मानकर जीने से जानकर जीने की ओर… मानव को समझने की एक नई यात्रा

मानव चेतना विकास केंद्र में एक माह के अध्ययन शिविर का शुभारंभ

✍️ मोहित धवन
इंदौर | 20 अक्टूबर 2026

जीवन की एक विचित्र सच्चाई है। हम दुनिया को समझने में अपना अधिकांश समय लगा देते हैं, लेकिन स्वयं को और अपने आसपास के मनुष्यों को कितना समझ पाते हैं? शिक्षा, व्यवसाय, परिवार और सामाजिक संबंधों के बीच हम अनेक भूमिकाएँ निभाते हैं। धीरे-धीरे यही भूमिकाएँ हमारी पहचान बन जाती हैं। लेकिन एक बुनियादी प्रश्न कहीं पीछे छूट जाता है—आखिर मानव होना क्या है?

इसी प्रश्न को समझने की एक नई यात्रा आज मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK), इंदौर में शुरू हुई। अवसर था एक माह के अध्ययन शिविर का, जिसका शुभारंभ प्रीति दीदी, ख्याति दीदी और नागेश्वरी दीदी की वंदना से हुआ। वातावरण में आत्मीयता थी और प्रतिभागियों के मन में जीवन को नए दृष्टिकोण से समझने की उत्सुकता भी।

प्रथम सत्र में केंद्र के संस्थापक अजय दायमा जी ने प्रतिभागियों से उनकी अपेक्षाएँ पूछीं। यह सामान्य-सा प्रश्न था, लेकिन इसके पीछे अध्ययन की दिशा छिपी थी। हम यहाँ क्यों आए हैं? कुछ नई जानकारी प्राप्त करने, अपनी पुरानी मान्यताओं की पुष्टि करने या जीवन को वास्तव में समझने?

अजय जी ने अपनी बात एक सरल किंतु गहरे विचार से शुरू की—“सबसे पहले हम एक मानव हैं, उसके बाद बाकी कुछ।” हम स्वयं को पिता, पुत्र, पति, मित्र, अधिकारी या व्यवसायी के रूप में पहचानते हैं। लेकिन क्या हमने कभी यह जानने का प्रयास किया कि इन सभी भूमिकाओं के पीछे जो मानव है, उसकी वास्तविकता क्या है?

उन्होंने अस्तित्व में पहचान और निर्वाह के संबंध को स्पष्ट किया। प्रत्येक इकाई दूसरी इकाई को पहचानती है और उसके अनुसार ही निर्वाह करती है। मानव जीवन में भी यही क्रम है। जब पहचान अधूरी होती है, तो वही कमी संबंधों और व्यवहार में संकट बनकर सामने आती है।

यह विचार हमारे रोजमर्रा के जीवन से गहराई से जुड़ा है। परिवारों में मतभेद, संबंधों में तनाव और समाज में बढ़ता अविश्वास क्या केवल परिस्थितियों का परिणाम हैं? या इनके पीछे एक-दूसरे को ठीक से न पहचान पाने की समस्या भी है? अक्सर हम व्यवहार सुधारने का प्रयास करते हैं, लेकिन उस समझ की ओर ध्यान नहीं देते, जिससे व्यवहार जन्म लेता है।

मानव की कल्पनाशीलता पर चर्चा करते हुए अजय जी ने बताया कि यह हमारी महत्वपूर्ण क्षमता है। लेकिन जब कल्पनाशीलता में भ्रम शामिल हो जाता है, तब निर्वाह में संकट उत्पन्न होने लगते हैं। हम वास्तविकता को जानने के बजाय अपनी धारणाओं के आधार पर निष्कर्ष बनाने लगते हैं।

यहीं से चर्चा एक महत्वपूर्ण विषय पर पहुँची—मानना और जानना। अजय जी के शब्द थे, “जानना बहुत आवश्यक है, मानना बहुत सरल है।” यह अंतर सुनने में छोटा है, लेकिन जीवन पर इसका प्रभाव व्यापक हो सकता है।

हम बचपन से अनेक बातें मानते आए हैं। परिवार, समाज और परंपरा से मिली धारणाएँ हमारी सोच का हिस्सा बन जाती हैं। लेकिन क्या किसी बात को लंबे समय तक मानते रहना, उसे जान लेने का प्रमाण है? आस्था और वास्तविक ज्ञान के बीच यही अंतर अध्ययन की आवश्यकता को सामने लाता है।

अजय जी ने स्पष्ट किया कि मानव को केवल बाहरी अवलोकन से नहीं समझा जा सकता। वास्तविकता को जानना और अनुभव के स्तर पर उसकी पुष्टि आवश्यक है। पूर्णता की पहचान के आधार पर ही हम अपूर्णता को सही अर्थों में समझ सकते हैं।

सत्र का एक और महत्वपूर्ण पक्ष था—भाव की उत्पत्ति। अजय जी ने कहा, “भाव एक आदमी से दूसरे आदमी तक नहीं पहुँचता, भाव हर व्यक्ति के भीतर स्वयं में ही उदय होता है।”

जब हम सच्चाई को जानते हैं, तब दूसरे मानव के प्रति हमारे भीतर स्वाभाविक स्वीकृति उत्पन्न होती है। इसी स्वीकृति से भाव का उदय होता है। जिस व्यक्ति में यह भाव उदय होता है, वह सुखी रहता है और उसकी क्रियाओं को भी उसी से दिशा मिलती है।

लगभग तीन दशक के व्यावसायिक जीवन में मैंने लोगों को समझने और उनके साथ संबंधों का निर्वाह करने का निरंतर प्रयास किया है। लेकिन आज के संवाद ने एक अलग प्रश्न खड़ा किया—क्या लोगों के व्यवहार को समझ लेना ही मानव को समझ लेना है?

शायद नहीं। व्यवहार के पीछे जो विचार, समझ, मान्यता और भाव काम करते हैं, उन्हें जाने बिना हमारी पहचान अधूरी रह सकती है।

अध्ययन शिविर का पहला सत्र किसी अंतिम निष्कर्ष के बजाय एक नई जिज्ञासा के साथ पूरा हुआ। आने वाला एक महीना इन्हीं प्रश्नों पर अध्ययन, संवाद और आत्मपरीक्षण का अवसर होगा।

लखनऊ की चिकनकारी: हुनर बेमिसाल, लेकिन कारीगर के हिस्से में क्या?

एक साड़ी बनाने में लग जाते हैं तीन-चार महीने, फिर भी कुशल कारीगर की दैनिक कमाई महज़ Rs.300–400। बदलते फैशन, महँगाई और मशीनों के दौर में कहाँ खड़ी है लखनऊ की यह विरासत?

लखनऊ, 13 अक्टूबर 2026
✍️ मोहित धवन

लखनऊ की पहचान सिर्फ नवाबी तहज़ीब, अदब और लज़ीज़ खानपान तक सीमित नहीं है। इस शहर की एक और खूबसूरत पहचान है, जो सदियों से सुई और धागे के सहारे कपड़ों पर अपनी कहानी लिखती आ रही है—चिकनकारी। एक ऐसी कला, जिसमें कारीगर का धैर्य, कल्पना और अनुभव मिलकर साधारण कपड़े को बेमिसाल बना देते हैं। लेकिन इस खूबसूरती के पीछे एक ऐसी दुनिया भी है, जिसकी मुश्किलों तक हमारी नज़र शायद ही पहुँचती है।

हाल ही में लखनऊ के सुभाष मार्ग स्थित श्री नाथ चिकन सरोवर जाने का अवसर मिला। दुकान में खूबसूरत सूट, साड़ियाँ और आकर्षक डिज़ाइन सजे थे। दुकानदार एक के बाद एक परिधान दिखा रहे थे, लेकिन मेरी नज़र एक महिला कारीगर पर ठहर गई। वह बड़ी तल्लीनता से कपड़े पर कढ़ाई कर रही थीं। उनकी उँगलियों के बीच चलती सुई हर टाँके के साथ एक नई आकृति उकेर रही थी। उस दृश्य में एक अजीब-सी शांति थी, मानो कपड़ा नहीं, किसी की साधना आकार ले रही हो।

महीनों की मेहनत, रोज़ की कमाई कुछ सौ रुपये!

