषणकारी सोच का विस्तार है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि स्कूल और कॉलेज केवल डिग्री और रोजगार देने के केंद्र न बनें, बल्कि ऐसे मनुष्य तैयार करें जो न्याय, संबंध और परस्पर पूरकता के साथ जीना समझें।

धीरता और वीरता से बदलता है जीवन

वर्षा दायमा ने कहा कि जब मनुष्य का स्वभाव धीरता और वीरता की ओर बढ़ता है, तब उसके व्यवहार में भी परिवर्तन आता है। वह समाज में दया, करुणा, कृपा और प्रेम की पात्रता के साथ जीना शुरू करता है। वह केवल अपने लाभ को नहीं, बल्कि दूसरे मनुष्य के साथ अपने संबंध और दायित्व को भी समझता है।

मध्यस्थ दर्शन की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि एक बार व्यक्ति इसे गंभीरता से सुन और समझ लेता है तो जीवन को देखने की उसकी दृष्टि बदलने लगती है। संभव है कि वह आज उस समझ के अनुरूप पूरी तरह न जी पा रहा हो, लेकिन उसके भीतर उस दिशा में जीने की चाहत बनी रहती है।

आज की कक्षा का सार यही रहा कि अच्छा मनुष्य बनने की मूल चाहत हम सभी में है, लेकिन उस चाहत को व्यवहार में उतारने के लिए सही समझ और सही निर्णय आवश्यक हैं। जब हमारे स्वभाव में धीरता, वीरता और उपकारिता आती है तथा हम मूल्यों का सही निर्वाह करते हैं, तभी न्यायपूर्ण और पूरकता से भरा जीवन संभव होता है।

संबंधों में जागृति से ही न्याय संभव : वर्षा दायमा

इंदौर, 19 अगस्त 2026।

मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में आज सुबह आयोजित कक्षा में संस्थापक सदस्य वर्षा दायमा ने मनुष्य, संबंध, न्याय, स्वतंत्रता और जागृति को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें साझा कीं।

उन्होंने कहा कि मूल रूप में हर मनुष्य सभी का भला ही चाहता है। कोई भी व्यक्ति भीतर से यह नहीं चाहता कि उसके कारण किसी का अहित हो। लेकिन जब वह अपनी इस चाहत को व्यवहार में उतारने जाता है तो सही समझ के अभाव में कई बार परिणाम उलटा हो जाता है। समस्या मनुष्य की मूल चाहत में नहीं, बल्कि उसे सही ढंग से क्रियान्वित करने की समझ में है।

वर्षा दायमा ने बच्चे के सहज प्रेम का उदाहरण देते हुए कहा कि जब एक बच्चा किसी से प्रेम करता है तो उसका प्रेम पूरी तरह सहज और निर्मल होता है। उसमें न द्वेष होता है, न ईर्ष्या, न छल और न कपट। यही सहजता मनुष्य के मूल स्वभाव की ओर संकेत करती है।

जब मनुष्य स्वयं को सबसे पहले ‘मानव’ के रूप में देखना शुरू करता है और सामने वाले को भी अपने ही समान एक मानव के रूप में पहचानता है, तब उसकी दृष्टि में बड़ा परिवर्तन आता है।

जैसे ही यह दृष्टि हमारे भीतर जागृत होती है, जाति-पाति, ईर्ष्या, द्वेष, भेदभाव और ऊंच-नीच जैसी दीवारें स्वतः समाप्त होने लगती हैं। तब सामने वाला किसी जाति, वर्ग, पद या पहचान का प्रतिनिधि न होकर सबसे पहले हमारे जैसा ही एक मनुष्य दिखाई देता है।

उन्होंने कहा कि अस्तित्व में प्रत्येक इकाई का दूसरी इकाइयों के साथ कोई न कोई संबंध है। चाहे पदार्थ हो, जीव हो या मनुष्य—सब परस्पर संबंध में हैं। मनुष्य के साथ अपने संबंध को पहचानना और उसका न्यायपूर्वक निर्वाह करना जागृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मनुष्य जब स्वयं में दृष्टा होकर वास्तविकता को समझने लगता है, तभी वह दूसरे के साथ न्यायपूर्ण ढंग से जीने की स्थिति में आता है।

कक्षा में ए. नागराज जी द्वारा प्रतिपादित सूत्र का उल्लेख करते हुए वर्षा दायमा ने कहा—

“जीने देकर जीना ही न्याय है।”

अर्थात हमारा जीना केवल अपने लिए नहीं है। हमारे जीने के साथ सामने वाले का जीना भी सुनिश्चित हो—यही न्यायपूर्ण जीवन की दिशा है। संबंधों में केवल अपनी सुविधा, अपेक्षा या लाभ को देखना पर्याप्त नहीं है; दूसरे के अस्तित्व, उसकी गरिमा और उसके विकास को स्वीकार करना भी उतना ही आवश्यक है।

वीरता के अर्थ को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि अन्य को न्याय दिलाने की प्रक्रिया ‘वीरता’ है। लेकिन हम दूसरे को न्याय तभी दिला सकते हैं, जब स्वयं हमारे भीतर समझ और समाधान हो।

इसे सहज रूप में ऐसे समझा जा सकता है कि हम दूसरे का पात्र तभी भर सकते हैं, जब हमारा अपना पात्र भरा हो।

जब हमारा व्यवहार इस स्तर तक पहुँचता है कि हम दूसरे की जागृति और न्याय में सहायक होने लगते हैं, तो यही व्यवहार उपकार का रूप लेता है।

वर्षा दायमा ने एक महत्वपूर्ण बात कही कि जो चीज हमारे भीतर है, उसे बाहर खोजना भ्रम की स्थिति है।