दुकान के मालिक रितेश कुमार बताते हैं कि बारीक और जटिल चिकनकारी वाली एक साड़ी तैयार होने में कभी-कभी तीन से चार महीने तक लग जाते हैं। जिस परिधान को ग्राहक कुछ मिनटों में देखकर पसंद करता है, उसके पीछे महीनों का श्रम और वर्षों का अभ्यास छिपा हो सकता है।

लेकिन उनकी अगली बात मन को छू गई। उनके अनुसार, एक कुशल कारीगर भी दिनभर मेहनत करके लगभग 300 से 400 रुपये ही कमा पाता है।

सोचिए, जिस कला को देखकर हम वाह-वाह करते हैं, उसे रचने वाले व्यक्ति की रोज़मर्रा की ज़रूरतें इतने सीमित संसाधनों में कैसे पूरी होती होंगी? परिवार का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की चिंताएँ—सब उसी मेहनत से जुड़ी हैं।

पसंद और खरीदने की क्षमता के बीच बढ़ती दूरी

रितेश कुमार के अनुसार, आज चिकनकारी का व्यवसाय पहले जैसा आसान नहीं रहा। ग्राहकों की पसंद बदली है, प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और व्यापार के तौर-तरीके भी बदल गए हैं। जिन्होंने समय के साथ नए डिज़ाइन और बाज़ार की आवश्यकताओं को अपनाया, वे टिके रहे। लेकिन कई लोग इस बदलाव के साथ कदम नहीं मिला सके और उनका पारंपरिक हुनर धीरे-धीरे पीछे छूटता गया।

इस स्थिति में ग्राहक की अपनी मजबूरी भी समझनी होगी। हाथ की चिकनकारी पसंद तो लगभग सभी को आती है, लेकिन बढ़ती महँगाई के बीच हर व्यक्ति महँगे हस्तनिर्मित परिधान खरीदने की स्थिति में नहीं होता।

यही वह जगह है, जहाँ मशीनों की भूमिका बढ़ जाती है। कम समय में अधिक उत्पादन और अपेक्षाकृत सस्ती कीमतें ग्राहकों को आकर्षित करती हैं। तकनीक ने नए अवसर दिए हैं, लेकिन हाथ की कढ़ाई के सामने आर्थिक प्रतिस्पर्धा भी खड़ी कर दी है।

विडंबना देखिए—जिस कला की बारीकी उसकी सबसे बड़ी विशेषता है, वही उसे अधिक समय लेने वाली और महँगी भी बनाती है।

क्या केवल बाज़ार तय करेगा हुनर का भविष्य?

चिकनकारी का इतिहास केवल वस्त्रों का इतिहास नहीं, बल्कि पीढ़ियों से अर्जित कौशल और मानवीय संबंधों की कहानी भी है। एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को सुई पकड़ना सिखाया, टाँकों की बारीकियाँ समझाईं और अपने अनुभव आगे बढ़ाए।

लेकिन आज एक युवा के सामने प्रश्न है—क्या इस काम से उसे सम्मानजनक आजीविका मिल पाएगी?

यदि वर्षों के अभ्यास के बाद भी आर्थिक सुरक्षा न मिले, तो नई पीढ़ी का दूसरे व्यवसायों की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है।

यहाँ आवश्यकता परंपरा और आधुनिकता को आमने-सामने खड़ा करने की नहीं, बल्कि उनके बीच संतुलन बनाने की है। बेहतर बाज़ार, उचित पारिश्रमिक, नए डिज़ाइन और तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग—ये सभी मिलकर इस कला को नई दिशा दे सकते हैं।

किसी विरासत का वास्तविक संरक्षण तभी संभव है, जब उसे जीवित रखने वाले लोग भी सम्मान और समृद्धि के साथ जीवन जी सकें।

कहीं तस्वीरों में ही न रह जाए यह खूबसूरती…

दुकान से लौटते समय रंग-बिरंगी साड़ियों से अधिक उस महिला कारीगर की छवि मन में रह गई। वे हाथ, जो बिना किसी शोर के लखनऊ की पहचान को आगे बढ़ा रहे थे।

मन में एक विचार आया—आज हम चिकनकारी पहनकर गर्व महसूस करते हैं, उसकी तस्वीरें साझा करते हैं, उसकी प्रशंसा करते हैं। लेकिन क्या कभी उन लोगों के जीवन के बारे में भी सोचते हैं, जिनकी मेहनत ने इसे इतना खूबसूरत बनाया?

बदलाव जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। फैशन बदलेगा, तकनीक आगे बढ़ेगी और बाज़ार अपनी दिशा तय करेगा। लेकिन इस यात्रा में यदि कारीगर ही पीछे छूट गया, तो हमारी प्रगति अधूरी रह जाएगी।

अगली बार जब आप चिकनकारी का कोई परिधान देखें, तो उसके रंग और डिज़ाइन के साथ उस अदृश्य मेहनत को भी महसूस करने का प्रयास कीजिएगा।

क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि लखनऊ की चिकनकारी कितनी खूबसूरत है…

सवाल यह है कि इस खूबसूरती को रचने वाले हाथों का जीवन कब खूबसूरत होगा?


लखनऊ का इंतज़ार खत्म होने को है, पहली बार आएंगे चर्चित कथावाचक इंद्रेश जी महाराज

28 जनवरी से 4 फरवरी 2027 तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन, पिता कृष्ण चंद्र शास्त्री जी महाराज भी होंगे साथ

✍️ मोहित धवन | लखनऊ, 10 Oct’2026

लखनऊ का इंतज़ार अब खत्म होता नज़र आ रहा है। देश के सबसे चर्चित युवा कथावाचकों में अपनी विशेष पहचान बना चुके इंद्रेश जी महाराज पहली बार लखनऊ आ रहे हैं। उनकी कथा और संकीर्तन को अब तक विभिन्न माध्यमों से सुनते और देखते आए श्रद्धालुओं को जनवरी 2027 में उन्हें प्रत्यक्ष सुनने का अवसर मिलेगा। 28 जनवरी से 4 फरवरी तक शहर में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन होगा। इस अवसर को और विशेष बनाती है उनके पिता, प्रसिद्ध भागवत कथाव्यास कृष्ण चंद्र शास्त्री जी महाराज की उपस्थिति, जिन्हें श्रद्धालु ठाकुर जी महाराज के नाम से भी जानते हैं।

यह पहला अवसर होगा जब लखनऊ के श्रद्धालुओं को पिता-पुत्र की इस आध्यात्मिक परंपरा से एक साथ जुड़ने का अवसर मिलेगा। एक ओर वर्षों का अनुभव और कथा परंपरा की गहरी समझ है, तो दूसरी ओर नई पीढ़ी को भक्ति और संकीर्तन से जोड़ने की एक अलग शैली। दो पीढ़ियों का यह संगम आयोजन के प्रमुख आकर्षणों में शामिल होगा।

इंद्रेश जी महाराज की लोकप्रियता का एक महत्वपूर्ण पहलू युवाओं के बीच उनकी बढ़ती पहचान है। उनके कथा आयोजनों में भजन और संकीर्तन के दौरान श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता है। कहीं लोग भावविभोर होकर सुनते हैं, तो कहीं भजनों की धुन पर झूमने लगते हैं। यह दृश्य एक दिलचस्प सामाजिक बदलाव की ओर भी संकेत करता है। जिस युवा पीढ़ी को अक्सर आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं में उलझा हुआ माना जाता है, उसका एक वर्ग आज भक्ति और आध्यात्मिक आयोजनों में भी रुचि दिखा रहा है।

कार्यक्रम के आयोजक कुलदीप मिश्रा ने बताया कि इंद्रेश जी महाराज और उनके पिता कृष्ण चंद्र शास्त्री जी महाराज के लखनऊ आगमन की तिथियाँ निश्चित हो चुकी हैं। आयोजन की तैयारियाँ शुरू कर दी गई हैं। कथा स्थल, समय और अन्य व्यवस्थाओं की जानकारी जल्द ही श्रद्धालुओं के साथ साझा की जाएगी।

श्रीमद्भागवत कथा भारतीय समाज की उस परंपरा का हिस्सा है, जिसमें कहानियों के माध्यम से जीवन के गहरे प्रश्नों को समझने का प्रयास किया जाता रहा है। कृष्ण और सुदामा की मित्रता हो, यशोदा का वात्सल्य या अर्जुन के सामने खड़ी दुविधाएँ, इन प्रसंगों में केवल धार्मिक भावनाएँ ही नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों, कर्तव्य और जीवन के निर्णयों से जुड़े अनेक संदेश भी मिलते हैं। शायद यही कारण है कि सदियों पुरानी ये कथाएँ आज भी अलग-अलग पीढ़ियों को अपने जीवन से जुड़ी हुई महसूस होती हैं।

लखनऊ की सांस्कृतिक पहचान हमेशा से विविधता और परंपराओं के सम्मान से जुड़ी रही है। यहाँ साहित्य और संगीत के साथ धार्मिक आयोजनों की भी समृद्ध विरासत रही है। ऐसे में इंद्रेश जी महाराज का पहला आगमन शहर के सांस्कृतिक कैलेंडर में एक उल्लेखनीय आयोजन के रूप में देखा जा सकता है।

जनवरी की ठंडी सुबहों और शामों के बीच होने वाला यह आठ दिवसीय आयोजन श्रद्धालुओं के लिए केवल कथा सुनने का अवसर नहीं, बल्कि परिवार और मित्रों के साथ कुछ समय बिताने, भक्ति संगीत का आनंद लेने और जीवन से जुड़े विचारों पर मनन करने का अवसर भी हो सकता है।

आखिर किसी कथा की सार्थकता केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसे सुनने कितने लोग पहुँचे, बल्कि इससे भी होती है कि वहाँ से लौटते समय वे अपने साथ क्या लेकर गए।

लखनऊ अब जनवरी के उन आठ दिनों की प्रतीक्षा कर रहा है, जब शहर में पहली बार इंद्रेश जी महाराज और उनके पिता कृष्ण चंद्र शास्त्री जी महाराज का एक साथ स्वागत होगा।

We Are Educating Our Children… But Are We Preparing Them for Life?

✍️ Dr. Abhey Wankhede
MCVK Vidyalaya – Indore
October 2026

A child scores good marks, speaks confidently, understands technology, and eventually secures a well-paying job. As parents, we feel satisfied that we have provided our child with a good education. But life extends far beyond examinations, degrees, and careers. When that same child encounters difficulties in relationships, experiences failure, or struggles with inner dissatisfaction, an important question arises—Have we taught our children how to succeed in the world, but forgotten to teach them how to understand themselves and life itself?

Have we taught them how to compete, but also how to ensure justice in relationships? Have we taught them how to benefit from nature, but also how to live in harmony with it? These questions bring our attention to an educational initiative at Manav Chetna Vikas Kendra (MCVK) Vidyalaya, Indore, which offers an opportunity to reconsider the fundamental purpose of education.

At MCVK, an important distinction is made between Skills, Literacy, and Education. Skills enable us to perform tasks, while literacy equips us with the ability to read, write, and acquire information. Education, however, is understood as something much deeper—the process of understanding oneself, recognizing the purpose of life, and identifying one’s participation in the family, society, and nature. Instead of asking children only, “What do you want to become when you grow up?”, perhaps we should also ask a more meaningful question—“What kind of human being do you want to become?”

For generations, we have largely associated education with classrooms, textbooks, examinations, and academic results. MCVK Vidyalaya attempts to broaden this understanding. Within its approximately 16-acre residential campus and associated agricultural land, learning extends beyond textbooks. Discussions, meaningful conversations, educational visits, presentations, music, dance, theatre, and experiences of living close to nature become integral parts of the learning process. The intention is not to move away from books, but to connect what children learn in books with their everyday lives and conduct.

This philosophy is expressed through a simple yet profound statement—“Complete Education = Language + Conduct.” We devote considerable attention to developing children’s language, communication skills, and knowledge. However, their conduct is equally important. Does confidence come with inner contentment? Is there justice in relationships? Does family prosperity go hand in hand with responsibility towards society and sensitivity towards nature? When education begins to address these questions, it moves beyond the transmission of information and becomes a process of developing understanding in human beings.

Another distinctive feature of MCVK Vidyalaya is its approach—“No Fees for Children, No Salary for Teachers.” The families collectively take responsibility for meeting the school’s requirements, while teachers view teaching not merely as a salaried profession but as a responsibility rooted in a shared purpose. It would be unrealistic to claim that this arrangement can be replicated in every school or under all circumstances. Nevertheless, it raises an important question—Is the relationship between a teacher and a student merely professional, or does it carry a greater responsibility towards the next generation?

This educational initiative does not suggest that conventional schooling or higher education is fundamentally wrong. Across the country, thousands of dedicated teachers in schools, colleges, and universities work tirelessly to shape the future of younger generations. Their experience and commitment offer valuable lessons. MCVK Vidyalaya simply introduces another question into this ongoing dialogue—Can education prepare children not only for employment but also for life? Can modern knowledge, science, and technology be combined with opportunities to understand oneself, relationships, society, and nature?

Perhaps meaningful transformation in education will not emerge from a single institution or teaching methodology. It will begin when teachers, parents, and educational institutions collectively revisit a fundamental question—Do we want our children merely to become successful, or do we also want them to become human beings who are content within themselves, just in their relationships, responsible towards society, and capable of living in harmony with nature?

Perhaps the true purpose of education is not to choose between success and understanding, but to make both possible together.

हम बच्चों को पढ़ा रहे हैं… लेकिन क्या उन्हें जीवन के लिए भी तैयार कर रहे हैं?

✍️ डॉ. अभय वानखेड़े
एमसीवीके विद्यालय – इंदौर
अक्टूबर 2026

एक बच्चा अच्छे अंक लाता है, अच्छी भाषा बोलता है, तकनीक समझता है और आगे चलकर अच्छी नौकरी भी पा लेता है। माता-पिता के रूप में हमें संतोष होता है कि हमने उसे अच्छी शिक्षा दी। लेकिन जीवन केवल परीक्षा, डिग्री और नौकरी तक सीमित नहीं रहता। जब वही बच्चा रिश्तों की उलझनों, असफलता या मन के असंतोष से गुजरता है, तब एक सवाल सामने आता है—क्या हमने उसे दुनिया में सफल होना तो सिखाया, लेकिन स्वयं को और जीवन को समझना भी सिखाया?