सुख, समाधान और संबंधों में तृप्ति को यदि मनुष्य लगातार बाहरी वस्तुओं, परिस्थितियों या दूसरे व्यक्तियों में खोजता रहेगा, तो उसकी तलाश पूरी नहीं हो सकती। आवश्यकता अपने भीतर उस समझ को पहचानने और विकसित करने की है, जिससे हमारा जीवन संचालित होता है।

कक्षा में स्वतंत्रता पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य को तीन स्तरों पर स्वतंत्रता के लिए कार्य करना चाहिए—

  1. आर्थिक स्वतंत्रता
  2. भावनात्मक स्वतंत्रता
  3. मानसिक या विचारों के स्तर पर स्वतंत्रता

इन तीनों स्तरों पर स्वतंत्रता मनुष्य को अपने निर्णय समझ के आधार पर लेने की क्षमता देती है। इसका उद्देश्य दूसरों से अलग होना नहीं, बल्कि स्वयं में समाधानपूर्वक रहते हुए संबंधों का बेहतर निर्वाह करना है।

अंततः कक्षा का केंद्रीय बिंदु ‘जागृति’ रहा। वर्षा दायमा ने कहा कि हम दुनिया में जो भी कार्य करें, उसका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उपलब्धि या सुविधा नहीं, बल्कि स्वयं की और दूसरे की जागृति में सहायक होना भी होना चाहिए।

जब मनुष्य स्वयं को मानव के रूप में पहचानता है, सामने वाले में भी उसी मानव को देखता है और ‘जीने देकर जीने’ की दृष्टि से संबंधों का निर्वाह करता है, तभी न्याय, वीरता, उपकार और वास्तविक स्वतंत्रता जीवन में व्यवहार का हिस्सा बनने लगते हैं।

करण शर्मा की तूफानी पारी, काशी रुद्रास ने गोरखपुर लायंस को 15 रन से हराया

लेखक ✍️– मोहित धवन

लखनऊ, 18 अगस्त 2026।
UP T20 League Season-4 में मंगलवार को लखनऊ के भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी इकाना क्रिकेट स्टेडियम में खेले गए मुकाबले में काशी रुद्रास ने गौर गोरखपुर लायंस को 15 रन से हराकर शानदार जीत दर्ज की। काशी की जीत के नायक कप्तान करण शर्मा रहे, जिन्होंने महज 48 गेंदों पर नाबाद 92 रन की विस्फोटक पारी खेली।

पहले बल्लेबाजी करते हुए काशी रुद्रास ने निर्धारित 20 ओवर में छह विकेट खोकर 194 रन का मजबूत स्कोर खड़ा किया। अभिषेक गोस्वामी ने 10 गेंदों पर 16 रन बनाए, जबकि साहब युवराज सिंह ने 25 गेंदों में 41 रन की महत्वपूर्ण पारी खेली।

बीच के ओवरों में कुछ विकेट गिरने के बाद करण शर्मा ने काशी की पारी को संभाला और फिर तेजी से रन बटोरते हुए मैच का रुख बदल दिया। उन्होंने अपनी नाबाद 92 रन की पारी में चार चौके और नौ छक्के लगाए। लगभग 192 के स्ट्राइक रेट से खेली गई उनकी पारी ने काशी को बड़े स्कोर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। अरनव बलियान ने भी 17 गेंदों पर 24 रन का योगदान दिया। गोरखपुर की ओर से निशांत ठाकुर ने चार ओवर में 34 रन देकर तीन विकेट लिए।

195 रन के लक्ष्य का पीछा करने उतरी गौर गोरखपुर लायंस ने मुकाबले में बने रहने की पूरी कोशिश की। सिद्धार्थ यादव ने 23 गेंदों पर 32 और प्रिंस यादव ने 23 गेंदों पर 31 रन बनाए। हालांकि काशी के गेंदबाजों ने नियमित अंतराल पर विकेट लेकर गोरखपुर को बड़ी साझेदारी बनाने का मौका नहीं दिया।

आखिरी ओवरों में गोरखपुर ने तेजी से रन जुटाने का प्रयास किया, लेकिन निर्धारित 20 ओवर में टीम सात विकेट पर 179 रन ही बना सकी। काशी की ओर से वैभव चौधरी ने तीन ओवर में केवल 12 रन देकर दो विकेट लिए। बल्ले से शानदार प्रदर्शन करने वाले करण शर्मा ने गेंद से भी एक विकेट हासिल किया। उन्हें उनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए प्लेयर ऑफ द मैच चुना गया।

UP T20 League उत्तर प्रदेश के युवा क्रिकेटरों के लिए अपनी प्रतिभा दिखाने का एक महत्वपूर्ण मंच बनती नजर आ रही है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से आए युवा खिलाड़ी यहां बड़े स्टेडियम और प्रतिस्पर्धी माहौल में अपनी क्षमता साबित कर रहे हैं।

इकाना स्टेडियम के स्टैंड्स में भले ही दर्शकों की संख्या अभी बहुत अधिक नजर न आए, लेकिन मैदान पर युवा खिलाड़ियों के जोश, संघर्ष और आगे बढ़ने के सपनों की कोई कमी नहीं है। ऐसे मुकाबले स्थानीय प्रतिभाओं को पहचान दिलाने के साथ भविष्य में बड़े स्तर पर खेलने का रास्ता भी खोल सकते हैं।

इस जीत के साथ काशी रुद्रास ने टूर्नामेंट में अपनी शानदार लय बरकरार रखी। यह टीम की लगातार दूसरी जीत रही।

संक्षिप्त स्कोर: काशी रुद्रास 194/6 (20 ओवर), गौर गोरखपुर लायंस 179/7 (20 ओवर)।
परिणाम: काशी रुद्रास 15 रन से विजयी।
प्लेयर ऑफ द मैच: करण शर्मा।