क्या हमने उसे प्रतिस्पर्धा करना तो सिखाया, लेकिन संबंधों में न्याय करना भी सिखाया? क्या हमने उसे प्रकृति से बहुत कुछ लेना सिखाया, लेकिन उसके साथ संतुलन में जीना भी सिखाया? इन्हीं प्रश्नों के बीच मानव चेतना विकास केंद्र (एमसीवीके) विद्यालय, इंदौर में शिक्षा को लेकर चल रहा एक प्रयोग हमें शिक्षा के मूल उद्देश्य पर फिर से विचार करने का अवसर देता है।

एमसीवीके में कौशल, साक्षरता और शिक्षा को अलग-अलग समझने का प्रयास किया जाता है। कौशल हमें कोई कार्य करना सिखाता है, साक्षरता हमें पढ़ने-लिखने और जानकारी प्राप्त करने योग्य बनाती है, जबकि शिक्षा को स्वयं को समझने, जीवन के उद्देश्य को पहचानने और परिवार, समाज तथा प्रकृति के साथ अपनी सहभागिता समझने से जोड़ा जाता है। यानी बच्चे से केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि “बड़े होकर क्या बनोगे?” शायद उससे पहले यह पूछना भी उतना ही जरूरी है—“बड़े होकर कैसे मनुष्य बनोगे?”

हमने लंबे समय से शिक्षा को कक्षा, किताब, परीक्षा और परिणाम से जोड़कर देखा है। एमसीवीके विद्यालय इस दायरे को थोड़ा व्यापक करने का प्रयास करता है। लगभग 16 एकड़ के आवासीय परिसर और उससे जुड़ी कृषि भूमि के बीच गोष्ठियाँ, संवाद, यात्राएँ, प्रस्तुतियाँ, संगीत, नृत्य, नाटक और प्रकृति के साथ रहने का अनुभव भी सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा बनता है। यहाँ विचार किताबों से दूर जाने का नहीं, बल्कि किताब में पढ़ी हुई बात को जीवन और व्यवहार से जोड़ने का है।

इसी सोच को एक छोटी-सी पंक्ति में व्यक्त किया गया है—“संपूर्ण शिक्षा = भाषा + आचरण।” हम बच्चे की भाषा, अभिव्यक्ति और ज्ञान पर ध्यान देते हैं, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण उसका आचरण भी है। क्या आत्मविश्वास के साथ उसके भीतर संतोष है? क्या संबंधों में न्याय है? क्या परिवार की समृद्धि के साथ समाज के प्रति जिम्मेदारी और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता भी है? शिक्षा यदि इन प्रश्नों तक पहुँचती है, तो वह केवल जानकारी देने से आगे बढ़कर एक समझदार मनुष्य के निर्माण की प्रक्रिया बन सकती है।

एमसीवीके विद्यालय का एक और प्रयोग ध्यान खींचता है—“बच्चों से कोई शुल्क नहीं, शिक्षक को कोई वेतन नहीं।” विद्यालय की आवश्यकताओं को परिवार मिलकर पूरा करते हैं और शिक्षक शिक्षण को केवल वेतन आधारित पेशे के रूप में नहीं, बल्कि अपने दायित्व से जोड़कर देखते हैं। यह व्यवस्था हर विद्यालय में इसी स्वरूप में संभव हो, ऐसा दावा नहीं है। लेकिन इसके पीछे छिपा प्रश्न महत्वपूर्ण है—क्या शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध केवल एक पेशेवर व्यवस्था है, या अगली पीढ़ी के प्रति हमारा कोई बड़ा दायित्व भी है?

इस प्रयोग का उद्देश्य यह कहना नहीं है कि वर्तमान विद्यालयी या महाविद्यालयी शिक्षा गलत है। देश के विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में हजारों शिक्षक समर्पण के साथ नई पीढ़ी का भविष्य बनाने में जुटे हैं और उनके अनुभवों से सीखने के लिए बहुत कुछ है। एमसीवीके विद्यालय का प्रयास इस संवाद में एक और प्रश्न जोड़ता है—क्या रोजगार की तैयारी के साथ शिक्षा को जीवन की तैयारी से भी जोड़ा जा सकता है? क्या आधुनिक ज्ञान, विज्ञान और तकनीक के साथ बच्चे को स्वयं, संबंध, समाज और प्रकृति को समझने का अवसर भी मिल सकता है?

शायद शिक्षा में बड़ा बदलाव किसी एक विद्यालय या किसी एक पद्धति से नहीं आएगा। वह तब आएगा जब शिक्षक, अभिभावक और शिक्षण संस्थान मिलकर एक बार फिर यह प्रश्न पूछेंगे—हम अपने बच्चों को केवल सफल बनाना चाहते हैं, या ऐसा मनुष्य भी बनाना चाहते हैं जो स्वयं के साथ संतुष्ट, संबंधों में न्यायपूर्ण, समाज के प्रति जिम्मेदार और प्रकृति के साथ संतुलित होकर जी सके?

शायद शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य सफलता और समझदारी—दोनों को एक साथ संभव करना है।

परिवार, संस्कार और संबंध—कथा से निकले जीवन के कुछ सूत्र

पुण्डरीक गोस्वामी जी महाराज की कथा का चौथा दिन | डीएवी कॉलेज, लखनऊ

✍️ मोहित धवन
लखनऊ | 8 अक्टूबर 2026

डीएवी कॉलेज, लखनऊ में कथा के चौथे दिन खचाखच भरे पंडाल में भक्ति का एक अलग ही रंग देखने को मिला। कथा के बीच जब पुण्डरीक गोस्वामी जी महाराज ने कृष्ण संकीर्तन किया, तो बड़ी संख्या में उपस्थित भक्तगण भी उनके साथ स्वर मिलाते हुए झूम उठे। कथा, संगीत और संवाद के इसी क्रम में गोस्वामी जी ने परिवार, संस्कार, संबंध, चरित्र और भक्ति को लेकर कई ऐसी बातें कहीं, जिन्हें केवल धार्मिक संदर्भ में ही नहीं, बल्कि मनुष्य के व्यवहार और उसके संबंधों के संदर्भ में भी समझा जा सकता है।

गोस्वामी जी ने कहा कि भारत में दो चीजों का विशेष महत्व रहा है—संस्कार और परिवार। पश्चिमी समाज का उल्लेख करते हुए उन्होंने परिवार की कमजोर होती अवधारणा की ओर भी ध्यान दिलाया। उनका कहना था कि परिवार में सभी का स्वभाव एक जैसा हो, यह आवश्यक नहीं। विचार अलग हो सकते हैं, मतभेद भी हो सकते हैं, लेकिन संबंध के महत्व को पहचानना आवश्यक है। शायद परिवार का अर्थ भी यही है—अलग-अलग स्वभाव के बीच संबंधों को समझना और उनका निर्वाह करना।

इसी बात को समझाने के लिए उन्होंने महाभारत का प्रसंग रखा। युद्ध समाप्त होने के बाद भी युधिष्ठिर का राज्याभिषेक तुरंत नहीं हुआ। पहले कौरव पक्ष के मृत परिजनों से जुड़े अंतिम संस्कार और दायित्व पूरे किए गए। जिनसे इतना बड़ा संघर्ष हुआ, उनके प्रति भी संबंध और संस्कार से जुड़ा दायित्व समाप्त नहीं हुआ। इस प्रसंग को धार्मिक मान्यता से आगे बढ़कर देखें तो एक महत्वपूर्ण मानवीय संकेत मिलता है—विरोध के बावजूद संबंध की पहचान और उससे जुड़े दायित्व का निर्वाह।

गोस्वामी जी की एक बात विशेष रूप से मन को छू गई—“राम जैसा चरित्र और कृष्ण जैसा मित्र मिलना बड़े सौभाग्य की बात है।” राम के प्रसंग में चरित्र और मर्यादा दिखाई देती है, तो कृष्ण के जीवन में मित्रता और संबंध निभाने के अनेक प्रसंग मिलते हैं। शायद जीवन में भी यही महत्वपूर्ण है कि हमारे अपने आचरण में दृढ़ता हो और संबंधों में विश्वास व साथ निभाने का भाव।

चरित्र की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा—“कुलवान होना प्रारब्ध की बात है, यशवान होना प्रारब्ध की बात है, धनवान होना प्रारब्ध की बात है; लेकिन चरित्रवान होना धर्म की बात है।” ‘प्रारब्ध’ को लेकर अलग-अलग दार्शनिक व्याख्याएँ हो सकती हैं, लेकिन इस कथन का व्यावहारिक संदेश स्पष्ट है—मनुष्य की वास्तविक पहचान केवल उसके परिवार, धन या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उसके आचरण से बनती है। हम अपने संबंधों में कैसा व्यवहार करते हैं और अपने दायित्वों को कितनी जिम्मेदारी से निभाते हैं, चरित्र की पहचान शायद यहीं से होती है।

श्राद्ध और पितृपक्ष की चर्चा करते हुए गोस्वामी जी ने संबंधों को लेकर एक बहुत सहज बात कही। यदि हम अपने माता-पिता और परिवार के बुजुर्गों की जीते-जी सेवा, सम्मान और देखभाल कर लें, तो बाद के कर्मकांड में कोई छोटी-मोटी कमी रह भी जाए, तो वह उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह जाती। बात सीधी है—श्रद्धा केवल किसी के चले जाने के बाद व्यक्त न हो; जो आज हमारे साथ हैं, उनके प्रति हमारे व्यवहार में भी दिखाई दे।

कथा का सबसे सहज उदाहरण शायद भक्ति और नमक का था। गोस्वामी जी ने कहा कि भोजन बनाते समय नमक डालना भूल जाएँ, तो उसे बाद में भी डाला जा सकता है। दूसरे कई मसाले बाद में उसी तरह भोजन का हिस्सा नहीं बन सकते। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह कि नमक के बिना अच्छे से अच्छा भोजन भी अधूरा लगता है। जिस तरह नमक भोजन में स्वाद लाता है, उसी तरह भक्ति जीवन में स्वाद लाती है।

उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण को आधी-अधूरी नहीं, पूर्ण भक्ति प्रिय है। इस विचार को यदि जीवन के व्यापक संदर्भ में देखें तो एक प्रश्न हमारे सामने भी आता है—जिस मूल्य को हम सही मानते हैं, क्या उसे अपने व्यवहार में भी उतनी ही निष्ठा से जीते हैं? क्योंकि मान्यता तभी सार्थक दिखाई देती है, जब उसका प्रभाव हमारे आचरण और संबंधों में भी दिखाई दे।

कथा के चौथे दिन से मेरे लिए एक सरल-सा सूत्र उभरकर आया—परिवार हमें संबंधों को पहचानने का अवसर देता है, संस्कार उनके निर्वाह की दिशा देते हैं, चरित्र हमारे आचरण में दिखाई देता है और भक्ति जीवन में संवेदनशीलता का भाव जोड़ती है।

अलग-अलग दर्शन और परंपराएँ इन शब्दों की व्याख्या अपने ढंग से कर सकती हैं, लेकिन अंततः प्रश्न मनुष्य के सामने ही आकर खड़ा होता है—मैं अपने संबंधों को कितना समझ पा रहा हूँ, और जो समझ रहा हूँ, वह मेरे आचरण में कितना दिखाई दे रहा है?

क्या नर्मदा परिक्रमा हिंदुस्तान को जानने की सबसे खूबसूरत यात्रा हो सकती है?

✍️ मोहित धवन
3 अक्टूबर 2026

मैंने अभी तक नर्मदा परिक्रमा नहीं की है।

लेकिन पिछले काफी समय से इस यात्रा के बारे में पढ़ रहा हूँ। सोशल मीडिया पर कभी किसी परिक्रमावासी का वीडियो सामने आ जाता है, कभी नर्मदा किनारे की सुबह, कभी किसी छोटे से गाँव में यात्रियों का पड़ाव, तो कभी किसी अनजान परिवार को परिक्रमावासियों के लिए भोजन की व्यवस्था करते देखता हूँ।

और इन्हें देखते-देखते एक अलग ही अनुभव होने लगा है।

मन में इच्छा लगातार बढ़ रही है—इसे स्क्रीन पर कब तक देखेंगे, एक बार वहाँ जाकर खुद अनुभव करना चाहिए।

इसी इच्छा के साथ एक सवाल भी मन में आया—

क्या नर्मदा परिक्रमा हिंदुस्तान को जानने और महसूस करने की सबसे खूबसूरत यात्राओं में से एक हो सकती है?

यहाँ रास्ता ही मंज़िल है

हमारी अधिकांश यात्राएँ किसी destination के लिए होती हैं। टिकट, होटल और घूमने की जगहें पहले से तय होती हैं। कुछ दिन घूमते हैं, तस्वीरें लेते हैं और वापस लौट आते हैं।

लेकिन नर्मदा परिक्रमा को जितना समझ रहा हूँ, इसकी प्रकृति उतनी ही अलग लगती है।

यहाँ कोई एक destination नहीं है।

रास्ता ही destination बन जाता है।

नर्मदा के साथ चलते रहना, घाटों पर रुकना, गाँवों से गुजरना, लोगों से मिलना और धीरे-धीरे उस जीवन को करीब से देखना, जिसे शायद कार की खिड़की से गुजरते हुए हम कभी देख ही नहीं पाते।

परिक्रमा और पर्यटन एक बात नहीं हैं

यह फर्क समझना शायद सबसे जरूरी है।

नर्मदा परिक्रमा मूलतः कोई sightseeing tour नहीं है। यह नर्मदा के प्रति आस्था से जुड़ी एक पुरानी धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा है। परिक्रमावासी संकल्प लेकर निकलते हैं और परंपरा के अनुसार इसके अपने नियम, मर्यादाएँ और जीवन-पद्धति होती है।

पर्यटन में हम स्थान देखने निकलते हैं; परिक्रमा में शायद स्वयं को उस यात्रा के हवाले करते हैं।

पर्यटन में हमारी सुविधा महत्वपूर्ण होती है—कहाँ रुकेंगे, क्या खाएँगे, कितने बजे पहुँचेंगे। परिक्रमा में सादगी, धैर्य, अनुशासन और अनिश्चितता को स्वीकार करना भी यात्रा का हिस्सा माना जाता है।

इसलिए कार से नर्मदा के प्रमुख स्थानों को देखना, कुछ दिन नदी के किनारे पैदल चलना या अलग-अलग हिस्सों में जाकर वहाँ के जीवन को समझना एक बहुत सुंदर अनुभव हो सकता है—लेकिन उसे पारंपरिक नर्मदा परिक्रमा कहना सही नहीं होगा।

दोनों के अपने अर्थ हैं।

एक नर्मदा को देखने-जानने की यात्रा हो सकती है, दूसरी नर्मदा के प्रति आस्था और साधना की परिक्रमा।

शायद यहाँ वह हिंदुस्तान मिलता है, जो हाईवे से दिखाई नहीं देता

हम आज भारत को अक्सर शहरों, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और होटलों के माध्यम से देखते हैं।

लेकिन इस देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा इनसे थोड़ा हटकर भी साँस लेता है।

नर्मदा परिक्रमा के वीडियो में मुझे केवल मंदिर, घाट या नदी आकर्षित नहीं करते। मुझे वे सामान्य लोग भी उतना ही आकर्षित करते हैं, जो किसी अनजान यात्री को पानी देते हैं, भोजन कराते हैं, रास्ता बताते हैं या रात बिताने की जगह उपलब्ध करा देते हैं।

शायद हिंदुस्तान को समझने के लिए उसके monuments से अधिक उसके लोगों के बीच जाना जरूरी है।

क्योंकि देश केवल उसका भूगोल नहीं होता।

देश उसके लोग होते हैं।

एक नदी के किनारे कितने हिंदुस्तान

नर्मदा लगभग 1,312 किलोमीटर लंबी नदी है। अमरकंटक से निकलकर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से गुजरते हुए अरब सागर तक पहुँचती है।

लेकिन परिक्रमा केवल नदी की लंबाई तय करना नहीं है। दोनों तटों और अलग-अलग परिक्रमा मार्गों को मिलाकर पूरी यात्रा की दूरी लगभग 2,600 से 3,500 किलोमीटर तक बताई जाती है।

इतनी लंबी यात्रा में भूगोल बदलता है, बोलियाँ बदलती हैं, भोजन बदलता है, पहनावा बदलता है। कहीं जंगल, कहीं खेत, कहीं पहाड़ और कहीं छोटे कस्बे मिलते हैं।

लेकिन इन सबके बीच एक चीज साथ रहती है—नर्मदा।

शायद यही हिंदुस्तान भी है—ऊपर से अलग-अलग, लेकिन भीतर किसी अदृश्य धारा से जुड़ा हुआ।

शुरुआत पूरी परिक्रमा से ही क्यों?

यदि कोई व्यक्ति धार्मिक संकल्प के साथ पारंपरिक नर्मदा परिक्रमा करना चाहता है, तो उसके नियमों और परंपराओं को पहले ठीक से समझना चाहिए। पूरी पदयात्रा कई महीनों की साधना हो सकती है।

लेकिन हर व्यक्ति की शुरुआत वहीं से हो, यह जरूरी नहीं।

मेरे जैसे किसी व्यक्ति के लिए, जो फिलहाल नर्मदा को समझना और महसूस करना चाहता है, शुरुआत एक नर्मदा यात्रा से भी हो सकती है।

सात दिन जाइए। दस दिन जाइए। किसी एक क्षेत्र को चुनिए। कुछ दूरी पैदल चलिए। गाँवों में रुकिए। घाटों पर समय बिताइए। लोगों से बात कीजिए।

फिर किसी वर्ष वापस जाकर नदी के किसी दूसरे हिस्से को समझिए।

कार या टैक्सी से प्रमुख स्थानों तक पहुँचा जा सकता है और बीच के चुने हुए हिस्सों को पैदल अनुभव किया जा सकता है। ठहरने के लिए आश्रम और धर्मशालाओं के अलावा प्रमुख शहरों और कस्बों में guest houses, lodges और hotels भी मिल सकते हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में सुविधाएँ सीमित हो सकती हैं, इसलिए पहले से जानकारी और तैयारी जरूरी है।

यह परिक्रमा नहीं होगी, लेकिन शायद परिक्रमा को समझने की शुरुआत जरूर हो सकती है।

शायद यात्रा बाहर से ज्यादा भीतर की है

नर्मदा परिक्रमा की जड़ें गहरी आस्था में हैं। लेकिन लंबे समय तक सीमित साधनों के साथ चलना व्यक्ति को अपने भीतर भी देखने का अवसर देता होगा।

मुझे वास्तव में कितना चाहिए?

जिन सुविधाओं को मैंने अनिवार्य मान लिया है, क्या वे सच में इतनी जरूरी हैं?

मैं किसी अनजान व्यक्ति पर कितना विश्वास कर सकता हूँ?

और क्या मैं स्वयं भी किसी अनजान व्यक्ति के लिए उतनी सहजता से अपना दरवाजा खोल सकता हूँ?

शायद किसी मोड़ पर परिक्रमा नदी के बाहर कम और अपने भीतर अधिक होने लगती होगी।

इसलिए यह यात्रा मुझे अपनी ओर खींच रही है

अभी मेरे लिए नर्मदा परिक्रमा एक अनुभव नहीं, एक जिज्ञासा और इच्छा है।

मैंने इसे अभी दूसरों की आँखों से देखा है—किसी वीडियो में, किसी पोस्ट में, किसी यात्रा-वृत्तांत में।

इसलिए यह दावा नहीं कर सकता कि नर्मदा परिक्रमा हिंदुस्तान को जानने की सबसे खूबसूरत यात्रा है।

लेकिन इतना जरूर महसूस करता हूँ कि यदि भारत को केवल देखना नहीं, बल्कि उसके लोगों के बीच जाकर महसूस करना है, तो नर्मदा के किनारे कुछ दूर चलकर जरूर देखना चाहिए।

हो सकता है मेरी शुरुआत परिक्रमा से न हो। शायद वह केवल कुछ दिनों की नर्मदा यात्रा हो।

लेकिन संभव है कि वही कुछ दिन मुझे यह समझा दें कि हजारों लोग सदियों से इस नदी के चारों ओर चलने के लिए क्यों निकलते रहे हैं।

और शायद किसी दिन मन स्वयं कहे—

अब नर्मदा को केवल देखने नहीं, उनकी परिक्रमा करने चलना है।

फिलहाल मन इतना ही कह रहा है—

एक बार चलकर देखना चाहिए…

नर्मदे हर। 🙏

इस रविवार कुछ अलग हो जाए… Cornucopia के बहाने प्रकृति के थोड़ा करीब

✍️ मोहित धवन
इंदौर | 2 अक्टूबर 2026

4 अक्टूबर, रविवार। साथ में लंबा वीकेंड भी।

जाहिर है, हममें से बहुत से लोग सोच रहे होंगे—इस छुट्टी में क्या किया जाए? परिवार के साथ कहीं बाहर निकलें, दोस्तों से मिलें, बच्चों को कहीं घुमाएं या फिर रोज की तरह यह रविवार भी आते-जाते निकल जाए।

तो चलिए, आपके इस रविवार और लंबे वीकेंड को थोड़ा अलग और शायद यादगार बनाने का एक विचार देते हैं।

अगर आप इंदौर में हैं और शहर से करीब 15 किलोमीटर की दूरी तय कर सकते हैं, तो मानव चेतना विकास केंद्र (MCVK) में 4 अक्टूबर को होने वाला ‘Cornucopia’ आपके लिए एक अलग अनुभव हो सकता है।

यहां दिन की शुरुआत सुबह 6:30 बजे पक्षियों के साथ होगी। MCVK परिसर में स्थानीय और प्रवासी पक्षियों की 150 से अधिक प्रजातियां देखी जाती हैं। Birdwatching करते हुए सुबह बिताना बच्चों के लिए भी उतना ही दिलचस्प हो सकता है, जितना बड़ों के लिए।

फिर आसमान में उड़ते पक्षियों से कहानी जमीन और हमारी थाली तक पहुंचती है।

यहां Farm to Table केवल आकर्षक शब्द नहीं है। खेतों में प्राकृतिक तरीके से उगी उपज को यहां के परिवार अपने हाथों से भोजन में बदलेंगे और वही ताजा खाना आपकी थाली तक पहुंचेगा।

जरा सोचिए—हम रोज खाना खाते हैं, लेकिन कितनी बार उस मिट्टी को देखते हैं जहां हमारा भोजन उगा? दूध पीते हैं, लेकिन गाय और उसकी देखभाल करने वाले हाथ हमारे जीवन से लगभग गायब हो चुके हैं। कपड़े पहनते हैं, लेकिन करघे तक हमारा रिश्ता शायद ही कभी पहुंचता है।

Cornucopia इन्हीं छूटते हुए रिश्तों को एक दिन फिर थोड़ा करीब लाने की कोशिश है।

यहां खेत हैं, गिर गायों की गौशाला है, Handloom है, Bakery है और प्राकृतिक व हस्तनिर्मित उत्पाद हैं। Food और shopping के साथ live music भी होगा। बच्चों के लिए Twig Art, Rock Painting और Block Printing Bags जैसी गतिविधियां होंगी। अच्छे तैराक प्राकृतिक तालाब में swimming का आनंद भी ले सकेंगे।

इस पूरे उत्सव की एक और खूबसूरत बात है। इसकी तैयारी केवल कुछ लोगों की जिम्मेदारी नहीं है। कोई खेती संभाल रहा है, कोई गौशाला, कोई Handloom, कोई Bakery और कोई भोजन। बच्चे भी देखते, सीखते और अपने छोटे-छोटे हाथों से इस सामूहिकता का हिस्सा बनते हैं।

उत्सव एक दिन का है, लेकिन उसके पीछे कई परिवारों का श्रम और सहभागिता है।

MCVK के संस्थापक अजय दायमा की पहल में विकसित इस जगह की शायद सबसे खास बात भी यही है—यहां विचार केवल कहे नहीं जाते, उन्हें रोजमर्रा के जीवन में उतारने की कोशिश होती है। खेती हो, भोजन हो, उत्पादन हो या आपसी संबंध—प्रकृति और मनुष्य को अलग-अलग नहीं, एक-दूसरे से जुड़ा हुआ देखने का प्रयास यहां महसूस होता है।

इसी सोच की एक झलक Cornucopia के Humane Exchange System में भी मिलेगी।

हम बाजार जाते हैं—कीमत देखी, पैसे दिए, सामान लिया और आगे बढ़ गए। लेकिन किसी वस्तु के पीछे केवल उसकी कीमत नहीं होती। उसके पीछे प्रकृति के संसाधन, किसी का समय, कौशल और श्रम भी होता है। यदि हम उसे भी देख पाएं तो शायद विनिमय केवल पैसे और सामान का लेन-देन नहीं रह जाता।

इसलिए Cornucopia को केवल Food, Shopping, Music और Fun का कार्यक्रम समझना इसके दायरे को छोटा कर देगा। ये सब यहां हैं, लेकिन इनके बीच प्रकृति, श्रम और मनुष्य को जोड़ता एक धागा भी है।

तो अगर आपने अभी तक इस रविवार का कार्यक्रम नहीं बनाया है, एक बार इस विकल्प पर जरूर सोचिए।

और जाइए तो अकेले मत जाइए। अपने परिवार और कुछ करीबी दोस्तों को साथ ले जाइए।

सुबह पक्षियों के बीच चलिए, खेत देखिए, गौशाला जाइए, संगीत सुनिए, वहीं का बना भोजन चखिए और बच्चों को मिट्टी, रंग और खुले आसमान के साथ कुछ समय बिताने दीजिए।

हो सकता है लौटते समय आपके मोबाइल में बहुत सारी तस्वीरें हों।

लेकिन उससे भी खूबसूरत यह होगा कि आपके साथ कुछ ऐसी यादें लौटें, जिन्हें तस्वीरों की जरूरत ही न पड़े।

यकीन मानिए, कभी-कभी एक रविवार सिर्फ छुट्टी नहीं होता—वह अपनों के साथ बिताई जिंदगी की एक खूबसूरत याद बन जाता है।

गांधी-मार्ग से मोदी-मार्ग तक… आखिर इस नए रास्ते की पहचान क्या है?

✍️ मोहित धवन
28 सितंबर 2026

कभी-कभी किसी सार्वजनिक मंच से निकला एक शब्द अपने पीछे पूरी बहस छोड़ जाता है।

वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय के 80 वर्ष पूरे होने पर दिल्ली में उनके जीवन और पत्रकारिता पर केंद्रित पुस्तक ‘अस्सी के राय साहब’ का विमोचन हुआ। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित कई प्रमुख लोग इस अवसर पर उपस्थित थे। अपनी बात समाप्त करते हुए राय साहब ने कहा—

“मैं अपनी बात समाप्त करने से पहले यह कहना चाहता हूँ कि आज भारत मोदी-मार्ग पर है। गांधी-मार्ग से स्वाधीन संग्राम की यात्रा प्रारम्भ हुई थी। मोदी-मार्ग और गांधी-मार्ग जहाँ मिलते हैं और जो मिलाता है उनका 110वाँ जन्मदिवस, पंडित दीनदयाल उपाध्याय का, आज है।”

यह वक्तव्य पढ़ते हुए मैं एक शब्द पर ठहर गया—

‘मोदी-मार्ग’।

राम बहादुर राय लंबे समय से भारतीय राजनीति और समाज को करीब से देखते-लिखते आए हैं। विद्यार्थी परिषद से उनकी सक्रियता शुरू हुई, जेपी आंदोलन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद में पत्रकारिता उनकी मुख्य पहचान बनी। गांधी, जयप्रकाश नारायण और दीनदयाल उपाध्याय जैसे अलग-अलग वैचारिक स्रोत उनके सार्वजनिक चिंतन और लेखन में आते रहे हैं।

इसलिए उनके द्वारा ‘मोदी-मार्ग’ शब्द का प्रयोग सामान्य राजनीतिक विशेषण की तरह छोड़ देने के बजाय शायद उसे समझने की कोशिश होनी चाहिए।

गांधी-मार्ग क्या है, इसकी एक तस्वीर हमारे भीतर पहले से मौजूद है।

सत्य और अहिंसा से आगे बढ़ें तो स्वराज, स्वदेशी, ग्राम स्वराज, आत्मनिर्भरता, अंतिम व्यक्ति और सत्ता का विकेंद्रीकरण जैसे कई सूत्र सामने आते हैं। गांधी ने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की बात नहीं की थी; उनके सामने यह प्रश्न भी था कि स्वतंत्र भारत में समाज और सत्ता का रिश्ता कैसा होगा।

लेकिन अगर आज की भारत-यात्रा को ‘मोदी-मार्ग’ कहा जाए, तो उसकी पहचान किन सूत्रों से होगी?

क्या आत्मनिर्भर भारत इसका एक सूत्र है?

क्या स्वच्छता को जन आंदोलन बनाने की कोशिश, डिजिटल तकनीक के माध्यम से शासन को सीधे नागरिक तक पहुंचाना, बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे का निर्माण और कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार इसकी पहचान हैं?

क्या भारत की सांस्कृतिक पहचान को सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाना भी इसका हिस्सा है?

या फिर मजबूत केंद्रीय नेतृत्व और निर्णायक शासन इसका प्रमुख तत्व है?

संभव है कि इनमें से कुछ बातें ‘मोदी-मार्ग’ में हों और कुछ न हों। क्योंकि राय साहब ने अभी इस शब्द की कोई विस्तृत परिभाषा हमारे सामने नहीं रखी है।

लेकिन उनके वक्तव्य में एक और बात शायद इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।

उन्होंने गांधी और मोदी के बीच पंडित दीनदयाल उपाध्याय को रखा है।

यहीं यह वाक्य राजनीतिक टिप्पणी से आगे बढ़कर वैचारिक जिज्ञासा पैदा करता है।

गांधी के चिंतन में ग्राम स्वराज और अंतिम व्यक्ति की चिंता दिखाई देती है। दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद में मनुष्य को केवल आर्थिक इकाई मानने के बजाय उसके समग्र अस्तित्व को देखने की बात आती है। अंत्योदय का विचार भी भारतीय राजनीतिक विमर्श में दीनदयाल से गहराई से जुड़ा।

नरेंद्र मोदी के शासन में भी अंत्योदय, आत्मनिर्भरता, जनभागीदारी, स्वच्छता, तकनीक और कल्याणकारी योजनाओं जैसे शब्द बार-बार सामने आते रहे हैं।

तो क्या राय साहब इन्हीं में कोई साझा सूत्र देख रहे हैं?

शायद।

लेकिन यहीं एक दूसरा सवाल भी जरूरी है।

गांधी का ग्राम स्वराज सत्ता को नीचे तक पहुंचाने की बात करता था। आज के भारत में एक तरफ पंचायतें और स्थानीय निकाय हैं, तो दूसरी तरफ तकनीक ने केंद्र और नागरिक के बीच सीधा रिश्ता भी बनाया है।

दिलचस्प बात यह है कि जिस कार्यक्रम में राय साहब ने ‘मोदी-मार्ग’ की बात कही, उसी अवसर पर उन्होंने संविधान के 73वें और 74वें संशोधनों तथा सत्ता के विकेंद्रीकरण की समीक्षा की आवश्यकता भी उठाई।

इसलिए संभव है कि उनके लिए गांधी-मार्ग से मोदी-मार्ग की यात्रा केवल नेतृत्व परिवर्तन की कहानी न हो, बल्कि बदलते भारत में सत्ता, समाज और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने के तरीकों को समझने का प्रश्न भी हो।

और शायद यहीं ‘मोदी-मार्ग’ पर गंभीर चर्चा की गुंजाइश बनती है।

किसी दौर को किसी व्यक्ति के नाम से जोड़ देना आसान है। लेकिन उसे ‘मार्ग’ कहना बड़ी बात है।

क्योंकि मार्ग केवल यह नहीं बताता कि नेतृत्व कौन कर रहा है। वह यह भी बताता है कि मंजिल क्या है, वहां पहुंचने के साधन क्या हैं और उस यात्रा में समाज की भूमिका क्या है।

इसीलिए राम बहादुर राय का यह एक शब्द मेरे लिए किसी निष्कर्ष से ज्यादा एक प्रश्न बन गया है।

गांधी-मार्ग को अगर एक पंक्ति में ‘ग्राम स्वराज’ जैसे सूत्र से समझने की कोशिश की जा सकती है, तो ‘मोदी-मार्ग’ को आने वाली पीढ़ियां किस एक सूत्र से समझेंगी?

शायद इस प्रश्न का उत्तर अभी लिखा जाना बाकी है।

और संभव है, जिस व्यक्ति ने सार्वजनिक विमर्श में यह शब्द रखा है, वही कभी इसे सबसे बेहतर ढंग से विस्तार भी दे।

शायद एक लेख में।

या फिर एक पूरी पुस्तक में—

‘मोदी-मार्ग’।

प्रभाष जोशी: जब अख़बार की भाषा में आदमी बोलता था

✍️ मोहित धवन
लखनऊ, 26 सितंबर 2026

आज इंटरनेट पर प्रभाष जोशी का ‘कागद कारे’ तलाशते हुए अचानक वे रविवार याद आ गए, जब जनसत्ता का इंतजार हुआ करता था। जहां मैं रहता था, वहां अख़बार आसानी से नहीं मिलता था। कई बार उसे पाने के लिए ऑटो या रिक्शे में दस रुपये खर्च कर देता था। वजह थी—रविवार को छपने वाला ‘कागद कारे’ पढ़ना है।

आज वह दस रुपये वाली बात छोटी लग सकती है, लेकिन शायद किसी लेखक के प्रति पाठक की बेचैनी का अपना हिसाब होता है।

प्रभाष जोशी को पढ़ने का आकर्षण उनकी बात कहने की शैली में था। वे अपने किसी अनुभव, मुलाकात, क्रिकेट के प्रसंग या रोजमर्रा की छोटी-सी घटना से बात शुरू करते। भाषा ऐसी होती जैसे कोई सामने बैठकर बतिया रहा हो। पढ़ते-पढ़ते वही सामान्य-सा किस्सा कब समाज, राजनीति या अपने समय के किसी गंभीर सवाल तक पहुंच जाता, पता ही नहीं चलता था। एक बार शुरू किया तो पूरा पढ़े बिना छोड़ना मुश्किल होता।

प्रभाष जोशी हिंदी पत्रकारिता के उन संपादकों में रहे जिन्होंने अख़बार की भाषा को अपनी अलग पहचान दी। मध्य प्रदेश में जन्मे जोशी 1983 में शुरू हुए जनसत्ता के संस्थापक संपादक थे। गांधी उनके चिंतन में रहे, क्रिकेट उनके लेखन का प्रिय विषय था और राजनीति तथा समाज पर उनकी अपनी स्पष्ट दृष्टि थी। बोलचाल और देशज शब्दों को संपादकीय गंभीरता के साथ बरतने की उनकी शैली ने हिंदी पत्रकारिता में अलग जगह बनाई। 1992 में शुरू हुआ ‘कागद कारे’ आगे चलकर उनकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

उस स्तंभ की शुरुआत भी दिलचस्प थी। 5 अप्रैल 1992 को पहले ‘कागद कारे’ में उन्होंने क्रिकेट के ‘कोकाकोलाकरण’ की बात उठाई। क्रिकेट उनके लिए केवल स्कोर, हार और जीत नहीं था। खेल के साथ बढ़ता बाजार भी उनकी निगाह में था। ‘कोकाकोलाकरण’ जैसा एक शब्द उस बदलाव की तरफ इशारा कर रहा था, जो आने वाले वर्षों में कहीं ज्यादा बड़ा दिखाई देने वाला था। आज के क्रिकेट को देखते हुए उस समय उठाई गई बात को फिर पढ़ना अपने आप में दिलचस्प अनुभव है।

शायद प्रभाष जोशी को इतने वर्षों तक पढ़ने का कुछ असर मेरे अपने पत्रकारिता लेखन पर भी रहा। मेरे भीतर यह बात कहीं बैठ गई कि पाठक से रिश्ता बने बिना बात उसके भीतर तक नहीं पहुंचती। इसीलिए किसी बड़ी घटना के बीच खड़ा सामान्य आदमी, बाजार की कोई पुरानी दुकान, रास्ते में हुई बातचीत या किसी व्यक्ति का छोटा-सा अनुभव मुझे अक्सर लिखने की वजह देता है।

यह प्रभाष जोशी जैसा लिख पाने का दावा नहीं है। इतना जरूर है कि उन्हें पढ़ते हुए लेखन को देखने का एक तरीका मिला।

आज ‘कागद कारे’ ऑनलाइन खोजते हुए यह भी लगा कि इन वर्षों में पत्रकारिता की दुनिया कितनी बदल गई है। तब अख़बार के लिए अगली सुबह का इंतजार था; अब खबर घटना के साथ स्क्रीन पर है। पाठक की चिट्ठी की जगह तत्काल प्रतिक्रिया ने ले ली है और अख़बार के पन्नों से निकलकर पत्रकारिता वेबसाइट, यूट्यूब और सोशल मीडिया तक फैल गई है।

इसी बदलाव के बीच एक सवाल मन में आया—

प्रभाष जोशी होते तो आज की पत्रकारिता को कैसे देखते?

शायद उन्हें यह दुनिया दिलचस्प लगती, जहां किसी लेखक को अपनी बात कहने के लिए हमेशा अख़बार के पन्ने की जरूरत नहीं। लेकिन खबर की रफ्तार, वायरल होने की होड़, बदलती भाषा और पाठक के घटते ठहराव को वे किस नजर से देखते—यह जानना और भी दिलचस्प होता।

उनकी ओर से इसका जवाब देना ठीक नहीं होगा।

आज उन्हें याद करते हुए मेरे सामने किसी बड़े संपादक की कुर्सी नहीं, एक पुरानी-सी तस्वीर उभरती है—रविवार का दिन, हाथ में जनसत्ता और उसमें खुला ‘कागद कारे’।

तब उसे तलाशने के लिए घर से निकलना पड़ता था।

आज स्क्रीन पर तलाश रहा हूं।

बीच में तीन दशक से ज्यादा का समय गुजर गया है।

शायद कुछ अच्छे लेख समय के साथ पुराने हो जाते हैं, लेकिन उन्हें पढ़ने की वजह पुरानी नहीं होती।